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क्ष एष ताता ३6 10 इताह 0 16 वितल [वाढ एवेह
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संदर्भगलौ निरो, बुध्यन्ते विल कैश्िदेव शचिरादरदैः समू्धरपि । 1 11296 110कदषथः १०९
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दौ 0011116 वता प 1 ^ 11.10.01... 3) १-६३.
|) 1, 1181 3. 1.1
५ [8 ¢ ^ 00त्पकदछाह, =, न न= + दद,
1.19/ क {णाध ०न ०० ० = ०, ०० ०० 9 १ -१.
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9 116 हापा 1980६, 00 प्1086 पञ त 20॥ चत् फार] प्)6 दित म्वा
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लण्फतलाा6त फा 16 सी पील कवतकपोतताक्षव तः तार |्णत् इतक छा 6 1
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116 कप्ापयत) च्विकठा०] कतादाः काहुदछ [दविर ६15 -सकताततमन्यदकः अतत् (116
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(1.8. 3.17.1.1..21211.....11 11111717
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06 फा फरापिटा क्हिहलीा 186 कणद्््काद्व् प्रफतचह #6 080व79ह् [िवर्वप्ण-
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1
{8} -अ्वातीसतादपिकरपमकाषनपानर ; () तत्ाताषणवत वसनत; {111
पवणन; (11) ककष्यादमपवक्ाण्तप्वपमककानवतणद-र्दक्नक्त्ट
(12) त्छाणपमृमलत तक धच -पु त ; (18) गूषणा); 18) कनित्वा ;
1, तान्न कमाता क, दद् परिव,
8. शओीमच्फमहसपरिजाजक्ताचाय री चिनश्वरसरस्लतीमगवतूज्दषदक्िष्वौमपवुद नवि चित्तः ५०,
8, तिकषापफरपा, 0ितनाथ( सुक्ष) (द 4. त 0, २ काच्छन्व्वादा) 26 -2,
1.7१. १111119111/॥ ता
(14) कािवाककाव्यः {15} एलन; (16) एडकतापमण्त;
(11) 5 काकवत; (18) द वकलत्ततकपप्लण- ट; (19) सपकोपकु-
वद्यापत्य-जततव्वक्रप्ाचकरठ; (20) प्चतव्तरदद्ताायनदपष (र पतीला
९५९० ) 919 (21) ववापतनुतप्कुत, गर स्पा ण ।78 वनद्ल-चकतद्रत
इटा ॐ [8.६ ण्यं क्प्ौ 018 कलाक 1180 क] (1888 चािछा171673 {11 पीरा
पष 0४ तरणय (क) 0६, 8 ( वस्ताद ) तमानकृ एटत्थानह
1 8 106 (र घ ६४ 0 रा ० पण 10 ( क्नाण्यवववसतुतकव)
(४) १०, 12 | दाधदवण्णपातष्व्यएपपााछ दद) मुष फपल
|| क, 1 त 1 ए 1 1,
6184 ०1 128 -उददुकक्कषौ, प्र 9 { ०. 11) 1/1 उफ्णुतवा]र 98 05 कत्तं
दण पष्ट पापा 8 कलत ठता 00 110 तिनि 168 पएाऽप्छ
ण ना8 स्ो6 प्य; आत् (द) ०. १ [ सताच्धणलतननकतप्दरतापकातं)
0608156 ९१९१ 4 प्एत6 पण्ड् पल्य 1 जड 10६ 11 ऋकार 86 त प्र
( सिधकादगिकतछ) १0 (द) प्द्हः हु इप्रालाप्राह (0४) साद्व धि ५. 9
{ क्ष्व षनद्रत ) ऋणात् ७ त्वमाशु फकठणद्ठ एव एहठ ६0181 ०35 118 (1118
५ 8 घातस्य एक ष्य ५) 16 तद्ज एपनल्य ५1०४
छा (व्रात 19 110 सत्रपतद्लापाा इत्र इश (पिच शा.प)
9.1. 1 1. क. 011 11111111 .1./198 1117111.
एप्णृछाः एटठकप्सर {15 [अलः 8 11 तिहर च [कः कणः एक 5०8०8 ए ७१
श्य् {16 [त्राणकहपा हप्कणह {4 पम 6त)9 उक्त, धमप च उत्का सि ध88 चव
[अ] ष्ठतनं एड } षड {16 पपा ऋधिा6 वात स्तत 100 1107 58? 08
1.11... 1.1.01... 11.11,
० #18 (ए पप्वकुणयतदती शहएतोड 15 ॥8४६ एजूरनह्प् चौ धत [88 शत् पकर्म
{12 त्क्वलपवणकष्य 71 5 (ीक्षपपाषलतक् धा अदालत इ८८तो8 ६5 18४४
सूल फ धौ पर पक 3 +र 18, प्पछञ प्तप ६19; १६ ॥॥ +, 1
लं दवण] फतह ४८६ कवणपद्प् 1 चल सकाः 9 1८ अववा
कला, प्कश : 1) तत्ण्वद्वजवत , (3) नै चक्ततिष्काष्यत 00; (8) ए ताप्र्
प्व; (द) सदु पक्व डका सिवय (5) कद्वव;
(8) दववस्तष्लस्य फल प्वप्ष्वनवप्तिव्छद ष; (4) क्कश्वेद्वतनण्ठन
किीवकावनक-चुवद्धीकुल र (8) नोवपसानष्ब्वकिण-कः (9) सीष््क्वद्ः
(10) तवच; (11) वक्रवण्दकाप्याद्ं पणः (12) वदान्फण्च ल (13)
एवन; (14) अण्वन्ति ; (15) स त्लालपत्नणं दथ 2;
(18) 4 पवकम व्छपयणठ छाः छक, (17) दवपवक्थवच्वद कवत धपत्
(18) दत्वा 0 (01556 61 दहह धि्ाका0११७ प्प (प्र
दिवसा ७स्त् 008 पणक्रठ पद्णशक, 1111, 1.1.14 1.1.111 ऋ. 1/7:
1 131 411 2.111.715
1. 1४ 7, 7. 1, कतिप्तप्ह नीप का वजप पजा (0808 आ > 0णतच्छ
0६ १ दि, 0 111. 111: क़ िप्तााडम्ति 3 तञ वितणडककत ऋता तहि कषर
4 [0 णीकृ 15 पात् ए कक्ल्प {कसती डपकाण्लप्रष व
षत 16 चा + [कषत एला त्नाः रक, वय प पवान्ै पा 33 न
एववा 1 15 पौ: {08 एता ता य ०६१ =०९॥ 1 01१ वणका 100
91101161: 07.76 -तणच्चप्कः [8,.13.9.1.11. 1.1.15
9. 4८ पतप्वततदचछत्ि न्ष ¶कतपक* 3 ४855 ताद्व) (र्, 20 924 26;
(धवार ( धिष सि १५1५४ | 10, 10 ५०५ 1६,
।॥ 77 प्ाक्तत्र.
व्रणिताः प्तलतलं 1 ४10९ [परत्ना प्रं + [8 (णाह त 1 नऋ, गरा
पाऽ पणा 10 फा 8 50 धा] का पह चापद (9 ताण पप्य, 1 का छणक्नप्रुटा
[1/ -1./.11.3./41/1.11/..9.1.11. 11110171}
(1) तवर्छस्वनवदा,
4.5 र्ण दह पीतौ पोादह्वप्ह चपल 4 पाणवहलतक कवडः 0६5/ [लेणडतं
पाद 1106 दमण हयीन्धतुः 0 एितीाक्राक्षपत्हि 0 ॥8 ववर्ष] अलात
१. 1. क 1.9... 11.11,
साः 0888 चत ५ पणम्य् करणा 8 तणााकलााद्यमप 1 प्रक्रत 0 > सिवद
०8 [0700 प्र 8 हिप एष्व 8.0 09 11 (पद एप्स कह पिकापफषप, 1
छा 18 धौ दसं परि प्र, द्दृ पृक 1४ व इक पि (5 चाकारः 085
8०९ छ] होता 18 {06 इष्टता 5 {18 चर उ एी्छवप्रणैदा पार #0 11176
(3 प 9, 519 पणा, वहता सात एकटा, 05 ठणणपणण २0959 छ
४5 दाव ण च्छद रा कह तणा एद लौट]0645 वादका 18 ४ 196 णण
सील: नाप सतह ६... 9 (06 द्वमव स्ाुच्छहय एक 108 1[पलएपष
तष्य 0षहोत त तक्र, 8 पल्ल )15 8 115 [1 पड(तर प्रह 1२९४ ण + 31९
प्र प्रा णता, > [तष 1 9 75 तडा पप
0 ्ावपल््योष्यन, प तततः 15 8150 पानद परस्तं पर
1,1..1.8 81811, + ./ 7 | क 0) त. 1.11.
शा छतत 77 #च [ता वत त्रतवद्वतवत 09 कादौ 1898 [दशा
एलका एं 10 106 दपा 85 18 करर रण 165 आनी ४0 खारि
1088 066 राहा #0 1 प प्रणाद पत् [एव पष्य काम विह, विया कदु 80
15 चपप ण 106 ल एवल ्ाद्त 15 8 रहात काटा) ६18 ब्रात
धठीतत्र) शत् 178 7एतैलकशतीश्ड 1 पह प्िप्रानो ए प्6 श्ण तौ पवष
ठह [वति [ष्का 9018 ४ दण) पैः फण #एत ककण कडा परयत 3८6 1 पि भं
विधं ।5 7 19 116 प्रत् 7 0 करार = एष्यल्य | ॥115 67 ण 08 फा 8
8९ 10श्]्वं स [रष णवर हल्य णल्छ #0 रवति उववकधव 7ण 08 जत्रट 06८008
क्ा्ष्त् 7 कषादाणद्ु ठ पह काच्मणाएह्ुढ ०६ ४6 उवा, (176 एको 0618
{कह 08 २०॥ ४१5 वाहटः पणता 58 16 16 पप्रा क पह फण एण 006
धा 95 1191 01 106 सवपती,
(2) ववदारण,
गप छा [0 ष्टा एषण६ैहतं 0 ध) नि प्प दक्षः एत्व, 10 ६06
तठापचाणु पदा चीच्छदाप पह कदी श्त 10 [तण पक्तृ छाल) 6 1
पए ठन, चत् {116 ८०160190 छ 45 दं 15 धफठः 1106 हका ह 88 {1191 8६ ६16
छत् ०? 18 सातरत्तवकष्ष्, धार चणक पदाः एलाप्ठ पद 16 कत
वदकै" छठा ३8 पाह [तलः (राक ६106 फत् "पए 15 कल्ला
{ल्त प [धता पसव 606 4 चवाानध्वकततं 8 कसला चः [द्भ जड प्रिणल्छि
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दततनिदौ ५५,
१, (शत व व्य क, ३42, 417, 480, 464 459 कण्व 995.
4. कयत कण 3, ७० करणं छदि एशि
9, दग यत अन न 8५, 898, 411, 634, 067 वकद 986.
0 पती. का
88 #5 ऋताः णा 16 धव्रााह शप्र. 10६ [तततवत पध; 108 [6
धत्ते एए 106 चपाठः स 18 तयद कऋता आ 10६ सवतत एष
पाद्यः पठा 5 [88 (छया पषात्यकनष्पद्ुचत् एला नद छठ [15 (एकया काय,
(ॐ) (तापचावतद्.
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1) 1. 1.1. 11.1.12... 1.1.
६ पाहत पिव्ठापडट ह एच णमंपड्ट शत् हदवं ज पह फः 85 ६6 एा०४्
क ६०8 र8 17 07. 1. 1 पीतव कदत दु सकाश ककन, एज, 17 9);
18.9.21 1.311.111... 1.1.111...
८१ शाट (त उत ककत ५०६५ पल्ला, अददत्, # 06 त 88 [षतापैल्य्
प 00101666 फर छ0पाच्रं ॥96 शुषि 7 चय 0 एष्टा. ८1०७६] #2॥1 (£
छता ह्च "ुा5 शएाणपह ध कात दए" 1०51904 91 "5 ९०१8
{1 दए 10 ४ 1४11 कए णिः » पहछक्तप श्भ९11 15 तकणाक
पताक, 15४ णत 15 एष्ट वरहाठितहपै 10 श ताद 10 06 करन्द +
0068 7 1116 4 तकण तकवद ततष्ठा, (९ 10 ॥6 धतत पए
70 6५6 वपता दता कवे एण्ड तव ६4९ दवप्वपततुध्णतर कषक ण
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1 81 8.1.11. 1121111 3.11
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11.411... 9. 1 1.
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18.11.111 3.7.11... 1 1
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71७ + एणा एप 175 10916 का, = (0प्णृामह 055, न ४८ ल्वताणद्व्-
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| 1 81111. 2111111... 1.11... |
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11811141 1.87... 91.
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1. कक्रकाषकक कतकः जगाद 1,01.11. 1.1.111... 1.1
च, क सतम 70. 99 कच्तं एष उपिद,
3, ततवत सततां 2 254 2, 4
१, (था पिह दा 7, 587, ४0, 477, 64671 045.
5, क त तवद उत 2. 4 2
8, साति सरलता ३, कर दाद दहु दादि.
7. वाकम सवः [भ णत 2], 74 रं 57,
का 11 1.11 01111.
प, सानक्ातः अच्छा व उल क 9 147 क, 12) 20 27 661 78.
॥\। 0.4.1१1, 1171.
18811. .811...1.1..7111/ 1 11.1.11
16८ स्य इहलः #109 कणा "एव्र 18 २8 किण क हततत प
६।३।५[६५ 7 1115 (वताश व्फणणण्छ् क् 0्वाधोव908 तपर, 0
171. श त | 1. 7... 1 1.
1078 00 लाता ण 118 दिप्त पाप्य ए धह चण 7660९610 ४0
11.1.71)... 1.1...
=1/1711.8/-11..01.1..11.912..1.1.11.2.1/..3.58/1..1. 11111
(५) समाकु मवकतकमपुकाश्वप्रल,
गृह [१8 ठः [ततत् आणा क्ति पार क्लम् ऋक्च 116६ 1 चकत
कणापाताछ ०४ 9. इषा भं 08 [9 उनम & 168 1196 एणी 8 608
ल्प 0 116 चनि ताषृन्णाः दत 5 ह्वी 1 11 ताह कराोपत क तीष छौ
18.091. 10. त 1 3.1)...
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छ 6 फणत्प् "एगध" शनिः 6 प्य् मात क्षत, किक्त्फाभव्
पिए 1 105 ऋणात् "5 पपतैषलवही न 36 कापट 70 पीतान 80 नि ४5 णरा
|, 8... 1 7 १
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{छा 6 इत ्0, - एावणताठ्ठं पतत चतत तीन छलक पिष परिपा व्य (ह
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छा प्रक्र 5 15, 7 च्ठतीपलाति् #ल7हकार कि कषक नीह काः वहता
समए 1 ६16 वरकाः क], #6 धक धष्राणिष ॥0क चका एनत
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188 चह 89 10 ॥॥5 २०१ कादा ३४ 116 एषह छा पा (णाणव ०0
9. 1 21189 1 41 1.4 11 4.11,
छो (धः प्र, हाट वंह पणा 00 पाठ ॥0िककर्हाफा् $€ 161 10 पण्ड
|. 1 81.11.91.
(5) (वु ूणम
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शवथ, 1 08 06 [णाति छु 15 कपहदि छ 00028 वाछणप्ु की
1181118 3.1.942. 1
लाभदा पला पाला 18 ॥ एकापएठा त द्र ववाह कणप 85 1084 9४ 116 के ण
11९ एफ 50 पित हटछयत्, प्प् अते वजत वौणुात 0 (16 हक्का
दताः ६ 6, 70 क्क, धह काप्य [फ् [दपर दपण ४1 णश् पन्च
श्त्ाडका॥१ 05 118 पराप्य. 5277101, 108 075६ 111६ ए {18 [मक्ता ण 1115 5 एहा४९७
प्रि ४ प छ्ण्च् ज (ह प्राह ॐ 115 चा छव ६155 076तहुणत्1एु ०6 ए
1 दफतादणी एला६8 90, १ 19 च४6 व वरणहलाधतति पय् इकतपदतभुाढ, कयाक
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तलाः प एद प्णणत्िण्णश्प, त 10१ ठद्णत ॥्ष्लहण प्रणत 2. 9].
16 0 इषा, 69 काड्णट) रिण 0 कतीपपवद्द्दद्चन्तहककाथ) 9 फा
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1, 4441 कवन कलास हर षा +. य ©, 14947 ५4 46
{पत्रता षरा
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1.2...) 7. 1... 1... १ 1 1111
8100 [6दु्तं ए 1108 क्ताः 1 [16 4 ककद्वकतवां 85 13 छण क्रु, गणड
188 कषर 5 एव कत्रः १६108 ४]९ फ 9 08 [चा ज 116 कता च 1116 काण
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(0) पकद्व ©" काशत,
108 पिष्ताः (|तत्र ती चां कणाः 05 ताद [ल्त छ द्रा प्रौ
(14/01... 21.1.28. .0....412...2..1111.11
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छा ४05 9ठ। ्ाज्गछछ अण 118 एफ कए ४08 0087 ६५, 195) डा धल
हन हदर् एदा चत् 7 ॥05 0 धद्य = हु 8 ठ00दपास्पपुः ३
एष्ट तण एण्ड्टत् (क ६1९ कणन वरपाह्लुतः 4† 0 तत ० शद् त]क 060
18 ४ एणएृणय 00 (न [ीणप्राचट चष प्पफहकु : पठ सात8......10 116 नवध
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एटा 816 च्छकलातटाः त्वं धाक पहा ज गिन्नोसीपव् ०, गवादय ऋ [पा 9
काठछाः ३ 16 छ पह तक्ाह क [5 (पाते एडणव् पदा जा षह ह वषत
वैस्तु [पतत] हक्पचणद (वक्त) त 18 एण ४1 कल्यः 0६ 16 १016 च्प्रात्तः
धत प्राक 16 {146 19 115 पफाल वाक्त 81118 19 ० [> 17 1118
18४06: 18 88६6 ॥0 कर्थ [0 १९18118 85 70 1157 106: पचित स इह्छान)₹ ६16 [कता
८ क) ००)6८६, 40 05. आदह ए क्व्िभव्णुपलकर बत् 1 ५9६ प्क्ष
णतं 23 ०९ ५५6 इदता६ (11852 19 18 35४६९ 10 7दाणः {० प८6]8 88 00 1118
ञः 10 एद 116 पतिक |018 0 ४ ०४५8४ धक, 46 व वप्दादा- लकाप््च
छात. वात 13 पण्ड (ठ वासक कवतुद्कणा कणा] द्र 10 ५ ९८२६ ०६
18111,
(7) -ावदनणव्यसुमषकवायतद्कत प्त.
पाध ह % पकाना ०9 छक 08 [व्क एलः एषा, प्बशात्रनकद्
1,8.11. 1. त 1. 1.71
0 (शः (ापासा[81158, 9 19 38787 ॥7त 1 0 (फी णि 121 0111; |
एिप्णप्य्टीदा त एण 1 6, 1955 ५ 7, 27-91 प् ६ 8एवह १० प्रह ०६
5 20 ढक एप्त 1116 का 08 10त्णा 85४6 49 [3४8 ए8्य # जाह ‰
एता एवा छाछ 1105 फ०18 एठा छद 8 (ुषव्न्छाः [30 6 2) प्च 096
पा ०४ 0श्छ88 11९८ 1 90 &010 00 छत् [कक 762 (7 39 हलसा पपत च
1116 व्यच् --"" 41] ५0५ कण ६। ह छ एमा त 111९ हा धह ०६ ए] [46
ह श्तं छप 08 10 १06 किदप्कातपततुमकच, सिदपार् फ हवा का) ७8 51१६ 1878
1150-4. गुण ०९ 79६ अछछाा1 10 1४8 [च्छा (ताछ 1 118 ५115९118 | .1५3..31.
प्र ७8 (णतप, 08 एर्वलह7९ ६० ।116 द कचवताल त्थ लाए 115 1 18 प्र"
प्छ 91116 ह्मया6 उप्र,
1 0 कण अद्ध ् 744.
२, इतिं अपदमर्बसषरवाज्का दारं धीपधुयद्रनषएरस्ती विरचितै नगवद्धनच्िमायने ५५,
१, 46४ नयपदापीदि कनः 0, 14. 7" 84.
4 [एद 8.
7. मक्तिरसरात्रुभवग्रकारशच सर्वोऽम्यस्नामिर्मक्तिरस्रायनेऽमिदितः । अवापि दियान्विकषयते ।
॥१॥। 1/1 11111111.
(5) -आाग्धाक(ा०- 17,
१1९ छलं छो ब्रह 5 त्मोचछत् ४ 06 [ल (एणफुष्ल्प् एक सिला
पत १ कदत [प्रणतं का पभ्वषल्रा0 सिणिकपसृ त एण्ाछाधमक
एए 56 पिका लव्यः 0५, 1 शृणृया शि पत 148 एटा ४8 प्ल 9 1
छते एवा एतना एक्स एक् पको छत् कणणापतस्त क कति कु उणकारीतफ ६15९
4 लाः] ए 1 शणता(भपल ६ छपा ७ द्व् कड [४ विथ्द्षभौोत्रफाढ हप
॥॥8 = (पलप 16 एए ण रा पार एदटाछणह पहा कठ 10 पाद्म्त (ाा
87 1168791 एत 5 +| तत् चतरत 19 एष. वप (णह एप ठ 78 (एकह
॥ 130. 2 3.1.11... 1. 11 1
8॥ 109 ९०१ 15 8 २ द्णुणृणठठ ॥9 0६ 9५५ सीसा: छारवृह 1
लफट च ददतातादष्यह एकाकरं [ए 176 [हकणाञ कदितशोत््चाध
इथ्फवत, 9 एद अहित का 16 [पद 166 णा (6 [[पहद्कतर पड प्लवका
ताडका 196 1 पर्लाप0प्च तवृ ठ एष्तणााााकणोष्वत, (धक {0 ४१६
एता [ला ०086 एषाहटड 26 क 27 वहात 18 ॥ पोह हदि ॥0 ६१९
[( 1.1/1.1..1..111.1 9} त त. त. 1...
11111719 11.21 111 8
पा्पछ]क्ल्वपतीा 8 ४कक्षा। प 0.1 111 1.11 1, 1.111.111
[88 116 ककव 19 ४118 ८ठणलुपदाणट्र (तक्र) 06 4106 दता यात ९0 ४९58
॥1118..31..1. 1.1 1.1 7 19.11.11.
छ छप्राः पाष,
(9) (गवकापतहतछ,
¶17115 क्रक 10 {ह शा 0 ता) 1 चि काल्प एक 108 एता ॥३5 एवल
088 0६ च्छा हण 1 शण 10 कष 05 ठण् तिक भपप 113०
91111811 9111181 1.111.111... 1.11
पथ 00 ४ (९ 7 ० ४16 ताला पातात्लनदध्त कधि 8116116 कवीीष्वप्रिणात् 166
२०६ 118६ 17 छपा 1 ए ४९ 1) ॥19 भकृृष्धा7६० छ 90 प्रहृष्टा पणा,
शद ॥ण्कपद्कि 10 एण्ड एवद्रत्।॥ एता315 17 [त्यत्र चव कि इछता 01 106
11४6 {# 165 901 [षह चप कतवा णठ {त ०108 प्रप्राप््ह्य ण पृ छ पपरा कवक,
(1) (त ष्च.
पातत 8 & साहा ता 118 कित ण $ णपश्त्या पता 15, =
छ & एफ् ६ प्ल छप ण पी क्क दात्त. [॥ छठ [पणत् छ (लहान
1 1920 क 1४0 30 [एौाठवृत्रहछा छै ४० &" 51118 ०7 12४९1, 1 18 प्री # 16१ 1090
५, 1... 1 9 त... 9... 8...
शक्रहा छण शवला त पी पिला 15 1 छणणणणक चठ तषठ णण क्ीर्ठौ,
षार "पाच एह 118 रधक [९1051107 } ० (९,,..,8 19 10 (116
आनद वणप ए ५५५ आप्रदक्णाह पषणहते, चलत एकु आश्वाव्रव्ततशक
दणणवपष्ी", 6 पशा प्यं 5 श्रीका ह (प्रती 5 ॥प्8 पाकम 007 1४, 17
1. धति शरमत्पगनतंसौमदिजेचरसरस्लत्तीचरणारविन्दमघुपशरौमघुसनसरस्तवीविर विता भदिन्नस्त॒ति-
व्याण्वः सुपूरष।
(क 119...) 0
8. इरि श्ीरोपदेनविर वित्ति लायां मदुषनत्रप्लतीप्णीष ^. स्कन्धविवरपनू ।
शग. | 4
15 188| ० ।116 88 एषाएवल [४ ३9 8 £)6 छतं त ह कपा, {6८ 78 २८४
6 ब्म प्षाह छ 116 काद्र करोप्ताकान आकु पित्रा ऋणिना, तहा
19 ०] 1# शशि शणतर 7४ 015 ॥ शाक ०६१७ कण्टः @[ 116 च्छतः8 श्रः चतः 18 पड
कताः ससाहदठप् 1 3 छण क पत कप्य] षप वाहप्छवशप्, 89 तित 84 व छा
फा, षठा छह पीलटाह प्राक एकल तेवा ति का 7 सधा 106 णद् प ठगी
ड पस्व्पतततक्रा9. इद्ाववफाकति 88 ० 788 70 1 तहातट्छ कः 105 छपा ५
108 साववात्तापधण्छसप्द यत् 1 54 06 फणाः, 116 6श्वपाल्व् स्वह ण
1184 णाद 10 6 (वनय पपं हिला [हर [0 फणाः ॥१।८् 14 ४ 5
पणः छानी अवछद्ु कोण हुछ भश त् 10 पद 80 हसै गा
हौ षाठ अण्पतत्ण श्ञाणफ्षति ऋष एकतः {० 4135 १0 ६15 णीः छप )द६,
एण, तणता ण एाण्वपप्ाशदवुषः ॥0 कतल पुत्णह छठि {४ ६68 [पद्लण्वपफ + 178
िष्हाचदंठया छा 1115 प्वतोप्ताकवा्तण कषह्ाष्ठ एणषणकु ठय प त्वात (्ान्धार,
{08 फक्त) 1०१ 94501 118 [हाद 87607 छा का (106 हापा 08) 118
कणत ४० ॥१४८त [७8 0? ॥०5 शावाजन्त/ ५ 185 ५180 08६ 85 7 198
ण्ण्तपहयतठ ६0 175 तलाक प्छण। [दत्रः हतर पण, 1 पनद्व फपतण
शौवण दण तदह, 1 पाकुवठं पः 0 80 पौ 1 कक पण ता 86 फ
५1810809. ञछक्व्; त 1115 १9० ऋता, एह कफ पीरा [ बु
118. 3,1.08 ./911/ 8... 88.
रका पाष्या चाष च १४ 07 पष्ठ 0 0द्पत अता. 407 5 दसत, ४10
1 1. 81. 11312.
कन्त फा हु क 1 कपत 88 पत्त्फवदकतता 10 इधन, शठा 0/४
आटा? 0१6 तिक्तवा वयप छाल ण णपा, # पतर छ 5 तताप
छाफलं फलय ॥16 चरतत 9 1018 फ ् 87॥ 1 116 क्रत पराददः, शिण (ह
पदयात्रा फ {£ सवातत ए हास 16 पक छ ठत वक 16्रहणाध
छि 9114# दला, छत् 15 काना तत्प्रा १0० नि कणाद, 11 काल पते
तेश्क्तस्प् 0 08 ता च तत्रि सप्ती श नित रत्तं नृणा त
र स्वाह ० प्रह पणव ततारक एषां प्रहर ००0 णद 9 ल्ाः६ 188
॥॥7 1 1 1 7. 8.1.91 1.1.
0 कश पकषत१०॥. दथा एत धच 10 15 तक्वा कााछकिताः कषः ण्व
पप्र 8 0 8 ०0४ तेहणप्तष्णा पा 1 कप्हठाः छ कर सक्त ्,
(17) वप्ता,
१18 एणनुर 18 ६80 फा 7 वग्न्त, + [पणन 79 कतणोप्त--
710 (0000119 7 ह 9 3000 10 1098 तास 10 द दत्पणाषप पत् 18 पान्न
छजाघासौ 17 कक&कप् ठप 80 हपादवणष [ण्ठ ९, टता ०0 # च एष्टा पठण च
61111188... 1...
11.111. .8.11.. त च. 1 81.18. 1.9 1.11.
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फा) 38 त्ततः उता 10 15 च्वाणीषा ६6 प्रफतद्च 16 द्याप 60 08४8 [ष्टा
सप णडछप। ण 315 पाद्या इत्रायवन्ा॥, 1 पषण ०१ 1118 507 ज श्चकापत,
गाह 15 ४० ड शाहवछहे {7 16 # शक छायः कता 9 116 काका 87 116 1118
@{ 118 प्राप्त द्ा००६ दपा 1४165 चत 606) ददता, आ, + अप उदित
(1 1.3. .... 1.111.189. 11 0... 11.11. 1
1, जातक कु दह 2, द, च. त, 79, 1 ऋ 15.56. ।
3, धमाका 0 1988 4. 0, ड. 41611010 2. 8,
% ति"
५ 19. 91111119 18/01
11111171 0/1 1111 1 1118 11/88.
11111... 1,11.9. 1.9.221...
शीध्ााच 38951 0 प्रवल # वज्र 0 वाान्यस दववणद ततत् तर्हि
पसा ४ एका) 08 खा (ना ण ६ स्वपता, पिह पक्षं त्रा 1. गरताकृ
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ष्ट्तताइठ 10 तत ३8 कतवा 1 ह नत्रकाल, 1 तीक 0 [1 गप्र्ाक्ः
एण्ड [6 500 00 रतातत छण िद्वशएवाा9 पा 115 स्पा क दिवी धप ऋ
| 1 8. १.1 9, 1,821.7 11.111 11
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८0 दा धाह दज चाध कष ष्च छा पप 51०४8, तष्णदत ॥115
2... 8.3.111. .1../1..11.1.111/1.1.1/.1/,..1/3/1.1..53./2..1॥
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(18) < श्त्वा
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8182 ठह. ॥ 015, पणठ्त, ए पौ 1 1878 छिप्णप् पार पवष 19 0, 7, 1 १1183
वचा ठा सा 46. =+ ०, 1677, 19 चण्ड वण ्एण्ठ धह प षष्ठ [प्र
11 16 15 वन्हि पिर प्रह क्का [त 16६0 दण्ट 0 तक्ता तेत्
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च 106 द्वा फाल का छप कप्त, पर मणा एता नीहि 8 कषरश्पं
हौ टका क 00 रकल 11517 तह ऋष [त्फ] ताः तारिद््णौ व
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11917; 111... .1 1.3.111 11.41.
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(16) नदन्तः ठ छाश.
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08 18 & एवतदद्वन 1, € ॐ काका) ६ वपर तन्मह छ क| त्रहवा)6 पह
ॐ ( भुधप) कधा ण 116 ाप्रहत्तठपम ततहोपततकणकृकतषय, एहएफणतं ॥ 9
पठत 101 ६19९ कोष पा0०४६ वदिता उमा [रिद [0 छण 0५६६४ ०१ ५१8 पणाः
0 4१17० ् (लि , 0. र, १0 ४0 शा, 9 # |
1700 0तााएप" ऋ
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पद्ा वल 10९ वतः क 46 छो) स्ता7 167 ादयठा एडु वुं
प्राशि [0४ 10558 छ 6 फकः छक्र फण जा 0 वपषः, ४ च०55 70
हद पहडलाक पष्य 10 108 1 छ 1115 १०0४1] ऋणा,
(77) क तन्मी.
1 11. ए. 0. त ष.)
8 त १,21.8.
9, 0. 4 4, पद पह तप चषप्ाह छ धह कपालः पान्त 88 अण्व {0
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(8.1 . 11... 1.1.111... 8.1.112,
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13111. 10.11.111. 1, 1
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च प्त ता छार च्रणाः, क. 08४ 808 0885 8 7 115 [पकता
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वणप बं चक् (दु प्रहस कठा धाह उलवत छा फरक 86 © ६8
(1111. 1... त. 1/7 3. 11.11;
[ष्णाव्ातति ता 1106 1८ 9 017 प 87 11859 {16 01007 ता वद्वत्न (ह
1... 118 116 1891167 18 15801106 क छाः छा दयौ8 01 11०त्॥प्-
1.111.111... 1.2.311. 1 1:
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वाठ्एद् 11186 पाह इप्रप्रीका ० पीता पाकर ३8 70६ वश्व प्रधी त्व. वपाक
प्रय} #150 81901 (्लवटक9 05 6८] णल् पणि 106 118 07 116 ऋण्लपछ ण
णा वप्प््णर,
1. 7, +. 25, 5715-4,
१, एण, ऋ 7, 1-16,
3. 6 एस्लक( 011द्ु उ्ाक) वह 4। 2, &, , 5
शा पा0एएा०४,
(19) ककाततपृणच्पनवाततक
पुति पवद कड [एटा # [का छित तह कीत पण6 क 1. एग
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12.11 11171. 7. त त. 1.
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[11111111 1 1. 11.119 8111111 1.11
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1181. 3. 7 1 1.9 1.1.
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एवत्र पवयति, व [णह [प्कहुणौ एत्र धार पृप्ठडण्ण व्ण
17 116 1 0६ 6 वद्र फु पि 7 पृण णा 118 एणा तका ऋ)
1,18.1 2 1 1.1. 11.1.11, 1.1
२९५ छठ 218त (2 [९ 0115 ¢ पटह पा [भण पा 30 [ह वड् एकततत कात
द् 05 पठा2 [ञी 0 #ह हाहा ण 109 वदन्नप उपप य पणा
पा] [द् ।वद्द्ध्, पश] ५96 कपर जलद धष्ल दछपलीप्रय #1४४४ &011109=
11111118. 1. 2.11... 1.1.831.
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18 [पप्फत् चणा वा (96 उप्क्ित्ध -एषवहर छ ६06 (ल पण, ह
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11111. त 1/9... त. 8114.
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कद्थुव्ष्ट प्रवत् -िप्मकाणम्यकवतयत, 1018 प्रणाः तयण टाक 09 धरपणकक
111 1158. 10.78.112...
दृ व घ, ५16 एला) 9 ६6 हदत्णीपकृ ० 06 ४०1 द्रप 9४ 8
7 ठा क्वाप्यत्र 54 15 एए पप ० (15 30 ऋष्क 17६४ 1116
वल्को अ(कएल्नाहहतठया @ 11676 078 9 ४1 चछा ऋललाद्दय ऋ
च्छ अर्श ०९ पराहसत #9 पह [ष्या दत्त एफ धत त्वह [0वीाप्पम
पश९]४:--{1) उप्वनौत्ताननतष्ेा; {2} त काद्रवन्वकल; (3) न ववमदवताग्द्षः
चाद; (4) एल्वन्वपएव्; (7) स्ना ल्वाकप ;
(0) (नीव; {7} -अपपाणतवफएवनकपतकनष्य ; {6} रषा
कीणोतणणक-ष्त; (9) क क्ामाव्गणनक् (पधाववीणट् पाह उगा्यन
वन शषा) (पणय (10) 1/4 11. 11.111 1४16 ८९
26 (68 कणा प्धणणुकु--(1) त] त, (2) वग्रवतोवकतवश्रवदद्लक
काना (३) -वककवफव्दवक क चिकणा धाह कण चह 9 सि00णदलप ०1
116 उद्फा७ पक्रता# शप्तौ 08 कावड [वं ६५ एह 0 छत्णकृतभ 95 0 16
हवया 6011107, 970 1197 1 दात अाः8 धौतछट ता ९ एकाद, पानक =) तत्त
1 पिनष्लतानणतो सकत रत ज, + 7.0 2, 7 साध्य ककड सन्ति
2, द ॥ पिक
1,01.111 1111101. 0 १ ३।॥।
निग, (2) चदायदवपण्पा कद्वद अत् (8) तकता लनम
धपा फी ऋ छण लणावेलण 06 वधात् 11085 ह शष 10६ 116 शर्णु ता
६ 886 शा1॥08 00४ त त्तका पञपा पोत्र उपला एत् 118 178 चकर
धाह प्ट, पश्णठ] 1) त्वव, (3) 6 तव धल्व्व्छ-1 ॥7
(3) 6 तननवतीन्सपयल वदद इकति हि फ्ात्ल् क्त्री) तठ चक्रता हा एलः
पणी साध दन्त तत्हप् 76 क्क ठा ६6 0६06, दता एला ण 1 (वट, 5 शा
५16 1009 0तणलाच्रस199 105 6८ 188 करतपह ५०५ य दछटडडञकु 7867 १ ताह
#0 ६08 चर चपलह एप [द्वा 16 रहातन्रीपण हां पदर पह धत डा, पौष
946 कड, पवात्) सकता; (१) वपवभ्ववत, (5) नक्त
तमद्य, (4) एवाभवत (त) उपचाव वपत (9) एकव
ववतरण 8 सकवक फप्णोञ कः ४6 कणु ण ६15 4१०१४ 8000
9११ 118 105 शा, करु {1} ष्क वा्वः (२) द्यून
शपद्वनषद्यजवकुत (2) अव्पाताणपवच- ह कापु (4) जह वववाणकनपषुन्व पु
ब्ध कृगृष्ाठाद्$ कड 0 16 पापं हण छत [9 लष्ठ वा तावा 1८ तत
पणल6 [8 [हहा छतफौ0 क ताप) {0 का हणाह छत एष पपा छक पप्रा
1. 1 0 त. 0
णाह पत् उपाजन) 0716 ष र्शर 6 त्का 0 7 फे हतप्ध
१९६ [णच चव्वु््रण्ल्ये प्व ६/९ [16रि-उतप ण छपर धाता 85 नि 85 1 ८8
1 1,88.11 1111.
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0ग्वाशा68 5६/८1) 9 106 4 01101.
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1818... 11.11... 111. 1.31.
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108 णवं 0 ऋपा ॥8 एव हवुप्रठतसत्, ॥1ह [01868 धा 01886६8 काचा 116 [9७
ठा) विण 172 चपष्या 0 8द्ण्चकुतच) 115 तपाः 02 कृषः 0 ऋणाप्या
1९ 1१६ &६, प्र] ५0006 97 {11055 फासह आत ४त ० य८य कृ ॥६९य 59164
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इ्ा6७, 1५86 ॥150 पय 8 [० एणदुप्छकृकल| उषट्छतौ पर चह पपी उप प
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कात व्य प्र छह {य प्यक त्र ४ (त्क कृपान्प् ७ 0). 5113-2:
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प्र 118) ्ष्छ 19 (8 1णणत्ठौपत्र 0 भी पव द्चतः 83 000
8. 1, 8.1.19. 1 971... 11
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1. -- 1.8 1 त 1 1
छ0वकक॥॥१ 96 16] पष्प 19 ॥186 [णाह ० [णतु + #6 ७४ णप [तषरष्छ
11 1 11.1.71... 1.1... 1.8.11. 3..,2..
18 ## प्रणयः. 1 80 61|| ठ जणा ढौः ६5 प्िताद्चण् पप्य) 10 106
[6०द्छ९व् दस्टाच् 19 06२४1 २0 ए छान्ाठ8 25 प्त एत्र पाषा ह १६११९
106 5६ फटा] एकव, 01१, 106 [787 [ता 7 [णात इलव, 19 {1) 8
0 10 218, ककर ल्माटव् [वद्वत्र 1 119 पवः ८ 2671४
प्रश्नः उत पए्वीद्ुखा७, 9 पहता णा चठ इकार कक्, ॐ ऋपा कतर
0011718, ०75 त फट], 18 0 पछ वादाय श्पनापतप्नक्ान-ण््यदत्, 8 [प्ण ण
्णह्ाुचत्व, एवणणृषन्तं एक फकदुणडण्टात्तय चाड 8 च] ५६ 4. 1). 1667,
[ह्च [ष 7099 188 01, (2) 3 (वमन्त, [तुक 8 क्षाः] शप्पा6
क: 18 = प्पह्न्रिपश्वं आ कष्ठ [पत्त्छ्वपद्ीलय परप कह प्द्व्नभव्ववा
(3) 1678 पया 006 फ छ 7060 पाड ८, श्र, 116 [ककचय्क्ठ॥ (| प्रिणु्यणुष्तीह
॥,1. 14.11.11. 1.) 1.8.7१... 11.01.111... 1
7501 {10८81 ॥0 118 जारण ० 8 कपण प्रानाः कत्
प्प 1160708 1678 [न्न छाए & प्रात एषाण्ह 0 0116 कण्ड् कत्छतुप्रणया पछ 18४४5 17
1115 0406 81] 9 पला 4818 ५ ४४6 16 त ध अपत्णः 06106
11 क, 11111111 प्रु#प् (11: 11.240 [वाह ऋ 29 5०४४ [पतोधन
णत पाः 9९101 188 0प्छठ टद ६9 उक 118, 118 प्य गभस च फ
18 2/1 1... 7 1 01...
पह (गाश (एप 983 एफ् क्प एप पणप्तीकिप 3४ ए सप्रपाप् पहह
एर णाद) 1 पतच 17६ हका. ह छकु9 पित्र्यः 9 109 -87त् इतत फ कप्रर
14171... 1, 3...
आ, 9 16 प््लप्पच्च्यवसोष्ठतिक ४७५६४ तत्रह 7 ए।पद्ञााचट ॥06 0618
णह पिप्लुः एलप्यद्ु = धह वदा (धक 95 706 पाकतपदुपास्छष्प् ३॥ शकाः जा ज
छः कणत 1786 कवहाः [षणृषत चातुरः {6 ह६३॥] तिदद व वपुष 7 08 छद
त कषपापवहवत् 19 क0 18 616 ४0 96 पपिदयन्नछ] फ छा चपला 19 णप्
वच्छ [0 7 हवृक्छह 18 84 180 छ ए9)6॥ 176 (१, + 15४ णं 106 7 01६78
त 16 3] 110 [क्त 113 वाजपरह्ठपा्ोद्पं [न्क प्वककछा$ #0 15 ०065
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1111. 8.1.111... 1.
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8810 09160 ६० दुहि 10 16 [ककरा पडावें छाम फपा।; पणा >
19086 &त & 16 ० [ाहपषकराितं प्रदा 0 दषते कत्ह्ञणि त ॐ
10 द्वा पपत = {15 सका शात् ए द्वतस्तथा ३0 [हुः ह8 || 6ा801॥
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इनत एका, 1106 एह ठ 105 प्रहस जप्णष कातणनि07द्व 11 118 पकाय शाव
(प्रवल, हिपाह एल]पणठ पाड पिह प्तं दत्र पच 06 ए वव्ाशद्पा
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ककत छ पभो ध धिक् व चेले कणा 5 शिः 111९ 81६6 ६ 6810 (१161 1108
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छात् & [षणि साहणत ऋत् एकक्णुवहला 18 कात्दह १056-0 शत् काह) ऋण
छि पठा ठ [ृष्ाप्डण्डय छतु [क्रफणछयपौ [ण्ठ्ड छापकाटुहाः ८ दढ [काला (४ 8114] 111६
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एणप्ापाल्यात्णकु [न एहछा [प्जाह्नीन्त [1118 पत्रता, रिताश्ठषलः कतुः |
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पहं छ कछ एततड ऋत कषा [कजान्ठ। द् ष्ठि पात-परणठह ब्रात (ह्णित
एएष्ड्पयाप्राक त णहा छा कल्ला त क्ष्य कृतरताष्टुप ष्का पपद्यत 1118
अण्डा प1९ च्छा चवण 60111 एता कषात् [दा हठ त] 161181४
पफाणिष्ि # प्ाः एणक्र 9 पकक, { ००0-कणटपछ्छ }) कयत सुषपछठष्प् [दाणनाठा
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1116 पवुष्छाणा ॥01|॥ दद्ाहस। ५४ पह [कद कफान् ४० 1४९ [णण न्ल(्रा #0 हप
वाह 5077 (78१08 = तिति द्रुततरा हला 10 दाष छा छलकता) ठ [ष [1.9]
प्ल, ॥114॥ (णत्व 2०0५5 हा १५14160 1010 96९४ ४ 108 (दप
वप्रान्तं छा सह्ाफवकषाद णत् प्राय 85 च द0क्तणृएराएर प्रहता छ [)8 [1 इठप। ल
14179. |] ध #द0 ताव्याह ३18 ९68४९ {0 दा क्[प्वत्रधह, 72 सरक्त [त्र गणा
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कऋता 55 (रतण६8न्छति प्राप 59 पाता (ठ 0 धा 8 णह, [5 ह्ण
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1५ लक्षा 17 4 जाह छवो ६ 0८८ द कववोणम्नदताश सहारण [णप्रल्लाह्त् ति
नण ए [5 एणान् द्यवी द 1 तचा नवक इवल२. 10 (2६ १०
11 701 छान कटु स्छटप् ७ दा ९९[॥९०।९ धवाद प४।९ [गणृषषल्यं एष [द्या 111, 8]@
11.11 :॥ 1 [0४६ {छा णिलठाादच] कात् सकन्विणा| छण पत८९ {11४ (10 9016
०1 (पतततः णह 08९९ विणा कठिण 3 दपु क ।98 तिक्ला६॥॥
छ 8 [सटाठपाकट्ु च धल हा६८१६।॥ एकडा. 9१४1४ स्यत "0 1४8 पाका
1019 0417 = शफठा5 ४ 11६ 111 [प८्व् 18 क्विप प्रह्रा 10 116 1106 11
1 वाणाकह कततकतत ॥ प्त्रणद्चणा" ऋः कद्ताषदव्रतोद्राक, पर क्तात ७ ना
(14.1.23... 1.1.871... 9111
तोका छह करतत षह (वा ण (8 गी सौ चकद्र, 1 1920 दाकर
ॐ". 1940 ध्वा+ध्व् 116 0415 (न्वता क्ण) 7) [द्षण्वच्रह-
{1011 17 वाता कचा ॥6 दिहा [ड 916 [दक्षहा 1544) चत् 1628 +, 0,
1 एष छौ उप्र ण 10088 अहा [018 19 7 118 प5 ० 119 धप्रा7ण ध एलापश्प्
क कएल छ 115 118 कत् णात एकीकलीष्य 7 ¶एण्, भका ण (र वकद पु 114
1. 0) |, 1 1.1...) 11011111:
६९ [२९5९ (र एणं (1080 नण8 ५00 17 056 [पठ 11५९ 20 11 [4१8८ १ न
11813319 19.11.411... 1.8.11 1 28 1)
न 70४ (हत हाप् 17 ३ 51 08६प्द दाप ९}8 एप 0 धह उा105 [081१
धाक] ए {16 एरक 0 6, [दात्र हणात् फा 08 कण्ण हत् शा {08 115 11084
ए 01६ १३० कण ६118 छप्र साठ ब षत् बवष्दटहप् च्य एरिर) [३ 1 शाक ४४71१
हदा + प्रौ (7 चेददत्फाोपल्यं | पाह [स्वपा सक्ती ठा धात एन्वताकन प्रष्ठ
{वपते पात् की प्राह हासते हु २ जहत णा छा, वड प्प 018 तानन
छा ष्वः ककरण. अण्ठत पा कत्रा, + एकवणा 5 हापा [क एम ा्डलां
8 एफ प्य् छा @ ववतो दपण कदप्कत्वकहु 19 [भा कक्षः 105 स्पश्
१९०01 कणं १ 1105 8६७ प [छपा [दिऽ छवा छप 12 106 फा म [णवोल,
ध पसपएिण्तनाय 0817 त हतौ लाता ० | धदरुएद रिप, प्यत्र [8
0715119, एष्व हतान्ः 10, चणप् किनदु९8 8 0008113 01151; 0896 त्रा8]९प 906 ४18
11111111/111 1. 11111... 1.9 1.211.111 11/...17111 णुष्कं [111
ष ध व| 0४ाछतत्च अाणए्ल & एङ शलाका - कहा १8 10 प्रीत ` प्रह्व ण छवी 0
ध 1१8 (त्पतु15 चतत् कह्वप्रा 88 ॥5 डप पत लदा 15 8४6 11196
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0008 9 1110 हप्र छ ॐ 0 प्ता, = किषदट्कण्छः [ (णद) ऋ ००९ 11105 ॥१४५॥
1१.1.11. 81.1.112.. 3.1.111... 2.11.
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~= लना
1, (०4०1८048 प वि ५. 2, ६,
(1 1 17 1.1.111.
अदा 17009०४.
1181 11/71 त}. 13. पृ्दाौ
[५71 1 अ | 1/9. त 8
वृष्ण ३० ॥16 कय॑ह 0 न्थ कह त ए 8319 चि पाधा, गला
11118... 1. 1/1, एिरणप्ठ 18 18
7१11. 1 १.2 1 8111138. 118./.
१4 एद [त ६6 परक ऊकया ० 15 दुर ७ 15 [1९6 १ 4 1), 1587
1660, १115 कण] तवना (० २ एटा 1 #15 [षत १1966 ण पष्ठ [राः6 1 ॥॥18#
। 0 1 1170 87.
1.0.710 9. 11. त. ता
प 2026त= च| पाः तल (9 वतत कू्त्पश्चीत्३ दिप 07
गद दाहस पप्तं] = पुप्तयकु, ए, कते) 6०0 पए पण
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1/9... 2.871.231... 3.31.
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फठ् धप छा ह एषण 0 ह चणा, एप हुक 88 95 [0६ पणयः ५६
उपाह [त 7 ढल शिता कह हप त्यत चन त एरत्छणचणातपैठत् प्रण
णिक पिप्य ६0 धर वक्ष्य, ९ 70६ 0 एला 108 धद 00 6 -4 वैक
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06 एवतणाग्छाकु [ण्त् पुणा 146 एतदत्र जाणा 85 ६8 शाः 01966
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प्रह एलन राहा 08१6 0६6 एव्र {0 तप्त ऋ18| 11146 पत्ट्त6,
क 16५ 1180 ॥0९हण€ 16 ००९ 9 18 1०96 कत् 2851 ०? ॥7६ रच्छ ० 6 चाषाः
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पा] धा 1 [ण्ड ॥0 छ 11 का णत (त्रा 18 [0फद्ठु ा 08णान
118| दह 11201 10६७ 0 ठ 908 ¶ स्य नुषदिष्ा ए एणात्डण्,
== या =
1, बृद्रङारण्यनिविषट मि्रितिमरामीगनारनारीिः।
सत्यचिदानेन्वधनं ब्ठा नराक्रारमारन्मे ॥ अदे. ए. \॥
प्यज्तकगेद्न्पं परं रष नदति ।
तौन्दर्यारसर्वख बन्दै नन्दात्मजं मदः ॥ गृद्धा, षू, ४०२ ॥
सत्वं शानमनन्तमद्टत्तुलं चद्व गन्ना गर्न
म्वा कष्यस्नमाधिभि्ुनिवरःमक्षाय साक्षात्कृ ।
जातं नन्दतपो बहात्तदधिन्मानन्दाच इृन्दाचने
वैद बादचदिन्दुसुन्वदसंलं बन्यैष्नविन्देक्षणम् ॥ क, शा, स्रम्, पू, १ ॥
च॑ विभू वितश्राकवनीरवामात् पौताज्जदादणनिन्द फलाषरोषठात् ।
ूर्गनदसुन्दमस्नादरविन्दनेतात् कृष्णात किमपि तमहं न जाने ॥ गृद्ध. प्र. ४१८॥
3. बद्धा न विना सुक्षियः सनष्यः स्र्गयोधिनाग् ।
तं बन्दे परमानन्दघनं शभीनन्दनन्दनम् ॥ गदाम, ए. २१२ ॥
3. ध्यानाभ्वारबक्नीक्कनैन मनसा तचत्रं निन्किविं
स्योत्तिः छिष्चन योगिनो बदिः परं प्रस्यस्ति स्यन्त पै ।
अस्माच जु तदैव लोचनचम्त्हारत्य मूयाचचिरं
कािन्दीयुकठिनि ठट करमपि तन्नीलं मदो धावति ॥ पिद, 4. १६२ ॥
कैविज्निगृष्म कःणानि िस्रज्य चौग- (१ मौग-।
ग्राच्वाय योगममात्मधियौ यत्तन्तै ।
नाग्रयणक्य परहिमानयनन्तपाद-
माश्वादनननरृचनत्तागमदं त सक्तः ॥ चैव. प. ४१७ ॥
4, सौगोविन्दपदागविन्द मकनन्दा्तादद्भुदधाञ्चयाः
तर॑परारान्त॒धिशुत्तरन्ति त्ता पदयन्ति पूर्णं मतः ।
केनदातैदवधात्यस्ति वरगं जेयर्त्मनम्ति जं
रितं खमनन्तमं विद्भ्ति विमां निन्दन्ति चानन्दतान् ॥ पैव. ¶. १०१ ॥
श्राप 1
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पापिद्या तथाः प्छ छाछ टह [गपाष्दुषप् # ए्पू9ह 6 फा [विल्ध 9
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क्त कदत पक्र ४ कः, ०5 हव एटातु प्रह [डटुप8 स्थ छप एद
प््ा९6 णा ह त्ठ्लाौ फठपप्र- पडा 1 1919-1 १४४५ 10 पप्र प्षकषठ प 6 कए
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6 श्षप्टाशचप, "गपु वर॑ः क्नु द्वात एातता^, "कोत्र 581६ 18 एवा" बत्
1 91.118 1.9 0.1 81.1.23 १9.71.19 /.8..
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6080118, [छलए पात वतंदफष्ड तलाः 1710 [हणा ४९४५ 9४|| {1६ पणा पह, 6118
छाश], 170010९8, ती प८ कृण च तलाक फक आह वैद्या, क्र) पडि फण
[४.111.191 1.1.117
प्ा०६॥ (कला |] एलका, छण उत प्वा बा, ड च्छा] पणा प्रौ [वकठ [1-1)
सपद ६४. ए छात कषलतृधयदु {1 षध 315.16 81001 06 वपा 06६ 17
पिप वा८ फलद प्ण) पदक व त सान्लपणह । ५06 01569 02 [एह
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श्र, वकमा, 14, 35- र,
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11. ऋ, ५, 2, चवा = इत,
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त्द्रुपै पाः पादु 0 तल, धवत् [पणनुि पशूलाक्णटु । 15 प्र्रना ण
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1. णकवतपकरज फी प) नवद तणकादच ह (फपाकम (4, $ 2, एव) 7, 21,
% त. 6, न, ववत 8, {5
२, माना छ -कावाक्म ककन तमि, 27, ©. 44950,
4 सद्म श तत्कर क (०न्ण 7, 7, 7, 215-15.
9 सा तठरल्छ १, 2 एत, 1; तवक, 7, 0; 7९ [1.18
४४७ धीणणल 4, 5; 41. +1-9; 7 46 वा, 15; च काधप्रान कवौष्चक ज
सवप $द्क 4 व. 4. (नन इ, 2, सकता 2, 439}.
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(1018-1 111.11.11/. 8,111.1 11.1.91 11.13...
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चा 1 पीप्र्ालछ ता त प्रदापाण९. प19 ए ल]165 8150 10 वहा [ह
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(12) कध फा 06 त रप्कत 406.
ग हा एतशा करा रण्डे 1६ 7 पधी पाप 1
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ृष्पुहप फक्ाप्व कहे एश्हठ शचल्छपृपक्निप् 1049 608 क्त एह ०१ 1०1४
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अ]९७८७् 10 1] 1116 "4.1.13... 77/11...
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2१०८६१९१ 62९1०4४6 ६4116 प16 4011 ल= 1६5 पात ्ए 5 पद ठ क्प्ीी कणत
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एप्त कषवं {57 ऋणातञ, 18 १०९४ 10 ९०।7 10 = चोह्डात्लाष्रा ०३ #0 9158 [णलु डे-
१, ओंष्यकार्वंतावदशिना चन्थमा्मिद योज्यते मया ।
मादाय भगवतः अकारयत केक श्व चहो बिष्ट ॥ गूडाष (ज. सै. ति.) पर. ५७ ॥
सगवत्यूज्य पाद्ानामभिबायौऽ्वनीरिति ~ ॥
अनिष्यात्तवा नष्ये दुरापो मन्दवद्धिनिः॥ सव. पू, ४५१५॥
आओभोगिन्मुखारषिन्डमधुना विष्टं महामार
गीत्रा्यं एदं शहच्यसपिषां व्यसन विटमापित्तम्. ।
न्पाद्नातं अगवत; प्रतिपदं शीश्चक्कशष्ः पुनः
विस्पष्टं प्धुचछमेन पनिना स्वानद्युह्पै कत्तम् ॥ रच. प. ५१५४ ॥
१, अगवत्पादभाच्वा्मरारो च्थोतित्रव्चततः 1
प्रायः प्रतिपदं कदे नौततागृहा्दीषिच्छ म्. ॥ तैव. प. ६ ॥
३. मष्वच्छ निरस्तानि दर्मतानीह रविंश्नत् ।
प्रन्वत्याख्यानमात्रायी ज तदर्पमषं थते ॥ तैन. धर ५५१ ॥
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एल 8० 1 1115 घष्वह ० = ६४6 [दनाः ]पकपप् पप ऋउ छण प कणर ॐ ४ ॥0
णि ए6ौ 16 कलह 7806 ण पिपा, प्रक्र 198 कृणि ८९ 0१ [१5०६ रणात्
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वदा 8 दण, [पप ६० + 1 इद्र, 093 1 पकात् छपरा वा अथा
पहा 8४६8 ० 1 [प्जोतहक्णठ पष्क [ठा दफा ९त्कललाषह कतात् पित द
४१10: &00 कृष्डौ-षरपाद [ाह्मप्रा्, वुटण्षवि ह0 फा 10 एणा पएण्ल्छपणटट
९५ दषाः क्ण कणत चिता इषललु+ प्ण 16 15 शष्ट 19 एता ५
थाथ, कप्त ल्ह 19 एला 06 17890060 फफ ह [प्राणा चट
०६ 714, 108 अ्तिटएकल छातं तपस्व इत् 1 ३९९11091 प्रप्र 80
का पध णा 158 चतत्छाणपुणछणम्चदु 0त्त्तठदा, 50 पाठा कवितकलातहाष्छ णा
1१.11, 11 1 1 51.9.1 1.
११०९८त् 610 ख एं५प५् ० ॥16 ृपणुणा 9 पढ धनव 75 [ह णण एणा हती
तर, पण) 9॥ त 118 एला णु 127, गए ह116 परए 17 106 एकाह ० एण. 210
एव सप 4 क्श का पणतु [गतकः 0 ककार शु 9 128
क ान्न्णुणीफठ 10 प्र वनाणणणु हमा लऽ" पधक २१०५७६९ एं
111 अ. 1 1119. .1.71॥
पण्ड श्णवल्यद0णत ह ००६॥ कए0ा१०६ 00 7६088 लाह फ
1५४ 9 ०४ [पतु इ]; पलपल १४0३ पह ०6 15 १ क्ता फ0िएी वशा
1000 1६ प्फ पलुषठल्लणौन्त णिः इणः छठा वपाक ण पाह पला
+, 7.1... 81111 1 ॥1. 1...
1 191, 1 + 1.11
11911811 11/17. 111
पज ञतटुर प 10 गदभ 00810080 15 10९६17४8 पा 0०६८४ 8 0065
9: 111 1 9 १ 191
०१६५ 64 प्रोफ = ९५ 0/8 ोणाद्यम8॥69 ल ध ृषणाहपपवञ + पठा
वपि ण च ७५, वर # 85 ऋ1८१ए० त्णापवहपाशरीसह 00 प षण"
1101. 11 111 1191 1.
1८ ४८ प्च तिप 1 13 10 18 सलातवद्ातकौश्च् पा 6 ॥8
क 71111111 111 1 11.
प 11016 छण् ‰॥ 35 127 11184 र्तुः दद्य ॥18 115 त् कपय] 95 (एद ए८टय [0०६७१
प्ण छु ६ वता] 88 1116 एल फणणुर ण वह [८ ध 106 ॥ 6८०६५
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नत लः (16 ए पाततापतीतिहते छव पृण, एकाच्त्वात् णः {16
(मुत्त ० 2५181; ६. १116 1.1.11 11.11.111,
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खिषठ ॥ प (एणठक]स्तेष्ुट 18 कीक ब0118, ॐ ०8४7९ ॥६ उद् र२य, धथ 1
वप्त, तलं्प्हत ५४०8 1116 ९२ 15 [0 9१ ४5 07088 12 १४९ [शक ५
1. 5. 2. = कत, 5. 1, 9. 29 (४. ॐ7 | 4, 4, 10 (9. 459), 74, 1, 5 (9. 44}, 1
1. 14 (7, {5 4-62), 7. 5. 29 {20. 60920}, 41. च, 54.64 {7 - 0285-80 }, 717, 4.5
(19. &75-24), 77, 3, 14 (8. 99},
२. गु णष्दु) 5058 छ 1116 1 १ एतेष 1.
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2. 9 2, 50, 2, 8, 19 (>, 50), 7. + 9 (3. 825), 7, 4. 9 (7, 588) 44, 2, 9 (7, 47}
3, तएव्य चा 57, 57. ८4, 4, 15 (2, 87२}.
0} %१.७१॥। दित 1104,
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(पलक), चाल विड शत [तणा 8 कटा, पत्वा ष्शुणणद्ठ धक
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प्रप्य (ट, [4 छाः परक ०1100. 10 व्रिलाण 192 एपतकणद्व धाथ 1105 [9 1106
गध्वल॥1०8 ० पतां, उका 95 पवर पि कषकः खयः त 018 तण
प्राह 0. ए, ५, 177, 4, 20-29 ४० वृ६०।६त् (18 10818589 0 पती, दः
17181. 1 11.11.
90 पात्छह 0 दित ४णत् प्राहं प्रव्रताभापद्ष्ी 1 अष्एगौ 0 ति एफ, 1118६
6061118 [1 18 पात 9 (09 ए णच भ वहातौ0 51001 ॥5 0०8९ 0 पिक ण
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क्ट एत उवाकतपपपपीह् वल्य, एएटाप, # कतुः ९० व पा 8 पढ
11९11 ६९ एणा र्कक वातपा १३ 1116 उक्ती, 1 85 प जिहत ४, 100 1118
भधात, एव ०1787, व्ठपतातद् इदम, [णु 006 [0 पपिफप्-
हदु, पौ ७6 106 वकुल छ 1018 &ववाय० 1 कक्प्रापर चण 05 (त्म
10] ०45 148 इर पातो 0 क 5. ए तात् पतौ पका
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णाऽ ९[ आं 1081६773] पणटर, ऋ "83 च [तक्रा छ सिकणकलयछ १४१
शो0कषप] [पाण पऽ च्जाफापराण॑याकु, कलौ ह [त्च कटीयं 108 कण्वा
पहिए 77० ववावां ४ = कणप, गदाश 108 [र 718 कहां
‡णद्रढ प्दापतणद्ु पह कका प्रह ठा 45 एप्त च 176 प्र०९]&§ 11८१7६8 = ए 171
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एकी 135 बडसणल्छ। ४15 प्प [वदतः डौ आ धार कवलत दुषण्स्व
ृप्णात्त [6 व्यड" 8 वणटकंएरे फणापत ४०6 शयात्, प 16 9 8 प्राट्)
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1 0, 00158 19 चदव 1186 धच प्य्त्रह्ला 1, छ (0191 ऋत धाश्च 08 ९0९५,
एवान्त ग ० ॥18 49 113 पाकहा कथ 75 पय अधप पछष्णाह्व [५८
00 एण शथुश0७, 115 सए, वह [नाः दयता पाद्व 10 पणा
{15 (पहतं एका क 108 काणाः पट 1९ दषपहयफएलाह्प- ¶ 3 18
115 पठा ऋफ पह एणतदठी) च 1 98] 8 प५कर क्पादः 1४6 न
हाए०6 पा 3६ 195 ऋषकतश्छल्त् उप च्छणनीपपाणदु चह पष ण पार पादरः 18
पाः पाल हाक 0 4005088, कंदी व्याः 106 किकवेक्वठत म (16 कका
कह 115 [९5 पि इप् चा कान्दपष्छछ्त् नाश, [+ ४४३ एतै ककत, ॥
1 1118. 18.111... 1111111.
एषा दषा एमाह्य् लद्द, 4४087008 हा
#९।। 18.11 19914140
1,118.1 क 1.11... 1.1 |
८६] -ए्रनीदप्वकतवक््, 09 ॥08 प्ता शद रत्र 18 हिट शतप
7पश्ाकः ण पिलह्णाहत द्व हशि = ाकनकयताकत्णणकप्तल प छतं
11.118, 111 18/11... 1.9.111 14111. (1
४1, 1 १. 1. 8.1.82.) त 11.1.11
[धिक्च 27 एफ 10 1115 धा पतात्लपत587 ० 4 7009 11719
( 2 1 शवातटणकतलम्तनकत,
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१, एव्वं 714, 785 { 175-78),
१, 702४ 144 4. (+ 240},
अप्षा |॥. 0.11 11181911
११6 1180६ १५६१९८१1 १०४8 क9 त 006 ६80 1४ एल छा पक सिवा,
1.18. त, 2. 9. 11. 0.
पापक 209, 19६ चटा छर छत ध 8 [कफर वृप्िल्छतो ऋ109
1. त. 9 7. १ 3...
पावक &1त 1 हषा 7 (16 [वड (क0 ९४5९8 ए 118 0१९8 1158 19
[1 क 1 ता 11. 3911 19 ०५ (गहण क्रणत
एणा ० कद्माक्रपेकय, पणा 119 पिणछयाः 14 ०0४ 001 8 018९९ भाद) 10६
819६७ {11101211 पएष111६]॥ ६० प्लुत [लडह 7 98 वृद्धौ वि पपरा, 79 ४91 3
९160169 40 10600) 19 175 7017 ४0 चिक ण 96 इ एफ अत् ह्य],
अतहः चा ६6 दषा, सतह 15 ह्याह 294 फलद द८९४९व, पड द्ाएशा पु,
एदलंवचड कठल्ताणाक पहु पञ फ [पकुरट, पर शकाः हमव 1068 कौ0ा8
४ ॥15 रष चप्ल॑दढ 1४ 115 फार, कणत काह्णदठुप्ञध पद्व [शितता$ ५
ए 11.781 77, 8.1. 171
(1प्णा6त्816 वतप्रछण }) ऋऋााट्ा 15 द्िपकषल्६९, एपाह णप अरण धष
व्यापक ०८ भाल छिपुोपवपड् च्छा ऋ ताक, ५5 त्रच 91 1116 पणवा,
1 1 त, 1, व त, त अ ता 1
छ ६16 पच् धिवि द्ष््ुद् धि हफलकाश्वद्ठुठ 1 च, व्छछादफद्क ६५ कप किष
08 ४] एष्ठल्व्वापकु 1 कह्ाितण भा ध एदाए 5 णृकष्णपरसौह 79 धणन ८४९
अत् 8) 7 [हि शप्त ङं £ एकाहः, ऋ 1 ३ धाह परततु 15 (118
त्न 0 ४06 1प68 9 पञ्दाणल _ प्रभााहक उ.रा, पक द, कात्
एप 19 = फल्छप्कु ४5 १6 वठवृ पारा+160 67 108 #90क 1६05 0 116 (पा
2 एक 10९ छव ०६ परथ कात्र एकखनितह४, 1118 प कदा1715607
3150 त्वर [8 0 107 फछणस्ड एच्छप्रह्छ 12 105 [ष्तः सना 066 18 10 प्ण)
ऋ 101, 39 एकणट्र का एण] फरक च 6ध६०त्, 10 न तफ हठ ट्ठ
£ पच्छ {9 [8 [ण्ठ चतत् 9 (को तह प्रापद् क्ष्क का 115
राता 7017958 11 िष्राऽ 0 क 01६1 1४ 18 पत्ता ताक क्रं ५ 1॥
फा ११ह 1116 ४६315100 71 ६11६ (८0२ दत्तो ० 1116 861 [प प्तप] ॥कफ्९६१
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3& 1 कषाचह 10 15, ४ 35 चसा दष 116 [ष्ठाः 1 णोत ते तीक चष
1 1, 1 13 त. 3 १
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द्वाम6 19 18 पडा क कलौठकह त) कौ वै 0ल्तार्ठ ॥॥६ 46106140)
11) 1. 1 9.9...
प्ना१ 710१ 18 पला्ट0ह कडणप्रत् ण ॥ छक प्र षह्तसुन्णिः कु प्णणपएहु प्राप
प्रणतृक्लस्यप् 11001 कठ पाठ ४ कपी कन (फलः 560 }) 0 ५15 प्रप्य
1-2-11. 111 1.. ष्णात प्रछ१००६९०् शा 9 (लीः 102 (8कल्तात्थ्कक
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2. नलम पत कला ०. 4 27, 0) 184 1900, 45, 800,
3, एय +, 58, 556, ‰85,
4, पतक 9 $, 9, ० 0, 59, 1 8. 70., 1, 1, 1, {10.708 92550 }.
2. जी मक्का सवर 85 सा 2. 4.
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8. 2015 8. ३४-३५;
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3 1 711)
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8 11 1.1. 1.711.111 1211
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कह व 176 पताह ८ ध च्वि प्लाच्छछः पि 175 हार वरत् (0
11144 कत्रदक्त कु 118 ऋष्य.“ 17 115 वनतत्पतप्यण नन [1 त चतत छ
0 (1९ सात पाहा 70 ०6 0 कपदण णक तपम, 35 [ातपषस्वृहह
0185 दुपणा.०६६ 48 ॥0 178 इह कद्र छ {5 लौ 15 वै पल्प्ठोएते ०
१४६ (णण णी का 011८६ हप ४5 8. [06
नद्वाः 8 एण्ड सवत् | 100 6. 0. इततच ॥ ५ वाहंणदुपञमत्
कायाः, पाणण [प्रहि 50 9 कृपक्ान्ोद्य् ८४० [ह प्राक 1 [तक्र ¢॥ ६118
ता कात +ठका ण त वालाः,
(5 ) शत कण,
(08 पाड १ श्वद्रा ० ६06 44४ 5९100 10 2066 ४ 8878 ए;111॥
00 181 $ तला फाकाह किलाः पहपाञगृदं षी, १, ९, 1८ इक्, 90४ 1106 हयव
ण ध8 पपा पतापु कया उवप पण, 49 [78 हाता {पणृणाहह, ॥&
थ © सका छव् ऋय ‰ तद प] 9 पिरष्डक्त्राय फ छाः व)96 169
1 1४5 व्छाप्राहतककतु ठ ¶05 सोकर क्न, 8 तण ण 1 कपण) वन्न
६6] पा उपार फा कतावा82, नीद 19 [19 छपा शप्ाहला0९॥ 18 ऋ वर
1* = सकर शत 9. 17 व 27 7, 2४.
4 कावक्त कथ्यत वया, पिह शतः, करत, अद्य स्थवक ॐ. 4
4. (ध सां व्ववर 2, 26,
4. कवक स्का [मादव दका 59 ॐ, स,
% तक द एलान ० न हण त 2, 76.
8.1 41111111141 411. (१
हक्का ण च लाए [णद पणात् क्विपो ब्रत पह [79011811 118
17५1६26 155. पह व ाटह क एलाह 16 188 [षल्य प्ति 8४०४6 900 4. 7.
16 1ववा6 वोह कावि 4 बहुदः 4 पाद ४2 प्रर 0108 {18
41.3.11... 1.1.11. 12.11. 1.31 1.11,
32... .1..3.11..1.81 1.1. 1.
६108६ 168 वकता 145 इतत ६15 पह द (16 तिपा ०110 वं धीय एष]
प |16] ९5प0०85 106 6318 161108 01 दक्षाद पषा, पटा छत ह दयत
105 (धृव 8४४८ 35 प्रयात] स्विः ६16 [हणाय [चछ त 1 शाह
छ पणार 16 कताव तं {16 णण तासृद्यन्च ए फः अदल 7णद क
दताः८्तयत् ६0 प्ण 9 106 सदः शषा, कतवा 15 अद्र
॥५९6॥ ०1 19 ६५९] 7 5 हापा ५1) 18 -त्लज् चा द्ाद्पण ०४ ५०8
एजफल्मष्णप पद ९० ]धव्यः ० (8 [पः कठव, बा कदस्या त लाह कष्न म
छदा उक्त, {15 लाठ(ल्वश त षी, $) 108 किषाव एदलाप्राणदटु
(1678५ ९. 18 81101019} 1०10९, (0 ६०९ ०4181 [णाध] 8 004 शासा
४९५ = ७4९-0०]01६8, ५64 पाहा 19 = 116 = इद्वा एदा त्त्
पोन्दाष्छल्य] 1 €९10 ता, हासा 60४. [४ 38 ॥४॥ कठ ण कधौ 15
ऋता कः 10 त वृ्तताकिहणौ वणप्टह आ ह [हक ०८ धह ततप पपठ?
एर्व तदे षाते| दका ०1६६105 कह (फ ६॥ वधस ६8 छ 110 १1९ ४१४४
11 111 13/18. त 11111471...
11४ तला) लक ट ¶णुकट् छण 95 तछा 9 ॥06 [षिका 9४
हतक्रा १ लपक, गस्ीषदार्वताः पत् तिच्वातिर्, च इतषलततयह्य पपं इटिति
{लल पुपाठह्ठ प्रहतं 17 (ह 019४ लान +६;-{1} १1.0६ 1 ॥118
[ष्फ छ १1९ एतष्य प्कषव साला च. "ण ठत, (0 च्छा; 15 10 ह हत्वा,
कातल, ५६॥६९।स्द् प्रतः = छण पाशत्व पृछा दए+ शि 09 ६९8 त
एप १ (2) प्रक वावर्त पितत का पिक (सकण) ण लीप)
चष ४१६6 5९३६०6८ 1680द्ुन्हि नप् 101 11 १ {91 प्फ ८४० 118
१ ताः कारा {8९०७१ ज {1९ हरा ठत} 0६ क18116 01815870 त ईष्ट बुशः ¢
छत (तपाल एकस्या 4114 [त्क प्लीह 9 1118 ऋठात्8 "तौ क्
न्यूपताा। तष्टा-तणद्ु (हाद्य (4) वणे पप्ठ प्श्वृत6॥ ५६॥ ९९९8 हपति८९६४
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6415, 871, 675, 993.
४, वका 40 0, 76, 7101 125, 459, 250, 249, 4;
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(9) (पवक,
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1. शवमद्व सल्पीद 5 एद $थ,
4, 0470 7, 5.
ति, काक् सषटाठना ], ष कस्तद सद्कव्तगात 30. 9-18.
(क (1 क व, 3 1.8.
7. सावी, 7, 244, 207.
2, ण्वः) न्ना 1४ सिन्त कन न, 77 १, 461. 1,
0. तानाह सात वा 0, 638 547, 664 604) 75,
10, नवत कुच इला 0, [व 70, 58) 509, 550, 5953 4५,
क्रा ए0 ततक्ष, ८1४
कक् फणा, ह 105 आतत कापया 3 (त्रश्च (1 ५ {0९ पव्ददतात्यतीकतन्रद+
पतिक डत प्तण्ड सत् काल्छ का प्ल -ुततततपलमततदं त धत
वताता व प्पतक्न्कनं [5 2 ककाणठ प काः एयुषः ००१५९ .०१ कर 88
[पपष्प् क #15 पाका सकि एत, ` एतत) 1१0 -कलपनैतः गिह:
141, = 105 [हहयधाश्प्हतात्णिः वभाण्ण [षड तप्र लाज 1४:5. {ह
वा 9 (कणत प्रत्त कठो छे 116 आह 85 [तलः ता {16 ~र
धाह ० 06 फपीताष्रकदिा 0 णपा ` प 16 । कव तक्रा
81078 119 [४ [ शा 119]| ए त्तौ 11115 7 17 1181: [ह " [पात्र दथ
+ 9, त... 17: 7
(१0|7-18011881) ¡; 1४ 106 कल्णाच्र॒ 18 लाश प्ह हत 118 ॥ 11.11 3.
0 (06 हा 0ा1088 15 णमुछ् 16 116 कर पीत उपक त 71 णाक, पशष
8.2. 1.811.112. 11111111
066८ कडा ॐ (वृष्ण तं लष व्ातफ्ण एए छप च प्राह प्रव च४६९])४
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च्चिर ह्ली कत ह ता्प्ड, व्रि तक्रणणहनि पपश्यठहषत (द्यप
1, त तततृणतरप्रक्क छतत जी ककातातगाकक्तता सच (जी तादु दैपः स्छड हपप्ा--
जिति ११४ ककाषक्म,
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वरे प प्लुष त् हुए षौ पिहिव्ताुण्य १.५1 ऋ. +
10: पकातु 19 तली पाहा शत् तव ह 1 5 ककत, क्प
हप जद दण्डाहता पफ [को फारच 11186 ¶& शवदटाोहा)15 09४
णका 1, 08 ` तकता कलार दिस्त क का पि 78 तचल
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वद व्ली 1४ 38 0 18078] (|) (पइ पटक 81161 [प्र
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पपासछपव णात [लौ फ, प पातौ आजनि र परपला अह नता
थध वात् [मादान 111 [यः 1[दफकाद 18 9 (1156 तछा
111 रि (व त त, त त १ 1
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द, दलका, कलावपि, कत् दण निषत्त वराह शप
1111111 1 11.111 1
कपश्रच्म चपप णमि 11 {08 पणफडलपूाहकौ त भुषन्लाड 15 119६ शारा 76 प्त
कवणृ्णयपतह्प् 101 110 [दतत तपनी सतह शुनः +य
क्ट, काकु ॥चौ 16 ३3 तककान्यहक छ छान वप् वापा पट् फणा 1
1 कि 1 त 1 1 1 क. त, 1.
पीठः छप 05 दादा "कृत (प्य ब", [काणना परपद 148
11118111. 811 13.11.11 1 {01411
शोत पाठश्च 01 तापं ०३१०-८; 85 श्प ऋ पण] [न्त्य 8 0 118
0 11.11 1 8 १.11.
हएछद] कृषका णाणव] प्ताड की [ह 9 ह [णिर् 70 (हा 10
प्रवु्यल्धणत्च 19 156 0 6 पकम पणक्यव्ह् व्रोणरह पि 1०106
108 इद्ध दोत्ृत्यः [वाल्य ल व्वोलतादणरलद्ततछकादका+ € 1198
धभप्छण च छण 016 ए 0६, द्या कणल्व् ६1९ लाता 1९8 ०1 ९१९1
8०4 वाऽमरो धत इला पिप्प तवता॥ त पाठय वतं ता ५॥ (ष्या {0611121
11.11. 1. 8. 9. 9.
( शाच्व18)} ज ध छक्र कणत व्ण ष्लत शवाहदतिक, 10 ककुहा ता
आता 18 ॥००५९१ तकी लाच दतकण्ठकतात्क, 9 ( कतै 1४ कोपा
एशणाए (6 ष्पद [मढणाणशकनतकद्तात्णदणा ॥1€ उशा = तकपाला
1, त्ता -णप्णोफ 08 दतापतषनाः एम, 7 7, 1-52 201 १ 4;
ताता (नवह कपत ष्का |~ छा सकु 0
श्, दा वमाप चटा 10, 5, 89 537, 429, १२5, 698, 064, 780, 9५,
2, नतह रान कद्व तमु, 756 141", 307, 77, 44,
1.41 .1,/1111114,.0 १1 ३।
प्ण, ५] वपो पाष्या, कठाहषहाः (15 अवतता 785 (ला पा्णष्णन्ण्सय्
करटा (क्र प्0वड ० पुप्प, ०6 णादो [95 ८४१8६0८८ 1 [४1479
870. 8 00108 कः ४06 चाप्रहतं उप्नपाधतन्व ॥08 1948६ 319 (01
11811 18 अदिप {णृप्छस्वं पफ 115 इ (पाः) च ष काली नि
0ारटा फट छप् दया ह्यह छा चठ [नृक्नाछट काद्या प्या [कक हका पपत ण
तपा सकं फत् आह्यत्र ॥5 चदसणह्व, कपल 10 १0९8 060010६ 9
08115 # कही 1९ ॥73 तक्रतन्व् (पि ्णकपतण्छ नण एतत्प्र ४2 09
4 त ~ त त. 3, १/0.
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2. 1094 2. 72, 17,
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4. ध ध. 24-८,
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ठ्ठ एना पवा १8 त पाकश०्य धप्डा) फार ६16 न्लान्ल् च ३ पण अणट
त्क्ल - + पतच 00लठ ० # बिक्णा ह6 20. 16 18 8४४ ६18 1५6
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ह 00 दः लणद्रु इष्टाा आला 111प्हकषप्र णप ११5८ प्रणा #8 दप्रणणणत्रण
क प्पश्चदा हञृन्शपषर 19 {09018 ता कडि कषक ह चह नैवम
तत 7 एलयालततणछत्रत्च" वषर हण ल्छ-ाणानदाः ण (ककष शप 25 ण्ण
प्रातु, 1॥ 5 कसति 38 ठस्[ह्व् "पएतकुत्वान्यपऽ 0 शलाक" 111
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प्रततं छत् 055 पकर शता %87146188; छपर (1) 89059608 ०
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शात 0८ € ५16 कन ्हत॥ ०१ कऋाक्ाटकसः करवत 0०8510६ # ब्त,
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सकु ऋापत 16 कलत 0 ४0 ५058 ऋक 008 हतर 90 [पस
1 ऋष्व [तम्प्र 16 19 श [अक्तः (वाद) ६05 [ण हमद 18 ४08
1 घा ०6 38 य अप्ाठड आत णठणष 2 छ्य कणद्कः †०१
8०1१५10 ०7९5 (णवर हयएलु ४६६ 07 एलान] ह708 0९१86 118
8९1 18 ऋए०कत च] पिणलनतणह ऋ वताः 0 [०806६ एक् ४ श्याम
प्रप्त, एण) 115 पणार 10851 १6 पप 10 अ 95 [ष््06त्
ए (1.9 52885 5० तशर 109 8 ५८ एप्त पक 115 6, एणाः
पलु क्ट, भर 0 0 8 (षतम प्दाक्रह्टा 1 छापर इतप् {198॥
त् चणा 70 16 -त्नददसातोङ्षवनात, कमठ) तणा 016 18 209 १
70 फा ॥ | 11 ०08 शि तय ४6 10 -पली 8 ॐ» [प्त76, {07 की
त00पपता व्वप्र = 2189४६० 11601063 त 109 इला प्री 8
एत्व 82त ¢ 88०888, क्ट) 76 (१६ 9०प] 6९५, = 7॥8 परप) णय
छ 06 108700४] एण्पठीत्र॑णछ 0? 8 पप्र [णठः 000 10 1675565 &0 #9
84 च धमंड एौषल्मुध्ः 8 छक इते हाद्व स्पाद्णाो, 50 (9 च्छ, ण ४9
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पहन 8४ रतु = (०५1०६5 ०८त् {तणह }) ६600708 १60६९ 9 ६1५५ 8138
0 ९६ ४४००5 9 ६010080 ४४ पाठ छाः 06600९४ च €|0क'
प्छणद्वा, 19 ववतितत की] 176 चण ॥0काोढह पदौ कार् 16 56बस
ण पपकत 19 18 पिता ० प8मा 5९, १९७18, वदा दद. अरात् ष्ठ कलह
0 102 98४ 9 चकत कः पटा पपठ पदाता 0त 87186६8 1 1108 एण१५,
{106 पस्ठणा एलका (115 लाता १४१ 108 हपु ६७58568 10 06 {6446
1115 परनन 10 कणप) [त सद 5ा18द 220 णाक ह्ला 13 ण
111 + 1,1.11. 11.8.11
कध पाल6 ताछ ४६ 6४९8 प एषषा 1 दष्क छप पपु
त्ण्णह् ण तणा 1 45 10 ठक 076 (वः 10 48) तह पणाकफोः वयक
100६ ॥\९ ८18 ण ॥16 1110 ॥16 0 हर दोककव्त्थ, पाह] वृप्रोच्छत्छा
1. मः, 47. 66.69, (2, 200-09},
(क 1,991.8
4 0. १1141 11011. 11
00 श; त त = १ |
1 1 8 त क १...
हलतणप्, चरा, 0१6९४10, = 8 वरटा शत् कप्त, ऋ 1 षत 0 ॥1॥8
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शा ० पौष वत् कृष्रद्वद्णाप्प 15 कुहा 9 तण 0 18019688 [प 11050
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10 114 61660 15 ए त्वद्रणछ्रतोतमोक ऋ 8 दपा त [18 पा 1
1, वक्तवा 2, 7-30; 3570599 20, भह -9-5 नपि फ
९, [नावा 1 सदाम ठ 14.28, 2, £,
3: ववाठान दू दा उन ॥ 2 छाप ०, च 7 420; 4४०9 द् 108
2, 0, 2. 1. 7०. (117 7, 24466; 1, 1. 11111111. 7
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णि 17£ [चौक्छ्वाणणाता एला 10 1198 ७४।त त्य] धह कि लोतद्कपा, ऋ)
06 [16008 तत इका6 08 1166 पलः |वनात300 6, प्रकत 115 एकाच्ु्ाार
11191. 1112... 9. 1111111 त 111.
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ष्क ०० तिकि कुकी
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त 0 ० 106 4१४18 [पाणण र ०णवाल् 13 १०८६) 10 संदह स्मा
सदाण्वी पौः काद कहता प्रहर पपलाह पप्र स्छिप्य च्व्छाः ण (ह
ए्ाद्ावद, एतधि, ५3 द, ६05 86१२0८४ वार्ण 75 ठकप्ल्् ' ए ककण
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कदी 110 च धन एकाकवाहड, ताह, छात् [स 9४ 19 (08 पितौ 61, 6116 चत्र
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न्य = त आ म्य
1 1. 1111139 11111 41.111 1.11
9, तिश क, जन,
१, (^ वानव 7. 5 पाक वाक्लदा कल्ला 7, ३१३३ 11/70}
0.1.11... .3. 1.1 1.1.111
५ द्विदााफकणनमि 2. 552 प्ल ककशन कतत 0, धद-षुद, दनः
+ $ 2. ततं प्ल) डना कन्न्िणत क}, प्र पूत;
५ ५; अषि, 30545 पा सण सलाह ततु, ६१ पुकि
५ + ष 7 0 पा ककव सीतला 27, २७-2६ ११/7७ ;
र 9 ॐ, ॐ 11/11/1111 01 1.1 ॥१-१.॥ |
४: शा 26575 प्ण (लाकातदुन्पाद्णकती अ, 55.
अ, 7. पीक कृकण विन (त्वकाल तठ 10 71 1119 75 २0
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71 116 भुला एधा हाती ४8 सोनल कतानः चात् (पकबयद्ध छणत् धाह 1४
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पक0प्रकडछवं ठाद अयत् ध हाहा 18 0 वल्न्रोाषत् वरहा 19 #19ह कंहनऽ ०
धातृ च्व, [5 भा त प्राठ पापका इष्ठ 19 {५ ६0 गहपुप्रंणौ ष ककव
0 धात दवता वकल 00 ४ [द्मा संहत, पात न्दा पीत
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धिप्ाहपानि पसि एषा)6168, दद, ४5 ८ 09 00 तणा 70 श्रु 0 प्राह
० 6 एष्व शकला, (4 (ह पका शात् कछ $तत् 10 1 कषत 11109
१।५५५४७१०॥ ४8 12 {15 [0तषुठ।हधण्ण ०६ [ण द्याद्यः एप 1685 तदत) पवनः
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0 पपकडतिणयह ४5 उट८ा हौ १ एषणा (14058, [6८६८ वप ६4६ पधा६8 पा \4 !. |
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11811711 1111114 11.11.
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शा्ा& 11 ६11 हा १0९॥॥ 88 1115 811६ [त 0 11 1421 अलका, 1107 0111
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आपप्ाह्षः०॥8 [हक [रहण त + पृश क्लः णाल त्वि हणप छप कपा)
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लक्ष्म [पराता प्श 05 तक्ता, कह [कपत एक 106 प्याणत्
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18 85 प्रणतद्यन्ौ तम ।[ दह परकर 19 06 छाए बाहाः [ण्ह ण 1118 78, दरा
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प्रयः 15 १8०46 6 ला [1०1 ह], निप [णडतिपकरा8 15 0 1146 ठ १1६ 6601188
वषत (0 ण + [एह्य 18 07 फणा चप् 1 4 फलार 0६1६८ # 1६ 6 = 1.11
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0लाहदणा कतात् 0 च्ञ मा शकष ६186 ए्ा1710् प्रादा) 1 हनि,
6 0४5 7001 ॥ पराः 7त] ९६४ (6 पवष एकक 004 188 हुए शा 81108४८
ल्य ्पकवणा [षदप वृका तट व्षणकु प्के पाहत काट 85 काकु णय 86
६28 प्6 वे & प पहा ६8९ 0०6 6८9६-4] 07१ छण चुरण, च्यः
1“ 11... 11 .11.11..2 व. 1.1.11... .7 1
116 द्भ कधि फणति तल छ (1 पहहण कड 10 0168 कषद पातत पल,
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1, 1.1 (14. 0.77.
अ (यापन हत 7), द४-द७ चत् 0 2.14 प्लत,
8. 7. ष
4, ¶ 0, ३५-३३.
11114114. (द्रप
॥). 1.2.811 1.11 1.1.23... |
४ [प 1 १४९ इ ड8 0१ 166) 8[6६]), प्र 1015 ६16 10 18118 {12४ 1 नकप
101, 800 11128 7 श्राताः एह 1४6 € 6८ 18 ॥766 9६४8188 95 ६1६९
शा0-515168 वपा 8 पृद्टाञ-दटा+ःबद्रहन-पर9, नृद्ुातव- 208110६ &६. कात्
त 1116 छडकदवरहव् ० ष्ण फादौ॥ छ0वह हिट 18 [त्वच ३0 [8 61818 ०
1.1. 9... 1.8.11.)
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छाणधह्ठ ज धार (ाष्् प 115 सतवमान ऋएड 7108 पणा
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दणन्तछल,
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कप्पदीत्तमंकपकः ऋृष्सीतवाक् पलहिपाटव् च 3 विह्याला १६ ० कणठः का कलो
४6 ८0 ताह 6118 (एषह ४0707 पा 614 ॥058£ 07 ॥1016 सषवत, ह [व्
धौ दाह पलटा प्रीहपलातट्व शप्र 81 छिपा ह 10] एड ॥8 ४0 5६7९४
छल [त्राण 180, पि18 धात्व ०8 60 पाला वण #6 स्णुगश्नंपप्त् 10 (13
कषु (118८ पद, 05९ ृषीा9 18 पप्र व्ह | 118 फल्एछःफ ० ०५८8१५६
16 [दलता एठः कायु वु कत प्नोतत छनिपनाधात्व् 2 छण् एप्र॥ 10] 1१६
1/8, त 11111 7/3.
0४ 10 08 01 80106 तू कषा8, (206 च वाप उ पौराः ३९] कातल,
1124 1 15 5व 9 [णफल्णीक, स्तत १५ नाद कच्छः ० 9 तण
ण्ण 0 ६॥४॥ गाृणूगदाक्ताहैटव् ॥प हणवा 170 कवदातुणुदन्याच 118 पाद्ष्लः
४ £ [ला तौति दनान्न्लच्त इल. धवत् कड ०३९५ 1118 हाः
पफ आत् दलः भूरवह्त् ॥्ा 116 वाट [पठदरस्छतत पा डद ०8], 95 1118
पटा 10 1116 0156 ० कराह छं रणित वृ्नापत्क र, {९ लातत ६ तकक्ना
10 8 [5 ०१ {16 [णप क सिकरी चपतणः ० 16 वकीण
क किष काह पणं दाप प्रद छना चर (फण | [ठट ¶ 616 110६
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एज [्व्छ्ध्प् 0 ४1६ पणणं ण 06 (की 178 आप्ताः ठ 116 दाद
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तावक, ततष्ठा ४० तिद्यीतातल) [ह 16 101 0810618 81161 08
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वपत्र [एठापाषह 14 18 जाह छपङ्ग भ्कयः 8 इवष्तयतु छ् [कय एलु #9 [हाच 19
तकण 115 छा - र पठकरः तका ता षक पचटपाह 111६565 पत्त
(वहा ५०६१, पकाल आ 0६ पुता ०0 ९४१३) [प्र६ [दिह त्प] उष्टा स्का ९1९,
४॥॥6 ९6118108 {कहै ताह = छपर 0६81 एप्प कापर 198 0हस्छाषह [एत्व तत्ठह 181६५
[गाठ छा 19 115 1 हता द 107 1 {ट् 7591-एतप्रकड च 105 एषह © चय.
व]6 515 ण श्ना कप्त एप क्धणदत्, द कषदपंणपत्त €| (8186 0 1118
60216 9 1014108, धव ।1@ -दृताकदपु्ठा॥ एववृह्यहयाहट णा तर तप् काक्र एाा
कपा क [1९ हद (९९ त ०६३ - 0 तवर, (104 ० 1118 [76दलुः्तः १९1५
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श षटा05 (एवावुहादका 1116 ४118 ०11}8८ल ४ ठो) छट ललक शात् तरतत
च {0६ हार ७६ पश्व ठह (19 आतहकः [िलात्रफाहाा [तप्ल्ड् 0% 2 [पदान
11 त ^ + 2.1 1
ऋ 1.114.111... 1.1
२, चादकदेयासभ्वद शाश्न्द्तैः चितम ।
गाङ्गः नङ्गटणं नात यन्धनेवं पिपश्चितः ॥ लारसद्ह-का धी पचत अन्थमराा पु. १८ (१) प. १६.
१. 77, 71 1-71/ 5४,
(श्रकाप्एएतका0 9.9.११
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एक्ट ए ण धह ताप वणत कड दुषणिश्व छक उत्वाप्याश्छप्ञ प 108
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त्हि8 8 परि ्कला६ त्रप त््प्रष् #एत 105 कपि त ध एकरवषस्यतान षर,
प्रित [णद्वफपपक 25 215 ०8 कसुप्न्ध्पि कप्त ण दया ऋतृहह्छवृहत कफः च
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118 पाताः कषक (एता 15 7070 60 06 > पल 5 णी प्र द्ल्यतह्का, (१108.
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97 75 आका ० (र हणाकपणद्ु छपा काढ क्ल 1 काचक, 9
पताही 0 सकचा स ्ाकोन्य5, 8 एप्प
छा #10९ पपलदाशक्रठड क = (नुत, ष्वय्तदकतदयतानयकरातह, ५० तकु
ट, पवाक, 9 हदति 67 116 (कतक ६0 इका
ववदधतोचाद्प्ः > व्छाणादलाहकु छो 1 कत्तु ३8 8 915 श्वस्य
प्राधा ६४५ कद्ध 00 8 (फाला 0 ४06 -धादकुषद्रपदताकतप्तणा क्त,
४6 © {18 [रदवाधद, द्व् 66 01 06 (द्यननतशपीकच्कत,
चह पिपर इतत {5 एह दण्द ९९ शरन प्णव् 1ह 118
एणा ठा 0, ४ दशात् छदा 401 प्यद्व8, 103 एप 9 {06 हापा)
(51198, एवज, प्रा ॥३त् ववत् 18100506 [ष्ल्] प दणशरं् ह 8 कषः
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1, वातत -गाववद्पकु तत रप्वपप््ातदमक एण, ज 17 45405 0004ताह वं
1.1 1.8 21. 1.118.112... 811.
119 श्र॑हक्त५ हदु ष्ठ 10 (िमद्तककिपतेक वकवत 0४8 0661 एत; तनत्य
ति दपा (9 वदततत 17 195 पक्तौ णा हला०
३. 4 वफनटलवास्पु (नान्त दु ज 0६ ६5 तिठकनतयिद्हं सतपा + भृकज्,
अचत००.ः 14157 4 ‰ 1944-2 ए, 4 20 +, 2, 1776, ।
9. (10 (कदपा0क्ल्ल 701 4 7, 556,
\10.111/ | 1१.11.111" 1 4.0
11.811... 1. 18.4.11. (1/1
1१ हतिणािण का [ताः 1 ४. ^ प्ाकपादश 34, 4. 15 पमा्णृनुरं
{त वितत 108 वचार पल 8 106 -नाणलुततुत उत् 048 [ह्व 161] 10 € 1
£111614 9४0६ फण कृ हवि पश [08888९5 77 115 {8 ऋ 15 हार + 09)
९181060 एफ काकु पाप॑ तप्यति छाः 0 किती 115 एरक पाशिष्पं
पिरष्य {1 9,
1,1.11... 1.111.111... ..2/.13...1...
एकापरा ददा 1 14456 [र ¢ दतत् प्ट पपत प ४05 अप्रता एलकणय०् कु
तिणि ॥॥9 कठक्तक्ाकृ णु पत्म ०138 धका कर्ती {78 एल 9 धार ऋणा
क. 1.1.191... 13.1.12.
58411514111 56101}.
॥ श्रीः ॥
अथ सिद्धान्तविन्दुः ¦
उपोद्धातः ।
श्चीदाङ्राचायनवावतारं
विन्वेश्वरं विश्वशुरं प्रणम्य ।
वेदान्तकाखश्रवणालसानां
बोधाय क्वे कमपि प्रयत्नम् ॥
इह खल साश्चात्परस्परया वा स्वानेव जीवान्ससुदिधीषुर्मग-
वान स्रीचजच्छङ्करोऽनात्वभ्यो विवैकेनात्मानं निचन्नुद्रवुदसक्तख-
मावं संक्षेपेण बोधयितुं द क्श्छोकीं प्रणिनाय ।
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीकृष्णा नमः ॥
यदबोधादिदं भाति शुक्तिकारजतं वधा ।
यद्रोधादस्तमायाति न ववोदेतिं त्यद् ॥ १ ॥
श्रीरामं स्ुहुरानस्व वक्ति श्रीपुरुपोत्तम; ।
सिद्धान्वचिन्दौ तत्त्वा्ध॑साधकं किमी स्फदम् ॥ २ ॥
परमैध्रिरुरं रामं श्रीपाद परमादरात् ।
नत्रा दरिदहरानन्दं नमाभि परम गरम् |! ३ ॥
श्रीधरं शरीयुरं नच्वा नौमि श्रीपादमादयात् ।
विद्यागुरं गुरूभिव दुचणां मधुद्धुदनम् ॥ ‰ ॥
विन्ननिघातार्थं ग्गं छ्र्वज्ञारभ्यमाणप्रन्धस प्रयोजनमाई-श्रीचाङ्कराचार्येति ।
विश्ैश्वरनामानं गुरं प्रणल्येयन्बरयः । तं किंभूतम् । विश्वगुरं चिशरेषां हितोपदैश्षरम् ।
भ्ीदयब्दः छतकर्षवाचकः । श्रीदाक्कयचायाणां भाष्यकरतामभिनवावतागपर । यद्रा
विभ्ैश्वरः सगुणं ब्रह्म प्रणम्य । श्रीस्यु पश्चणं बाणीभवान्यौः । गं कल्याणं करोतीति
व्युत्पा घर्मा विष्णुः शएस्मुख । आचाथां चपदैष्टारो ज्यासवैयासिफक्पिटश्राचारय-
पथ्यः । अत्त एव नीना दक्षा एतै जाघरुनिकावताय यद्य तम् । भं पूर्ववत् |
प्रयोजनमाद-वेद्रान्तेति । कमपि, अनिर्वचनीयम् । नलु, कमपि प्रयत्नं क्व
ति भतिज्ञातं तस्य च यिषयः स्तन्न बरन्थौ घा कस्यचिव्याख्यानं त्त्र द्वितीयमभि-
१, चपुस्ठकै श्रवरधमिति पाट; । य, तसितैव शरीयङ्गरः इति ।
द कपोतः |
परेयाद-शेति । इह, अदैतविचारे शारीरकविचवारे बा । खल्यु, वाक्यालङ्कारे ।
जसम्भावनाविपरीतमावनारदितानत्तमायिकारिणोऽनिप्रेवाद--साक्तादिति ।
चछोकोषरेशमात्रेण इत्यर्थ; । असन्भावनाविपरीतभाननाचतौ यध्वमानधिकारिणो '5-
भिपर्याद-प्रम्परयेति । च्ाल्रजन्यज्ञानानन्तरं श्रवणद्ारेचर्थः । यदा खसन्नि-
ष्टा ये तान्माक्षात् अन्यासु रिष्यादिद्राया परम्परयेति । अनात्म्य हति ।
अनात्मभ्यो दैहैन्दियमनोवद्धिपाणाहङ्कारचित्तादिभ्यो विवैकेनात्मानं धोधवितुमिदय-
न्वयः । एतेनात्मनो बह्माभेदो ध्वनितः । नहि त्रह्मातिरिक्तः कथिन्परुक्तसख्माबोऽच्ि ।
निष्यशद्धवुद्धसुक्तस्रभावेचयनन्तरं सचसुदमसद्विञरु-अद्वितीय-परमानन्देतिं
पूरणीचम् । तथाचोक्तं संक्षेपश्चारीरके (१-१५३):-
निदः चुद्धो चुढ्क्तवभावः सयः चुक्मः सद्धिमुश्चाद्वितीयः ।
आनन्दान्धि्मैः परः सोऽद्मस्ि प्रचग्धातुनात्र संदी तिरस्ति ॥
न्द्रा वः शूयते स परत्येकमभिसम्बध्यते ह्यनेन न्यायेन नियखभावत्व-
टरुढ्वभावत्वादिरियर्थः । अन्न च प्रमाणसुत्तर्च्रसिहतापनीयनवमखण्डस्थवाक्यानि ।
तद्यथा--'पक्रमेवेषा माथा सा व्यतिरिक्तानि श्ैत्राणि दश्चयित्वा जीवेश्याघामासेन
केति, माया चाविद्या च खयमेव भवति; सैषा चित्रा घुदडा बहरा इयादिष-
सक्या, ' वस्मादद्रय एवात्मा सन्मात्रो नियः चुदो वदस्य अुक्तो निरञ्जनो विभुर
यानन्दः परः प्रगेकस्सः' इति। तया तत्रैव ' सहोवाच वद्मा एतद्रद्माढयं बृहत्त्वा
शुद्धं क्तं सु्मं परिपूर्णसद्वयं सन्मां चिन्करात्रमात्मैव व्यबदर्यम' इति । नित्यत्वं,
काटपरिच्छेवश्चन्यत्वम् । त्च "अजं भात्मा महान्ध्रुवः)! 'अविनादीं अरेऽयमात्मा
इलादिशरयर्थापत्तिप्रमितम् । दद्ध्वं, अविश्ामदरहितत्वम् । त्च, “असङ्गो हवं
पुरपः' 'ल्सङ्खमरुणमविक्रियम्ः इयादिषुतिघ्रमितम् । बुद्धत्वं, खयप्रकारालुभव-
खरूपं, भवे क्तप्रययात् । अत्र च श्रमाणं ‹चेत्तनश्रैतनानाम् ,' "सत्यं विज्ञानमानन्दं
द्मा, ८अत्रायं पुरुषः ्वयंव्योतिः' इदा विशतिः । शुष्कत्वं, भमात्त्वादिवन्धरदिवत्वं
परमानन्दखरूपत्वं चा । अत्र रमाणं, “तद्रद्याहमिति ज्ञात्वा सर्ववन्ध॑ः प्रमुच्यतै' |
एवं च बन्धस्य कास्यनिक्रत्वेन मुःलस्वभावचं ` बोध्यम् । अन्यथा अन्धस्य सत्वे
ज्ञाननिषत्यत्वं न स्यात् । नद्वि सदस ज्ञाननिचत्वं दृट्म । विमुक्तश्च विमुच्यते"
इति धुतेश्च । "बह्म वेद् नद्येव भवतिः इयनेन बह्मखरूपतवं च युक्ततरं च । ब्रह्म च,
`प्ररमानन्दखहपम् । तत्न प्रमाणं , ' एष एवं परमानन्दः, ‹करं बह्म खं जह्य, ।आन-
न्दाद्येव खल्विमानि भूतान्नि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्य-
भिसंविश्नन्ति' इयाद्याः श्रुतयः । सत्य्व, पारमार्थिकत्वम् । तच्रावाध्यत्वं सुक्ष्म
१. गदु्तके धधमानविचरिण इति । २. १ पृस धरम्बध्यतैति न्वायेनेपि । ३, तस्मिनेव
युक्तिखभावल्निति । ४, खुदत त्न िवत्वत्वं चित् शपति ।
उपोद्धात; । द्
त्वमिन्दरियाभादयत्वं दुर्विज्ञेयत्वं था । अश्र च प्रमाणान्तरं, “नित्यं विभुं सर्वगतं
छक्षमम् इदादिश्चतिः । खद्धावरूपं, “सदेव सौम्यः दलादिथुतेः । विभुत्वं,
सर्बगतत्वम् । तच देशषरिच्छेदशुन्यत्वं खातङ्यं वा । तत्र प्रमाणान्तरै, *मङ्कान्तं
विभुमात्मानं मत्वा धीरो न दोचति' इति श्रुतिः । अद्वितीयत्वं, खसमानसत्ताक-
दवितीयरदहिवतम् । तश्च स्समानसत्ताकमिन्नद्धितीयकः्वय् । खत्मानसनत्ताकतरतिचोनि-
सामान्यभैद्रहितत्वमिति सजात्तीयविजातीवस्वगतभेवशन्यत्वमिति वा । आन
न्दत्वं, अपरिच्छिन्नसुखश्रूपत्वमिति । नन्वत्र सन्ति वहवो निवन्धाः किननेन
श्यत आद- संश्चेपेणेवि ।
नन्विदङ्कारारपदेभ्योऽनात्मम्योविवेकेनादङ्ारास्पदमात्सानं सर्वौ
लोकोऽहमस्मीति परस्येति दुःखं चानुभवति । तैन त्तातन्ञाप-
कलत्वान्निष्प्रयोजनकत्वाच आस्मतत्त्वप्रतिषादनं व्यमिति चेत् ,
न, चिद्धास्यत्वेन लक्षणेन इदेङ्कारास्पदानामपि देहेन्दियमनसों
प्रतिभासतोऽहङ्कारार्पदत्वेन तद विवेकात्, तेन चिद्ुद्धेऽप्यात्मनि
दुःचित्वाद्यभिमानात् शा्ञीयेणैवं अद्यैकयज्ञानेन समृटस्य तस्य
निनत्रत्तेः । तस्मादनज्ञातज्ञापकत्वात्सप्रयोजनकलत्वाचात्मतन्वपरतिषा-
दनं न व्यम् ।
नन्वनात्मभ्यो घटपटादिभ्यो भिन्नत्वैनस्मिनि ज्ञातेऽपि दै+खानुभवददीनान्नीत्मन्ञानं
दुःखनिवर्तकं ज्ञातज्ञापकलवोचं शाल्ञं न प्रमाणमिदयाशंइते-- नन्विति । जथ
इदङ्गरास्पदत्वं नाय, इदमिति प्रतीतिंविषयत्वप् । तच्चास्मन्यपि सन्वत् ‹अंय-
मात्मा त्रह्म,' "जनेन जीवेन इत्यादिना इदस्वेनात्मनो वोधनात्तथा चाुपपन्नतरोऽ-
चमरतभवः, नहि कच्िदनात्मभ्यो मैदेनात्मानमलभवति इयत भाह-ञअनास्मभ्य
इति । षटपटादिभ्य इदर्थः । एवं घटपदा्न्वतमत्वं जउत्वं वा इत्वं न पूृषत्त-
अतत एवबोपपन्नतमोक्तातमत इतिं भावः । कियच््यो भेदेन, आत्मनि गुरीतेडपि अना.
त्मभ्वो देदेन्दरियादिभ्यः । भेदैनाब्रहणात् धनात्मसामान्वेभ्यो भेदाप्रहात् । तीस
जञानं जातसपि ने प्रयोजनक्षममिति परिदरति- नेति । वस्तुतः इदङ्कायस्पदानां
देदन्द्रियमनसां वचिद्धाखखत्वक्षणरूपेणासाधारणधर्मणानास्मनासपि अदृङ्कारास्पद्-
च्वेनाहमितिप्रलयावबटम्बनसैनार्मस्वैन प्रतिमासतो ज्ञातत्वादिति भावः ।
तद विवेकादिति । देदेन्द्रियमनोऽहङ्कारादिभ्यो भेदेनाव्रदयादिव्यर्थः । श्वं च तद्
१, सुरे देदन्धियप्रायमनघागिति । ५. सपोत्ते च धडेऽप्यश्मनीति ॥ ३, ऋपुस्ते
दाघ्नाचार्येण च बह्मासमैकान्नानेन इश्यश्चद्धः प्राम विदत । उ. क पुलक नक्षारो ऽयं नालि तथापि
स आ्रह्मक दति खगपुखकयो रुदतः ।
च उपोद्धातः ।
विवैकारियन्तेनाश्रङ्कितानामार्मभेदमरहः परास्तः । चिद्धास्यस्वमनात्मत्वसाधने हेतुः ।
अनात्मत्मैनाक्ाचत्वम् , आमयेन ज्ञातत्वं विवेकाग्रदे हेतुरिति मन्तव्यम् । प्वं च
्देन्दरियादय अनात्मानधिद्धास्यत्वात् । दैदाद्य आत्मनो न गृदीतमेदकाः; अनास्म-
तेनान्नातस्वाद्ात्नत्वेन ज्ञातत्वारैति प्रचोगः । चिद्धास्यत्वं च, चैतन्यप्रकादयत्म् ।
तन्न च धरमाणं, ^तस्व भासा सर्वमिदं विभाति! इवाच्या शरुतिः । आचङ्गितदुःखातु-
भवमपनुदति--तेनेति । तेन, जविवेकेन, अगृहीतभेदेनेति चात् । अभनिमाना-
दिति । आत्मनि दुःखभ्नममात्रं न तु दुःखमिति भावः । चदीदं ज्ञानं न प्रयोजन-
क्षमं तहिं कीटशामात्मतच्वज्ञानं भयोजनश्षमं तवाद्--दाखत्रीयेणेति । शाखं च ।
'लामःलप्रसुषुध्यादिप्रपच्चं यत्मकाशाते |
तद्रद्याहमस्मीति ज्ञात्वा खर्ववन्धैः प्रमुच्यते ।।' इयादि ।
एवं च शुद्धजीवव्रह्मणोरभेदावगादटिश्ञानं शालजन्यं ठञ्च वन्धनिवर्तकमिति फि-
तयपसंदरति- तस्मादिति ।
तस्य चात्मतक्वस्य (तत्त्वमसि ( छा, २।८।७), "अहं जह्मास्मिः
(बृ. आ. १।४।१०), इत्यादविवेदान्तमहावाक्यमेव धरमापकम् ।
याक्यं च पदार्थज्ञानद्ारेणैव ापकमिति तक््वम्पदाथयोः; धरकूत-
वाक्याचुङ्लयोरन्यतोऽसिद्धत्वात् तादपि राखेणैव प्रमातच्यौ यूषा-
हवनीयपदार्थवत् । ततश्च “यतो वा इमानि भ्रूतानि जायन्ते येन
वा जातानि जीवन्ति' ( ते. ३।१।१) हव्याव्याः खछ्यादिश्रुतयस्तत्प-
दवाच्याथ॑स्य समर्पिंका ¦, स्यं च्ञानमनन्लम् ( सेव, २।१ ) हत्या
दयास्तु लक्ष्यार्थस्य ।. एवं जाग्रत्खभ्रसुषुस्यादिश्ुतयः तद्यथा महा-
मत्स्य उने के अलुसश्रंतति(ब.भा.५।२।१८)६ाद्यास्स्वस्पदवाच्या-
स्य समर्भिकाः, "योऽयं विज्ञानमयः; प्राणेषु हृ्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः,'
(र. आ.४।२॥५) "न द्रष्टारं पये" (सैव. ३।४ ४५ इ्यावयास्तु लक्ष्याथै-
स्य । तेन प्रथममवान्तरवाक्येभ्योऽचश्रतयोः दुद्र जीवव्रह्मणोस्तत्तम-
स्यादिवाक्ये सुख्यार्थान्वयालुषपत्तलेश्षणया स्मरणोपचत्तिः । सषुतौ
निर्विंकल्पकसान्िचैतन्याङ मवाङ्गीकाराच अद्वितीयन्रह्मजिक्ञापयिः
षया भ्रधृत्तानां खयज्ञानादि पदानाखुपाधिविरिष्चैतन्ये राक्तत्वेऽपि
चैतन्यमात्रे तात्पर्येण तत्रैव तदै पैव संस्कोरोडोधाच। इच्छन्ति दि
जआकादादिपदादःपि निर्विकल्पकं स्मस्णं तार्प्याधीनत्वाच्छब्दशततेः।
एतेन प्रमितिप्रमान्ो्भदायाकयाथनोये मानमपास्तम् । असम्परज्ञात-
१, १ पुलक अनुशरदतीति पाठः घ्र न युक्त एति मन्यै । २, कुस्ते तदथा मदामत्छ द्याया
यः| ३, तद॑रो एव इतयैत्तसदद्वयं कमुके नात्ति । ४, तस्िन्नेव स्मरणनितिपदं चाश्चि ।
हपौद्धात्तः । ५
शना निता तिस्तिसिद्धत्वाचं । एारोध्वसद्धिीयत्वाभ्यां च न
पमात्राल भवदेव कृतकूलयता । वाच्याय च भेदाव-
मासान पौनस्त्यम् । चक्ष्या्थस्य चैकत्वादखण्डार्थता । पदजन्यस्य
च स्मरणस्य निर्विकर्पकवाक्याथौनुकरलस्य निर्विकस्दकः्वमनुभव
वदेवाविरद्धमं । सविकर्पकवाक्या्थयोधे च सविकल्पकपदा्थौ-
पथितिरङ्गप् । धकरते च निर्विंकल्पको बाक्यार्धधोधस्तस्यैव प्रमा-
त्वेनान्चाननिवतनसामध्यातं । अतो न लक्ष्यतावच्छेकमन्तरेण
लक्षणानुपपत्तिः । पर्रतवाक्या्धानुकृरपदार्थोपस्थितिरेव चाक्ति-
खक्षणासाध्यत्वात् ।
दासमेवाह- तस्य चेति। आत्मतत्त्वस्य, जीकतरहमभोरभेदस्य । एवकारेण
लोकिकप्रमाणव्यावत्तिः छता । नन्दैवमपि पदार्थवोधकाभावाश्न वाक्ार्धबोघ
इयाशङ्ञयाद-- वाकयं चेद्यादिना। असिद्धत्वात्, अन्ञाततत्वात् । नन्विदमदृष्-
चरमेव करप्यते, न इाद--यूपेति 1 "यूपे पञ्च्वभ्नाति'ति श्रुयते, वश्रैव “युष
तक्षतिः" '्ुपमष्टालि करोति इति च तेनाषटाननितश्चणविरिषटखदिरादिंकाष्ठविदोपो
यूपपद्वाच्य इति चधा वेदाचछक्तिम्रदत्तथा तत्त्वन्पदार्धयोरपि वेदाच्छक्तिप्रह
इयर्थः । आहव नीयेति । यपि "वसन्ते ्ाह्मणोऽप्रीनादधीत' इयायुतपत्तिविधिषु
आहवनीयत्वाविरूपेणाभ्रेयधानकर्यत्वं न श्रूयते तथापि तख खशूपेणाप्नितवेन था
उत्वाय्राच्यविकार्यकर्मघ्वातुपपत्तेः आहवनीयादिशव्वा्थाज्ञानान्चाधानकर्मविचिप्रवु-
चितः आपूर्व साधनत्वस्य ज्ञातुमशकयच्वात्तेन रूपेण त्रीश्यादिवत्संक्ा्यत्वाद्ठुपपत्तः
कैन रूपेण कीदृ कर्मेयायपेक्षायां ।लक्तं गारहपयमादृधाति दिवा खादवनीयं भूरितिं
गा्दपलमादधातति शुत देयाहवनीयम्' इवयादि गुणवक्चेषु गा्हपदयादवनीयर्पे णाडया-
घानकर्मत्वावगमात्तद्रपश्य चाधानात्प्रागसिंदधत्वात्तेन स्पेणोराचकर्मलं प्रतीयते ।
भआधानेनाप्री गाह पत्या््वनीयौ छ्यादिति, खधिरादिकाष्ठं तक्षणादिभिः यूपं छयौवि-
तिवत् । ततश्चाधानजन्योऽमिगतोऽिश्चय एवादवनीचादिपदबाच्यो भवतीति । भादि-
पिद्राह्यं तु च््गाचपि वेदवोधितश्चक्तिकमर । तवादि वेदः-
४चन्न दुःखेन सन्भिन्नं न च प्रस्तमनन्तरम् ।
शयिष्टापोषनीतं यततद्युं खःपदास्पदप् ।॥' दयादि ॥
१, खपुन्तके सिद्धत्ाचेति इत्ति पाडः । २. गपुक्लके अनुभवनदैवर विङूढमिति । ३, च्युत
प्रमातृत्वेनाह्ाननिषृत्तिसामभ्य दिति । ४. 5१ परे कीटदा च्मयादपैक्षायां चा्हपद्यताद््ाति शुकं
द्ु्वादवनी यिच दिगुणवाक्येष्रु इतिं ।
४ उपोद्धौतैः ।
तैलरीयकस्य दृततीयप्रपाटकवाक्यसुदादरति--यतं इत्यादि । जीवन्तीत्यनं-
न्तरं ध्यत्ययन्यभिसंविखन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद्रद्च' इति श्रुतिनेषमागो बोध्यः । एवं च
मरचन्तीत्य पोतन बहमन उषादानस्यमपि ध्वनितम्, अन्यथा तत्र छवासम्भवात् । नदि
कपालातिरिक्तोऽपमवायिकारणनादाजन्यो घटनादा इति कंथिचेतनो जवीतीयवनरे-
चमू । पुनरपि तैत्तरीयथतिगुदादर्ते--सच्यमित्यादि । "्रधैवेदं निहितं गुदायापः
इति धतिरेषः । छक्ष्यश्य, तत्पदलक्ष्यसय । एवभिलयस्य समरपिंका इयनेना-
न्वयः । त्वंपदार्थवाच्यार्थसमर्पिकां चरहदारण्यकषष्ठाध्यायखल्योतिनौद्यणमभ्यपातिं-
शरतिरदाष्टरति- तदयथा मष्टाप्श्य इति । अखं दोषभागः “उमे इकेऽतु-
सश्नरति पूर्व चापरं चैवमेवायं ॒पुरुष एवावुभावन्तावनुखच्चरति खशरान्तं बुद्धान्तं
च' इति । ज्योतित्रह्मणखदक्ष्यार्थसलमर्पकं वाक्यमुदादरति--योऽयभिल्यादिः
इहव्यन्तरज्योतिः पशव इत्यनन्तरश्र, "स समानः सन्रुमौ टोकावतुसच्चरतिं
भ्यायतीव कछेावतीव' इत्यन्तो द्रष्टव्यः । उपस्तन्नादाणखवाक्यं लक्ष्यस्य सम्पेकं
पुनरुदादरति- न दृष्टेरिति । नन दृ्र्ारं प्रदचेनं श्रुतेः श्रोतारं श्रणरुयान्न
मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विह्नतेर्विज्ञातारं विज्ञानीधा, एव तत आत्मा, अतोऽन्यदि'
इयन्तं बोध्यम् । छक््स्य, लंपद॑टक्ष्यस्य । मुख्यार्धति । पतेनान्वयानु पपत्त्या
छक्षणा आद्वियते इति ध्वनितम् । यदि गोरनिय दयतैवान्वयवोधः सभ्भवतिं
तदा तात्पयौनुपपच््यैव छश्वणेयवधेवम् । विनापि उश्चणामनुमवप्रकारमाद ~
सुषुपाविति । खं च क्षणानादरर्णयेति भावः । विरिष्टवारवार्यवोधादेव निवि
कत्पकं सरणमियारयेनाद--अ दितीति । प्मेयवद्रामजनकद्ृत्तिधर्मचदिव्या दिना
चोधितख वारस्य द्तर्थत्वास्यप्रमेयांडास्य देशरथत्वान्ययासजनकवुच्तित्वांश्चस् चं
मोष्टा दक्षरथत्वा दोऽन्यप्रकारकं॑दसरवज्ञानं यथो परे दन्ति तथाऽत्रापीय्धः ।
परसम्मतिमाद्-हच्छन्तीति । उभवन्नापि साधकमाह-- तात्पर्येति । विपरी
पररश्चवादिप्रामाकस्मतमपनदत्ति- एतेनेति । तात्पर्य आस्ममात्रै, अन्यथा (तमे
विदित्वाऽतिमृयुमेति नान्यः पर्था विच्यत्तेऽयनाच' इति श्रुतिविरोधः । नच तत्रापि तं
विदितैव इत्येवकारथङ्गः कर्वज्यः, अन्यधा ज्ञानातिरिक्तस्यापि कर्मणो नोक्षजंनकं
त्वापत्तिरिति चाच्यं, “नान्यः पन्था चिचयतेऽयनाय' इयनेनैव तद्रयादृततः । ज्ञातक्षाप-
कत्वेन नान्य ॒इत्यंरावैवर्ध्यातत, “न कर्मणा न प्रजया इलयादिध्चुतिनिरोधाचच । न
च श्ाब्दयोषे प्रमितिषमात्रोमौनाभावैऽपि सर्वत्र भानाभाबो न चिद्ध इति वाच्यं;
नियमभङ्गेऽन्वत्न भानसाधकाभावादन्यत्र आनेऽपि क्षलभावाच् । नत चुद्धास्मनात्रविष*
चकपदार्थजञानादेव नोऽ तत्राद--पारोश्ष्येति 1 नतु, तत्त्वपवार्थयोः पौन
शक्तय यत् तद्वाच्या्थयोशषयार्थयोरबा । नाय इलाद--वाच्यार्थस्ये ति । हवितीयेऽध्येवं
दपोद्धातः । च|
क्रमेण चक्तव्यम् । तथाहि-षटं घटं इत्यादौ उरेदयतावण्करैदकवि वेयतावूरैकयोरदेः
इयनिघेययोवां पेक्येन शाब्दनोधा्चवयान् पवयोर्विरद्मकारकोपितेः कारणस्ं घा-
द्यम् । तथाच निष्पकारकचैतेन्यमा्ोपश्यापकयोस्तत्तवंपदयोरागतं पौनरुक्त्यमिति ।
सोऽपि न निर्विकहपकः, साधारणत्तमानव्रकारकोपद्धिलयभावस्वैव कारणत्वकष्पनेन
सर्वसामश्चच्यात् । एतैन तचतवपदलक्त्यार्थवोस॑पौनक्तयं बाच्यार्थ्व भैदैनाचभास्-
मरनत्वादित्युपाढन्मः पर्ल! । यद्धि च वाक्यार्थे संसर्गाभावासपदार्थवोधवाक्यार्भ-
बोधयोरेक्वरूध्यमिति, तदपि न रमणीयम् । भूते घटो न, षटाभावबद्वतटमिदत्
सप्नन्यर्थमतुवर्थसम्बन्धभूतरचदाभावरूपविषयैक्येऽपि विपयताभेदचत्पदार्थनोधापे-
क्षया बाक्यार्थबोधे जीवन्रह्मणोरसैदहपश्य वरैठक्षण्यभानात् । स वाभेदः खकरूप-
सम्ध्रन्धपिदोषः प्रतीत्तिविशोषताध्लिकः । परे त्वयं घर इति शाव्दथोषे धद्व
विरेष्यलयप्रकारत्वसांसर्गिकविपयत्ववदेकस्यैव चैतन्यच्य निरोष्यत्वप्रकारस्वाङ्की-
कारेण सर्वसामश्स्यात्् । विरष्यत्वं प्रकारत्वं च सहूपमेव नातिरिक्तय् । नच विदो
ष्यत्वप्रकारत्वोक्तौ निर्विकत्पकत्वह्मनिरिति वाच्यम् । पारिमापिकनिर्विकहपकत्व-
दानाबपि अखण्डार्धंविपयकत्वाश्चतिरिति वदन्ति । वस्तुतस्तु पदार्धवाक्याधंयोरैक्व-
रूप्येऽपि न क्षतिः, अपि ममानुक्क एव । उक्तं च सिद्धान्तमाच्छरादौ वाक्ष्वार्थ-
योधस्येव पदा्गोधच्याज्ञाननादाकत्वमिच्युपरस्यते । तर्हिं वाच्यार्थ गोधस्य कथमख-+
ण्डार्धविषयकत्वमत आश्--छक्ष्यारस्य चेति । नतु अरणस निर्धिकहपकत्वमश्ध-
चरनत आद--पद्जन्येतति । प्रमात्वेनेति । निर्विकल्पकत्वस्य परनात्वं निदयो-
प्याच्रुल् श्रकारकत्वं खवाधितार्धविषयकत्तं बेतयन्ययैतत् । नन्वेवमपि निर्धिकरपकः
व्राक्यार्थवोधो न संगच्छते छ््यत्तावच्छैदकल्पेण छश्त्यभाननियमादतत आद
अत इति | यत्तो वाक्यार्थबोधो निर्विक्तसपकः "तमेव विदित्वातिमृल्युमेतति इतिं
घुचयादिसिद्धः, यतश्च निर्विकन्पक्वात्यार्धनोवे निर्विकत्पकपदार्थापश्ितिरङ्गम् ;
अतोऽत्र न दश्ष्यतावच्छैदचछरूपेण छक््यभानमियर्धः । ये तु छश््वतताचच्छैदकरूपेण
लक्ष्चमानमद्गीर्नन्ति तेऽप्यतिपरसङ्गभङ्गाय नानाधर्मवत धर्मिष्ठ एव न तु निधै्म-
करथले, तन्नातिप्रसङ्गाभावात् । छश््यभेदैन छक्ष्यतावच्छेदकस्य नानात्वेनानुगत्तत्वात् ।
छक्ष्यचावच्छेदकभिन्नपकारेणोपैखिद्यमावस्य उभव्ताधारणतचान्ुगतत्वाच्तिं दिक ।
ननु तर्द वेदान्तवाक्येभ्व एव पदार्थोपस्थितौ वाक्या्थवोधे च
सति तस्य खत एव प्ामाण्याचतेनाज्ञानतत्कायनिष्रत्युपपत्तौ किं
विचारेषेति चेत्, स्यम्, वेदान्ता यद्यपि खत्तःप्ामाण्याननिर्विक-
१, क१ पुखकै पटं पटः एत पाटः । २, तसितनिव तच््वम्पदाधयो त्रि । ३, खपुल्लक बक्षय-
-दावच्छैदकशकारेण इति पाडः ।
~ त्वं पदार्धनिर्णयः ।
ल्पकमात्मसाक्नात्कारं जनयन्ति तथापि मन्दमतीनां वादिविप-
तिंषत्तिजसंदायप्तिवन्धेन तस्याज्ञाननादाकलत्वासामथ्यात्, विचा-
रेण तु क्षंदायनिध्रत्तौ निरपवादमज्ञाननिवृ्तिरित्ति संदायबीजभूतः
वादिषिप्रतिषत्तिनिराकरणार्थं विचार आरभ्यते ।
इदानीं बिचारमाधिपति- न्विति । तथाच क्षाल्नं नारस्भणीयमिति भावः ।
अदं ब्रह्म भवामि नवेयादिविषयसंशयाहितपरामाण्यसंदेष्ेनाप्रामाण्याशङ्काऽनास्कन्वि-
तनिञ्चाभावाहाक्यार्धबोधस्यना ज्ञाननिवर्तकत्वनियाह-सल्यमिति । तत्न त्वप
दार्थ इति आचर्य ्प्यादय भूस्यादवीनामात्मत्वनिपेध एव कतौ न विप्रतिपत्तिः
प्रदर्सिता तथापि विनानिप्रतिपक्तिं निराकरणेश्लुक्तोपालम्भः स्यात्तदर्थ निर्णयाधिप्ना
विषतिपत्तिर्बक्तव्या, सैथ प्रदर्दितेखवधेयय् ॥
प्रथमो विभागः
संपदाथनिणयः ।
तन्न त्वम्पदा्थे विप्रतिपत्तयः प्रथमं श्रदहरयन्ते । तत्पदार्थस्य
चाखलात्पर्यविषयत्तयाऽभ्यर्दिलत्वेऽपि त्वम्पदार्धस्य राख्जफलमो
क्षभागितया ततोऽप्यभ्यर्हिततत्वात् ।
तन्न देहाकारपरिणतानि चत्वारि भृतान्येव त्वम्पदाधं इति चा-
बौकाः। चक्षुरादीनि प्रत्येकभिल्यपरे । मिकितानीस्यन्ये । मन इत्येके ।
ग्राण इत्यन्ये । क्षणिकं विज्ञानमिति सौगताः । चन्यमिति माध्य-
मिकाः । देदेन्दियातिरिक्तो देहपरिमाण इति दिगम्बराः । कत्तौ
मोक्ता जडो विभुरिति वैरोधिकलार्किकप्रामाकराः। जडो बोधात्मकः
इत्ति बाह्याः । नोक्तव केवलवोधात्मक हति साद्या; पातच्रलाश्च ।
अविद्यया कतैत्वादिभमाक परसाथतो निधमकः परमानन्दबोधरूप
एषे ्यौपनिषदा; । एवं खामान्यतोऽद्म्प्रलययसिद्रचिदाह्मनि वादि
विप्रतिपत्तिभिः सखन्दिग्धेऽ्म्भरल्यस्यालम्बनविरोषनिणंयायाह
भगवानाचायैः-
नन्वभ्वर्दिततत्पदार्धस्यैव प्रधमतो विभरतिपत्तिप्रददीनमुचित्तं न त्वंपदार्थस्य
तत्राह--तत्पदा्स्येति । पर इति | स्वपदार्थं इयनेनान्बयः । एवमुत्तरत्र ।
जड इति । खधरकादकमिन्न इयर्थः । जडबोधात्मक इति । मामहं न
तवंपदार्धनिर्णवः ९
जानामीति प्रतीतैः कत्कर्मविरोधान् । जढ्वोधास्कमात्मानमङ्गीकुर्वन्ति भाट्या
यर्थः ॥ इदानीं व्याख्येय्न्थस्यावतारिकामाद--एवयिति । कारकाख्य
यद्य न्वाकू्षानमाह--
न मूमिनं तोयं न तेजो न वायु.
नं खं नेन्द्रियं वा न तेषां समूहः ।
अनेकान्तिकल्वात्सुषुध्येकसिद्ध-
स्तदेकोऽवशिष्टरििवः केवरोऽहपर् ॥ १ ॥
अरम् अहम्प्रल्यालम्बनम् । एकः अद्भितीयः। अवरिष्ट; सरवदरैत-
वाधेऽप्यवाधितः। हिवः परमानन्दबोधरूपस्तस्यैव मद्गलरूपत्वात् ।
केवलो निधैमेकः । तेनाद्ितीयस्सर्वध्रमाणाबाध्यः परमानन्दबोध
एवाहम्भल्ययावछम्बनमिवयौ पनिषद्धपश्च एव अथानित्यधः । एतदुए-
पाठनायेतरवादिमतानि . निराकरिष्यन् शरथमं देदात्मवादं निराक-
रोति न चमिन तोधं न तेजो न वायुने खमिति । तवाहमिति सर्वत्र
प्रवेक नघा सम्बध्यते । या भूमिः साऽ न भवामि योऽ्दंसख
भूमिने भवतीति च परस्परतादरात्म्यामावो दृष्टल्यः ।
अहम्प्ययावलस्बनमिति । अदभ्परययनिषय इयर्थः । पदार्थं व्याख्याय
वाक्या्थ॑माद- तेनेति । देदात्मनादस्यातितुच्छत्वादादौ तं निराकरोति- प्रथम-
मिति । परस्परेति । उभयत्रैव एकस्तादात्न्याभावः दाब्दः, भपरस्तादात्याभाव
आर्थं दुल्वचधैयम् ।
यद्यपि वादिना ध्रल्येकं भम्पादेरात्मत्वं नाभ्युपेयते संधातस्यैव
तदभ्युपगमात् तथापि तन्मते अचयव्यनङ्कीकारास्षश्चमतत््वाभ्युष काराः =
गमग्रसद्वेन च संयोगादिसम्बन्धानभ्युषगमात् संहन्तुरभावाच
संघात्तो नोपपद्यत इत्वभिमे्य भवयेकं तनिराकरणेन भौतिकः
देदात्मवादो निराकुलः ।
भवतु संधात्त एवात्मा तत्राह-तथापीति । संघात्तोऽबयवी संयुकतद्रभ्यं चा ।
ठत्र नाय इयाद--अवयवीति । नान्य इचाद-- संयोगादिति । तयैव हेतु-
माद--पचमेति । सहन्त संघात्तकते ।
१, गपुक्तक परमानन्दो स्व निति ।
१, ऋयुत्तकते तचत्रं प्रत्येकतया प्तम्बभ्यते इति परठ्लत्न चुक्रः ।
३, खगपुखकवो्वा भूमिः तोऽ न भवामि योऽ प्रा भूषिनं वक्तीति ।
स्ति चिन
१९ त्व॑पदार्धनिर्णयः
यद्यपि च भुतचतुष्टयतत््ववादिनो मते जाचरणाभावत्वेनाभि-
मत्तस्य स्िर्लासतं जआकारास्य देहालुपादानत्वं, थापि सिद्धान्ते
तस्य मावत्वं देहोपादानत्वादयद्गीकारातं , तच्राप्यास्मत्वपसक्तया
तनिराकृतम् । अथवा न वायुरियन्तमेव देहात्मवाद्नस्य निराकरणं
न स्वमिति तु शन्ववादस्य, खह्ाब्दस्य शान्यवाचकत्वात् ।
देहा्ुपादानत्वे देतुमाद--असल इति । भसे हेतुमाद-स्िरस्येति ।
खसिद्धान्तसिद्धेऽपि तन्मते सिच्छभावात्तन्निराकरणमलतुचितमिदत आद-अधवे-
ति । श्ुल्यधादस्येति । निराकरणमियनेनान्वयः । मिलितानामिलादिपरिणता-
नामिलस्य पूर्वेणान्वयः ।
नेन्दरियभिति श्रलयेकभिन्दरियाणामात्मत्वनिरासः । न तेषां खम
इति मिलितानां भरतानां देदहावयल्याकारेण परिणत्तानाभिन्दियाणां
च मिलितानां निरासः । प्रवं संघातमनभ्युषगम्य प्रयेकं भूतानि
निराकृतानि। अधुना तु संघातमभ्युषगम्यापि निराकरतानीति भेदः।
भूतनिराकरणेन भौतिकयोः पाणमनसोर्निरासः। मनोनिराकरणेन
भनोचृन्तेः श्चणिकधिज्ञानस्य देहातिरिक्तस्य कतल्व मोक्तत्वादिवि-
दिष्टस्य च निरासः । =. ज्ञनिच्छासु्वादीनामन्तःकरणाभ्रय-
त्वाभ्युषगमात् , कामसङ्कल्पाः मन षवेति श्यतेः । (र, आ,
१।५।३) । तैन देहमारभ्य केवलमोक्ततपर्यन्तानां तत्तबाचभिमता-
नामनात्मत्वं प्रतिज्ञातं मवति । लच्न हेतुमाह-अनैकान्तिकलत्वादिति।
च्यभिचारित्वात् विनादित्वादिति यावत् । आत्मनो देचाकाापरि-
च्छि्रस्वात्तत्परिच््छिन्नानां धटादिवदनार्मत्वात्, तद्धसप्राग नाव
योश्च गृहीतुमराक्यत्वात् , अनार्मनां जडत्वात्, ख भिन्नस्य चात्म-
त्वा मावात् , आत्मन एकत्वेऽपि सखदुःखाद्याश्रयाणामन्तःकरणानां
मेदाभ्युपगमाच्यवस्थोपपत्तेः, खेनैव खा भावभ्रहणे विरोधात्, राय
काचे ग्राहकासनत्वात् ्राहकखत्े ्राद्या भावात् क्रतदान्यकरलाभ्याग-
मपसंगाच्च न तस्य ध्वंसध्राग मावौ । सदपस्यात्मनः सवैतरानुगमाच
१, कयुछक्े मावरणाभावरवेनानिन्त्वास्थिरश्य सत इति ॥
२. खगपु्कयो भावत्वेन देद्योपानल्रावङ्गौकागिति ।
३. छगयोर्कामादीन्पहृयति ।
ॐ, कपुत्तकै पराछकाहे भादकाघत््वात् प्राञमदरत पाटकामावाविति पाठस्त खषटमेष दवानू ।
त्वंपदार्थनिर्णयः ¶१
नाव्यन्ताभावसं भवः । द्वैतस्य भिथ्यात्वेनाधिष्ठानसत्तादात्म्यापन्नत-
यैव सिद्धत्वात्, शयुक्तिरजतादिवदध्यस्तल्वेन तत्तादात्म्यभावातुष-
पत्तिः । तेनात्माना भावपतियोगी । अ मावप्रतियोभिनश्च देहेन्रिया-
दयः । तेनामी नात्मनः । किं तु खपकाकाबोधल्पे आत्मनि अद्ते-
ऽप्यनायनिर्घचनीयाऽविच्याकल्पित्ता अनिवेचनीया एवेति सिद्धा-
न्नरहस्यम् ।
पौनरक्यमादाहवाद---पूर्वभिति । नलु पूर्चपश्चै आशङ्कितं प्राणमनसोगात्मत्वं
किमिति न निराकृतं तत्राद-भृतनिराकरणेने ति । एवमप्यादह्कितं तौगतमतं
किमिति न निराङ्तमत आद-मनोनिराकरणेनेति । श्चणिकविज्ञानस्येति वश्ष्-
माणनिराघ इखनेनान्वयः । वैशेषिकमत निराकरोति- देहातिरिक्तस्येति ।
कर्वृ्वादिषिदिष्ठं तु मन एयेयाहायः । तर्हिं परयश्चतिद्धानामर्हकरोमीति प्रलयानां
का गतिर आदह- सिद्धान्त इति । कर्वत्वादीनां मनोधर्म॑तवै अमाणमाह--
कामेति । ।कामः सङ्त्पो बिचिकिस्सा भद्धाऽशद्धा प्रतिरधृतिहीधीर्भारित्येतत्
सर्वं मन॒ एव'इति ब्रहदारण्यकश्चतैरेतैषां मनोधर्मत्यम् । एवकारेण आत्मघर्मं
निचत् । मन एतदयनैन काय॑कारणयोरभेदोऽपि ध्वतिं्त इयवधैयम् । एनमर्थ
मागवतस्छतिरप्यनुबदति--
हर्षश्चोकभयक्रोधलोममोद्हावंयः ।
जदष्धारस्य एवैते जन्म सूयुख नात्मनः ॥ इति ॥
एवं मोध्चकाण्डकत्पतरधृचत्रद्पुराणव्रचनमयप्यचेचनसैव करीत्वादिकं बोधवति ।
न चेतनस्येति । तथदि-
ुर्वन्लचैतनाः कर्म दैदेन्दरिकणाः तदा ।
चेतनस्तदधिष्ठाता शान्तात्मा न करोयश्चौ ॥ इति ॥
तथाचाहङ्करोमीति प्रयचल्याहङ्कार एव विषयो नात्मा । एवं शुविस्छतिवियोध-
म्गीष््यापि अदेड्रोमीतिप्रययवलात् आत्मनः करैत्वादिकमङ्गी कपे चेत्तर्हि अहं
गौरः अहं स्थुः अं गच्छामीलयादिप्रती तिवत् दैदात्मचावोपि स्थेय इयं मृत-
नारणेनेति दिद । ज्ञानादेर्मनोडक्नित्वमुपपादयति सिद्धान्त इत्यादिना श्चुतेरि-
ल्यन्तेनेति परमार्थः ॥ कीर्मोक्रियत्मत्वनिराकरणेन भट साङ्खपतश्चलिमतमपि निरा-
छतम् । च्ूल्यवादस्य न खमित्यनेन निराकरणमिति 1 मध्यमपरिम्राणस् विनारिस्वेन
= ===
१. कपुर सिदत्वादिति पं त पर्वत ।
३. कष पुस्तके शल्यवादस् ,०५०,,निरकरणभिति इत्येतद्वाक्यं नालि ॥
१२ त्वपदार्थनिर्णयः
घटादिवदात्मभित्नत्निति दिगल्वरमतभुषेधितम्॥ आत्मनि देत्वभावमाह-आस्मन
ति ॥ तकमाद--तरह्परिचच्ल्ानाभिति । देशकाटपरिच्छिन्नानामियर्थः ।
परादकभावाद्पि न हस्व ध्वंसप्ागभावावङ्गीकरणीयावियाई-- तङ्क सेति । आत्मध्वं-
सेयर्थः । नन्वनात्मा बाकोऽतु त्त्राद--अनात्मनामिति । जडत्वात् ,
ज्ञानमिन्नत्वात्त ॥ एकारमवादिमते कथमहं खखी अहं दुःखी चाविप्रयय इयत आह--
आत्मन इति । नन्वातैव खामावं गृहात तत्र आद--खेनेवेति ॥ विरोधं वि-
दृोत्ति- ग्राद्यकाल हति ॥ आत्मनो विनादित्वै प्रतिद्रल्तकं प्रवशेवजरुपसंहरति-
कूतहानीति । आत्मनो नाशाङ्गीकारे अ्तफटस् सर्वस कर्मणो नाशः पुनरकस्मात्
उत्प्यक्गीकारे तदुत्पतिमठववहितामिनतोत्तरक्षणे ऽलुभूयमानयोः सुखदुःखयोरलुप-
चत्वा ऽनैनात्मनाऽकृतस्य कर्मसम्बन्धोऽख्य वक्तव्यः । तथा चेदं द्रवमनिष्टमिचर्थः |
नान्ति कस्यापि तप्ररिलायोदणादिकर्मणां कृतानामावदयकफल्दातृत्वमिति निवस इतिं
तन्मतेऽपि दोप इति बोध्यम् ॥ नतं माऽत काटपरिच्छेदः देष्टापरिच्छेदस्तु केन
वारणीय इयत आष्ट-खद्रुपस्येति। सद्रपस्यात्मनः सर्वत्र सम्बन्धत्वेन घटो नास्तीति
प्रययवत् सजनाश्तीति भययाभावादिति भावः ॥ नन्वैवमन्योन्यभावनिरा सात् तदप्ति-
योगितवैनैव परिच्छिन्नत्वादविनादित्वमियत आद द्रै्श्येति । फवितमाद्--
तेनात्मा नाभावप्रतियोगी ति ।॥ अनात्मनानभाव्रतिबोगित्वेन किं साधनीयं
वत्राद--अ-मावपरतियोगिनखामीद्यादि सिद्धातरदस्यभिच्यंतेन ॥
ृषुौ च बोधा भायात् गां
सुपोत्थितस्य पएरामरांच्कथमव्य-
छथ न प्रमातुः सर्ब्राहुकस्य साधचि्राह्मत्मियारङ्ते- नन्विति । त
आद--अन्यधेति ।
ननु, प्रमाश्रयः भमाता ख एव कलौ मोक्ता पदीपवत्खपरसाघा-
रणसवेभासक्चेति न घटादिवत्साक्षिसापेश्च इति चेत्, न, विका-
रिल्वेन खचिकारसाश्षि्वानुपपत्तेः दृदयस्य अ :, प्रमा-
तुश्च परिणामित्वेन दृहयत्वात् ; एकस्य कूटस्यस्यैव स्वसाक्षिल्वात् ।
त्व॑पदार्थनिर्णयः १३
चिकारिष्वेनेति । भमाठरिति शेषः ॥ देतमाद--दृद्वयस्येति । आस्तामियं
व्याप्तिः प्रमात्ुमौसकल्वाभावे को भासकल्तत्राह-पंकश्येति । न च साक्षिणः
कथमन्यभिचारितत्वं अविद्यावच्छिन्नत्वैन विनाशित्वादितति बाच्चम्। अदिचोपटश्ितस्य
साश्चित्वात् । करस्य; अविकारि । एकपतवा तुं थः काटच्यापि स करदस्य
हत्यमरः ॥
ननु, एकः कूटस्थो निधेमकः साक्षी नाद्वियतेऽप्रामाणिकत्वादिति
चेत् , न, "तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य 'मासा स्वमिदं विभाति
(श्वे. द १४, मु. २।२।१०, क. २।५।१५), "न दष्र्टारं पठ्येः' (ब्. जा.
३।४।२) (अदृष्टो द्रष्टा, नान्योऽतोऽस्ति द्मा (केव ३।५।२३) इ्यादि,
बदला वेदारतप्रमाणराजेन तस्यैव खवसाश्चिचेनाभिषिक्तल्वात् ।
वाचो भन्नया्ह- ठकः इति ॥ प्रामे पञ्च ्रयोऽरण्ये नारे सप्र ्ताक्चिण इयादिस्त्रया
बहूनां साक्षीत्वपरतिपादनान् ॥ कटस्य उयनैन कूटसाक्षिणो नादरणीयच्मरक्तम । अ-
धार्भिकोऽपि न साधि स्मरतिनिभिद्धत्वादित्युक्तं निधैर्मेक इतनेन ॥ देत॒माद-अप्रा्ा-
णिकल्वादिति ॥ बेताश्ववरषण्राघ्यायस्य चाच्ययुदादरत्ति- तमेवेति ॥ एवस्य
पूर्ववाक्यम-न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो मान्ति छतोऽयमन्निः'
यन्वम् । पत्दातुपूर्वीवाक्यं कर्व दित्ीयाध्याय द्ित्तीयचच्यामपि इति बोध्यं ॥
बृहुदारण्यकस्थवाक्यस्ुशदरति-“न देपरषठारं पद्येत इव्यादिना । राज्ञा यः साक्नी
अङ्गीक्तियते स एवार्थलाधकः प्रामाणिकञचव्युक्तं वेदान्तप्रमाणराजेनैदनेन ॥
ननु, भददेत दिन्द्रजालल, पमाश्रयानकररस्यान्विहाय कूरस्थमप्रमा-
अयमेव प्रमाणराजः सर्वसाक्षिणं करोतीति । वादं, इन्द्रजालमेवैत-
च्खभ्रवद बिद्याचिसित्तत्वात्, तथापि द्यस्य चरादिवल्नडत्वेन कथं
प्रमाभ्रयत्वमिति चेत्, न, दपणादिबदतिखच्छत्वेन चिदिम्बग्राह-
कत्वैचित्तादात्म्याध्यासाद्र।
इन्द्रजाछत्वे देतुमाद--अविद्याविलसितस्थादिति ॥ अविद्याधिरचित-
त्वादियर्थः । दृष्टान्तमाद-खप्रचदिति । दश्यस्ान्तःकरणस्म तचैत्तन्याश्नयत्वरूपं
अरमाश्रयत्वं कुतं इतयाध्षिपति- तथापीति । चिदिस्बग्राहकत्वादिति । एवं
च प्रतिविम्बप्रादकत्वमेव चैतस्याश्रयत्वनिति भावः |
१. क षृपुरर वाचो श्नाम्तिमाहेति पाहः ।
३, एत्तदानपूर्वैकभिति जपृ्लके, एतदानुपू्तीकमिततिं च यपुस्तङ
३. बयुन्ल्े भिम्बपाहुकत्वादिति ।
ड. तस्ितेषं नैतन्यततादषम्याच्वासादिति ।
१४ त्वंपदार्थनिर्णयः
नल, नीरूपस्य निरवयवस्यात्मनः कथं प्रतिबिम्ब इति चेत्;
काच्रातुपपत्तिः, विश्रमहेतूनां बिचिन्रत्वात्, जपाकुरमरूपस्य
नीरूपस्य निरवयवस्यापि स्कटिकादौ प्रतिबिभ्वदशरनाच्छब्दस्यापि
प्रतिराब्दाखयप्रतिनिम्नोपलम्भात्तयोः सम्यतिपन्नपरति विम्यवैलक्ष-
प्थानिरूपणात् ।
अतिविम्वत्वमाश्िपति-- नन्विति । नीरूपस्यापीति | अपिशन्दाज्निरवयव-
सानुकर्षः | नलु उभयत्रापि प्रतिबिम्बत्वमेव नाखि तताह-तयोः सम्पतिपन्नेति ॥
तथापीन्छियम्राद्यस्पैव प्रतिविस्व इति चेत् , न, व्यभिचारात्, अ-
निन्िम्राद्यसाक्षिप्रलयक्चस्पाप्याकाशास्यापि जलादौ प्रति निम्बोपल-
स्मात् । अन्यथा जाुमात्रेऽप्युदके अतिगम्भीर(ना)घ्रतीतिन स्यात्।
तर्हिं अन्धस्य जद प्रतिविम्बपरतीतिः कुतो न जायते, सालोकस्य
सचाभ्रत्य चतिविम्बतत्वात्तद्रहणाथं चश्चुषोऽपेश्चणात् । पतेन नीं
नभ इत्यादिविन्नमेऽपि चश्चुरन्वयन्यतिरेकौ व्याख्यातौ, तन्न सालो-
कस्याकारास्याधिष्ठानत्वात् । तस्माचाश्चुषयति विम्बमेव रूपसापेश्च-
मिलवधेयम् ।
प्रकारान्तरेण पुनरा्षिषति--त्थापीति । आष्यकारमतमालम्न्याद--सो
श्िप्यक्चस्यापीति । अतिगम्भीरेति । जतिविशालस्वाप्युपलश्चणमिति बोधं ।
ननु प्रतिविन्वस्व साश्चिमाष्यत्वै अन्धस्य क्रिनिति न प्रययलत्राद--प्रतिचिम्ब-
स्येति ॥ ननु तर्हिं नीडं नभ इतिप्र्यै न्तव मते कथं चश्ठुर्वयः इन्धियाप्राह्यस्या-
कादाख्माधिघ्ानत्वात् तत्राहई--एतेनेति॥ नलु तत्रेव नाधिष्ठानघहणा् चश्ुरेश्षा
दयाशङ्खय न केवटमाफाञ्चतरधिष्टानं येन नपिश्षा स्याच्षुषः किन्त्वारो कोऽपि, तथा
चालोकांो चश्चुषः अपेश्षणात् न त्वड्क्तदोप इयाद--सालोकेति ॥ उपसंद-
रति-तस्माद्विति ॥
तथाप्याह्मनः प्रतिविम्वे किं प्रमाणमिति चेत्, श्णु-'ूपं शूपं
प्रतिरूपो व तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय ब्र. जा. २।५।१९) 'माया-
भातेन जीवेतां १ करोति' (च, उ. ९), “एकधा बहधा चैव इयते जल-
चन्द्रवत्त्' (त्र. चि. १२) इत्यादि श्ुतिः, "स एष इह पविष्ट" (द, जा.
१. क पुलक "दर्ि,,, +न जायते" इवयेतद्राकयं न दयते तथापि तदस्िन्परकरणे आाव्रद्वकप्निति
वगपु्तकयोर्गदीततम् ।
२, क्षगपुक्तक्योः कथं चश्चुनरवस्लचाद इति पोटः ।
लंपदार्धनिर्णयः १४
१।४।७), शस एतमेव सीमानं विदार्यैतयाद्रारा पापच्यत' (२,१।३।१२),
(तत्खष्ा तदेवानुभाविदातः (ति, २।६।१) इल्यादि (न न्वधालु-
पपत्तिः, जआभास एव चः (त्र. सु, २।३।५०), "अतएव
कादिवत् (लदेव, ३।२।१८) इत्यादि पारमर्षछत्राणि च तन्न मानानि ।
बृहदारण्यकीयमधुनान्मणखं वान्यञयुदादरति--रूपं शपं ¶्रतीति ॥ "तदेतत्
ऋषिः परयन्नवोचत्' इयां मानमित्यनेन घन्ववः। “इन्द्रो मायाभिः पुरूकूप ईयत
इत्यन्तं बोधम् । काठके द्वितीयवह्यां
‹ अभनिर्ययैको भवनं परविष्टौ रूपं रूपं प्रतिहूपो वभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्म कूपं पं प्रतिरूपो यदहिश्च' ॥| इति ॥
इययाच्यपि बोध्यम् ।॥ ठत्तरनृसिहतापनीयसं वाच्वमुदादहरति- मायेति ॥
मायाभासेन जीवेश्षावभिव्यनक्ती्यर्थंः ॥ तैत्तरीयक श्रुतिमुदादरति-ख एतसये-
वेति ॥ ब्ददारण्यकदतिमुदृहरति--स एष इति । तत्छष्टेति । आदिषद्ह्मा
"यधा ह्ययं व्योतिरात्मा विवस्ानपोभिन्ना बहुधैकोऽलगच्छन् उपाधिना क्रियते भेदरूपो
देवः श्षतरष्वेवमजोऽयमास्माः इत्याविश्वतिः । "पुरखधक्ते द्विपदः पुस्करे चतुष्यदः
पुरः स्र पर्ष भत्वा धुरः पुरषं आविशत् श्चाृद्यम,।। बाद्रायणीयद्धिती याध्याचस्
ततीयपादसूव्रसंमतिमाद~--भा भास एवेति । ज्सुयंकादिववाभास एवं जीवो न
वस्त्वन्तरं परमात्मन इयर्घः । वाद्रायणीयवततीयाध्वायस द्वितीयपावसूत्रसूदाह-
रति-अतएव चोपमासर्यकादिबदिति ॥ "वथा सैन्धवषनोऽनन्तयेऽबाद्यः
कृरन्न; रसवनं एनं वो भरैतयभात्माऽनन्वते उवाह्यः त्तः भ्रह्वानचन एव इत्या-
दिना यत्त पेक्यक्प्यं प्रतिपादितं यतश्च (अयातं आदद नेति नैति ' इत्यादिना रूपान्तरं
म्रतिषिद्धम्, अतण्वास्यो पाधिनिभित्ताऽपारमार्थिकी विदोपवत्ता इयमिप्रेय जछसू्यका-
दिवदित्युपमा उपादीयते मोश्चवान्ञेषु । एवं च यथासुयादिपरति बिम्बं जख्चरूनेन चकति
जलमभेदेन भिद्यते तथा आत्माऽपि दपाधिधर्मेण धर्मवानिव भवति ॥ दपाधिभेदेन
भिन्न इव भवति । वस्तुतो निधर्मको निर्भेदो ऽद्ितीयः । उक्त च आागवते--
यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिल्लच्छतो गुणः ।
दृदयतेऽसन्नपि द्र्रास्मनोऽनात्मनौ गुणः ।। इति ॥
यथा जठमूय॑कः सूर्यघ्रतिविस्वः । आदिराब्देन चन्द्रपरति विम्वादिग्रहणम् ॥
तथाचामृतविन्दूषनिषत्-
“एक एव हि भूतास्मा भूत्ते भूते स्यवच्ितः ।
एकधा वहुधा चैव दस्यते जखचन्द्रवत्' ॥ इयादि ॥
4: त्व॑पदार्थनिर्णयः
तथाच याच्चचत्क्यत््रतिरपि-
लाकाशामेकं हि यथा घटादिषु परथग्भवेत् ।
तथात्मैको नेक जलघारादिवांछमान् ॥ इति ॥
तस्य च प्रतिबिम्बस्य सव्यमेवेति प्रतिबिम्बयादिनः, भिथ्याल्-
मेबेत्या मासवादिनः । खरूपे तु न विवाद एवेत्यन्यदेतत् । अचेतन-
विलक्चणत्वन्तु तस्य श्चुतिसिद्रमनुभवसिद्धं च । तस्मात्सिद्रमन्तः-
करणस्य प्रतिषिम्बाध्यासद्रारा भरमातृत्वम् ।
नन्वयं दृष्टान्तिभूतः प्रतिविम्बः सच्योऽसयो वा तव्राद्- क्तस्य चेति ॥ तरि प्र-
तिविन्वस्य चेवनत्वमापतितं तव्रादह--अचेतनचिटश्चषणत्वमिति। दर्पणादिवदि-
लादिना चचितमति विन्वाहकत्वेन परमाश्नयत्वसुक्तमन्तःकरणस्य तदुपसंहरवि-
तस्मादिति ।
नु, अध्यासोऽपि नोपपच्तते । त्थादि-आत्मनि वा अनात्मा
ध्यस्यते अनात्मन्यात्मा वा । नायः, तस्य निःसामान्यचिददोषवल्वेन
स्॑दाभासमानत्वेन सादृहयादिरदितच्वेन चाधिष्टानल्वासम्भवात्।
नापि द्वितीयः, तस्य मिध्याल्वाभ्युपगमात्। भिश्यावस्तुनोऽधिष्ठा-
नत्वे श्न्यवादपरसद्धात् । लस्य च सत्यस्वे तद निवन्तरनिर्मौश्षपस-
ङ्ञाच । न हि सत्यं कचिक्षिव्तते, निवर्तमानं वा श्रमन्ञानेन ।
श्रुतयश्च “मियते हद यग्रन्थिरिकच्यन्ते सर्व॑संरायाः । क्षीयन्ते
चास्य कर्माणि तख्ििन्दरष्टे परावरे" (मु. २।२।८), (तमेव विदिल्लाऽ-
च मेति नान्यः पन्था वियते जअयनाय' (शवे. ३।८), (तरति शोक-
त्मवित्' (छां, ५।१।३) हत्याचाः ज्ञानात्सर्वसंसारनिव्रत्तिं दर्चयन्त्यः
तस्य भिध्यात्वं सचयन्ति । (ठकमेवाद्वितीचम्' (छां. ६।२।१),
“अतोऽन्यदार्तम् (चरू. आ. ३।४।२), नेह नानास्ति किंचन (सैव,
शग १९), अथात आदेदो नेति नैति" (सैव. २।६।६) इवयाचाः शुत
यः साश्नादेव मिथ्यात्वं प्रतिपादयन्ति । ददयत्वेन शरुक्तिरजतवन्मि-
ध्याल्लाञ्चमानाच । आत्मन्यध्यस्ततयैव चानात्मनि सिद्धे त्रात्मा-
ध्यासः । अनात्माध्यासेन चात्मनो दोषसाटहयादिसम्भवात् तच
चानात्माध्यास दव्यात्माश्रयादिदोषपरसङ्ञाचच । पतेनात्मानात्मा-
१. पुस्तके धामाप्रमाश्रवारदिन इति ॥
९, शपुर्तके निवर्तमानं चा न हिने हति, नपृ्तके च निवर्तमानं घ्रा ज्ञानेन इति ।
त्वं पदार्थतिर्णयः १७
ध्यासस्याविव्याकल्िपिलत्वान्न विकस्पावसर् इत्यपास्तम्, खपकारचा-
त्मनि अविद्याया अष्य्ुपपत्तेः । तथाहि साऽपि अध्यस्ताऽनष्यस्ता
चा । तत्र आये कथं नात्माश्रयादिदोघध सङ्गः । अन्त्ये तस्या अन्ञु-
च्छेदादनिर्मोक्षिपसङ्कः । सरवैस्याध्यासमूरत्वे च श्रमधमादिन्यवस्था
न स्यात् । एकस्पैवात्मनः परमाणपमेयपमितिषमातुरूपषता च विस्
द्वा, अविरोधाभ्युपगमे बा सौगततमतोपपत्तिरिति ।
नतु च्छद रोके सामान्वरूपेण ज्ञात्तं निरौषरूपेणाज्ञातमधिष्ठानम; ह्म
तद्धिपरीतं, तथा च कारणाभावान्नाघ्यास इयान्षिपति- नन्विति । लस्येति ।
ह्येति रोषः । निःसाभमान्यविदहोषत्वेनेति । निर्गतौ सामान्यविक्ोषरूपौ धमं
यस्मात्तेन इदन्त्शुक्तित्वादिवत् सामान्यवि दोपधर्मरदितत्वाद्रह्या नाधिश्ठानमियर्थः ।
भवतु मिच्चात्वं किं तेन तताह--मिशध्यावस्तुन इति । पएतदनुपपतत्या चेत
सव्यस्वमाखीयते तहिं अनिर्मो्षप्रसङ्ग इयाद- लस्य च सत्यत्व इति । आस्म
वदिति दोष; । को वा धवीति ज्ञानेन निवर्तते तत्राद--श्चुतिनश्चेति । तस्येति ।
स्र्तमानाधिकरणासन्ताभावपतियोनित्यादिकं यदा निप्वालं तद सूचनं, यदाच
ज्ञाननिवत्यंत्वं मिथ्यात्वं चदा साक्षान्निध्याल्वचोधनयित््यवबेयम् । एवमपि प्रपच्चमा-
ष्यं निध्यात्वं॑नागत्तवै किन्तु हवयमन्ध्यादाविति हदये निधाय सव्यभिन्नसवं
मिथ्यात्वम् । सयत च॒ शरुतितासर्यविषयी भूतत्व मियारयैनाद-- एकेति । पं
चागतं प्रवच्लमात्रश्च भिध्याल्मिखवथेयम् । इदं तु वाक्यं छन्दोग्यम् । आर्ति-
विनाक्ञः । इदं च पूर्वमीमांसायां सुप्रचिद्धम् । विवेचितं चास्माभिः सिद्धान्तमास्करे
विनाराग्रतिचोगिं मिथ्यात्वमियाशयेनाद-अल्तोऽन्यदि ति । इदं त॒ घाक्यं इह्-
हारण्यकस्यम् । प्रतिपन्नोपाधौ निपैधप्रतियोगित्वं बाध्यत्वं वा मिध्याचममिपर
चाद- नेहेति । मनसेवेदमाप्तञ्यमियादि । इदं नाना बरदहमभिन्नं किमपि नास्लीयर्धः ।
या्यत्वं॒पिध्यात्वं खसमानाधिकरणत्यिन्ताभावप्रतियोगिलं घा इस्याश्चयेनाद्--
अधात हृति । बाध्यत्वं च न इदमिह नास्दीति प्रमाविषयत्वं, कस्यचित् कचिन्नि-
पेधस्य प्रमितत्वैन सिद्धसाधनात् शरतेरनुबाद्कत्वापत्तैश्च, किन्तु काकिकविदोपणता-
विक्ेपेण इदमिदानीं नास्तीति ध्रमाविषयत्वम् । तस्य चाज्ञातत्वेन न श्ुतेरनुवादकत्व-
मू । न च कालिकसम्बन्धेन धरतियोनित्वमतेनेव सम्बन्धेन कथं तदभाव इति वाच्यम् ।
क
१. कष दुष्क धघ्रद्रयेति तोष इति ।
१, तसि यदा मिस्वालतस्ुज्नमिति ।
३. लगपुकतकय मिध्याल्वमि्यवधेवभितरि ।
४. ज्पुश्त ॐ ददयप्रन्ध्यादरैेति ।
४ पिनिम
१८ त्वंपदार्थनिर्णयः
शभावस्व दै िकविकेषणतांविरेवेण दत्तरङ्गीकारेण एकसम्बन्धावस्ित्त्वामावा्ै ।
शरस्यैव काठत्वात् समानसत्ताकत्वाभावैन चिरोधाभावाच्र समानसन्ताकयौरेव चिरौ-
धात् । ईश्वररपकाटन्रत्तिरभादस्तु पारमार्थिकः, प्रतियोगी च व्यावहारिकः । यद्यपि
सूर्यक्रियारूपकाोपाथिवरत्तिस्वैनीमावस्मापि न पारमार्थिकल्वं तथापि उपाध्यवच्छिन-
श्वरस्नैव कारोपाधितवेनाभावस्य पारमार्थिकत्वाच् , वस्तुतेस्त॒ धततिपन्नोपाधौ नास्तीति
प्रहीविविषयश्वं घ्रतिपन्नोपाशरौ प्रतियोगिकारातिरिक्तकाले नाश्तीतिप्रती तिविषचत्वं बाध्य
त्वमिति दिक् । नापि द्वितीय इत्र देतन्तरमाद--आत्माध्यस्ततयैवेति । यदि
चात्माध्यस्ततयैवानात्मचसिद्धौ (१ द्धिः) तत्रात्माध्यासः, अनात्माध्यासेन चात्मनो दोवा-
दिसंमवात्तत्र चानात्माध्यास इति व्वाक्ररुषे तदात्माश्नवान्योन्याश्चयादिदोष इवर्थः ।
प्रद्ङ्गा्च इयत्न चक्तारस्तु मिघ्यात्वाभ्युपगमादिलाचपेश्षया बोध्यः । खद्रकाात्म-
नीति । जाच्छादिकाया इतिं दौषः । नदि सूर्यजन्धकारोऽस्तीति कथिडढदतीति मावः |
पूर्वोक्तमात्माश्नवादिदोषमप्वापादयति-- कथं नात्याश्चयादीति । अन्य इति।
अनभ्वस्तस्न ज्ञाननिव्य॑त्वाभावशरै्पि बोध्यम् । सर्वस्येति । वाधिततिषयकलं
श्रमं, अवाधिततिषयक्तवं च प्रमात्वमिति व्यवसा च स्यादियर्थः । सौगतेति ।
यथा िन्नानचादिनां सर्व विज्ञानात्मकं न वदतिरिक्तोऽर्थाऽस्ति तथा त्वन्मतेऽपीयर्थः |
अच्रोच्यते-अहं मनुष्यः कती मोक्तव्या दिप्रतीनिस्तावच्स्चजन-
सिद्धा । सा च न स्वरतिरपरोश्चावभासलाद्वेवाग्रहप्रवकत्याच। नापि
प्रमा शुतियुक्तिवाधिचत्वात् । तथा च श्युतयः-- योऽयं विज्ञानमयः
प्राणेषु हयन्तञ्योतिः पुरुषः' ( च. आ. ४।३।७), “अयमात्मा ब्रह्मः
( सैव, २।५।१९ ), "स्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्मः ( तै. २।१), *वि्ञानमा-
नन्तं ब्रह्मः ( र. आ, ३।९।२८ ), ध्यं आत्ता अपहतपाप्मा ( छा,
८9१), "यत्साक्ाद परोक्नाद्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः" (ब्रू. आ,
३।४।१), भ्योऽल्ानाचापिषासर चोकं मोहं जरां सृष्युमवयेतिः (सैव.
६।५।१), “व वत्तत्न किखित्पद्यति अनन्वागतस्तेन भवति असह्लो
ह्ययं पुरुषः ( सैव. ४।३।१५ ) इत्याद्या ०8
तामात्मनो दीयन्ति । गुक्तयश्च-विकारिणः परिच्छिन्नत्वेन अना-
त्मस्वापन्तेः, खेनैव खस्य ग्रहणो कतकमविरोधात्त् रर्दरययोग्ध
१, शख पुस्तके विदोषता इति ।
च. चगयोरवच्छि्नत्वाभावादिति ।
३, ऋ१ पुस क।लोषाचिदृक्तवैनैति ।
५, कखपुखङ्योः प्रतिपन्नौ पाधि 1
त्वंपदार्धनिर्णयः १९
सम्बन्धाचुपपत्तेः, भेवेना.बेदेन वा धर्मधर्भिमावानपपत्तेश्च । क्ञाना-
निव्यस्वपश्मे तत्तदवयक्ति मेदध्वंखभाग मावससवायज्ञानत्वजालाय-
त पगमे गौरवात्, एकत्वाभ्युपगमे चालिलाचवात्, घटज्ञानं परज्ञा-
त्यु पाधिमेदपुरस्कारेणैव ज्ञान भैद्रधतीतेः । तस्तु ज्ञानं ज्ञान-
मिति एकखरूपावगमात्, तदुध्य्तिविनाशवतीव्योश्चावरयकर्प्य-
विषयसम्बन्धविषयतयाप्युपपत्तः, उपाधिपरामरीमन्तरेण खत एव
चराद्धटान्तरस्य भेदपरतीतेः तत्मतिबन्वीय्रहासखस्मवात् आकाश
कालदिदामपि नानात्वापन्तेञ्च । कर्तत्यादे वीस्तवत्वेऽनिमोक्षप्रस-
ङ्गात्. । खपकाच्चानभ्युपगमे च जगदान्ध्यपरसङ्ात्, वरमपेमारप-
दस्वेन च तस्यानन्दररूपत्वात्, नि्धभकनिष्यखपकारासुखात्मकः
एवात्ना इत्यादयः ।
नन्वध्यासोषीत्यादिना पूर्वपक्चिणाऽऽच्ित्रेऽध्वासे सिद्धान्ती लमाधकत--अच्रो-
च्यत इति । सेदाग्रहपूवकल्वाशेति | नहि स्तौ भेदप्रदः किन्तु निदिष्ठ-
नुभवे, तथाच अपरोक्नात्ुमब एवेति । अष्टं मुष्य इ्यादिभययस्र सनुष्यःखादिवाभिकां
बरददारण्यकादिशुतिमाद--योऽयं विज्ञानमथ इत्यादि । एतत्तव पूर्वं कतम
आत्मेति वोध्वम् । शचं शुतिस्तु ज्योतिन्ना्षणखा । ज यात्मा ब्रह्म, इतिं शुतिप्लु
मधुतराचणस्था अपू्वंमनपरमवाद्यनिलाया । विज्ञानमानन्वं जह्य, इति शविष्ठ॒
शाकल्यत्राद्मणस्या । रातेदौतुः परायणम् (१) इलन्वां तैत्तिरीयकश्तिमाह--
सत्यमिति । छान्दोग्यश्तिमाह-- य् आत्मैति । विजरो वि ्वुर्विशोफोऽविनि-
धस्सोऽपिपास इयन्तं उपत्तव्ाहयनस्यानाद--चत्साश्लादिति । कवंत्वारिनाधिकां
कटोठत्राद्मणसां धतिनाद--योऽच्रानायापिपासे, इलादि । स्यो्तिधौश्रणखं
बाक्यमाद--स यत्तन्नेति । अनन्वागत्तोऽनलुग्तः । अदं मनुष्यः कतया-
विप््यस्य बाधिका शरुतिुपन्यस्य युक्तिमाद--युन्तथश्येति । सखात्मक एवा-
त्मेयादय इयनेनान्वयः । आत्मनः करेत्वादिरूपविकारतन्तवैन परिचिठि्ततवं
प्र्ाध्यते । नानात्वं साधयति--बिकारिण इति । ददं तु पूर्वमध्युक्तगभा-
वप्रतियोगिनश्चामौयादविना । आत्मनो ज्ञानरूपविकाराङ्गीकारे वृषणमाद--खेनै-
चेति । मामं न॒ जानामीति भयचे एकस्यालानः कर्वत्वं कर्मत्वं च वक्तव्यं त
विरुद्धम् । विरोधगेव रददौयति-(कत्तैकभविरोधादिति । ) तत्न च केचन स्वतश्चः
कतां स्ातज्गयं च तदिततरकारकाप्रयोभ्यत्वे सति सकल्कारकप्रयोक्तुतम्;, एवं चं
एकस्यैव क्तत्वेन इतरकारकाप्रयोज्यत्वं कर्मत्वेन इतरकारक प्रयोज्यत्वहपं विसै-
धमिति षदृन्ति । अन्ये तु कतुरीप्तितत्तमच्वैन प्रधानत्वं, क्रियानिप्पादकतवैनं गण
२० त्वंवदार्धनिर्णयः
स्वम । वथा च एकस्ैव गुणव्वप्रथानस्वहूपं विरोधे वर्णयन्ति । अपरे तु पाणिनीय
प्रथसाध्यायचतुरध॑पादे "था कडारादेका संज्ञा इति प्रथमतूत्रे कायाः कर्मधारय'
इयतः पूर्वे एका संज्ञा विहिता, एवं च एकसंज्ञाधिकारेः एकस्य कथं करसं कर्मसंडा
य॒भयसंज्ञाविधानगितति विरोधगद्धावयन्ति-दृण्दद्यसरम्बन्धाचु पपत्तेरिति ।
नन्वज्ञानं चिषयासस्वन्धसेच प्रकाङकं सर्वेषां जीवानां सार्घजञप्रसङ्गात्त् । नापि सम्ब-
द्मात्मश्वरूपस्य वद्रुणख ज्ञानस्य चा विषयेण सद् संयोगसमेवायरूपसम्बन्धान्य-
रामाया, ज्ञानैऽध्यस्तौ विषय शयाध्यासिकसस्बन्धानङ्गीकारेऽन्यस्य साक्षादिदिष्ट-
प्रतीत्तिजनकस्य सम्वन्धस्याभावान् । न च विषयविषयिभावरूपोऽस्तु स इति वाच्यम्,
तस्व दिषरयैविषयित्वरूपत्वादेकमात्रनिष्ठत्वेन सन्यन्धस्य उभयसमात्रनिशरतया विशि-
्रुप्रययजनकत्वक्षतेश्च तस्य ॒दुर्निहपत्वात् । तथां तस्यातिरिक्तत्वेऽपसि्ान्तात् ।
अनतिरिक्त ° किं ज्ञानचन्यफलाघारकत्वं ` किंवा ज्ञानजन्यदानादिंबुद्धिगोचरत्वम् ।
तत्रे न आद्यः, ज्ञातवाह्पततफलस्यानङ्गीकारात्रं अतीतादावमाका्च । नापि द्विती"
यः, गगनादौ तदभावात् महारजत्तमारेरपि तज्जन विषयत्वप्रसङ्गा्र । णवनन्यद्षि
वहुविधमाशाङ्खय निराृतमदैतसिद्धौ गुरुचरणैः । तदपि च विवेचितं मया मल्छत-
चिद्धिसाधके । नापि ्ञानविषययोर्विषयिविषयत्वं खरूपसम्बन्धस्यातिदधेः ^ । तथाहि
स्वरूपसम्बन्ध दव्यस्व श्वरूपं सम्बन्ध ` दयर्थ संयोगसमन्राययोरतिञ्यापित्तयोरपि
खरूपत्वात् । न च संयोगसरमवायान्वहपत्वं, हिमवद्विन्ध्ययोरपि स्वरूपश्तम्ब-
न्धापत्तेः । अथ सम्बन्धान्तरमन्तरेण विरि्रमतीतिजननयोग्यत्वं सखरूपसम्बन्धं इतिं
चेत्, न, आमानं जानामीयत्राव्यात्रः, तत्र सम्बन्धान्तरस्य समवायस्यैव सत्वात् ›
अतीन्द्रिये भाकाश्षादाषव्यापरे्च । न हि तस्य विदिष्टप्रतीतिजननयोग्यस्वे मानमश्षि ।
अन्यथात्वेतै विसिषप्रयवजननापत्तेः । किंच चि दिष्टप्रतीतिजननयोग्यल्वं धर्मो वा
सम्बन्धसतादश्षखरूपद्वयमेव वा । आगे ख्वलूपस्य सम्बन्धत्वग्याचाततः प्रतीतिवदि-
तस्य वा्चपादिज्ञानगोचरः्वश्सङ्गशथ । न द्वितीयः अननुगमात् । किंच खरूपस्य
लम्बन्धत्वे घटाभावप्रसाचत्पपत्तिः ` । अभावध्रमश्यठे-घटतदभावयोरन्यतरस्य खरूप-
१, गपुन्तके एवं च एकस्य कथमिति ।
३, नवु्त कयोविपशतत इति ।
१. तयोरैवानतिरित्तवै%पीति ।
ज, १ पुन्न फरावायकत्तभिति पाडः च न शुक्तः ।
५, तस्िनेवं चशपषम्थरपविरोषातिदेरिति ।॥
६, छगयोरन्यथा तेनैति पाण्ल्प्रऽनुपपन्नः ॥
५, चुच्तके चटाभावश्नमाच्तुपपत्तिरितिं 1
£, सगय दुमावश्चसख्यकखपीतिं पारः ।
ल्वेपदार्धनिरण्यः ९१
सम्बन्धस्य सन्त्वेन विरिष्रप्रमासस्भवाप् । न च सम्बन्धान्तरमन्तरेणं वि दिष्प्रमा-
जननयोग्यत्नं बक्तन्यम् । वालवसम्बन्ध सर्वेन वचि दिष्टपरमाखस्याप्यापा्त्वार्च ।
अन्यथा तत्र च्वाप्रमाततै सम्बन्धामावः, सम्बन्धाभादि च तस्छाप्म।सं इलयन्यो-
न्याश्रयात् । कंच ज्ञानस्याभावः ज्ञातोऽमावः इति प्रतीोरविरक्षण्व' न स्वात् । ज्ञाना-
भावयोरेवोभयन्र श्वषूपसस्यन्धस्वे चिषयकतविष्ोवामावान् । तस्मात्त सुप्त अभ्यासं
विना हग्हदयसम्बन्धानुपपततेरिति दिव् । भेदेनेति । अत्यन्तभेदे गौरश्च इयादौ
धर्म॑धर्मिंमावातुपपत्तिः । एवमलन्ताभेदेऽपि घटस्न धर्मधर्मिभाव इयर्थः । अहं
मनुष्यः कर्तेवयादिषतीतिवाधिकां युक्तिसुपन्यस्य ज्ञाननियत्वसा धनौ पयौ गितया ज्ञाना-
निचस्वं दुषवति-ज्ञानानिष्यल्वपश्च इति । ननु क्ञानानिच्यत्वपश्च एकपुर्-
पीयज्ञानेऽपि निबा नातीति एकसिन्नषेऽन्येषामनुपादात कित बहुधुरषीयन्ञाने
इवयादायेनाद-तत्तह्यक्ति भेदैति । ज्ञाननित्वपद उक्तदोषामाव इवाद--
एकत्वाभयुपगमे डति । ज्ञानैक्यपक्चे अस्मा्त्ानादिदं हानं भिज्नमिलत्र का गति.
रित्यत आह-- घटज्ञानमिति । अश्च वैतद्धेद्वं घटविपयत्यादिफमेतेति नं
उक्तदोप इति भावः । नन्वेमपि ब्ञानोत्वत्तिचिनाशयोः का गतिरित्यत आह--
तदुत्पत्तीति । ककारो नष्ट इति प्रययस्य यथा वायुस बोगनाशविषयक्तवं, यधा
वा स्वगं न इति प्रययस्य स्वग सम्बन्धनाहाविपयकल्य,* यथां वा दृष्डपुकपोभयत-
क्वे दण्डी नष्ट इति प्रत्ययस्य एतद्ुभयसंयोगाध्वंसचिषयक्लवं, यथा चा अदं विद्रान
जावः, घटाकर इस्पननः, कूषाकादा उत्पन्नः, घटाकाशो नः, करुपाकादो न इति
प्रययश्य न आत्माक्ाशाविविष्रयकत्वं ऊप तु विद्याषटादिविषयकल्वं, तथा ज्ञानं
नष्टमिति अ्रलयस्य न ्ानविषयवयं किन्तु तद्रुमययोः सम्बन्धविषयकत्वमियर्धः ।
अन्यविषचकरमत्ययस्यान्थ विषयकत्वं सर्ववाविसिद्धं; तचाधत्तात् प्रदृर्तितम् । न च
घटाकारादनतिरेव श्ञानं घ्य विनारित्वैत कथं त्द्पाप इतिं बाच, विषयात्मषटप-
ज्ञानयोः सम्बन्धहूपा वृत्तिं तु ज्ञानं, ज्ञान नित्यखरपत्वदुखस्ठपत्वादिकं ठ
|
१, प्रम्बनधान्तरैणं इति गपुश्लकै ।
२ कृष धुक्तके विञिटन्ननास्तभवादितिं । ।
३, पुसतक छतोऽभाव द्यभाव् इति पाठः ल न शुक्तः । रुशत ्ञानख्याभावः परतीतमरैलकच
ष्यमितति च नार्थबोधङः।
४, श्नयोगृश्वेषाश्ठ्यादाचिति पठरतोऽतुपवश्नः ।
५, क सयोग चैत्तन्यल्वमिति ।
६, गपुखङे खगो वष्ट इति ।
५७, कच पुत्तने स्ररपिषयकतनिति 1
५, चप्लक्े यिनाननित्वै चनि !
२२ त्वंपदार्थनिर्णयः
तद्विरुद्धं नियं चिज्नानमानन्दं अद्रेदयादिश्ुतिप्रसिद्रं गुशूचरणप्रदर्िं्युक्तिचिरद
च । न च तथापि शाखे वर्तौ ज्ञानपदप्रयोगो ददेत इति वाच्यं, इत््यवच्छिन्नचैतन्ये
ज्ञानपदपयोगान् न तु कैवलवृत्तौ, असम्बद्धस्य भासकत्ते तवातिप्रलङ्गवत ममाप्यति-
परचक्गात्र । एवं ज्ञानविषवयोः सम्बन्धौ वक्तव्यः । स ॒चास्मन्मते वत्तिः, परेषां तु
पदार्थान्तरम् । उक्तं च नञ्यैरपि विघयत्वादयोऽप्यतिरिक्त एव पदाथा इति दिक् ।
तिं बटादैरपि भेदो न स्यात् तव्राह-उपाधीति । वच्चौपाधिकभेदेन बस्तुभेदः
साध्यते तद्य॑तिपसङ्ग इ्याह--आकाडोलि । अं मलुष्वः कर्तेयत्र यदि कैवं
वातं तत्र दृषणमाई--कलत्वादैरिति । तदुक्तं वार्तिककारपवैः--
'आत्मा कत्री दिषपन्चन्माकाद्की सर्हिं मुक्तताम् ।
नदि खभायो भावानां ध्याचर्ततौष्स्यवद्रवेः' ॥ इति ॥
॥हुर्षदोकभयक्रौष इत्यादिना (कुर्वन्यचेतनाः कर्न" इयादिना चात्मनः कर्वैत्वा-
दिकं वास्तवं नास्नीयावेदितमधस्तादितिं । ` तमेव भान्तमनुभाति सवं त्य आसा
सर्वमिदं विभाति' इति श्रुत्या खवं वदतु ज्ञाततयाऽज्ञाततया वा स्राक्षिभासभितिं
विवरणन च सर्वं चैतन्यभास्यमित्युक्तम् । तचरं तस्य जड्वे न संभवति इयाद--
खरप्रकादोति । आन्ध्यप्रशङ्भादिति । अप्रकाशपरसक्घाषिचयर्थः। आनन्द्रूपसवं
साधयति परमेति 1 अच्नार्थं आचवतस््रतिरपि अरमागय्--
ग्स वै प्रियत्तमश्चात्मा यत्तौ न भयमण्वपि ।
इति वेद सर वै विदान्. यो विद्वान् स गुरुदरिः' ॥ इति ॥
तस्मात्परिद्ोषाद्धान्तिरियमिति स्थिते तत्कारणमपि योग्यं कि-
श्रित्कल्पनीयम् । कहप्यमानं च तदात्मन्यध्यस्ततयैव धर्मिग्राहकः-
मानेन सिध्यतीति न जानामीति साक्ि्रतीतिषिद्धमनिर्वाच्य-
शा । न चेदम मावङ्पन् , ज्ञानस्य नित्यत्वेन तद् माबान्ु-
पपत्तेश्तस्वात । धर्मिप्रतियो गिन्ञानाज्ञानाभ्यां च च्याघातापत्तेः ।
नापि भ्रमसशायतत्संस्कारषरम्परारूपम्, परोक्षत्वात्, अतीता-
नागतभ्नमसंरायतत्संस्काराणां चापरोश्चत्वेन ज्ञातुमश्चक्यत्वात् ,
आवरणात्मकत्वात् , न्नमादत्पादनत्वाच। आत्मनो निर्विकारत्वात्,
अन्तःकरणादेश्च तलन्यच्वात् . 'देवात्मचाक्ति चगुणौर्निगटाम्ः ( श्वे.
१३ ) इति य॒णवत््वश्चुतेश्व, मायां तु पक्तिं विद्यान्माथिनं तु महे-
श्वरः ( सैव. ४।१० ), “इन्द्रौ मायाभिः पुरुरूप ईंयतेः (चर. आ.
१, खगपुस्तकयौसलदभावानुषपत्तिगिष्युक्तवादिति ।
ल्नेपदार्थनिर्णयः ६३.
२५1१९ ), 'अदतेन हि घत्युदः' (छं. ८।३।२), (नीहारेण चाचताः
(नै. स, ४।६।२।२), भयश्वान्ते विन्वमायानिचव्रत्तिः ( -3. १।१० )
इव्यादिश्युतेश्च मायाऽबियानिषौच्यसद्टलं लश्वन्नाननिवत्यैश्वाज्ञानमेच
खपराध्यासे कारणम । न चाह्मा्नयादिद्धषग्रसन्गः, अनादित्वेन
तच्िरासात्, अनादित्वेनोत्पर्यभावात्, खप्रकारार्मन एव तज्ज्-
सिरूपत्वात् ।
तस्पराद्धान्तिरिति । अदं मवुष्यः कर्ती भोक्तेयादिपरतीतिश्ौन्तिरिल्धंः । सा--
धकमाद-न जानासीति । ज्ञानश्येतति । ज्ञानस् निलत्वेन त्रिविधपरिच्द-
शल्यत्यं तथा च कथं तदभाव इयर्थः । तुष्यतु दुर्जनं इति न्यायेन परमत्तमचदम्न्य
बरस्वमावस्तधापि न ॒त्वदिष्टति दिरि्ाद--धर्मौव्यादि । मवि बटज्ञानं नास्ति
ज्ञानं नास्तीति वां वक्तव्यम । इभयथाप्ययं सामन्याभावः । स च यक्किश्चिद्यति-
सोगिसन्वचिरोधी । चदि च प्रतिचोनिनो घर न्नानस्वं ज्ञानमस्ति तर्हिं ज्ञान चिप्रय-
विषयकन्वनियमे ` नासि घटज्ञानकूपं धरलियोगि; कुतस्तदभावः । सामान्याभावल्प-
विषचाभावाच्च न तस ज्ञानम् । यदि च न प्रतियोगिज्ञानं चदा सुतरामेव न अभावः
ज्ञानं प्रतियोगिन्चानकूपक्तारणाभावान् । एवं ज्ञानं नाल्लीय्यत्रापि यदि धर्मिप्रतियोनि
ज्ञाने तदाज्ञानमस्ति। न तत्सामान्याभावस्तथा च करतस्तच्य ज्ञानम । न हि विषयाभावे
ज्ञानं लायतै, जायमानं बां प्रमा अप्रमा च न खविषयतनाधक्य् । चदिं च न ज्ञानहूपस्च
प्रतियोगिनो ज्ञानं, तवा न सुतरां तदमावज्ञानं प्रतियोनिन्ञानरूपकारणामावादि-
ल; । संस्कारस्यारीन्द्ियत्वभिचमिमेयाद-भषरो्नल्वादिति । रमार्दीनाम-
प्यपरोश्चतवै वाधक्माद-अलतीतेति । जावरणात्मकत्वादिति । (अज्ञनेनादूतं
ज्ञानं तेन गुश्यन्ति जन्हव' इयाः स्मृतयो भावरूपाङ्ञानस्य न्ञानख्वरपात्मन आव्-
रणक्त्वै प्रमाणम । व्निज्नानस्माज्ञानाव््तत्वं नोक्छिसन्मवं, अभावस्य चाचरकर्तव
न दृष्टं न श्वुलमिलयाश्ययः । श्वमसंदायादीनामपि भवका्त्वेन उपादानं चक्तव्वं;
तदपि च विवक्षिचचिपेकेनाज्ञानमेवेलाद-- श्रमेति । तथा चागतं भमा श्रतिरिक्ताक्ञने-
न, स्वस्य खानुषादानत्वादिव्यादाचः । आत्मान्तःकरणं चा उपादानमरसतु तजाचमभिभर-
याद-- नात्मन इति 1 अन्यमभिपरयाद--अंन्तःकरणादेरिति । तच्वाप्य-
निर्वचनीयस्य जन्यत्वेनोपाद्रानगवैषणायामन्ञानमेव पर्यवसितमिति भावः । शेवा-
---- -- बब __________==--- ~= = -~
१, हुते मायाऽतिद्याऽनिवाच्यमिति ।
१ खगयोष्पुष्यतु सजन इति पाडः च न युक्तः ।
३. नपुसके विषनि विपयकञ्लनिवये इति ।
क, सङ्खानमेतं तदुपादानं परवच्िततमिति खपृतक्ते ।
२४ स्थ॑पदार्थ॑निर्णयः
खतरमधमाध्यावस्ं वाक्यमुदादरति=-दैवेति । रतः पूर्ववाक्यं, ते ध्यानयोगा-
तता अपदयन' दति । लगुषैरनिगृहाम् इनेन गुणवत््श्तेना माब इति भावः ।
तत्रैव चनुधौध्याये मायां त्विति | विद्यादिच्यनन्तरं "मायिनं तु मेर् इति
बोधम् । इदः पूर्ववाक्यं;
. छन्दां यज्ञाः कतो श्रचानि भूतं भज्यं यच्च वेदा वदृन्ति ।
अम्मान्मायी स्रजते विश्वमेतत् तसि्वान्यो मायया सननिरद्ध; ॥ इयन्वम् ॥
उद्ददारण्यकवाक्वशदाहरति--इन्द्र इति । छान्दौग्यदद्चमाध्यायीयां शति-
सदाधरति--अनतेति । एतख पूर्ववाक्यं, ।तचधा हिरण्यं निधिनिहितं क्े्रज्ञा
चपयुपरि संचरन्तो न विन्देयुरेवभेत्ेमाः सौः प्रज्ञा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं
न विन्दन्ति' । तत्र देतुमाद--अन्तेन हि प्रत्युदा हति । असयेनाच्छािंता
इत्यर्थः । चाजसनेयिसंदितायाः खश्राच्यायग्थकण्डिकादृत्तिवाक्यमार्द--नीहारे-
णेति । तयथा कण्डिकाः--
न त विदाथ च इमाः जज्ानान्ययुष्माकमन्तरं बभूव ।
नीहारेण भाता जप्या चामुक्ं उक्था स्वरन्ति ॥ इति ॥
चेताश्चतरखप्रधमाध्यायवाक्यडुदाह रति-- श्य इति । एतस्य ॒पूर्ववाक्यम्-
'तस्याभिष्वानाधोजनात्तत््वभावात' इचन्तम् । नन्व चिदाध्वासे रैवाविच्या चेत् कारणं
तर्हि आत्माधयः । ्न्वाविचा चैदेतवविद्याध्यासरे कारणं तहिं अन्योन्याश्रयः, तद्-
ध्वाससिद्धौ एतदध्यासः, तदभ्यासलिद्धौ च तदध्यास इ्याशङ्वाद--न चेति ।
नलु उ्वत्तौ आत्माश्रयः कप्तौ वा । नाय दयाद-अंना दिस्वेनेति । नान्त्य
इत्वाह-सखध्रकादोति । |
` तेनान्नानाध्यासः, तद्विशिष्टे चैतन्येऽहङ्काराध्यासः, तद्विदि
च . कामसङ्कल्पादीनामहङ्कारधमौीणामिच्दियधमौणां च काणत्व-
वधिरत्वादीनामध्यासंः। इन्द्रियाणां त॒ परोश्चत्वान्नापरोश्चधम्प॑ध्यास
इति सिद्धान्तः । तद्विदि च स्थुलदेदाध्यासः, धभिपुरस्कारेणै-
बौहं मनुष्य इल्याकारः, न तु खरूपतोऽदं देह हद्यध्यासः, तथा
4. पएतदाक्तय वैच्धिगीयसहितावासपि वर्तेते । तत ननंतं विदाथ यवं जजानान्वधुषणाकमन्द
अवाति' इति पाठान्तरं, अन्ते च “परो दिवा परर एना" इति विदोषः ।
२, छगपु्लकयोन्लदिशिषटे च कामसष्हपदीनामहदङ्कारषरमीणामभ्याप्रः । तदि चेन्धिवधर्माणां
काषत्वबिगतावीनांमध्वास् इतिं ।
३. तस्मितेव घन पुरस्कारेणवेति ।
त्वंपदार्थनिर्णयः 1,
प्रतीय मावात् । तद्विशिष्टे च स्थौल्यादीनां देष्टधमोणामध्यासः ।
तद्विरिषटे बाद्यानां पच्र मायौदीनां साकल्यवैकल्यादिधमाध्यासः 1
एवं चैतन्यस्यापि अहङ्कारादिषु देदपयन्तेष्वध्यासः संखगतः ।
अध्यासव्यवधानतारतम्याचं प्रेमतारतम्यम् । तदुक्तं वार्तिका
(ब, आ, मा, वा. १।४।१५३१ )-
वित्तात्पुत्रः परियः पु्ात्पिण्डः पिण्डात्तयेन्दरियम् ।
इन्द्रियेभ्यः पियः प्राणः प्राणाद्वात्मा परः प्रियः ॥ इति ॥
पिण्ड; स्युलदारीरम्, प्ाणोऽन्तःकरणम्। देहापेक्षया चेन्द्रियाणां
प्रियत्वं चाश्चृच्यादिधारापाते चक्षुषो निमीलनददौनादनभवसि-
द्रम् । तेनान्योन्वाध्याखाचिवचिद्धन्थिरूपोऽध्यासः । एकतरस्या-
ध्यासाङ्गीकारऽन्यतरस्यामानयपसद्गात्, अध्यस्तस्यैव श्रम -भाननि-
यमात् (सं. चा. १. ३६ ) "इमे रङ्गरजतेः इति समूदालम्बनश्रमव-
दवद्यमितरेतराध्यासः । सचैवाधावधि भूतचेत्तन्यपरिरोषेण च न
छान्यवादापत्तिः, सल्यानृतसं मेदाव भासत्वादध्यासस्य । तस्मात्पूवे-
र्वाध्यासमृल एवायसत्तरोत्तरोऽदङ्काराद्यध्यासो बीजाद्ुरवदना-
दिः । अविदाध्यासश्च एक एवानादिः ।
एवमज्ञानाध्याससिद्वौ छक्र छत्र कल्वाध्यास इति रिष्याकाद्वायां तं तमध्यासं
संकदय्यं वर्दयति--तेनेति । अज्ञानाध्यासस्यानावित्वान् प्राधम्बेनेवर्थः । अदङा-
राध्याखवदिन्द्रियाध्यासः किमिति नोक्तत्व्राद-इन्द्रियाणां त्विति । नेय
हेतुमाद--तयेतिं। साकल्ययैकल्ये संपत्तिबिपत्ती । चैतन्ये कारय्यासमु-
क्ट्वा जहङ्कायदौ भतन्याध्यासनाद-- एवमिति । संसगंत इति । यथाषट्ा-
रानां श्वहपतोऽध्यासस्तथा न किन्तु चैतन्य संसर्म॑तः । अनत्मववेतन्यस्यापि
स्वरूपत अध्यासे अनास्मबचैतन्यस्यापि मिथ्या्ग्रसक्गाच्टन्यवादप्रसङ्ग इत्यर्थः ।
संसन्त इति षष्ठ तसिः, सार्वविभक्तिकल्तसिदिति" सूत्रेण । एवं संसनंस्वत्यर्धः ।
अन्यथा संसर्नितेनाप्वभ्यासे शन्यवादतादवरथ्यमिति भवः । सर्वस प्रेयात्मौध्यासल्वे
५, तखिनैव उेदपर्न्देष्वव्यास इ्यनन्त६ ससगतोऽभ्यापत्दह्ववधानतारवम्यादिति पच्य न
1111119.
, च्चक्टपरपि इति गपुस्तके पारदो इतुपपन्नः ॥
„ खयुसकै नभ्विल्न्न दैतुमाद-अदं देह इति ।
; गपुदके स्ववि भक्तिभ्यस्तपिल् इति 1
, सर्षर्य परियाय इति तन्मित्र ।
छं तिं जिं
क धथ व
२६ त्वंपदार्थनिर्णचः
्रेमतारतम्बं कृत याद--अध्यास इति । पुत्राच्पिण्ड इया । प्रिय इयनेना-
न्वयः । हृन्द्रियमिति । प्रियमिति रषः । षपसंहरति--तेनेति । देतमाद--
एकतरस्येनि । अभानपरसङ्गे देतमाद-अध्यस्तस्यैवेति । “अधभ्यस्तमेव दि
परिसरति मेषु, नान्यत्कथं चन परिस्फुरति मेषु इवययादिना संक्षेपारीरकाचार्यै-
रक्तत्वात । एवं च देदपरयन्यैष्पैव चैतन्याध्यासो नान्यत्रेति भावः। ननु जडयैत्तन्ययो-
रुमयोरष्यस्ततवे शल्यवादापत्तिरत आह-सर्ववाधेति । वैत्तन्यसं सगौध्यासेऽपि न
सखरूपतोऽध्यासौ चतत; श्ुल्यवादापत्तिरिलर्थः । ननु, ज्ञातखैवाध्यासः, तथा च अह-
क्काराध्यासासपर्व तस्य ज्ञा्त्वाभावात्कथमध्यास इत्याशङ्कग्ुपसंदारव्याजेन परिहरति
- तस्मादिति । अनादौ संसारे पूर्व पूरं ्ञातानामदृङ्काराणासुत्तरोत्तरत्राध्यासस्तस्य
व प्रवाहानादितयैवानादित्वमिलर्थः ।
नन्वध्यासस्यानादित्वे स्मर तिरूपः परत्र पूवट्टावमासोऽध्यासंः
(रा. भा. १७-१८) इति वदता भाष्यकारेण स्खृतिरूपत्वेन संस्कार-
जन्यत्वसुन्तः विरुध्येत इति चैत्, न, कायौध्यासाभिपायत्वात्तस्य,
परल परावभास इव्येतावन्मान्नस्पैव उभयाकुगतस्य रक्षणत्वातत ।
यद्रा स्याद्ते निघुनीकरत्य' (तदेव, १६) इति जाष्यकारवचनात्स-
त्मिथ्यावस्तुसं सेदाव भासोऽध्यासं इच्येव सिद्धान्तलक्षणन् । तैन
कारणाध्यासेऽपि न क्षणान्याधिः। कायांध्यासस्य च प्रवाहरूपेण
वीजाङ्करवदनादित्वाभिधानःन्न कोऽपि दोषः ।
नन्वेवमपि अध्यासलक्चणे' भाष्यनिरोधमाराङ्कते- नन्विति । स्मृतिरूपपदं
व्याच्े--स्प्रतिषपत्वेनेति । हत्थंभूतक्चणे दतीया । एवं च स्यतेः हपमिव
रूपमस्येति व्युस्पच्या स्मृतिसटदात्वं॑प्ापतं त्च संस्कारन्न्यत्वमिदार्थः । नेदमवि्ा-
ध्याससाधारणं लक्षणं, भपि तु पञ्वभूतादिरूपकायौध्यासयेयाद--कायौध्यासा-
भिप्राधत्वात्तस्पेति । इदं ठ छश्चणमध्यस्यत इयध्यास्न इति च्युतच्वा अर्थाध्या-
सस्व, छध्यसनमध्या् इति च्युपत््या ज्ञानाध्यासस्य, इतिं चिवैकः । नन्विदमयुक्तं
सानान्यरश्चणाभावात् विशेषलश्चणस्य तूर्वकत्वात् तव्राह-परचरेति ।
चवमध्यासे सिद्धे एकस्याप्यात्मनो जीवेन्वरादिच्यवस्था भानमे-
यादिपतिकमैव्यवस्या चोपप्यते। तथाहि-अन्ञानोपदहित आत्मा अ-
च्रानतादात्म्यापन्नः खचिद्राभासाविवेकादन्तर्यामी साक्षी जगत्का-
१, अ्वभ्याप्रसक्षणेन माष्येण बिरोध इष्याशङ्कत इति गपुस्दके पउ! ।
त्वंपदार्थनिर्णयः ७
रणमिति च कथ्यते", बुद्युपहिलश्च तत्तादातम्यापन्न; खचिदाभासा-
विवेकाल्लीवः कतौ भोक्ता प्रमातेति च कथ्यत इति वार्तिककारः
पादाः । प्रतिदेहं बरुद्धीनां च चिन्नस्वात् तद्भतचिदा भासमेदेन चद वि-
चिक्तं चैतन्यमपि भिन्नमिव प्रतीयते । अज्ञानस्य तु सर्व्नाभिन्नत्वा-
द्रतचिद्राभासमेदा भावात् तद्रविविक्तसाक्षिचैतन्यस्य न कदाचि-
दपि नैदभानभिति।
अष्याल्तसाधनफटमाद- एवमिति । मानमन्तःकरणुत््वनच्छिन्नं चैतन्यम् ।
मयं घटायवच्छिन्नं चैतन्यम् । चिद्ुपदितस्येश्वरोपजीव्यत्वैन प्रथमतोऽज्ञानोपद्धित-
सयैश्वरस् स्वरूषडक्षणमाद--अल्ञानोपद्ित इति । अज्ञानोपदितौ य॒ आत्मा स
एवात्मा्ञानतादात्म्यापन्नो य; श्वचिदाभासः खख शज्ञानोपदितो यश्चिदाभासं॑सव-
वितरेकात्चदगृहीतभेदकः सन्नन्तवौ मीव्यादिच्च्यत इयर्थः । अन्तर्यामीति । भ्यः
प्रधिःर्यां तिष्ठन प्रथिवीमन्तसो यमवति इत्यादिना शअन्तनिंयसनश्चील एक्त दर्थं; ।
साक्षी सवद्रष्ा । दशररं निषप्य जीवं निरूपयति--वुदधयुपहितशेति । एवेकि-
नात्मनानुषङ्गः । तत्तादाच्म्यापन्नो उुद्धिवादारम्यापन्न; । जीवस्य प्रमादत्वमधिक-
कश्ुकपरवेशादिलवधैवम् । चिं जीवभेदः कंथ ताद प्रतिददं चैति । तर्दि
जीवभैदवत् सा्चिभेदोऽपि स्यात् तत्राह-अज्ञानस्य त्विति ।
असश्च पद्मे त्वमा दिपदेः जहल्टक्चगैव, साभासस्योपाधेवौच्या-
थादास्य हानादाभासस्यापि जडाजडविलक्षणत्वेनानिवचनीयत्वात्।
तदुक्त सद्घपरारीरके (१-३६)-
साभासाज्ञानवाची यदि भवति पुनन्रैद्यराब्दस्तथाहं
शान्दोऽदङ्गारवाची जवति तु जती लक्षणा त्र पश्च । इति।
न चाभासस्यैव बद्धत्वात्केवलवैतन्यस्य च पुक्तत्वाहन्धमोश्चयोर्वंथ-
धिकरण्यं खनाकतार्धं पच्रुत्यजुपपत्तिश्चेति वाच्चम्, केवलचैतन्यस्यै-
वाभासद्रारा बद्धत्वाभ्युपगमात्, तदुक्तं वार्तिककारपातैः-
अयमेव हि नोऽनर्थो यत्संसायीत्मददहोनम् । (श्र. आ. भा. वा,
२।४।१३८) इति,
१, कयुत्तकै जगत्कारणमिति च कष्यते इति वार्तिककतः इति ॥
१. छगपुलंक्योः ख्य चङ्ञानोददितश्याह्मनो यधिदाभासु इति ।
३, खगपु्तकयो्ततवस्यादिपद इत्ति पारस्सोऽन॒पपकस्तह्वमसी चैतस्य पाक्यच्वात् ।
४, नख छोक्य उत्तराधः- नीरेषा रौति कों दहति विषधरौ रद्युरमे पवाभिंयतरैवात्मवस्तु"
न्यपि भवतु जदेद्व्षणा को निरोच इति ।
५. कख पूर्वापः--संसगौमनि चषेऽपि ने ३ किधिः्रयोजनमिति ।
याया
२८ व्वंपदार्धनिर्णवः
तेन छ्यदधयैतन्यस्या भास एव वन्धः, तनिष्रचिशच मोक्ष हति न
किञ्चिदसमश्तसम् । अथवाऽऽभासाविविक्तः चैतन्यमपि तत्वमादि-
पदवाच्यम् । तेन वाच्यैकदैदास्यायागाद सिन्पश्चे जहदजहद्छकश्षण-
वेति न कोऽपि दोघ; । अथमेव पक्ष आभासवाद् हति गीयते ।
विनासिनः साभासस्ोपायेश्ंपदवाच्यार्थत्वे समागतां जदङ्वश्चणेयाशङ्तय इष्टा
पत्या परिदरति--अस्मिशेवि । भवत्वाभा ए बाच्यार्थसव्राह-आभा-
सस्यापीति । आभाससँवेति बुद्धितादात््यापन्चिदाभासस्यव जीवस्वैन चद्धत्वा-
दिलर्धः । नन, प्रषच्ञवदाभासस्यानिर्वचनीयत्वैन ज्ञाननाश्यत्वमेवं च ख्वनारास्या-
्युदेदयत्वं बाच्यं वचानुपपन्नम् । तथाहि -- आत्माऽपि दुःखदतुत्वातं निर्र्तयितव्य
इति विक्नानवादिवदास्िकौऽपि न खनाशार्थ भ्वर्वत दयाद--खनादाधमिति ।
संसार्यात्मददीनपिति । संसारित्वेन आत्मद्ौनमिदयर्धः । जामा एव तत्वं
पदवाच्य इत्ति मतं सम्य भ्ाभासानतिरिक्तं चैतन्यं तच्त्वंपदवाच्यमिति मतं समर्थ
यति-अथकवेति ।
अन्ञानोपदितं बिम्बचैतन्वमीश्वरः, अन्तःकरणतः्संस्काराचच्छि-
न्नाज्ञानपरतिविभ्बितं चैतन्यं जीवं, इति विवरणकाराः । अज्ञानपरति-
विभ्नवितं वैतन्यमीग्वरः, वुद्धि्रतिविम्ितं चैतन्यं जीवः, अन्नानोप-
हितं तु विस्बचैतन्यं शुद्धमिति सद्वेषरारीरककाराः । अनयोश्च ष-
क्षयोः बुद्धि मैदाल्ञीवनानात्वम् । प तिविस्यस्य च पारमार्थिकत्वाल्न-
दृद्ुश्षणैव तच्वमादिपदैषु । हमेव प्रतिविम्बवादमाचश्चते ।
काविचयापक्चेऽपि जीवैश्वरभेदो जीवनानातं चेयमिप्रेयाद-अज्ञानोपहित-
मित्यादि । विस्वचेतन्यमिचत्न विभ्बपदं श्वरूपकथनार्थम् । अन्तःकरणसंस्काराव-
च्छिन्न इचज्ञानविशेषणम् । जीवनानाचस्य सपुपौ जीवनाश्ाभावस्य च सस्पादुनायां
अन्तःकरणावच्िन्नस्य जीचत्वै ' कार्यो पाधिरयं जीचः कारणोपाधिरीश्वर' एति शतत;
प्रमाणम् । भगवद्ाष्यकरारवचनम्-*अन्तःकरणसम्निन्नबोधः स त्वंपदामिषं'
दृत्यादि । उक्तोभयपन्षे जीवनानात्वमुपपादयति- अनयोरिति ` ।
१, शपुक्तकरे तदागत्ता दति पाठ्तपरोऽयुपपन्नः |
२. छगयोर्महीति ।
३, तयोरेव दुः रहेतुरिति 1
४, सगदुख्कयोरन्तःकरण ,, ,, जीवः दृखनन्तर भज्नानादुपहितं विम्वयैतन्वं तु घ्द्धभितिं 8िव्-
रनकागाः दति वाक्यं वरयते ।
५, प्रपुच्तके छक्नानजेदात्वीयननात्वं कुतत्तत्राह-अनयो गि्धत्राहशाः पाटः ।
त्यंपद्ार्धनिरणयः २५
अज्ञानविषचीभ्तं' चैतन्यमीभ्वरः, अन्ञानाञअयी भूतं च जीव हति
वाचस्पतिमिश्ाः। अस्मि पक्षे अन्नाननानात्वाज्ीवनानात्वम्। प्रति
जीवं च प्रपञ्च मेदः, जीवस्यैव खान्ञानोपदहिततया जगदुपादानत्वात्।
प्रयभिल्ला च अतिसाददयातं । ईश्वरस्य च सप्रपश्चज्ीवाविव्याधिष्टा-
नत्वैन कारणत्वोचचारादिति। अयमेव चावच्छेदवादः;।
परज्नानेच्छादिवत पराचिद्यायाः परप्रयश्चस्ामावेन परपम्रद्क्षत्वाभावावाद--
प्रलिल्ीवं चेति । अन्न केचन पराविच्याकत्पितत्वं खाप्रयश्चे तन्नं न किन्तु खावि-
शाकल्िततत्वं स्वप्रयक्षे तच्रम् । तथा च यातनां पुरुषाणां यद्रष्तु प्रश्रं तावताम=
विद्याभिरेव तदारच्चम् । च चैकस्य गोक्षौ चद्विशानाश्रात्तछषश्चनाषरीन पुनः प्रपच्छ
प्रयक्नानुपपत्तिरिति वाच्यम् । चण्डघटर्वेदुनरत्पनश्च चमस्मरणस्य संस्कारनादाक-
त्ववद्यं चरमा चिद्यानादास्यैव तन्नाचाकत्वकल्पनेन त्वदुक्तवोषाभावात् । एनं सर्व॑सा-
ज्ञस्य ऽनन्तकोरि प्रप्चकहपनं स्वभिन्नहवे सति स्वतशरयोधर्मवन्वरूपेण सादयेन
प्रयभिज्ञासमर्थनं नातिरमणीयमिति वदन्ति । ' पुरत्रये कीडति यश्च॒ जीवस्तत्त्तु
जातं सकं विचिव्रम' इयादि श्यतुसारेणाद--ज्ीवस्यैवेति । प्रत्यभिज्ञेति ।
यज्ञदत्तेन यो वटो दृष्टः च एवायं जवा विष्णुमित्रेण रद्य इलादिषपां इयर्थः ।
तर्दिं ईश्वरस्य कारणव्यपदेशः कयं तव्राद-ईश्वरस्येति ।
अज्ञानोपदितं बिस्बचैलन्यसीश्वरः, अज्ञानपरतिबिभ्नितं चैतन्यं
जीवं इति वा, अन्नानानुपहितं खुद्धचैलन्यसमीश्वरः, अन्नानोपहितं जीव
हति बा, बेदान्तरसिद्धान्त एकजीववादाख्यः । इममेव च द्ठि-
खष्टिवादमाचक्षते । अस्मि पक्षे जीव एव खाक्ञानवद्ाल्बगदुपा-
दानं निभित्तं च, इदयं च सर्वं प्रालीतिकम् । देहभेदाव जीवभेद
आन्तिः एकस्यैव च न
दाद्वदात्मसाक्षास्कारे सति मोश्चः । कादीनां मोक्चश्रवणं चाध-
चादर एव । महावाक्ये च
तन्यस्य लक्षणयोपस्यापकमित्याच्या जवान्तर मेदाः खयमृहनीयाः
एकजीववादे द्वितीयं मतनाद--अज्ञानोपदितमिति । नु जीवलैक्नते
१, कपुसाके अज्ञानविषयीकद्िति ।
१, तसिनैव पर्यनिल्ञा च साद्दयादिति ।
३. तवैव दैश्वरस्य च प्रप्वनीवाविधयातिषठानलैनेति ।
४, क षृ पुस्तकः शण्ड परवदिति पाटः ।
३५ त्वंपदरार्धनिर्णयः
शुररिष्यभावः कथं एकस्यैव श्रवणादिना मष्ट; ख्वादिंवाशया वषटुनां श्रवणादौ प्र
बुधि न ॒स्पादियाशद्गयाद--एकश्ैवेति । खपे यथा गुररिष्यभावकहपनया
उयकवहारक्तथा जागरणेऽपि । चथा वां स्परे एकस्य नानात्वकत्पनया क्रीडा तथा च~
बणादौ पवृत्तिः । निदयमुक्तानन्तकोटिव्रह्माण्डे्वरशीकृष्णसोभरिपरभृतीनां चथा काय
व्यूहेन धर्मादौ प्रवृक्निः कथा धवणादौ प्दृत्तिः सौघ्रमोक्षार्थम् । न च जीवस्यैक्ये
कथं बहूनां प्रवृत्तिरिति राङ्का । अस्मन्मते "कामः सङ्करपो विचिकित्से चादि कर्व
भ्यचेतनाः कर्म" इत्यादि "दर्षसोकभवक्तोभे'यादि शुतिच्छरख्यादिपर्यादो चनया अचैत-
स्यस्मैव पद्रः । तान्वयैतनान्यन्तःकगरणानि वष्ुनि इति नोचदौष इति विक्र । नतु
तर्हिं कथं ह्ुको क्तः प्ह्ादो वैति प्रा सङ्गच्छते तत्राह--ज्ुकादीनामिति ।
नन्वस्मिन्पक्षे छक्षणाऽत्ति न वा, सखामपि तस्तं कस्यौपस्यापकत्वं तत्राह--
महावाक्ये शति ।
नन, वस्तुनि विकल्वासर्मवात्कथं परस्परविरुद्रमतप्रामाण्यम् ,
तस्मात्किमच्न हेयं किथुषादेयमिति चेत्, क एवमाह वस्तुनि विकल्पों
न सम्भवतीति । स्थाणुर्वा पुरुषो वा राक्षसो वा हत्यादिविकल्पस्य
वस्तुन्यपि दरीनात्। अतास्िकी सा कर्पना पुरुषवुदधिमाच्रपभवा,
हयं त चाश्नीया जीवेश्वर वि भागादिव्यकस्था इति चेत्, नूनमतिमे-
धावी भवान । अद्वितीयात्मतत्त्वं हि प्रधानं फटवत्वादल्लातत्वाच प्र-
मेयं चाखस्य । जीवेश्वरविभागादिकल्पनास्तु पुरषवुद्धिमाचप्र भवा
अपि दाखेणानृचन्ते, तत्त्वन्ञानोपयोगित्वात् । फलचवत्सन्निधावफलं
तदञ्चमिति न्यायात् न्रमसिद्धस्यापि श्यानुवादसस्भवात् । पतेन
हवैतज्ञानेन प्वैतज्चानस्य बाधो निरस्तं । चरादिद्रैतज्ञानस्यापि अद्रैतस-
न्माच्रांदोऽज्ञातेः पामाण्याभ्युपगसाच। न्ञानान्नानयोस्समानाश्रयवि-
षयलत्वनियमात्, जडे च प्रमाणप्रयोजनयोर भावेनाज्ञानानङ्गीकारात् +
तद्वच्छिन्नचैतन्याक्ञानादेव तच्नाप्यज्ञानन्यवदारोपपत्तेः, प्रामा-
प्यस्य चाज्ञातज्ञाचकरूपकल्वाते । अन्यथा स्न्रतेरपि तद्ापत्तेरिति।
वेदान्तेषु सर्वत्र एवंविध विरोधेऽयमेव परिहारः । तदाहुवौर्तिककार-
पाठा; र, आ, भना. वा. १।४।४०२.)--
१, कपुर श्रवणादिना मनन मोक्षः स्वादिति ।
२. कयुत्तकै जदरैतज्ञानस्य बोधौ निर्न इति पादस ऽनुपपन्नः ।
३. तस्मिभेव अैतत्न्मात्राऽदैत इति ।
४, न्गयुक्तकवोः । प्रमाण्य चाज्ञातह्वापक्तवैनेव प्रामाण्यादिति ।
त्वंपदार्धनिर्मयः ३९
यया यथा भवेत्पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रिया श्चेया साध्वी साच उयवस्ितां ॥ हति ।
श्चुतितास्प्थ विषयौ भूता्थविरद्रत्वं च देयमेवेति रातच्च उद्धो षितम-
स्पाभिः । तस्मान्न किंजिदेतत् ।
अथैकमेच चैतन्यं तदप्युपाधिभेदेन भिन्नं तेन च कथं एकं नियं युक्तमपरं च चद्ध-
मियादिव्यवखा इयाते नन्विति । यदुक्त--इयं तु चाखीयेल्यादिना ।
तस्मात् सोपहासं दृषयिबुखुपक्मते- नृनमिलादिना । जीवेश्ररादिविभागस्य
शा्परमेयत्वाभावं बक्तमादाथद्वितीयात्मतनर्वस् प्राधान्यं प्रमैयत्वं च उयबस्थापयति
- द्वितीयेति । धधानव्वे देः फलवत््वादिति । मनेयते दैतः--अ-
ज्ञातत्वादिति। जीवेश्वरादीनां चाखप्मेयतं दूषयति-जीवेःवरवि भागादि ति।
थ कथं पुरषवुद्धिनात्रप्रभवस्व शुयनुबादलत्राद--ञअ्रमसिद्धस्यापीति । पते-
नेति । अज्नानारैतप्रघानयिषयत्वेनेचर्थः । अज्ञानबोधफं चेरप्रमाणं वर्हि पटादिवोध
कल्य का गतिरत आद-चटादिद्वैतक्ञानस्येति । मेव परतिपादयति--ज्ञाना-
ज्ञानयोरित्यादिना । उपखंदरति--एवमिति । षटुत किमिव देयं तव्राह-
श्यतीति । अतिमेधावीलादिना य उपारम्भः कतसखव्राह--इातद्ा इद्यादि ।
तदेवं जीवस्योपाधिनाभिभूतचात्वं खारोपलदिधः, परमेश्वरस्य तु-
पाधिवरात्वात् सर्व॑ज्ञत्वादिकनिति खम्यगुपपद्यते व्यवस्था ।
ननु वस्तुनीदयादिनाऽऽशद्ष यत्त समाहितं तदिदानीयुपसंदरति-लदैवमिति ।
4 व मवत्वविव्यावक्ालीवेन्धरादिषि मागन्यवश्या मानमेधादिप्र-
उ्यवस्था कथमिति वेत्, उच्यते । इदयत्वाद्धिनादित्वाच
परिचछिन्नाप्यविद्याऽनिर्वचनीयत्वेन विचारासद्टा आवरणविश्षेष-
छाक्तिद्रयवती सर्वगतं चिदाच्मानमान्रणोति, अङ्घदिरिव नयनपुरः-
शिता ष्ु्थमण्डरम् । तञ्च चष्ुष एबावरणेऽङ्गेरप्यमानधरसह्वात् ।
अधिष्ठानावरणमन्तरैण च वि्षोपालुषपन्तच्। लतः सा पूवेषूवंसंस्कार-
जीवकरमपयु का सती निखिलजगद्वाकारेण परिणमते । सा च खगत-
चिदा मासद्वारा चित्तादात्म्यापन्नेति तत्काय॑मपि सवैमाभासदह्ारा
चिदयुस्यूलमेवं । तथा च चेतन्यस्य दीपवत्खसम्बद्भसबै भासकल्वौ
, योरेव पत्त इतिं ।
. सपु्तके श्थिरथ्थित्ता गपुश्तके च अनेश्िता इति ।
, कयुल्तके तत्कार्यमपि सर्वमायाद्रारा विदवुष्वृत्तमेवैति पाउस कखकच्ं ह्तदोष एम ।
, तथात चश्छितेव दीववश्खयंनदसर्षभासकरवादील्यपि पार्स दोप एथ ।
नू „क च >
३२ त्वंपदार्धनिर्णयः
ज्रगदुपाद्वानचैतन्यं प्रमाणापेश्चामन्तरेणैय सर्वदा सर्य भासयत्
स्ेज्ञ मवति । तेन तत्र न मानमेयादिच्यवस्था । किन्तु जीवे तस्य
बुद्धवबच्छिन्नत्वेन परिच्छिन्नत्वात् तेन चिद भिव्यक्तियोग्येन येना-
न्तःकरणेन यद्वा यत्खम्यनद्धं मवति तदेव तदा तद बच्छिन्ञो जीवोऽ-
जु भवत्तीति न खाङ्कलयप्रसङ्धः ।
परतिकर्म ज्यवख्यामुपपादयितुं भूमिकामास्वयति'- नन्विति । आवरणेति ।
छचि्यां आवरणदात्त्या सर्वगतमखण्डपरमानन्दसाश्वात्कार्खकूपमात्मानमान्नणोतिं ।
छत एब आत्मा ख्वप्रकाशच्क्यौऽपि तेन करूपेण न भासते, विदधचेपलश्चणशक्तया
वियदादिसाबरणग्रह्माण्डान्तं प्रपश्च्ुद्धावयतीदयवधेयम् । उमयक्चक्तिप्रयोजनमाब्रणो-
तीति अन्यथा अखण्डानन्दरूपेण बद्मणः स्फूर्विः स्वादिचययर्थः । अल्पदैक्षन्यापकेन
वहुदैराभ्यो पकस्यावरणे दृ्टन्तमाइ--अङ्खुलि रिवेति | अङ्कङ्िनान्रते चक्षुषि यथा
सूैमण्डलमावृतमिति बुद्धिः, तथा अविद्यया बुद्धिपिधानेन बह्म आवृतमिति बुदिरिति
बोध्य् । ननु तवैवं वक्तव्यम् , अङ्कदिश्चघ्चुर्रणोति, आ्रतं च न दकं , अतो न
सर्यमण्डल्दशनमियत् आद--तच्रैति । नल मास्वाबरणं बद्मणलत्राहद-अधि-
छानावरणमितिं । यथा शयुक्तिलवाशाबरणं चिना न रजतोसभिसतथा न्गावरणं
विना न प्रपच्चोत्पच्चिरिवयर्थः । साऽविद्या चिदात्मानमागरुख जगदात्मना परिणमत
इयाद~-तत्तश्चैति । अमे वश्ष्यमाणच्वक्तम्वदभासकल्वोपपादनार्धमाद--नत्क्ञा-
यंमपीति । तदिति । अविचेचर्थः । नलु भवतु तत्का चिदनुध्यूतं फ तैन
तव्राद-- चतथा चेति । ननु चवलु जगदुपादानं रैतन्यं एवं कमेण सर्वभासकत्व
भ्रकृते किमायातमत् आाद--तेनेि । भमाणनिरपेक्षत्तया सर्वभाखकल्वेनेयर्थः ।
तन्न; दशर । तस्येति | जीवस्य परिच्छिन्नत्वेन, न सर्वसन्वन्धाभावाविति
भावः । फलितमरा्-- तेनेति । चिद मिन्यक्तियोग्येनेति । सर्वसैव चिद्-
भिन्यक्तियोग्बत्वेन स्वरूपकथधनमात्रपरम् । यैनेति । येनान्ःकरणेन खपरिणामद्य-
रा यस्मिन्काले च घटादीनां मध्ये दस्तु सम्बद्धं भवत्नि विषयीक्रियते तदैव वस्तु
तसिन्काे वद्न्तःकरणावच्छिन्नो जीवोऽनुभवतीयर्थः । न साङ्कर्येति । न बुद्धध-
न्त प्रवच्छिन्ननीवस्वानुमव्रधन्नङ्ग इद्धः |
एवमत्र भक्रिया -शारीरमध्ये स्थितः सर्वदारीरव्यापकः सश्चपाधा-
न्येन सुश्ष्मपज्मूतारञ्धः अन्तःकरणाख्योऽवि्याविवर्तो दर्षणादिव-
१, खणपुलक्योलतारपवाषि।" {1
२, भादरं चश्वुश्च न प्राहुकमिति गपुत्कै ।
३. सर्वत्वेन इति पु, सर्व तैन इति च यपुद्श्चे ।
त्व॑पदार्धनिर्णयः ३३
दतिखच्छो नेच्रादिष्रारा निगल योग्यान्यशदीन्विषयान्ध्याप्य तत्त-
दाकारो भवति द्रुतताभ्नादिवत् । तस्यं च सौरालोकादिवत् ज्ञरिव्येव
सङ्कोचविकासावुपप्येते । ख च सावयवत्वाह्परिणममानो वैदाभ्य-
न्तरे घटादौ च सम्यग्ब्याप्य दैहघय्योमध्येऽपि चक्षर्वदविच्छिन्नोऽ-
प्यवतिष्ठते । तच्र देदावच्छिन्नान्तःकरण भागोऽहङ्कारास्यः कर्तैत्यु-
च्यते । देहविषयमध्यवर्तौ दण्डायमानस्तद्भागो इत्तिज्ञानाख्यः कि-
येत्युच्यते'। विषयव्यापकस्तद्धागो विषयस्य ज्ञानकमेत्वसम्पादकम-
भिव्यक्तियोग्यल्वंमित्युच्यते । तस्य च चि मागस्यान्तःकरणस्याति-
खच्छक्वात् चैतन्यं तच्रामिव्यल्यते । तस्य चाभिव्यक्तस्य चैतन्यस्य
एकत्वेऽपि अभिव्यश्चकान्तःकरणमाग मेदात् त्रिधा व्यपदेखो भव-
ति। कतभागावच्छिन्नचिदंडः प्रमाता, क्रियाभागावच्छिन्नचिदंशाः
धमाणम् , वेषयगताऽभिघ्यक्तियोगयत्वभागावच्छिन्नचिदं राः परमि-
तिरिति । प्रमेयं त विषयगतं ब्रह्मचैतन्यमेवाज्ञातम् । तदेव च ज्ञातं
सत्, फलम् ।
खपरिणासद्रारेति यदुक्तं तरकटयति--एवसन्नेति । सर्बरारी वच्छेदेन शा-
नपुषादानल्व सर्वशारीरसम्बन्धं विना न ॒सर्भवेयत उक्तम-सर्वचारीरव्यापकः
इति । विदनिव्यक्तियोग्यतवप्रकटनायाद्-सस्वप्राधान्येनेति । सरवोद्रिक्ते
खच्छ एव प्रतिबिम्बो भवति न रजस्तमो श्रिकतेऽख्वच्छे लोष्टादौ इति आवः । भवत्वेवं
तथापि कथं श्यरिति धुबरोकादिगमनागमनं तत्राह तस्य चवि । पखवनूतारज्ध्वं
यदुक्तं तस्य फलमाह- स चेति । अन्तःकरणाल्य इलयर्थः । प्रनात्रादिंविभागाय
तहुपाधिविभागमाह- तच्च देहेति । नट बआल्ायुपाधिविभागस्तथापि क्त चैत"
न्यामिन्यक्तिः छतरस्ववा च कथं तदमिन्यक्तयैतन्यस्व भमातृत्वादिक तंक्राह--तस्य
चेति । ओौपनिषदमते त॒सर्वे्र चध्लुरादिभयोज्यान्तःकरणव्त्तिः प्रमाणमिदभिमे-
व्याद- क्रिया भागावच्िछिन्न इति । अत्रापि मूखायच्छिनज्नः प्रमाणं, मभ्यभागस्तु
इन्द्रिय विषययोः सन्निकर्षः; सनिकर्मजन्यं च ज्ञानं प्रलक्चम् । वटुक्तमश्चपादा-
चार्यैः-हन्दियार्थसननिकपत्थिनं ज्ञानमव्यपदेदयमन्यभिषारि व्यवसायात्मकं प्रयः
्षम्ः । अत्र॒ आण्यम्-इन्द्रियस्यार्थेन समं सन्निकषाद्यदुत्पयते इनं तेत्मलश्चम ।
नामयेयरब्देन व्यपदिश्यमानं शाब्दं घसज्यतेऽत धआद--अल्यपवै श्यमिति । चव्द्-
१, कवुश्तक वत्तित्तानाष्या क्रियिदयु्यते इति प्राठः भोऽनुपपन्नः मागगब्दश्च पुंिक्त्वात् ।
२. सपुरफे ज्ानकमेत्वत्तम्पादयं कर्मानियोग्यस्मिति ।
५५ ति नि°
३४ त्वपदार्थनिरणयः
सम्बन्धल्ञानानधी नमिः । आमवारणायान्यमिनारीति, संदायवारणाय च्यवचाया-
त्मकमिति । एवं च सन्निक्पविधया चिषवपर्यन्तान्तःकरणत्रततिरपे ्षितेलवधेयम् ।
तेनात्रापि अद्ुमानादिवदन्तर्धीसमुद्ास एव, न तु विषयपर्यन्तान्तःकरणदृत्तिरि-
पास्तम् ।
अच्च यस्मिन्पक्षे अन्तःकरणावच्छिन्नो जीवः, यस्िश्च पक्षे
सर्वगलोऽसङ्गोऽविद्याप्रतिषिम्बो जीधः, तन्नो मयच्रापि धमातृचैतन्यो-
परागाथां विषयगतनचैलन्यावरणमद्गा्था चान्तःकरण्रसिः। यसि
पक्षे अबिद्यावच्छिन्नः सवेगतो जीवः आवृत्तः तस्मिन्पक्षे जीवस्यैव
नुदत स्ेसम्बद्धत्वात् आबरणभङ्खा्धा बरत्तिरिति बि-
¦
सन्निकषालन्धत्वेन अंनुभित्यादिवत प्रयश्वत्वाभावात्च कसिन्यशचै वृत्तेः कि प्रयो.
जनमिति विचिच्य बक्तुुपक्रमते--अच्नं चेति | अन्तःकरणावच्छिन्नजीवपध्चे प-
रिच्छिन्नस्वात् तस्यैव परिच्छिननजीवस्य दृत्तिमदन्तःकरणरूपाधिककञचुकमवेदात्
भरमादत्वम् । एवं च अ्रमात्रचैतन्यामिन्नजीवस्य विषयसम्बन्धार्थावर्िः । एवं सर्च
गतस्यापि खतोऽसङ्गस्य बृत्तिमद्न्तःकरणरूपाधिककच्ुकपवेशात्् परमानृत्वम् । तख
चं खतोऽसङ्गसर विनाधृ्ति विषयासम्वन्धाभाषान्, असङ्गसर्वगतपक्नोऽपि दृ्तिे-
चित्ता । अरमेयचेतन्वप्रमाद्चैतन्वयोः सन्वन्धषश्चैऽपि व्त्तिरयेन्चित्ता । अन्यथा
मचाऽवं विदितौ घट ति प्रमेवचैतन्यास्षम्बन्वे प्रमातृचैतन्यस्य प्रययौ न स्यात् ।
अत इमयपक्षेऽपि प्रसाद्चैतन्योपरागा्थीं वृत्तिरावदयकरीति मन्तव्यं सूरिभिः । सर्व-
गतः, प्रपच्छन्यापक्ः । असहः इति | असङ्ः, अविच्ानङ्गगदितः, अनावृतः इयर्थः ।
विषयस्य प्रमात्चैतन्वेन तद् यः सम्बन्धः स॒ विनाघ्रुत्तिं न सम्भवति, एकलो्मीमा-
वाभावात् । विना च अरमादरचेतन्यलम्ब॑न्धं मयाऽयं चिदिततो घटः इयादिभययो न
भवति इयतः भमातचैतन्वसम्बन्धो विषयस्य आवद्यक इयाद--पमातृचैत-
न्योपरागार्थव्यन्तेन । अत्र चेयादिना पूर्वेक्तिभयमते विषयस्तु अ्यवैतन्ये.ऽध्यच्त
इयवश्रेयम् । उपरागः, सम्बन्धः । विषथगतेति | विपयचैतन्याषरणभङ्गक्तु
विनाधृत्तिं न सन्भबतीति । उक्तोभयपश्चेऽपि विषयावरणभक्घार्था वुत्तिरावद्रयकी-
दर्थः । बाचस्पतिमिश्रमते तु लावरणभङ्गा्यैव वृत्तिर्न सम्धन्धार्था सर्वेषां पदार्थानां
तत्सश्वन्धत्वादिवाद--यस्मिश्चेति ।
१, कयुस्तके इदं ब्रां न द्यते ।
२. स्तगयौस्तथा चैधि ।
त्वंपदार्धनिर्णेयः ३५
ननु चिहुपरागाथा इत्तिरिति पशमे खतोऽन्तःकरणसम्बद्धानां
घमाधर्मादीनां ब्रह्मणश्च चत्तिमन्तरेणैव स्थदा भानं स्यात् । न
शात चैतन्यस्य तत्तदाकारत्वा भावात् । तद् भावश्च खच्छेऽपि
तन्ये आवरणात्, अनाघ्रतेऽपि श्ुक्तिरजतादावखच्छत्वात्,
घमोघमांदौ तु अखच्छत्वादाच्रतत्वाद्रा । तेन खच्छेऽप्याद्रते पमाण-
बत्य तद्राकारता, अनाव्ृतेऽप्यखच्छे शुक्तिरलतादाव विच्यारलया
तद्धाकारता, अनाघ्रते खच्छे तु सुखदुःखादौ खत इति नान्तःकरण-
सम्बन्धम्रान्नेण चानधसङ्कः ।
प्रमाद्रच॑तन्योपरागाथां वरत्तिरिषयत्रादङते--नन्विति । वृ्तिच्यतिरैकेणापि घ.
म्वन्धच्त््वादििति भावः । धर्माधरमादीनामिस्युपलश्चणमनात्रवचैतन्या्य्तानां श्तिर्.
जतादीनाम् । परिदरति-न स्यादिति । तद नावः, तदाकारत्वाभावः । आत्रू-
तस्वाद्धेति । तदभावशरेलयनेनान्वयः । ब्रह्मणश्च्यादिना यदुक्तं चत्परिहरति-
खच्छेऽपीति । तदाकारकल्वाभावप्चोलकमपपाद्य तवाकारकत्वपरयोजनमाह--
तेन खच्छेऽप्याश्त्र इतिं । कणि इत्ति दोषः !
ननु, ब्रह्मणः कथमावरणम् , निरवद्यस्वपरकादास्मेन सर्वज्ञत्वात् ।
सघ्यम्, खसम्बद्धसवेभाखकतया स्व्ञमपि अन्तःकरणावच्छिन्न-
जीवाज्ञानविषयतया आन्रतमिति व्यपदेात् । तस्माद्रह्म जगदुः
पादानमिति पक्षे चिढुपरागार्था आचरणभद्गाधी च वृत्तिः, जीवो,
पादानत्वपक्षे तु आवरण मङ्कार्थेयेति ।
ननु; यदि त्र्मण्याबरणं संभवति तदप्रमाणवृत्या तदाकारं वक्तव्यं तदैव
न संभवति तथा कथमुक्तं खच्छेऽपि नहायैततन्ये आबरणादियाचद्रते- ननु
ब्रह्मण इति । जीवाज्ञानविषयत्वैनादतत्वादिति । यच्चप्यावरणदाक्तिमती अविच्य
दैधरोपाधिश्तथापि तस्या ईश्वरं प्रति नाधरकर्वगन्वथा सार्वज्ञभङ्गापतेः चिन्त जीवं
्रतीयर्धः। अत्र चेलयादिना यदुक्तं तदुपसंदरति-- तस्मादिति । विख पश्च
इनेन यदुक्तं तदुपसंहरति-- जीवो पाद्धानत्वं इति ।
नज, प्केनेव धदादिज्ञानेनावरणभद्के सयो मोक्षपरसङ्गः, अज्ञा-
१, गपुस्त द च्ििजत्तारिवदिति ।
३. कपुल्के प्रमाणपघरत्या इति ।
३. चगवौल्तदुभवनुपसं रतीति पाटः स॒ न युकः ।
३६ त्वंपदार्ध॑नि्णवः
नस्यैकत्वात् । नानाज्ञानपक्षेऽपि एकस्य जीवस्यैकाज्ञानो पाधित्वातं ।
न, उत्तेजकेन भणेरिवं ब्रत्याचरणस्याभिभवाङ्गीकारात्। तधा च
प्रमाणजन्यान्तःकरणन्र्य मावसहक्तमज्ञानं सति भादयपि वस्तुनि
नास्ति न भाति इति प्रतीतिजननसमथंमावरणमित्युच्यते । वृत्तौ
जातायां त्ववच्छेदक्ताभावाद्धिच्यमानमप्यविद्यमानसममेवेति न ख-
कायंसमथेमज्ञानं तेनाभि भृतमिच्युच्यते ।
ननु विषयप्रकाशाय आाधरणभङ्गाधां चेदुतिरक्गीक्रिवते तर्दिं अतिपभसङ्ग इया-
शङ्कते---नन्विति । नलु नानाश्चानप्नोऽप्वस्ि+ तया च नातिप्रङ्गसत्राह--
नानाज्ञानपस्षेऽपीति । फकिवमाद-तथा चेति । आवरणपदार्थमाद--
सखतील्यारभ्य ससर्धमिखन्तेन । नन्वेवं चैत् तरिं कथममिभवसततराद--
वर्तौ जातायामिति ।
नल, एवं खति अ्रद्यज्ञानेनाप्यविष्ाया अनिधृत्तेरनिर्मोक्षपसङ्कः ।
न, तत्त्वमस्यादिवाच््या्ज्ञानाद विव्यानिव्त््यभ्युपगमात्, खविषय-
प्रमात्वेन वविद्यानिवतंकत्वान्महावाक्याथन्नानस्यैवावाधितविषय-
तया प्रमात्वात् । पचयश्नादीनां तु बाधित्तविचयतया ज्मत्वेऽपि
व्यवहार सामर्थ्येन प्राञ्ाप्याभिमानात्, जानादज्ञाननिधत्तेरन्यश्ना-
दानं चाकिचित्करम्, खावभवसिद्धत्वात्, अन्यथालुपपत्तेशच
सर्वतो बलवत्वात् । तदुक्त (ख. च. खा. १)-
अन्यथाजुपपत्तिश्चेदस्ति वस्तुप्रसाधिका ।
पिनच्वदष्ियैमलय' सैव सवचलटाधिका ॥ इति ॥
अथवा शलान्ञानस्यैवावस्थाज्ञानानि घटादिविषयावरणानि ।
अज्ञानस्य प्रागभावस्वानीचत्वेन यावन्ति ज्ञानानि ताबन्वयज्ञानानी-
ल्यभ्युपगमात्त् एकेन च ज्ञानेनैकाज्ञानस्यैव नादात्, चटादिन्ञानेना-
वरणनाद्ोऽपि न काचिदनुपपत्तिः ।
१, कपुश्लके नानान्नानपन्नेऽपि एकनाह्नानोपाचधिकत्वादिति ।
२, खगपुन्क्योततेज्कःदेन मणेतैवर इतिं पाठः पर न युक्तः ।
३, कपु्तक ऽन्टेदकत्वाभावादिति, खपुस्तकते चाज्ञानशक्नगवन्छेदोभावादिति।
५, कपु तिषयप्रकौलिवरनमक्ना्था सेतिरिति ।
५, शपु्लके छविषयतिषयपरनाप्तेनैव इति ।
६, तस्िनैवर पिनश्वदनैमसनिति, कठिकात्तायां शिते ्ण्डनन्तण्डलये च पिनषिषतैनल्वनिति ।
तंपदार्धनिर्णव £ ३४
शङ्कते---नन्विति । एवं, अमिभवाज्गिकारे। भय वटज्ञानायैकान्ाननिवतितत
कथं बाक््ार्थज्ञानादनिवृत्तिः, उभयोरपि त्वानत्याविेषादत ज--खविषयेति ।
घटमात्रविोष्यवटत्वप्रकारकन्ञानस्वापि प्रमात्वमल्याहतं तव्राह-महावाक्या-
ति । पातीविकल्याचिष्ठानज्ञानबाध्यत्वबत् ञ्यावद्ारिकस्यापि त्रहाज्ञानवाध्वत्वात्
चटादिज्ञानानां वाधितविषयत््रेनाप्रामाण्य, नद्यन्नानं लु न तवा, व्रह्मणः काष्व्रया-
वाध्यलादिवारयेनेोक्त--वाक्यारथृज्ञानस्यैवावाधित्तविषयतया प्रमात्वा-
दितिं । ्रहमज्ञानातिरिक्तस्या्रमात्वे जगति प्रमाश्यवदहारोच्छेदतवादह--प्रत्यक्षा-
दीनां त्विति । विज्ष्वादृत्तिमरकारकत्वादिरूपपरामाण्यमादाय भरामाण्यव्ववद्वार
हयपि बोध्यम् । नतु चटादि्तानानामपामाण्ये नानाङ्क ज्ञानाक्ानचोर्नारवनार-
कभावः कुतः कपः यद्रखाद्राच्यार्थज्ञानस्यान्ञाननादकन्वं करप्यते तत्राद--ज्ञाना-
दज्ञाननिच्रेरिति । खातुभवसिद्धत्वात्, जीवन्ुकतानुभवसिदःतादि-
यर्थः । ्ञानादज्ञानानिवृत्तौ अज्ञानमूलकसंसारानुच्छेद इयाद--अन्यधानुपप-
त्ेखेति । स्वोक्तसम्पादनाय खण्डनकारिकामवतास्यति-- अन्येति । पिनष्टि
नादायत्ति, पिष् संचूर्णने इनि धातोरनिष्पन्न्ेन नाशरार्थत्वात् । सन्परदायमनुर-
न््याद-- धवेति । र्हि एकेन तानेन पएाज्नाननादो सच्चो यचिभरसङ्गसत्राद--
मूलाज्ञानस्येति । एवं च मूलाज्ञानस्यानादात्, एकस्ाबस्ाज्ञानस्य नाद्ोऽप्वप-
राबच्वाज्ञानघ्तर्याज् न सद्यो मोश्चपसङ्खो न बा स्ववा वरस्य भानमिति भावः । पषदर-
कार्थुपसंहरति--चडादिज्ञानेनेति । न काचिद्धलुषपत्तिरिति; न स्यो गो
क्षप्रसङ्ग इयं; । अथवा धकेने चटा दिज्लानेन प्कावेस्धाज्ञाननाशनो सर्वदाघदादेभानं
खात्, आवरकान्तराभावाच्तत्राद-- चटा दिक्ञानेनेलि । एकाङ्ञाननारोऽप्यज्ञाना"
न्तरसन््वा्तै न घटादेः सर्वदाभानप्रसङ्ग इति आवः । एवमप्यसिन्यध्चै घटाका-
यादिवृत्तिखन्वे अवस्था ज्ञानल्पावरकान्तरसन््वेन एकस मणेनागोऽप्यपरमणिसस्े
दाहानुक्पत्तिवघ्् बदादिन्यवद्वारानुदयप्रसङ्कार ब्रत्यमावसदहछृतावयाज्ञानस्मावरक्त्वा-
बस्यकत्वं वक्तव्यम् । तथा च पूर्वो्तरीत्यैचोपपनत्तौ, अलमनन्ताज्ञानकरपनेन इति
व्याः । चदि च ज्ानप्रागभावल्यानीयत्नेनाक्ञानङ्गीर्बन्ि वन्न निवाप्यामः ।
यदि वा वाक्यार्थह्लानादपि भूलाज्ञाननाशस्य ठुरपपाद्त्वापततः प्रमाऽ्ञानयोनादवना-
१, कथपुस्तकयोः कथं वाकया्कानादुभयोरपि ज्ञानत्वाधिरेषादत जह इति ।
३. कषुपुस्तफे बाधित्तविषयत्वेन प्रामाण्यमिति पाः स्र त वुक्तः।
३, वाक्तयारथतानच् चावाधित्रनिषवकःतेन अ्रासाष्यतिति रकायान्निष्वपि दृस्तडेचेषु मृद ठु उपरि
मुदितं तथैव ।
५, तप्तितेव घन्नानान्तरभषादिति ।
५, क्लपुत्तकते प्सकृत्वभाधचहकतः दति ।
३८ त्वंपदार्ध॑निर्णयः
सकभानकवलदक्तानभिच्छन्वि तदपि न निराकर्मः । किन्तु घटादिज्ञानेनाज्ञाननादो
स्यो य॒क्तिप्रसङ्न इयमिसततमभिधाय यदवण्ाज्ञानाङ्गीकरणं तक्िमर्धमिति न जा
नीम इति रिं ।
नल, अजमानादिभिरावरणं निवतंते न वा । आघ्ये साक्नात्कारि
श्रसस्यापि राङ्कपीतत्वादेः श्वेतत्वाद्यलमानादिना निच्रत्तिप्रसन्नः
अधिष्टानाज्ञानो पादानकलत्वेन अरस्य तचिच्रत्तौ निचत्तेः । यौक्तिकः
ज्ञानेन च ब्रह्मण्यविव्यानिच्त्तेः साक्षात्कारा्थं श्रवणमननाच्यपे
श्चं न स्यात् । द्वितीये च बह्धयादित्यवहारो न स्यात्, प्रतिवन्धः
कस्य विद्यमानत्वात् । उच्यते-द्विविधमावरणम् , एकमसत्त्वापादकः-
सन्तःकरणावच्छिन्नसाश्चिनिष्ठम्, अन्यदभानापाद्कं विषयाव-
च्छिन्ञत्रह्मचैतन्यनिष्ठ, घटमहं न जानामीत्युभयावच्छेद्ाल मवात् ।
तत्राद्यं चरोक्नापरो्वस्राधारणप्रमामाच्रेण निवतते । अनुमितेऽपि
वहवादरौ नास्तीति परययानुद यात् । द्वितीयं तु साक्चात्कारेणौव नि-
र्ते । यन्निष्ठं यदाकारं जानं तच्निष्टं चदाकारमज्ञानं नादायतीति
नियमात् , परोक्ापरोक्षनि्ठत्वात्ं । तद्क्तम् ( पज्च. ७.४५)-
परोश्चज्ञानतो नदयेदसच्चाचृत्तिदेतुता ।
अपरोक्चधिया नव्ये नानाव्र्तिषैतलः ॥
तेनास मानादैरद्च्चवावरणनाश्ांत्र तद्कवहारः । अ भानावरण-
निन्रच्या च सोपाधिकसाश्चात्कारिश्रमनिन्र्तिरिति । तस्मा्निर्धमं
कस्थाप्यात्मनोऽविदान्तःकरणतादात्म्याध्यासात्तद्धमंकवैत्व भो
त्वायध्यास उपप्यते ।
चतं समाप्य विचारान्तस्मारभते--नन्विति । आद्य इति । अज्ञानं नि-
वर्तत इति पक्ष इदर्थः। वत्र देत॒माद--अधपिष्ठान इति । दूषणान्तरमाद्--
यौक्तिक इति । क्वान न निवर्तत इति पश्वमाद--द्विलीय हति । बहथादि
व्यवहारामावे दतुमाद--रतियन्धकस्येति । भवरकस्याङ्गानस्येदयर्थः । अस.
च, छगयोः प्रतीच्यनुदयादितिं पाटः ।
२, खपु वदाधर्ये यदाकारं ज्ञानं तदाधयं तदाक र्मक्ताच नाक्चयतीति । कपुस्के बन्नष्ठा यद्
काद्य च शतति्मषति तन्निष्ठं तदाच्छर्मन्ञानं नदयत्तीति ।
३. कुलक परो्तेधान्त भतिमुहास्मातरत्वैन विषयनिषठत्वामावाद्पतेक्षतेश्च विधयान्तःकरणो-
भवलन्यत्वेन तदुभवनिष्ठत्रादिति ।
5, खगपुश्कयरुमानादावद्रत्वावरणनाशादि तिं ।
त्वंपदार्थनिर्णयः ३९
च्वापाद्रकमिति । असन्तं, सत्वामावः । एवं च इदमत्र नातीति प्रययापादक-
मावरणनिचर्थः । अभानापादकसिति । ज्ञानं अपरोशषज्ञानं तदभावोऽभानं
ददापादकं, तथा चाप्रयक्चत्वापादकमावरणमिचर्थः । ननु, कीददं जञानं कीददामन्नानं
नाशयति तत्राह-यचिष्टमिति । तदुक्त, वार्चिककारपदैः' इयर्थः । साश्वा-
त्कारिदपीतत्वादि मोऽपि निवर्तते चक्राह--अशानावरणेति । अविद्या
कैत्वादिमाक् परमार्थतो निर्म इत्यौ पनिषदमते यदुक्तं भाद् तदिदानीमुपपाद्-
चति-तस्यादिति । तादात्म्येति । वादात्वेनान्तःकरवाध्यासादियर्थः ।
नतु तात् मात्, ये कतैस्वादयोऽन्तः-
करपाधमां आस्मन्पध्यस्यन्ते तेऽनिर्वचनीयास्तच्रोतपष्यन्तं इति वन्त
च्यम् । तथा च व्यावहारिकप्रातीतिकथेदेन कतृल्व भोक्तृत्वादीनां
देषावभासः स्यात् । न स्यात्, तादात्म्याभियानेनादिवेकात् । स-
कलधमविचि्टस्यैवान्तःकरणस्यार्मन्ययस्तत्वेन द्वधाभावद्रा । त-
स्मादेकस्यैवात्मन उपाधिभेदेन पमाच्रादिव्यवस्यो पपत्तन सौगनम-
तापत्तिनं वा विरोधः । अन्वापि व्यवस्थाः स्व्टतरणुपरिष्टादुपपा-
दयिष्यन्ते । लस्माञ्ल्ानखशरूपस्यात्मनः सुषुपाचन्यभिचाराददेच्ि-
यादीनां च व्यभिचारादुदयस्वाच नत्र तच्रात्नवुद्धिस्तेषां तेवां वादिनां
च्रान्तिरि्यौ पनिषदमलमेव प्रमाणमिति सिद्धम् ॥ १ ॥
नह यथां व्यावहारिकं रजतमेकं, सपरं च प्रातीतिकं तथा करत्वारिकनप्युभवं
वक्तन्यनियाश्डतै-ननु ध्वन्भत इतिं | ये कटष्वाद्य इति येयां धमां अध्यखन्ते
ते त्याबदारिका इति भावः । परिद्रति-न स्यादिति । दुक्तं द्विधावभातः
स्यादिति तद्पलुदति-तादास्म्येति । द्वितीयमेव नात्तीचादं--सकल धरति ।
यदुक्तमेकस्यैवाःमनः प्रमाणप्रमेयप्रमितिरूपता च विरद, अविगोधाभ्युपरामे
बा सौगवमतापत्तिरिति तदपनुदति-तस्मादेकस्यैवेति ¡ प्रथमोक्तस्य विरोधस्
घ्यबस्योपपत्तेरित्यन्तेन प्रथमो दुषितत्ान्न विरोध इंयनुवादमात्रम् । एतेन
प्रथमद्वक्तौ विरोधः प्रमत्तः कितिति न दुषित्र इसयपान्तम् | परमप्रकृतमरुषन्चं =
हरति--तस्याज्ज्ञानस्वरूपस्वेति । इति प्रथमश्छोकनिवगणम् ।
स्यादेतत् । आत्मनोनिधेमेकत्वे प्रमा्नादिव्यवहारश्याध्यांसम्-
छत्वे च श्राह्मणो चेतः इवयेवमादीनां चखाणाभभ्रानाप्यप्रस ङ्गः,
१, भयं श्लोको न वार्तिकेशपि तु पव्वदद्याघ्ुपलभ्यतते ।
१. कष पुल्छके द्वितीयेन नान्तीद्याह् दति पाडः चर न समी चीनः ।
४४ त्वंपदार्धनिर्णयः
अकतुरभोक्तश्चात्सनः घचत्त्यजुषपत्तेः, चेदाधाभाण्ये च कुतो ब्रह्म
सिद्धिर, तस्य तन्नाच्रगभ्यत्वात्, साखयोनित्वादिति न्याधात्।
तथा च वेदप्रामाण्यार्थं धनान्नादिव्यवहारस्य सलयत्वमभ्युपेयमि-
व्यारोङ्ू्य, कि तच्वज्नानात्पूर्वसप्रामाण्यमाप्यत्ते ऊध्वं चा । तत्राय
यावदविद्यानिच्रत्तिव्यवस्याया उपपादितल्वात्सर्वेषां परमाणानाम-
विव्यावद्विषयत्वेन तदरायां बाघधाभावान्निष्मतथृहं प्रामाण्यम् ।
द्वितीये च्विष्टापत्तिरेवेव्याह-
न वणौ न वर्णाश्रमाचारधर्मा
न मे धारणाध्यानयोगादयोऽपि ।
अनात्माश्चरयाहंममाध्यासहानात्
तदेकोऽवश्ि्ः शिवः केवरोऽदहम् ॥ २ ॥
कछोकार्थः । वणी ब्राह्मणश्चन्नियवैदयद्रद्राः। आश्रमा ब्रह्मचा-
रिश्रहस्थवानपरस्थभिक्षवः। आचाराः रोचसानादयः। धर्मा; व्र्मच-
यगुरुसेवादयः । अच्च इन्द्द्रयम्मषदिततपुरुषेण वणीनामाचाराः
धर्मांश्च आञ्माणामप्याचाराः धमरौख् लभ्यन्ते। धारणा ्रह्मणि'
वाद्यविषयत्यागेन मनसस्स्ै्यम् । ध्यानं परमात्मचिन्तनम् । योग
शित्तवृत्तिनिरोधः । आदिच्राब्देन आअवणमननादयो श्यन्ते । सर्वेषां
ज्लानोत्तरकालमसनत्त्वे देतुमाद-अनात्माश्रयादंममाध्यासदहानादिति।
अनात्मा आस्मविरोधिनी अविद्या, तदा्रयस्तदहुपादानो योऽद
ममकाराद्यध्यासतस्तस्य समस्यापि तच्वज्ञानेन दानात् तच्पयुक्त-
वगोधमरादिव्यवहारों नास्तीलैः ॥ २ ॥
द्वितीयश्छोकावतरणिकामाद--स्यादैतरदिव्यादिना । उमयगमिप्रेयाद--
ब्राह्मण हति । नि्र्यकस्यालनो जाद्यणत्वयागायुङ्कखकयादीनां वैरिश्छवोध-
नेन कृयाश्चिप्रज्ञानेच्छादीनां बोधनेन च स्ाल्नाणासम्रामराण्यमध्यलचोधने च शु-
क्विरचतवो धकवाक्यवदा हत्यै बा्रामाप्यमियर्थः; । निधर्मकत्वमभिप्रेयाद-अकः-
^, तस्मिन्नैव चित्तकतेर्निरीधः इति पाटः ।
कपु्तकं दो ऽदंफारल्तदा श्रयो मनकराराश्ध्वःत्स्व इति ।
४४ त्वंपदार्धनिर्णयः
अकतुरभोक्तश्चात्सनः घचत्त्यजुषपत्तेः, चेदाधाभाण्ये च कुतो ब्रह्म
सिद्धिर, तस्य तन्नाच्रगभ्यत्वात्, साखयोनित्वादिति न्याधात्।
तथा च वेदप्रामाण्यार्थं धनान्नादिव्यवहारस्य सलयत्वमभ्युपेयमि-
व्यारोङ्ू्य, कि तच्वज्नानात्पूर्वसप्रामाण्यमाप्यत्ते ऊध्वं चा । तत्राय
यावदविद्यानिच्रत्तिव्यवस्याया उपपादितल्वात्सर्वेषां परमाणानाम-
विव्यावद्विषयत्वेन तदरायां बाघधाभावान्निष्मतथृहं प्रामाण्यम् ।
द्वितीये च्विष्टापत्तिरेवेव्याह-
न वणौ न वर्णाश्रमाचारधर्मा
न मे धारणाध्यानयोगादयोऽपि ।
अनात्माश्चरयाहंममाध्यासहानात्
तदेकोऽवश्ि्ः शिवः केवरोऽदहम् ॥ २ ॥
कछोकार्थः । वणी ब्राह्मणश्चन्नियवैदयद्रद्राः। आश्रमा ब्रह्मचा-
रिश्रहस्थवानपरस्थभिक्षवः। आचाराः रोचसानादयः। धर्मा; व्र्मच-
यगुरुसेवादयः । अच्च इन्द्द्रयम्मषदिततपुरुषेण वणीनामाचाराः
धर्मांश्च आञ्माणामप्याचाराः धमरौख् लभ्यन्ते। धारणा ्रह्मणि'
वाद्यविषयत्यागेन मनसस्स्ै्यम् । ध्यानं परमात्मचिन्तनम् । योग
शित्तवृत्तिनिरोधः । आदिच्राब्देन आअवणमननादयो श्यन्ते । सर्वेषां
ज्लानोत्तरकालमसनत्त्वे देतुमाद-अनात्माश्रयादंममाध्यासदहानादिति।
अनात्मा आस्मविरोधिनी अविद्या, तदा्रयस्तदहुपादानो योऽद
ममकाराद्यध्यासतस्तस्य समस्यापि तच्वज्ञानेन दानात् तच्पयुक्त-
वगोधमरादिव्यवहारों नास्तीलैः ॥ २ ॥
द्वितीयश्छोकावतरणिकामाद--स्यादैतरदिव्यादिना । उमयगमिप्रेयाद--
ब्राह्मण हति । नि्र्यकस्यालनो जाद्यणत्वयागायुङ्कखकयादीनां वैरिश्छवोध-
नेन कृयाश्चिप्रज्ञानेच्छादीनां बोधनेन च स्ाल्नाणासम्रामराण्यमध्यलचोधने च शु-
क्विरचतवो धकवाक्यवदा हत्यै बा्रामाप्यमियर्थः; । निधर्मकत्वमभिप्रेयाद-अकः-
^, तस्मिन्नैव चित्तकतेर्निरीधः इति पाटः ।
कपु्तकं दो ऽदंफारल्तदा श्रयो मनकराराश्ध्वःत्स्व इति ।
२ त्वपदार्धनिर्णयः
विद्यमानतेच्यथः । तथा च सषु प्रकर श्युतिः-“अच्न पिताऽपिता
भवति माताऽमाता देवा जदेवा वेढा अवेदा; स्तेनोऽस्तेनो भवति श्रुण-
हाऽश्रुणहा चाण्डालोऽचाण्डालः पौल्कसोऽपौल्कसः; श्रमणोऽश्रम-
णस्तापसखोऽलापसतोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो दि तद्रा
सवोज्छोकान् हृदयस्य भवतिः (वर. आ. ४।६।२२ ) इत्याद्या अ-
भिमानाभावे सर्वानर्थनिनच्त्तिमल्तवदन्ति ।
तृतीयश्ोकावतारणिकामाह-- वर्णाश्च मादीति । पिदरौश्चया मातुरभ्य्दि-
तत्वादादावाद- न मातेति । तदर्धमाद- माता जनकर्लीति । पमाणवा-
व्यानीत्युपलश्चणं तद्पजीविनामर्धवादवाक्वादीनां तथा च चत्वारो वेदा शवर्धः |
अधवा, चतुर््वैव वेदेषु यानि प्रमाणवाक्यानि तानि चेन्न सन्ति तर्हिं का कथार्थ-
वादानामियाश्चयः । यज्ञा इति । एतेन तत्साध्वमपू्बादिकमपि व्यायाम् । चर्व
चाचकमंति । पापक्त्नौभावात् कुतः पापं तदभावाच्च कतो नरकादिकमितयनचन्यै-
चम् । एतेषासभावे देतुमाह-- सर्वेषामिति । आवार्योक्तमर्थमतिप्रामाणिकीकर्
ष 3 चेत्यादिना । अनन्वागतमिति । असम्ब-
द्मिद्ंः ।
नज, सवैव्यवहाराभावे रान्यतैव स्यात् । न, हव्याद--निरस्ता-
तिश्चन्यात्मकत्वादिति । निरत्तमतिद्न्यात्मकत्वं यस्मात्तत्तधा ।
भावप्रधानो निर्दराः । तस्य छुषुधिसाधकत्वात्पुनरुत्थानालुपपत्तेशच ।
अविनारी वा अरेऽयमात्माऽलुच्छित्तिधमी' (ब्र, ज, ४।५।१४ ),
“माच्रा संसर्गस्त्वस्य मचतिः, ध्यद्वैतन्न प्यति पदचयन्वैतन्न पडयतिः
(सैव ४।३।२३), “न हि व्र्टैेविपरिरोपो विद्यते, अदिनादित्वात् ,
न लु तद्धितीयमस्ति ततोन्यद्ि क्तं यत्पड्येत्' (सैव) इत्या दिश्युतिम्य-
खात्मचे्तन्यस्य न द्ुषुप्तौ दन्यतेल्यथः । निराक्कतमप्येतसपुनरपि
स्थूणानिखननन्धायेन निराक्रियते । यद्रा निरस्तमद्रानायाद्यतीतम-
द्रितीयमतिश्यन्यं यद्रह्मं तदात्मकत्वात् । तथा च श्चुतिः-'्यदा
पुरुषः खपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति, तद्यथा भिययां
सिया सम्परिष्वक्तो न वाच्यं किंश्चन वेव नान्तरम् एवमेवायं पुरुषः
प्राज्नात्मना सम्परिष्वक्तो न धाद्यं किशन वेद् नान्तरम् (छां.
१, कष पुत्तष्ठे सधंवादकतकडादीनाभिति ।
१, क्गयौरतिशत्यनिभर्मकं यदर्य इति ।
त्व॑पदार्धनिर्णवः ४३
६।८1१) इति । तेन जगत्कारणीभृतसर्धज्ञसर्षदाक्तिपरिपूणानन्द्-
बोधरूपेण श्रह्मणा सहेकत्वादसख सार्येव जी इति सिद्धम् ॥ ३॥
यस्मादिति । वैवन्यादियर्थः । इदवारण्यकशुतिमाद- अविनायी वा
इति । माचेति । सौवते इति मान्ाश्चवदत्तेनासम्बन्ध इयर्थः । यद्वै इति ।
चै, अव्ययम् । तत्तदा सुषुपरौ यन्न पदयतीयन्वय; । अतिशल्यात्मकत्वामावे अन्ध
कारः श्वातक्येण देतुमाद--लस्येद्यादिना । स्य, चैतन्यस्य । न खमिलयादिना
प्रथमश्छोके शान्यवादस्य निराङृतत्वात् पौनरक्तयमियराङ्गवाद-निराकरतमपी-
ति । उक्तपौनरुक्तयमिवा प्रकायन्तरेण च्वक्योति-द्रा इति । अतिहान्य-
मिति। कं व्रह्म खं घर्मं इति श्वल्या खशब्द्य जद्मवाचकत्यवदतिशुटयपदस्यापि
नह्ययाचकत्वनमियर्थः । अनेन यजीवस् जद्यभाव उक्तस्तत्र बरहदारण्यकशुत्िं भमाण-
वति--लथा च श्युतिरिति । सता इति । सच्छन्दवाच्येन त्ह्मणा दरथः ।
कोकश्चयोखात्ययमाद- तेन जगत्कारणी शतेति । हति दततीवः कोकः 1
यायाय न -----------~--~
१ करुन व्रहावाचकल्वादिति पाठः स न पमीचीनः।
हित्तीयो विभागः ।
तत्पदार्धनिर्णयः ।
एवं तावत् चिभिः ऋोकैः वादिविप्रतिपत्तिनिराकरणपूर्वकं त्व-
पदार्थो निघीरितः । सम्पति तत्पदाधस्तपैव निधारणीयं; । त्र
निराकरणीया वादिविप्रतिपत्तयः प्रददर्थन्ते । ननु, न ब्रह्मणा सह
जीवस्यैकयमषपष्यते ¦ तधा हि सच्छन्दकाच्यं जगत्कारणं ह्म “सदेव
सोम्य हदम् जासीदः ( छा. ३।२।१ ) इत्यादिवाक्येन अतिपादि-
ततम् । जगत्कारणं च घधानसचेतनयिति साह्वया; । पश्ुपतिरेव
जगत्कारणम्, ख च चेलनोऽपि जीवाद्धिन्नः स उपास्य एवेति म ~
पताः । मगवान्वास्देव ईश्वरो जगत्कारणम् , तस्पादुट्पव्यते सङ्कषे-
णाख्यो जीवः, तस्मान्मनः धचुश्चः, ततोऽदङ्कारोऽनिरुद्धः, तेन काय॑
त्वाल्लीवस्य तेन सदे न चदह्मणों चासुदैवस्याल्यन्लामेद इति पाश्च-
राचिकाः । चरिणामी नित्यः सर्वतो भिन्नाभिन्न इति जैनाचिदण्डि-
नश्च । नास्ति सर्वज्ञाद्युपेतं ब्रह्म, आच्नाचस्य क्रिंयापरत्वेन तन्न ता-
त्पयीभावात, किन्तु बार्धेन्वादिवत् सर्वज्ञत्वादियुणविरिष्टतया
जगक्कारणं परमाण्वादि बा जीवो चा उपास्य इति मीमांसकाः ।
अस्ति नियज्ञानादिमानीश्वर १ सर्वज्ञ; पएरथिव्यादिकार्यलिङ्गाचमितः,
स च जीवाद्भिन्न एवेति तार्किकाः । क्षणिकः सर्वज्ञ इति सौगताः ।
दाकमं विपाकाचायैरपरासरष्टो निचयज्ञानरूपः प्रधानांँरासत्वगुण-
प्रतिफलिततया सर्वज्ञः संसारिपुरुषविलश्चण एवेति पात्तञ्जलाः ।
अद्धि्तीयषरमानन्द एव च्म, तच्च जीवस्य वास्तवं ख्यं मायया
च सर्व॑न्नत्वादिविदिष्टं जगदुपादानं निभित्तं चेति ओौपनिषद्धाः ।
नलु, उक्तक्रमेण सिद्धे जीक्न्रद्मणोरेक्ये जीवस्यानतं सारिः च भं न साल्>
मिखादुत्तर्फोकेन इलाराह्याद-- एव तावदिति । न साह्छमियादिश्ोकमव-
तारचिहुं तननिरस्याराङ्ामाद-- नन्विति । अथ मदभिमतमेव च्वयोदाहृतं न तु
१, खगयोनिं घारथित्त्य शतिं ।
२, तयोरेव पेक्यमभ्वुषतयतं कत्रि ।
तत्पदार्धनिर्णयः ५५
मद्नमिनतं जीबनरह्षणोरनेक्यप्रतिपाद्कं वाव तत्राहू- जगत्कारणं च
प्रधानमिति । एतं च न चेतनाचेतनयोरैक्यगिति एुचिरं बिमाश्य संोष्टन्यमा-
ुष्मन्न मवदनमिमतगुक्तम , अनुक्तं वेति भावः । एवमैक्याभावे पाशचुपतमतमुदाह-
रति-पछ्ुपतिरेवेति । न हि कचित् धतमुपपयते घा उपास्योपासकयोरैक्येन
इपास्नेति भावः । रेक्याभावस्ताधकतवेन मतान्तरमाईमगवानि्यादिना ।
ननु, भवत्वेवं तथापि जीवश्रह्मणोरेक्याभावे किं साधकमव धाष्ट--तेन कार्म
स्वादिति । नित्य हति । परिणामी निलयस्य शद्धजीवेन सदायन्ताभेदाभावादस्ति-
स्मतेऽपि न जीववरक्षणोरलन्वाभेदपिदिरिति मावः ।-- नास्तीति । रं च केन
सहाभेदः, नं दि श्दाचिषाणेन सद कस्यविद्भेदं इति कच्िवतीति भावः । आदि
पदपाष्टमाह- अस्तीति । अत्यन्तभिन्न योरभेदै गज्गगनयोरप्वभेदः; स्यात् ,
उतो न जीचत्रह्मणोरेक्यनिति भावः । णिक हति । न दि श्गिकङ्टखयोरभे-
दतो न जीवत्रद्मणोरैक्वमिति मावः।-द्दचाकर्मेति। न हि वाकवसर्वश्त्ववाल-
बाज्ञयोरभेद् इति भावः ।-अद्भितीय इति । ननु, भवन्मते जीवत्रह्मणोरैव्यं
कथं सर्वशतकिच्विन्मात्रक्ञत्वादिरूपवेधरम्वादतवं आह--माययैति । वं च
सर्वज्ञत्वकिश्चिच्छत्वादीनां नायिकत्वेनावारतवत्वमिदयर्थः ।
एवं वादिविप्रतिपन्तिभिः सन्दिग्धे तत्पदार्थे जौपनिषदपश्चसय
परिदोषेण तन्निणेयायाह भगवान--
न साङखयं न दोवं न तत्पाचरात्न
न जैनं न मीमांसकादेर्मतं वा ।
विरिष्टानुभूदया विशुद्धात्मकलत्वात्
तदेकोऽवशिष्टः हिवः केवलोऽहम ॥ ९ ॥
आदिराब्देनाजुक्तानां सङ्गह: । न तावद चेतनं जगदुपादानम्,
(तदैश्चत बहु स्यां प्रजायेय ( छां. ६।३।६ ) इति ईृक्षणपूर्वकदि-
अरवणात्, "अनेन जीवेनात्मनानुप्रविदय नामरूपे व्याकरवाणिः
(छां. ६।३।२) इति जीवात्तल्वन्यषदेरात् , यस्मिन्विज्ञाते सर्वमिदं
विज्ञातं नवतिः ( सं, १।१।३ ) इति चैकविज्ञानेन सव॑विज्ञानपति-
ना ---
१, केपपुलके जीदत्रद्रणोरक्वप्रतिषादक्तनिति ।
२, गपुस्तकेऽु् चैति जाव इति ।
४६ तत्पदार्थनिर्णयः
ज्ञानात्, पधानन्नानेन च तदपक्रुतिक्ानां पुरुषाणां ज्ञातुमरक्य-
स्वात् , "देवदात्म्यमिदं सर्वं तत्खद्यं स आत्मा तत्वमसि ( छा.
६।८।७ ) इति च तदभेदस्य नवकरत्वोपदेदात्, (तस्माद्रा पएतस्मा-
दाह्मन आकाराः सम्भूतः ८ तै, २।१ ) इति श्चुलन्तरादचेतनस्य
जगत्करणत्थे विचिच्ररचनानुषपत्तेः. प्रधानमहद्ादेरघामाणिकत्वाच
न खाह्यमतं साधु । एवं पाश्चुपतं पाथराचिकं जैनं च मतं श्चुति-
युक्तिवाधितत्वादयुकत्ताम् । न च विधिरोषत्वाच्छ तिन ब्रह्म भ्रतिषाद-
पतीतति मीमांसकमतं युक्तमखिद्धत्वाद्विधिदोषत्वस्य । न चा्थ-
वादाधिकरणन्यायाद्धिधिद्ोषत्वम् , वैषम्यात् । खनःप्रयोजनवदथे-
प्रतियादकानां "वायु श्चेषि्ठा देवतः ( तै. सं. २।१।१।१ ) इच्येव-
समाधीनां खाध्यायदिधिद्रहगान्वधाश्पप्थाः प्रयोजनवदभषरत्ये
कल्पनीय चाग्द् मावनेतिकर्तव्यतांकसाक्ताक्षस्य विषे: सम्थदान-
तदैवतादिस्तुतिद्रारेण तर्द पूरकल्वान्नष्टाश्वद्ग्धरथन्यायेन तदु-
-ममैकवाच्यता हय्थकादाधिक्रणे निर्गीलन् । वेदान्तवाच्यजन्य-
ज्ञानत्व साश्तादेव परभानन्दपरासिर्निःदोषदुःखनिन्र्तिच्च पुस्वार्धो
छभ्यत इति निराकक्चत्वान्नान्यरोषत्वसस्मावना, प्रत्युत विधय
एवान्तःकरणच्चद्धिद्धारा तच्छेषतां मजन्त इति । तस्मात्मयोजन-
वदवाधिताज्ञातनज्ञापकत्वेन वेदान्तानां खतं एवं प्रामाप्यादस्ेव
ज्रद्येति न मीमांसकमतसिद्धिः । तार्दिकादीनां च मतं (तत्वमसि
( छां, ६।८1७ ), "अह् ब्रह्मासि' (वर. जा. १।४।१० ), (अयमात्मा
ज्रह्मः ८ सैच. २।५।१९ ), "सदयं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" ( नै, २।१ ) इत्यादि-
श्युतिवाधितम् , "एकमेव द्वि तीयं ब्रह्म" (छां. ६।२।१), नेह नानास्ति
किन (ब्र. आ. ४।४।१९ ) इव्यादिश्चुतिवाधित्तं च । भिन्नासिन्नत्वं
क्षणिकत्वं च 'आकादावत्सर्वगतश्च नित्यः" इत्या दिश्युतिबाधितम् ।
अचर च सर्वेषां मतस्यासभ्वे प्रतिज्ञाते बिराद्धात्नकलत्वादिति हेतुः |
निर्विकल्पकाद्वितीयचैतन्यरूपत्वादित्वथंः । अत्र हेतुः विशिष्टानुभू-
व्येति । विदि्ठा सविकल्पकानुभूतिभ्यो र ला या तत्त्वमस्यादि-
वाच्यजन्याश्वण्डानुभृतिस्तचैयर्थः । तेन सवंञ्यापकमद्वितीयं परः
मानन्दबोधरूपषं च व्रह्मेति सिद्धम् ॥ ४५॥
उक्तमतदूषणाय चतुर्थ-छोकमवतारयति--एषं वादीति । ऋमप्रा्तं साक्षतं
प्रथमतो दूषयति---न तावद् चेतनमिति । छान्दोग्यवाक्येन लमाधत्ते-तदैश्-
तत्पदार्थनिर्णवः ४७
तेति । पनछान्दोग्यवान्येन दृपणमाद--ञ्ननेनेति । जीचात्सनेविं सामाना-
धिकरण्याल्नीवात्मल्ाभादचेतनम्रधानव्युदास दति जाव; । 'कुसिन्नु भगवो विज्ञाते
सर्वमिदं विज्ञातं भवति" इत्यादिना यदेकनिक्ानेन सर्वचिज्ञानसक्तं म॒ण्डके तद्विरुद्धं भबति
प्रवानोपादानकत्व दइ्यादह--यस्मिन्निव्यादिना | विरोध भक्टयति-प्रधानेति।
छान्दौग्यवाक्यमाह--पेतद्वात्स्यमिति । वैचिर्दयकवाक्वयुदादरति- तस्माद्रा
इति । युक्तिमाद-अचेननेच्येति । साद्धमतदूषणसुपतंदरति-- प्रधानेति ।
अप्रामाणिकत्वादिति । पमाणे; वेदः, तदबोधितततवादिदयर्थः । मतत्रय.
मेकदूषणेन दृषयितुमाद- एवमिति । श्रुतिरत्र “वक्वमसि,' “अद्ं॑बरह्मास्मि,
` श्द्दयाहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धेः ग्रजुच्यतेः, "नेष नानाऽन्ति फिश्चनः "गलो; स
मृत्युमाप्नोति च इह॒ नानेव पयति" ्यादिका । युक्तिश्च, ाचवाद्भिन्रनिपिननो-
पादानक्त्ववत् चैतन्येक्ये सिद्धे तस्य चौ पाधिकभेदेनैव व्यचस्धोपपत्तौ बातत
द्कस्पनमयुक्त, कूरख्यचैतन्यस्य मायां विना जगच्कारणत्वानुषपत्तिः, तदल्ीव-
व्यापि कतुंत्वादैः सदयत्वे ऽनिर्मो्षपरसङ्क इ्याविकय । भिन्नाभिन्न इति पक्षे च वि"
द्धयोर्भदतदभावयोरेकत्रासत्वादैतदन्ययोर्भवानेदयोरङ्खीकारे परिभाषामात्रत्वावेयतु-
सन्धेचम् । नीमांसंकमतमनूद्य दूवयति-न च वि धीव्वादिनां । वर्हि अर्धवा-
दाधिक्रणविरोध ददाच्चङ्य॒ परिष्टरतति-न चेत्यादिना ! "जान्नायच् ज्जियार्थ-
त्वादानर्थक्यमतदथौनां तस्छादनियभित्युच्यते' इत्र काय॑परवात््यानां सपरयोजना-
नामेन प्रामाण्यं, तदितरेषां निष्पयोननानामर्थवाद्रादीनामप्रामाण्यमिवयाशङ्खय गुण-
वादस्त्ियाद्धिना विधि्लावकतया श्र्ोजनसाकाङ्काणामर्धवावादीनां भरामाण्यमिय-
धवादाधिकरणे तिद्ध, अत्तद्िरोध इयर्थः । तत्न प्रयोजेनचिरदिणामप्रामाण्यप्रतिषा-
द्नेऽपि नात्र तथा, परमपुरपार्थप्राप्रिसाधनत्वादारमज्ञानस्तैवेवया- चैषम्यादि-
त्यादिना । न केवटमन्यदोषता किन्तु वैपरीयमपीयाद-- प्रत्युतेति । तारि
कादीनां चेति । जदिपवादर्वमचुक्तमपि नैरोचधिकमतम्, चक्तं व पातञ्नलठम
प्राह्मम् । पातच्नलमतस्यापि एता उक्ताः श्तयो बाधिकास्तन्मतै लौ वेश्वरजगतां सच-
त्वादिति । 'लतत्वस सि? इति छन्दोग्यम् । 'अहं ब्रह्मास्मि इति वृददरण्यकश्ं |
"अयमात्मा ह्यः इति च । "सत्यं ज्ञानं" इति तैत्तिरीयकरम् । जंनच्निदण्डिनो
मतं दुषयति--एकमिति। ददं वाकं छान्दोग्यस्यम् । भेह नाना इति इददार-
ण्यकस्थं मनसैवालुदरष्टव्यमिल्यादि । सौगतमतमपाकरोति--क्षणिकलत्वं चेति ।
आदिपदात्त “नित्यं यिज्ञानमानन्धं ब्रह्म इत्यादिकं प्राह्मम् । ज्ञानस्य क्षणिकत्वकल्प-
नेऽनन्तकोटिज्ञानतदहंसादिकल्पनमपि बाधकम् । शुतिप्रामाण्यं चापौरुपेयत्वेने दोष
१, गयो ग्मजागस्येव इति पाः प ज युक्तः ।
4. तत्यदीर्धनिंर्णयः
चरपुपापरणी तत्वादाक्तिकनान्तिकसाधारणतया साधित्तमित्यचधेयम् । विरिष्टशब्दच्य
व्याबच्यर्थकत्वामिप्रायेणा्थं माह-- विदि देति । ( इति ) चतुर्थः शोकः ।
ननु (स य एषोऽणिमा' ( जँ. ६।८।१५ ), 'अणोरणीधान' ( तै.
भा. १०।१२।१, कट, १।२।२०, श्वेता. ३।२० ) इति ब्रह्मणोऽणुत्व-
शते, "अङ्गषटमाच्नः पुरुषः! (कठ. २।४।१२), 'आरान्रमाच्नो च्यवरोपि
ट्टः" ( शता. ५।८ ) इव्यादिश्चुतिपलिपादिताघ्युजीवाभिन्नत्वाचच न
ब्रह्मणः सर्मटयापकत्वमित्याकाङ्य 'वहमैवेदभद्रतं पुरस्तात् जह्य
पथात् ब्रह्म दश्चिणलश्चोच्तरेण । अधश्चोध्वं च भतं ब्रह्मैवेदं विश्व-
मिदं वरिष्ठम्" (खुं. २।२।११ ), "तदेतद्रद्यापूर्वमनपरमनन्तरमवाश्यम्ः
(वब, जा. २५।११) इद्याद्याः श्रुतयो निर्विंदोवमेव ब्रह्म प्रतिपादय-
न्तीति पूर्वोक्तमेव दहयन्नाह--
न चोर्ध्वं न चाधो न चान्तनं बाह्यं
न सध्यं न तिङ् न पूवापरा दिर ।
वियद्यापकल्वादखण्डेकरूप-
स्तदेकोऽवरिषएठः शिवः केवङोऽहम् ॥ ५ ॥
शछ्रोकाधैः । वियद्यापकत्यात् वियद्वघ्यापकत्वात् 'आकारावत्सवै-
गतश्च निलः इति तेः, वियतो =यापकत्यादिति वा "ज्यायानाका-
चात्! ( रात. त्रा. १०।६।३।९), 'बहलो महीयान' ( कठ. २।२० ) इ.
व्यादिश्चुतेः। जीवस्यापि सकलदैदहच्यापिचेलन्योपखच्ध्या महक्चेऽपि,
उपाधिघमौध्यासेनाराग्रमाच्रस्वाभिधानात्, चुद्धेशेणेनार्मयुणेन
चैव दयाराश्रमाच्नोः खचरोऽपि दष्टः" (श्वेता, ५।८) इति श्ुतेन्ैह्मणश्च
सृष्ष्मत्वाभिग्रायेणाणुत्वन्यपदेचात् । दोषमतिरोहितार्थम् ॥ ५ ॥
पश्चमकोकमवतारयति- नन्वित्यादिना । सख (य) एच इति इदारण्य-
कल्चम् ( ? छान्योभ्बश्यम् ), अणोरणीयान् इति लु शरेताशत्रदरतीयाध्यायच्यम् ।
कररबहीप्रथमाध्यायस्य च ब्रह्मणो ऽप्ुलपतिपादिकां शरुतिमुदाष्टस्य जीवाणुखप्रतिपा-
दिको शरुतिमाद--अङ्कष्टमान्न इति । इदं च वाक्य॑॑चेताशवतरस्यं॑कटव-
हस्व च । बियद्यापकल्वादिति । ञ्याकरोति-- वियद् (वद्) व्वापक्लात्
दन क््ः ` ` १, कपुर जीवस्येति ।
तत्पदार्थनिर्णयः । ४९
इति । आराग्ममाच्च इति च ॒शेताश्रतरपश्चमाध्वायखम् । इदमेव साधयति--
आकाशाबदिति । न चाकादादष्ठान्तेनात्मनः सर्वगतत्वादिलाधने आकाशस्यापि
निदात्वमापतितं तथा च द्ैतापक्तिरित्ि चाच्यं, थाबत्कादस्ाविष्वरूपनियत्वेऽपि
क्राहनादोत्तम त्स्य नादौन तैतापत्तेः । न चं ब्रह्मणोऽपि नाशः स्वादिति वाच्यं
(अविनाशी वा अरेऽ्यमात्मा इचयादिष्चुतिविरोधात् । एकस्य वाक्वस्मोभवपर्त्वै
वाक्यभेदापत्तेः । स्तुतस्तु नेदं बाक्यमाकाडनिय(त्व) भरतिषादकवकपरमपि' तु तद-
पत्तिः । सा दवैतश्चतिः, आकादोत्पत्निविरोधक्चतिजन्यस्य भावस्य विनाशप्रतिषा-
दकतकंसहकृतं “ज्वायानाकारात्' इलादिश्चुया, पराहता इति विक । वत्यदा-
ध्याहारापरितोषगाशङ्गवाह-- वियतो च्यापकत्वादिति वेति । इदद।रण्यकवा-
क्यमाद-ज्यायानिति । धैताश्चतरकव्वद्टीखमाह--महत हति । मध्यमपरि-
णामत्वै विनाचित्वापत्तिरतः "अङ्कघ्रमा्नः शुतिमरुपे्य -आरात्रमात्र' शरुतितकंबि-
सचैनोपचारितया व्याकरोति--जीवस्यापीति । उपचारे बीजमाद--चुद्धेथ-
णोनेति । बदमणोऽग्यत्वपरतिपादकायाश्च +य एषोऽणिमाः इयादिश्ुतैरविरोधमाद--
ब्रह्मण्ति । इति पमः गोकः ।
नर्न, ब्रह्मणो जगदुपादानस्वादुपादानोपादेययोच्चानेदादिचि-
जगदभिन्नत्वेन ब्रह्मणः दुःरूपत्वात् न तदभिन्नत्वेन जीवस्य
परमपुरुषार्थपािरिव्याराङ्खय ब्रह्मणः खपकाद्ापरमानन्दषूपत्वान्नि-
खिरुजगद्धमाधिष्ठानत्वेन कारणत्वन्यपदेशादध्यस्तेन च समं सम्ब-
ल्धाभावा्न तच्ान्लेदोप्यस्तीयाह-
न शङ्कं न कृष्णं न रक्तं न पीततं
न कुन्जं न पीनं न इखं न दीर्घम् ।
अरूपं तथा ञ्योतिराकारकतात्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवरोऽहम् ॥ ६ ॥
१, गपु निद्यत्वै चत्त्वेऽपीति ।
३, करृखपुस्लकयोः अतिषादकमिति ।
३. क पुखके निव्यत्वप्रतिपादकमपि वु तदी या भाष्टागोत्यत्तिव धच्धुतिः जन्यमाषश्य जनक
च विनाशप्रतिपादकतकसचछत शत्यायानाकातादिदादिशरुश्या परता इति दिद इति पाठःसरन
प्रस्यगर्थबोधकः । शपुचकं विनाश प्रतिपातं दकृत् इष्येतम्नासो न वर्तते ।
४, खगयोर्मनु श्यादैतदद्यणो लगहुपाद्ानत्वादितिं 1
५५, गपु्तके ध्य स्तेन च चह सम्वन्धानवादिति ।
% सिंर न्निंर
५ स्वपदार्धनिर्णयः
कुकमणु । पीनं मदत् । तैनाणु महत् हस्यं दीघं चेति चतु-
विधपरिमाणनिषेधात् 0 । रृण्यत दति रूपं प्रमेधम् ।
न प्रमेय अरूपम् । वैन सर्वेषामेव व ना तत्त-
व नां निषेधः । तधा च श्ुतयः--"भस्वुलमनण्वहस्वम-
कृव॑मरोहितम् ( च, आ. ३।८।८ ) इत्यादा; 'जचाब्दमरपद्ामरू-
पमन्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्र यत्' ( कठ, १।३।१५ ) हत्या-
द्याञ्च सर्वानर्थश्यन्यं परमात्मखरूपं प्रतिपादयन्ति । ओतस्याप्य-
धस्य न्यायेन निणेयाय हेतुमाह-ज्योतिराकारकत्वादिति । खघका-
राज्ञानरूपत्वेनाप्रमेयत्वात् , प्रमेयत्वे घटादिवल्रडत्वापत्तेः, “पतदर-
प्रमेयं धुवम् ( ब्र. जा, ४।४।२० ) इव्यादिश्चुतेेदय्धः ॥ ६ ॥
पठ कमोकमवतारयति -नन्विच्यादिना । द्रव्यत्वं निषिभ्य प्रमेयत्वं निषेधति
-ख्च्यते इति रूपमिति । अस्थुलमिति इहदारण्यकशयं, अक्राब्मिति
कठबहीस्यम् । श्रौतेऽर्थे देतुर्निरर्थक्सव्राद--श्रौतस्यैति । वर्कमाद- प्रमेयत्व
इति । न केवठमर्थपिद्धः किन्तु भौतोऽपीयाह--पएतद्पसेयमिति । इदं च
वाक्यं इद्दारण्यकखम् । इति षष्ठः रोकः ।
१, कुत्तकै इर्यप्रतिषेष इति ।
२, कृपुद्धकते ोकमुदाहरती्चशचद्धः पाठः ।
तेतीयो विभागः ।
तच्वमसिवाक्यार्थनिणयः ।
नलु, कस्य व्रह्म माव उपदिदयते, ब्रह्मणोऽब्रह्मणों बा । नान्यः,
तस्य जडत्वादसत्वा्, न पथमः उपदेचानर्थक्यात्, ब्रह्मभावस्य
खतःसिद्धत्वात् । जीवस्य खतो ब्रह्म भावेऽप्यविद्या्यवधानं ज्ञानेन
निवत्यत हति चेत्, न, अविश्यानिचत्तेरात्मभिन्त्वे तरैतापत्र््ह्य-
णोऽसिद्धिपरसङ्गात् । तदन्तं वार्तिके--( वृ. आ. भा. वा. २।४।१४ )
'अव्याचरत्ताननुगतं वा ब्रह्मेति मण्यते |
ब्रह्मार्थो दुं मोऽ स्याह्वितीये सति वस्तुनि ॥' इति ॥
अभिन्नत्वे चोपदेलानथक्यमित्युक्तम् । अच्र किं परमार्थतः
फलामाचमभिपैषि किंवा प्रतीतितोऽपि । तच्राश्चमिष्टापस्या परि-
हरति-
न शास्ता न चान्नं न रिष्यो न रिक्षा
नचत्वंन चाहं न चायं प्रपञ्चः।
खरूपाववोधो विकदपासदहिष्ण-
स्तदेकोऽवश्लिष्टः रिवः केषवरोःऽहम् ॥ ७ ॥
चास्ता उपदेदाकला गुरुः । चाच्तरमुपदेराकरणम् । दिष्य उपदै-
च्ाकम । दिक्षा उपदेदाक्रिया । स्वं श्रोता । अहं वक्ता । अयं सर्य
प्रमाणसन्निधापितः प्रपञ्चो, देदैद्दियादिरिनधैः, परमार्थतो नास्ती-
व्यैः । द्वितीयं निराकरोति-खरूपेति । अयमर्धः-यच्यप्यविव्यानि-
ब्तिरात्मानात्मा वेति विकल्पने किमपि फलं निरूपयितुं न शाक्यते
तथापि खरूपाववोधो विन्ञानफलमनुभरयतेः । न चैतत्कथमिति वि-
कह्पनीयं सर्वद्रैलोपमर्देन विकल्पासहिष्णुत्वात् । न हि द टेऽनुपपन्न
नाम । तथा च श्रुतिः (? गौ. का. २।३ब्)
१, खगयोरीद्ाधादसत्वाषतेरिति ॥
२. कपुद्लक्त शनफलमननुभूयत इति पारः ।
५९ तच्वभसिवाच््यार्धनिर्णयः
(त निरोधो न चोरयति बद्धौ न च साधकः ।
न सुखुश्युने वै मुक्तः इत्येषा परमाथताः ॥
रह्म चा इदमग्र आसीत्, तदातंमानमेवावेदाष व्रह्मास्मीति,
तश्यात्तत्सर्वम भवत्! (वर, आ. १ २1५) इत्याचया पूर्वमपि ब्रह्मखश्ूपस्मैव
सतो जीवस्य ज्नानाट्रह्मभावं दरयति सवं च द्वैतं वारयति ॥ ५ ॥
सप्रमश्छोकात्रत्तरगिकावां शङ्कते-- नलः कस्येति । ननु 'तत्तमसि' आदििवा-
क्यानां न जीवश्च बद्मभावोपदेदानातनं कलम् , अपि तु अक्ञाननिवृनिगित्याशङ्कते--
जीचस्थेत्यादिना । बरह्मणः कथमसिदधप्रसन्गस्तव्ाद--तदु क्तमिति । उक्ताः
प्ैपास्कन्द्कत्येन ऋोकमवतारयति--अच्च किमिति । न चायमितिपद्स्य पदा-
धमाह-- सर्ब॑घ्रमाणेति । “किंवा प्रतीतितोऽषि "इनेन य एक्तः पश्चस्तं दुषयति--
द्वितीयं निराकरोतीति । इतति सप्तमः रोकः ।
नन्वात्मनः खप्रकादारूषत्वे सवदा समाने जाग्रत्लभ्रखषृक््यादिः
व्यवस्था कथम् । न च शरान्दैव जपवस्थेति वाच्यम् , तथा सति सर्वै-
स्यैव स्व्रत्वापत्तेरिति चेत्, न, रश्चषणतखयाणामपि खभ्रत्वेऽपि
प्रतिभासतोऽविचात्मकविदोषसम्भवादसद्विलश्चणत्वेन तु सविहो-
चत्वाद्रवस्थोपपत्तेः । परमाथतस्तुं न कापि व्यवस्धेव्याद--
न जानन मे खध्रको वा सुषुपि-
न विश्यो न वा तैजसः पाज्ञको वा ।
अविच्ासमकलाञ्चयाणां तुरीयः
स्तदेकोऽवशिष्टः क्षिवः केवखोऽहम् ॥ ८ ॥
अषटटमच्टोकमवतार चित्तं भूमिमारचयत्रि-नन्वाह्मन इति । इष्टापत्या परि-
हरति-न, लक्षणत इति । लश्चणं, आविक । प्रति भासतः, वनतः ।
खप्रवदसत्े कथं विदश्वणत्व" तत्राद-असद्विलश्चणत्वेन स्विति । तर्द कं
सविरोषत्वं पारमार्थिकं वत्राद-- परमार्थतस्त्विति ।
„ गयु्तके उयदैज्तगा्नं प्रयोजनमिति ।
° कपृपृक्तके भतिद्धिसङ्ग इति पाडः स दशतो इव दृयते ।
= तस्ते भूमिभूमिमाचरति इति पटः स दस्तदोप एत्र ।
° पसितैव कथं विलक्षणमिति पाठः स ने. युद्धः ।
ष प्यं „48 =
तर्वमसिवाक्यार्धनि्णयः ५३
भचर ख्यक्रमेण पौर्वापयैनिर्देदाः । तथा हि-अस्मन्मते पदार्था
द्विविधः, टका दरयश्च, अन्ववादिपरिकल्पितानां पदाथीनामनरैवा-
न्तभावात् । तत्र दक्पदा्थं आत्मा पारमार्थिक एकः सर्वदरैक-
रूपोऽप्यौपाधिकमेदेन चिविधः, ईश्वरो जीवः साक्षी चेति । तन्न
कारणीभलाक्ञानो पाधिशीश्वरः, अन्तःकरणतत्संस्कारावच्छिन्नान्नानो-
पितो जीवः । प्रपञ्चितं चैतदधस्तात्। अविध्ापतिविम्बश्वरपशचे
विञ्वचैतन्थं, विम्बेश्वरपदमे च चिर्वपतिविम्बसुखानुगतसु्वसवरूप-
वल्लीवेश्वरानुगतं सवौनुसन्धात् चैनन्यं, साक्षीत्युच्यते । वार्तिंक-
कारमते त्वीश्वर एव साश्चीति ईैविध्यमैव जीवैश्वरमदैन इृन्राः।
लच्रेश्वरोऽपि चिविधः । स्वोपाधिभलाविश्यागुणन्नरयभेदेन विच्णु-
ब्रह्मरुद्र मेदात् । कारणीभरलसत्वगुणावच्छिन्नो विष्णु; पाटयिता ।
कारणीभलरजडउपहितो च्रह्या खटा । दिरण्यग भ॑स्तु महाभूतकारण-
त्वा भावान्न व्रह्मा तथापि स्थूलभतसटत्वात्कचिद्रदयत्युच्यते । कार-
णीभूततमडपदहितो रुद्रः संहतौ । एवं चैकस्यैव चतुखजचतुखंखपश्च-
सुखाद्याः पुमाकाराः सरी भारती नवान्याश्चाश्च हयाकाराः । अन्ये च
मस्स्य्घर्मादयोऽनन्तावलाराः हील्यैवावि्मवन्ति भक्तानुयहाधै-
मि्यचधेयम् ,
'चिन्मयस्याद्वितीयश्य निषकलस्यादारीरिणः | ।
उपासकानां कार्यार्थं ब्रद्येणो रूपकल्पनां ॥` इति श्यतेः ॥
जीवोऽपि चरिबिधः, खोपाध्यवान्तर मेदेन विभ्वतैजसप्ान्न भेदात् ।
तचावियान्तःकरणस्थुलरारीरावच्छिन्नो जाग्रदवस्थामिमानी विश्वः।
स एव स्थृलद्ारीराभिमानरदिन उषाधिद्भयोपदहितः खभ्राभिमानी
तैजसः । शारीरान्तःकरणोपाधिद्रयरहिनोऽन्तःकरणसंस्कारावच्छिन्ना-
विच्यामाच्नोपहितः सुषुस्यभिमानी पराज्चः । पतेषां च खलतच्रोपाधि-
भेदाभावेन खतच्र मेदा नावेऽप्यवान्तरो काधि मेदादेकत्वेऽप्यवान्तर्-
मेदो व्यवहियते । साश्वी तु सर्वालुसन्धाता सवांलुगतस्तुरीयाख्य
एकविध एब । तच्रोपाधि भेदेनापि न कछषचिद्धदस्तदु पाधेरेकरूपत्वात् ।
अविधयातद्भयाध्यतत्कार्यौमकः प्रपश्ो दद्य पद्धाथं; । चस्य चापारमा-
वजया
त ।
१, गपु्लके एषः सवगतः सर्वदैकहप इति ।
२, खगत्योरयं छोको न दृयते ।
५४ तच्वमसिवाक्यार्धनिणयः
्थिकस्वेऽपि त त् न स्ाभिकपदार्थवन्निरूपणं
व्यम् , उपासनादाबुप । सोऽपि च्रिविधः, अध्याकरता-
मूर्तमूतं मेदातं । तत्र साभासाविव्या मूतामूतेम पश्चवीजराक्तिरूपा
तदजन्यत्येऽपि तन्निवत्तौ निवर्तमानस्वैन लद््याप्यैस्ैनन्यतत्सम्ब-
न्धजीवेश्वरबिमागचिदाभासैः सदहानादित्वादव्याक्रतमित्युच्यते ।
सा च खयं जडाऽप्यजडेन चिदाभासेनोज्वलितपूुशपृ्वसंस्कारजीव-
कर्मपयुक्ता सती चाञ्दस्पदोरूपरखगन्धात्मकान्याकादावायुतेजोजल-
एथिव्याख्यानि पञ्चमहाभूतानि जनयति । तच्च पूर्वपूर्वभूतमावाप-
चाया अविद्याया उत्तरोत्तरं प्रति करणत्वा परषपवैन्रतयणानाख-
त्रोत्तरभृतेष्वनुपवेदाः । एवमविव्यात एवान्धकारोऽपि माबरूप
एवावरणात्मा चाश्चुषन्ञानबिरोधी आालोकनाच्यश्च श्नटिति महा-
विद्युदादिवदाविभवति तिरोजवति चेति सिद्धान्तः । संसारदैतु-
देहो पादानत्वाभावाच न श्चुतिषु खष्िपक्रियायामान्नायत इत्यवि-
रोधः । दिक्रालौ त्वप्रामाणिकत्वान्नोक्तौ, आआक्राचास्यैव दिर्न्यव-
हारजनकत्वव्यवश्यासम्मवात् "दि; आओन्नम्' (श्र. जा. ३।२।१३ )
इति श्युतेश । कालस्त्वविधैव तस्या षव खवाधारत्वादिति । अयं
चाव्याक्रुतपदाधं ईन्वरोपाधिः।
सङ्गात. यैशोपिकादिवत्दा्थं निकूपयति-लधा हीति । उक् चैतनो ज्ञाना-
त्मकः; रश्य्तदिंतरत्वाव्वहः । ननु, वैरौषिकाः अभावसप्रकाः पदार्था; सपति
वदन्ति, शक्षपावावा्यास्तु षोदश, तथा च कथं पदुर्द्धैविष्याङ्कीकारे नि्तारस्त-
बराद--अन्यवादीति । दानीं दपदाथ विभजते-तच्र कपा आत्मां
पारमार्थिक एक इत्यादिना । पारमार्थिकल्वं, काठन्नयाचाध्यल्वम् । पकः पार
मार्थिकशचेत्तदिं कथं जीवेश्चरादिव्यवष्या तत्राद--सवदैकशरूपोऽपीति । अत्रा
"वथा स्वथंज्योतिशत्मा विवस्ानपो भिन्ना चहुपैकोतगच्छव् । उपाधिना क्रियते
भेदरूपो देथ; केत्रेष्ठेबमजो ऽवमादमाः इति श्वतिः प्रमाणप । याज्वह्क्यस्ृतिरपि
( प्रायश्चित्ताध्यायः १४४ )--
'जकारामेकं द्वि यथा घटादिषु प्रथम्मवेत् ।
तथात्मैको ऽप्यनैकश्च जकधायस्विवांश्ुमान् ।॥ इति ॥
१, कशपुके अव्याज्तमूतामूरतमेदादिति ^ ` ~ ~=
२. तस्िनैव तनन्यःवेऽपीति प्राठः सघ ह क्न्थनारधंबोचंकः ।
३. सनुत्यो त्तरोत्तरं कारय पतिं कारणक्दिति ।
तत्वमसिवाक्यार्ध॑निर्णयः ५५
ठवगच्ार्थे अन्या पि श्रुतयः स्मृतयश्च उषाः । कमप्राप्रमीश्वरं कक्षयति--कार-
णीशधूता्ञानो पाधिरिति। कारणीभूतं यदज्ञानं तदेवोपापिरयन्न सः। तथा जीबेर-
छक्षणं विधाय साध्चिरक्षणं विधत्ते--अविद्येति } स्ेपघ्चारी रकमत ह्यर्थः ।
यिम्बचैतन्यमिति । साक्षीयनेनान्वयः । विवरणकारेकलीववादिनौ मतमनु-
गतीकचाद--विम्देश्वरपश्चै चेति । ई खरपदायं तिभजते- लच्रभ्वरोऽपीति।
ठर विवृणोति-कारणीभूल इत्यादिना । ननु; दिरण्वगर्माऽव तह्न तद्ति-
रिक्तो वा तत्राद--हिरण्यग भस्त्विति । महाभूतेति । सुक्ष्नमद्याभूतेयर्थः ।
एकस्मैवेति । ईरस्येति शोषः । ई्रस्य पुमाकागमूर्तीरक्तवा ख्याकारमूर्तीराद--
आ्रीभारत्तीमवान्याद्याश्चति । सर्वशाक्तिमदवतायलुक्त्वा ( ? अस्पशक्तिमत्)
अवतायनाद- मस्स्येति | ईश्रतैविध्यनपपाय जीवत विध्वमपपादयति-- जीयो
ऽपीति । उक्ततरिविधं जीवं विभजते-नन्रेति । एतेषां मभ्य इयर्थः । वि्वश्न-
छणमाद--जाग्रदवस्थाभिमानी (जीव) इ ति। भविव्यान्तःकरणस्थुलदा-
रीरावच्छिन्न इति खरूपकथनं न तु ठश्चणभनिष्टम् । णवं खघ्नावस्थाभि-
मानी तैजसो (जीव) इति लक्षणं, रोषं तु सखरूपकथनपरम् । उपाधिदयोप-
हितः भविचान्तःकरणोपदिवः । प्रा्ञरश्चणमादई--सुषु्यभिमानीति । सेषं
स्वरूपकथनार्थम् । तर्हिं किं जीवेश्वयः श्चतन्ना नं इयाह--पतेषां चेति । नतु
उीवेग्धरवत् साक्षी किच्कारत्तव्राह--साकश्षी स्विति । रक्पदार्थं निरूप्य रशवं
निरूपयति--अविद्यातह्वाप्येति । नज त्वन्मते आवि्यकपदार्थस्य खाग्निकपदा-
तुल्यत्वात् खाप्रपदार्थनिरूपणचदाविश्यकनिपणं विफलमत आद्--लस्य चेति ।
निलपणप्रयोजनमाह--उपाद्नादाविति । सोऽपि दश्वपदार्थोऽपि । व्रयाणां
मध्ये ऽन्याङतपदार्वमाद- लच्रैति । स्ाभासाऽनिधयाऽन्याक्तमु च्यते इलन्वयः ।
वद्चाप्यं, अविदान्याप्यम् । तच्च मन्थकार एव वक्षयति--तद्न्याप्यैञ्ैतन्येव्या-
दिना । स॒श्षमात्त्ाप्वन्ै हवुमाद--तद्वजन्यत्वेऽपील्यादिना । सा चति ।
अचियेलर्धः । प्रपन्चवी जदाक्तिरूपत्वं यदव्याहृतस्योक्तं तविदानीं प्रक्डयति--छाब्द-
द्यादिना। ठं चौपनिषद्मते शदादयात्नक एव सहमाकादादिनं ठ सावत्
दाब्दादिगुणवबदाकादादैरुत्प्तिंरिति । नन्वेवमपि श्व्दाकादयोल्तादात्म्याद्भवतु शब्द्-
गुण आकारः, एवं स्पर्शगुणो वायुम ठु एब्दगुणा प्रथिवी वत्राष्--लनच्र प्व
ूर्वेति । एवं च कारणगुणक्रमेण प्रिन्वां शच्दरुणतिदिः । एवं बाय्वादावपील्य-
१, कनखयो लक्षणम हिष्वेतताचन्तान्नम् ।
२. गपुस्तके तर्द किं ईयरवश्रिविधो नीवः खतच्रौ न दति प्राः ।
३, कष्खप्ु्तकयोः शन्ददिगणाद्ाकाचादेकतपत्तिरिति ।
५६ त््रमसिघाक्यार्धनिर्णयः
वचेयभ् । एवमप्यौपनिषतमते प्रसक्गादन्धकारोऽपि भावरूप एव इति प्रतिपादयति--
पवमविव्यात इति । तर्हि गगनादिबिद्न्धकारः किमिति सष्ठिपकरणे नोक्तस्त-
व्ाह-संसारेति । दिकाठौ क्रिमिति नोक्त तत्राद--दिक्घालाविति । आकारा
एव दिगिति भावः । कालस््वविदैवेति । वस्तुतस्तु अविदयाचच्छिन्नं चैतन्य-
मीश्वरः स एव काटः, पुराणादौ तथा दरौनारिति ।
तानि च सृक््माण्यपज्ीक्रतानि पश्चमदहा भूतान्यमूर्ताख्यानि कार-
तौक्यात्खत्त्वरजस्तमोखणात्मकानि सत्वांदाप्राधान्येन ज्ञानक्रिया-
चात्तयात्मकमेकं खच्छद्रव्यं चिच्ररूपमिव मिटि्ला जनयन्ति । तस्य
च ज्ञानच्ाक्रिपधानांशोऽन्तःकरणम्। तच वुद्धिमैन इति द्विधोच्यते ।
क्रियादाक्तिभधानांचा; प्राणः । ख च पञधा, प्राणोऽफानो व्यान
उढानः समान इति । एवमेकैक भूतेभ्यो ज्ञानक्ियादाक्तिभेदात्
पत्येकमिन्दरियद्नयं जायते ` । आकाद्राच्छ्रोच्रवाचौ, वाथोस्त्वक्पाणी,
तेजसश्वक्षुःपादौ, अद्भयो रसनपायु , एथिच्या ब्राणोपस्यौ चेति ।
अत्र तेजोमयी वाक' ( छां. ३।५।४ ) हति श्रुतेस्तैजसी वाक, पादस्त्
नाभस इति केचित् । ० श्रोच्रवद्राचो नाज-
सत्वम्, पाद्चिकित्सया च चक्रुषः (दौनाचष्चुवेह्पादस्य
तैजसत्वमिति तु युक्त खत्पदयामः । तेजोमयत्वश्यतिस्त॒ सनसः
पश्चभूतका्यस्यापिः अन्नमयत्दशुतिरिव तदुपकार्थतया ध्याख्येया ।
मनसश्च पञ्च भूतगुणमग्राहकत्वेन तद्रत्वनिश्चयात्पश्चभूतात्मकत्यमि-
व्यन्यदेततं । एतेषामधिष्टातारो देवा अपि ज्ञानक्रियाराक्तिथधानाः,
दिगम्री, वातेन्द्रौ, आदिद्यविष्णु, वरुणयिच्नौ, अशथिप्रजापती । तत्र
ज्ञानचाक्तिसमष्िरन्तःकरणं, क्रियाराक्तिखमष्िः प्राणः । राच्द-
स्पदरूपरसगन्धग्राहकाणि आओच्त्वक्चक्चुरसनघाणाख्यानि पश्च-
ज्ञानेन्द्रियाणि । त्वक््वक्षुषी खय्राद्यखणाञ्रयद्रव्यमपि गृह्णीतः ।
ओच्रमपि चक्षुवेत् गत्वा चान्द ग्राहकम् दरे न्ड हति प्रत्ययात् ।
वचनादानगतिविसगौनन्दजनकानि वाक्पाणि पाद पायूपस्थाख्यानि
पश्चकर्मन्द्ियाणि । एतच सर्वं मिदित्वा सप्तदराकं चिद्धं ज्ञानचाक्ति-
१, कपुस्लके इन्छियद्रयं दवं जायत इति ।
ने, तस्िप्निव मनसः एवमष्टाभूततत्ताकार्म छ एति प्राः च न घम्यार्वबोधक्धः ।
दे" त किनेव पदभूतमाहकःवेन तद्वन्वनिश्चयादितयन्मदेतदिति, गुले व वाकवान्ते दृम्यदिति ॥
वन्त्वसतिनाक्यार्थनिर्णीयः ५५
प्राधान्येन हिरण्यग भं हति क्रियादक्तिपाघान्येन सचमिति चोच्यते ।
अयममूलेपदा्थः कार्यत्वात् व्यष्टौ समष्टौ च जीवो पाधिरेव ।
अव्याङ्तपदार्थयुक्त्वा अमूरतपदार्थमाद-- लानि चेति । जनयन्ति तानीति
सम्बध्यते । तस्य चेति । ज्ञानक्रिवाराक्तयात्मकख खच्छद्रन्यस्येलर्थः । एवं च
प्राणान्तःकरणयोरैक्यं घर्मभैवाद्धेद इति तत्त्वम । हयं दवमिदयादिं वा ज्ञानशक्तिपराधा-
न्येनैकं ज्ञानैन्दरियं ॥ क्रियादाक्ति्राधान्येनापरं कर्मन्द्रियमिति चाग्िभागः। तदेवाह-
ध्ाकाश्ात् प्नोच्चवाचौ' इत्यादिना । रायो मतमाद- अन्नेति । एषु मध्य इयर्थः ।
एकदे श्िमते ऽ्वगसं व्यज्ञयन्खमतमाद-- चाब्दव्यञ्जकै न्दियत्वेनेति | एवं च
प्रयोगः, वाघ्राभसी श्चव्दन्यच्वकेन्द्िचत्वात्त् (त्वेन) घ्ोत्रचत् । बषटष्ठादिसामान्यका-
रणे व्यनिचारमाद्-इन्दरियत्वादित्तिं (एव्वेनेति) । तर्कस्तु लाक्वाख्य एव,
धूमत्वावच्छेदेन वद्धिजन्यत्ववत् , दाच्दरयज्ञके न्द्रियत्वावच्छैदेन नाभसत्वनिति । तर्हि
हतेजोमवी वाक् इति श्रुतेः का गतिरिति चैत्, तत्राह-तेजोमयत्वश्चुति-
स्त्विति । तत्र “चन्नमयं द्वि सौस्य सनः इति शतेरन्नमयत्वन्नवणेऽपि मनसः
अन्नोपकार्यत्ववदत्रापि वानचरतेजख इपकायंतवभिलयर्थः । नलु मनसः पच्छभूत कारयते
कि प्रमाणं तत्राह-मनसच्छेति । त्द्रक्वनिश्चयात्, पजभूतकार्यत्वनिशयात् ।
धुतिस्मृतिप्रसिद्धाचिघ्ठाववैवान््रसक्ञागद--दतैषाभिति । ज्ञानक्रियेति । ज्ञान-
शक्तिमराघान्यं ज्ञानेन्दरियाद्यिष्ठातरदेवानां , क्रियादाक्तिमाधान्यं कर्नेन्दरियापिष्ठाद्देवा-
नामिति विवेकः । दिगश्रीति । भरोस दिगधिष्ठतदेवता, "दिद श्रोत्रम् इति
श्तेः । एवं बानिन्दिययाधिष्ठातरैवता अत्रिः । एवहुत्तरजामि यधासक्खन वोध्यम् ।
पराणान्तःकरणयोर्विकषेषमाद्- तरति । यथासह्येन शब्दादीनां ्राहकाणीन्दरिया-
ण्वाद--दाब्दैत्यादिना । त्वक्चक्ठषोस्तु दरत्यमादकरूपनिरोपमाद--त्वक्तचश्चु-
प्रीति । चक्रवत् ध्ोत्रस्मापि प्नमूतकायैत्वेन कियाराक्तिमत्वात् दूरदेशगमनलखा.
मथ्यं, अतो गत्वैव गृहते द्याद--चश्ुवैदिति। तक॑माद-दूरे राच्द् इति ।
सकार्यागि ज्ञानेन्द्रियाणि विविच्य का्यसदितानि कर्मन्द्रियाण्याद--वचनेति ।
पु चेन्द्रियेषु प्रमाणं स्मतः । तासु याज्ञवस्क्यस्परतिः (परायश्चित्ताध्यायः ९१-९२)
धान्धरूपरसरपरंराव्दाञ्च विषयाः स्ता; ।
नासिका छोचने निष्ठा त्वक् शरोत्रं चेच्दियाणि तु ॥
हस्तौ पायुरुषश्यञ्च वाक् च पादौ च पच वै ।
कर्नौ न्द्रियाणि जानीवान्मनव्रैवोभयात्मकप् ॥
१, कथुपुके मदषटादिसामान्याकरिणैति ॥
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५८ तत्वयसिवाक्यार्धनिणयः
एवं च अनुस्मयादावपि बोध्यम् । इदानी प्रसङ्गा दिद्खोकपरद्योकगामि लिङ्गदा-
सर॑ जीवोपाधिभूतमाद--एतनचेति । तखापि दैविध्यमाद--ज्ञानकाक्तिपा-
धान्धैनैव्यादिना । तलु, किमयं षदार्थो मूर्तं अमूर्तो वा तेत्रान्यमेच सिद्धान्-
भिमवमियम्प्रिल-अयमसरर्तः पदां इति ।
तानि च तथाभूतानि भूतानि भोगायतनं चरीरं मोरयं च विष-
यमन्तरेण मोगं जनवितुमचकुवन्ति जीवकर्मपयुक्तस्वात् स्थौल्याय
प भवन्ति । तच्च च प्रल्येकं पञ्चभूतानि द्विधा विभल्यते।
ं मागश्चतुधा विभज्यते । तद्धागचतुष्टयं च खनागं विहाय
इतरभूतचतुष्टयार्धभागेषु प्रविद्राति इति खस्ार्धभागेनेत्रेषाम-
मभागेन च पञ्चीकरणान्मेलनेऽप्याधिक्यादाकाचादिराच्डपयोगः ।
लानि चेति । पश्वीकरतानि भवन्तीयततीनेनान्वयः। किमर्थं पञ्चीकरणं तत्राद--
श्थौल्यायेत्ति । सख्वौस्यखापि फठमाद-- मोगायतनमिद्यादि । छरीरं,
सधृशरीरं ओगस्व कारणमत आह--जीवेतिं । जीवकरमप्युक्ततवाद्धोगस्थेयर्थः ।
सृक्ष्मस्य भोगायतनत्वं न सम्भवतीयत इदयुक्तनितिं बोध्यम् । पञ्लीकरणमेवाद--
तच्च चेति । ननु, मवतु नाम मेनं तथाप्याकाक्षादिभागस्य सर्वन्ानिशि्त्वातत
करविदाकाक्षादिपद्पयोगः कचिन्नेति वैविध्यं कतस्त्राद--आधिक्यादिति ।
यत्राकादाभागायिक््यं तत्र आकाङ्षपदप्रयोगः, वत्र बवावुमागाधिक्यं तत्न
वायुषदुप्रयोग इयर्थः । एवं तैजःपर्टतिष्वपि बौध्यम् । अत्ार्थंवादरायणन्नत्र
( २-४-२२ ) श्रैने्यात्त तद्वादसद्वाद्ः' इत्यपि प्राणे वेदितव्यम् ।
अच्र “चिन्त चिच्रतमेकैकां करवाणि ( छां. ३।३।३ ) इति श्यतेः
शतरिबत्कुबैत उपदेरातः (त्र. सू. २।४।२० ) इति सूच्राच याणामेव
मेलनप्रतीतेञ्च चिन्रत्करणमेव केचिन्मन्यन्ते तै बियडविकरणन्या-
येनैव निराक्रताः। तथा हि तैत्तिरीयके (तस्माद्रा एतस्मादात्मन आ-
कारा; सम्भृतः, जाकादाद्रायुः' (नै. २।१।१ ०५. ¦ छान्दोग्ये
च च्रयाणां तेजोबन्नानां खष्टिश्रचणे रूपसंहारः, तेजसः
प्राथम्यपद्वाथधमौपेक्षया आकाशवायुपदार्थयो्धलीयस्स्वात् , छान्दो-
ग्ये चैकविज्ञानेन सवैविज्ञानपरतिज्ञानात्, आकादावायोरचेतनयो-
ब्रह्मकार्यत्वस्यावद्रयं वाच्यत्वात् । तत्र पञ्चानामेव मेटनेऽप्यवयुला-
` कततन्कनन्््े। ` ` १, छगमोराकाध माचस्यैति । न
यन कम्पुखके यत्राकालणलभागाधिक्यमिति ।
३, कपुद्कै वद्यं वच्तल्यत्वाधिति ।
तत्त्वमत्तिवाक्यार्धनिर्णयः ५९
लुबादेन त्रिवरत्करणोपपत्तिः । चिव्तमेवेति तु कल्वनायां वाक्यनेद-
प्रसङ्गः । जिचरत्त उपदेचात्" (बर, स, २।४।२०) इति सघ त्वनु-
वादकत्वान्न पञ्चीकरणं न्यायसिद्धं वाधितुसुत्सहते । मेटनपरतीतिञ्च
शारीरावौ पज्ानामविदिष्धैव, पञ्चीकरतपञ्चमहाभूतानीति च भाष्य-
कारवचनम् । तस्मादलमनेनानात्मचिन्तनेनेति दिक ।
तत्र शङते--अच्र चिघ्रलमिति । पकैन्ं एषिल्यादिव्यक्ति ब्रं एरथिव्यप्रजो-
भागक्तयुक्तां करोमीयर्थः । श्चुत, छान्दोग्यश्तेः । (चिवृच्छुर्वत उपदेदात्
इति सवरात् › “संज्ञाूर्विहछपरि्छ जिचत्छर्बत उपदेदातर" इति सूत्रैकदेशार्थदियर्धः ।
इदमधिकरणं द्वितीचाच्याचस् चतुर्थपादे । सत्मक्रिवां तेजोवन्नानां सिं विधायोपदि-
शयते , सेयं देवतेश्चत हन्ताहमिमास्तिल्तो दैवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे
व्याकरवाणीति तानां तिवत जिवत्तमेक॑कं करवाणि इति । वत्र स्ंक्ञवः--पिं जी-
वकऱकमिदं नामरूपमाहौखित्परमे्रककंकमिति । तत्र परापरं तावत् जीवकरैकमेवेवं
नामरूपषल्याकरणसिति । कुतः ए "नैन जीवेना्छनो' इति विरोषणगात । वथा लोकं चारै-
णाहं परसेन्यनुप्रविषय संकरयामि इत्येवंजातीचके श्रयोगे चारकर्तृकमेव तत्पैन्व-
संकठनं देतुकरीत्वातं दैवतावद्राजात्मन्वध्यासेपयति, संकखयाभि इत्यु्मयुरुषरयो"
गेण; णवं जीवकदकमेव सन्नामरूपव्याकरणं, देतुकतंखात् देवतात्मन्यध्यारोपयति
व्याकरवाणीत्युत्तमपुरुषरयोगेण । अपरि च ॒हित्थकपित्थादिषु नामसु घटकपाहादिष
च शूपेषु जीवस्यैव व्याकरैत्वं चं, तस्मान्वीवकरकने चेदं व्याकरणं इत्येष प्रापरैऽभि-
धत्ते--संज्ञामूर्तिह्ठतरस्॒॒त्िद्क्छर्वत इति । तुशब्देन पश्चं॑व्यावर्तयतिं । संज्ञा
मूर्तिङ्कप्निरिति नामरूपच्याक्रिंया इत्येतत् । तरिवरछर्बतं इति परमेच्धरं उक्षति
्रिव्रत्करणे वस्य निरपवादात्कतरत्वनिरदेशात्त । येयं संज्नामूर्तिङ्कमिश्वान्निरादिलन्चन्द्
माविदयुदिति तथा ङुशकाशपादादिषु पद्युखगमदुष्यादिषरु च प्रलयाकृति प्रतिव्यक्ति
चनेकप्रका्ं । सा खलु परमेश्वरस्यैव तेजोबन्नानां निर्मातुः ह्प्िभविरुमर्दति,
कुतः ? उषदै्चात् । तथा हि सेयं देवतेश्चत इत्युपक्रम्य व्याकरवाणीर्युत्तमपुरषध्रयोरोण
परस्यैव ब्रह्मणो व्याकतेत्वमिह्योपदिदवत इति वियद्धिकरणार्धमाद-तधां हीति ।
‹सदैव सौम्येदमय आसीत् एकमेवाद्वितीयम् । तरैश्चत बहुत्मां प्रजयेयेति । तत्तेज-
ऽस्रजतं । तत्तेज पेश्चत बहुस्यां प्रजायेयेति । तदपो ऽस्रलत्त' इलनैन, तदनन्तरं 'ता आप
पेश्चन्त बह्थः स्याम प्रजायेमहीति । ता भन्नमसन्न्त' इल्यनेन च छान्दोग्ये श्रयाणां
१, खनगयोटशकदादिन्निति ।
२, कमुस्तके पञ्चदगमुष्यादिषु च परापरा तिः प्रद्याृति परतिन्यक्ि चजेकमकाय इवि ।
३, इत्तिरिति गपु ।
६२ चन्त्वमरसिवास्यार्वनिर्णंयः
किं तुच्छत्वमङ्गीकृतं, तत्र न इयाह-- स्वं चेति । भत्र देठमाद--उ्यवहार-
क्षममिति । एवं च नेदं तुच्छं व्यवदारसमर्थलवात् , यत्तच्च तन्न व्यवदटारसमर्थ
यथा गगनक्मखादीतिं' घ्यतिरेकें दृष्टान्तः । किमिदं भवतैवोच्यते कचित्केनचित्म-
तिपावितं वा तत्राह-यथा चेति ¦ न केवलं यथाकथचितमतिपादित्तमपि तु भा-
ष्यादौ प्रकटं प्रतिपादितमिति व्यक्तपदार्धः- ।
एवं स्थिते जागरणादिन्यवस्योच्यते । उच्ियब्र्तिकालीना्थोपल-
स्मो जागरणम्। त्र च मूर्त बिराडशख्यं भोग्यं धल्यक्चादिप्रमाणषद्रून
च्यवहियमाणस्वात् व्यावहारिकं विश्वाख्येन जीवेनोपश्चज्यते । स च
ेदेन्दरियादिषं वेदात् व्यापनाद्रा विश्व इच्युच्यते, विरा भ्रवेराने
विष्टः व्याक्राविति च स्मरणात् । अन्न यद्यपि सां
चानमानादिनार श्रयते, तथापि व्यावदारिकं सर्य विष्वेनैव ज्ञायत
इति नियमात् स्थृलद्रारीरोपाध्यभिमानित्वाच न तस्य अवस्थान्तर
व्यापकत्वम् । शुक्तिरजतादिन्ञानानामध्रामाणिकत्वात्तद्विषयस्याः
व्यावहारिकत्वेऽपि इन्द्रियव्यापारक्वलीनत्वाल्ञागरणोपपत्तिः । ज्ञा-
नोत्पत््यादिथक्रिया चाधस्तादु क्तैव ।
एवं स्थित इति । एवयुक्तकमेण पपच्वस्य तुच्छविलक्षणतरै खित इयर्थः ।
अन्यया प्रपञ्चस्य तुच्छत्वे जाभ्त्सप्रादिविमागो न स्यादिति हदयम् (१) ।
इच्ियेति । इन्दरियद्रारा निःछतान्तःकरणमेब गृत्तिलत्कादी नार्थोपलम्भो जागरण-
मिदयर्थः । इन्रियद्यारा निःखतान्तःकरणसख वृत्तेर्भावाज्निःचतान्तःकरणमेव श्रचतिरिति
स्यातवम् । अत्र॑ जागरणमित्ति कश््यवाचकं पद्मं । परिरिष्ठं त॒ कक्षणम् । खप्न-
सुुष्यादौ वटदुखाशरपम्भसत्त्वात्ततरातिव्याप्रिवारणाय चृत्तिरिति । नन्वेतावता
प्रबन्धेन ओम्यवग॒पवोक्तो न तु भोक्त्याद- तन्न चेति । सौपनिषदेऽतिप्रसङ्गा-
त्माणानि प्रततिपादयति-चचश्चादीति । कियन्तीलपेश्चायामाद--षदट्रुनेति |
षटच, प्रयश्चानुमानो पमानक्ञब्दायापन्यज्चपरन््याख्यानीति । ख चेति । विश्चाख्य-
१. च्पुसतकै कमदद्रीति ।
२, शपुस्तकै इति वन्त पदं, गपुललक्े च इचर्थकं व्यत्त पदुपनिति ।
३. कपुककै सर्वदेहेन्दरिनादिषु इतिं पाठः स न चुक्तः।
४, तद्मिक्षिव विष व्याप्ताधिति ।
५, खपुक्तके इन्दिवर इत्यारभ्य इतिति इतिपर्यन्तं बाक्यचतुष्टयं नायेष, गपुललकत प्रथम.
मात्रं नलति, ₹१पुखके च तत्रातिन्वातिदारणाय इ्यनन्तरं इन्दियप्िश्नारीनेति कपेऽतित्याप्निवा-
दणाय ब्रत्तिरिति दति पाठः ।
६, कभपुक्तके ठक्ष्यवाच्यं पदमिति ।
तच्वम्रसिषाक्यार्धनिर्ण॑यः ६३
जीव इव्यर्थः । ठभयतरैव दैतुमाह-~--विद्चा प्रवेरान इति । नतु, मूरववत्सूकमपन्न-
भूततत्कायौत्सकममूर्तमव्याछतमपि च विश्वज्ेयम् । तथा च कथयुक्तं स्थूरं प्नभूत-
तत्कार्यं मूर्तं वियाडास्वं विश्रज्ञेयमियालकृते--अच्च यद्यपील्यादिना । परिद्-
रति-तथापीव्यादिना । विक्ञेयत्वमियत्र ताद्य व्याबहारिकत्वावच्छेषैन
व्यावहारिकमाध्रं विश्वस्य ज्ञेयं न तैजसादि(! दैः) । दं तु 'विपेनैव' इत्येवक्ररल-
च्यम् । प्रसङ्गाद्वशयास्तरसम्बन्धित्वाभावं विस्य साधचत्ि-स्थुेति । ननु,
हन्दरियव्रत्तिचदितं चैन्नानरणलक्षणं तदा यस्मिन्पश्चौ इदन्त्व मपि प्रातीतिकं तदा इद-
न्त्वादो रजतां च इन्दियनच्रत्यभावात् प्रात्ती तिकभानकारै इन्द्िववरुत्तिकालीनार्थोपि-
स्म इति जागरणलक्षणमच्याप्रमिलयाशषङ् परिष्टरति--शक्तिरजलतादिज्ञानानाः
मिद्यादिना । तद्विक्यस्येति ¦ रजवादिज्ञानविषवस् रजतदेरिय्ंः । इन्दर
येति । एवं च इन्दरियव्रिकालीनार्थोपम्भ इति लश्वणं न कर्व्यमपि तु इन्द्रि
यञ्यापारकाीनार्थोपकम्म इति । तथा च नाव्याप्तिरिति भावः ।
एवं जाग्रद्धोगजनककम॑श्चयै खाअनोगजनककर्मदिये च सति
निद्राख्यया तामस्या इत्या स्थृलदेह्ामिमाने दृरीक्रते सर्वेन्धियेषु देव-
ताजम्रहा मावान्निव्योपारतया कीनेषु दिश्बोऽपि खीन इत्युच्यते ।
तद्रा च खश्चावस्था । तच्ान्तःकरणवासनानिचित्तह न्द्ियशु स्य भावका-
लीनोऽ्थोपलम्भः खञ्नः। तत्र च मन एव गजतुरगाद्यथोकारेण विव-
तते अविव्याव्ृत्या च ज्ञायत इति केचित् । अवियैव श्ुक्तिरजतादिः
वत् खम्नाधोकारेण परिणमते ज्ञायते चाविध्याच्््येन्ये । कः पक्ष;
श्रेयान् ? उत्तरः । अविद्याया एव सवैत्राधांध्यासाक्ञानाध्यासोपा-
दानत्वेन कल्पितत्वान्मनोगतवासनानिमित्तत्वे च करचिन्मनःपरि-
णामत्वव्यपदेश्ात् । ननु, तदा मनसो ददयाकारपरिणामानभ्यु-
पगमे दृष्टत्वसम्मवेनात्मनः खयंज्योतिष्टरासिद्धिरिति चेत्, न,
वहिरिन्रियजन्यच्त्य भावेन तद्वानीं मनसोऽग्राहकत्वात् तत्सहका-
रेणैव तस्य ग्राहकत्वनियमात्, सञ्त्तिकान्तःकरणाचच्छिन्नस्यैव
चैतन्थस्य परमातृत्वनियमात् तदान्तःकरणसत्वेऽपि प्रमान्न भावः ।
आदिपदग्राष्मां सख्प्रावस्ां निखूपयितुमारमतै--एव मिति । जाच्रद्धोगलनके
कर्मणि दीन इयर्थः । सर्वेद्दियेष्विति । छीनेष्वियनेनान्वयः ! तत्रेति । कषणा
दिमिर्निल्पणीय इयर्थः । जासदतिव्यापिवारणायाद--इन्द्रियदृ्य भावक्तालीन
१, शखपु्के क्वा वित्ति ।
६१ तत्त्वमसिवाक्तयार्थनिणवः
सष्ि्रवणेऽपि द्रयोहपसंहारः । अस्यां प्रतिज्ञायां देतुमाद--'लस्पाद्ा पतस्मा-
दात्मन आकाराः सम्भूतः, आकास्ाष्रायुः" इस्यादिश्चुतेरिति । त्रयाणां
एरथिव्यपनेनसां द्वोवाव्वाक्ताश्चयोयंदुपसंदारेणापातवः छान्दोभ्यश्चुतिविरोधपरिदार-
स्तथापि छान्दोग्ये तैजसः प्राथम्यमङ्घस्तथधा च कथपुपखंदागसत्राह--तैजखः
प्राधम्पेति । तेजोनिश्रं चत्पाप्रं पारकरमेण बाधस्य तख तेजोरूपच्छ तेजःपकार्थस्य
धर्म्यात् वदपेश्चया वाच्वाकाज्योः पाच्यं बाच्वाकारापदार्थत्वादियर्थः । दृं च
पूर्वमीमांसायां पदार्थधमपिश्चया पदार्थस्य चदवच्वम् । वाच्वाकाशायोरुभयोरावदय-
कोपसंहारे छान्दोग्यथुतिसम्मतिमाद-- छान्दोग्ये चेति । "येनाशु शतं भवति
अमतं मतं विज्ञातं विज्ञातम्' श्यादि अतिक्चा दीयेत चाप्वाकादायोवेदहाका्यत्वाभावैन
ब्रह्म्ञानेन तयोज्ञोनं न स्यात् , नह्यकारणस्य कनकरधौतस्यं ज्ञानादेतदकार्यस्य कनकवल-
यष ज्ञानमिति कथचिदेशक्चावानङ्गीकरोति इति दृष्टम् । कथं तर्हि तरिवरतं त्रिवृतं करवा-
णीदुक्तिलत्राद--त्रेति । अवयुत्याजवादैनेति । सम्भवचेकवाक्यत्वे वाक्य-
भेदो हि नेष्यते इति न्यायमनु्रवादं--चिघ्रतमिति । सष्टिपतिपादकछान्दोग्व-
ब्हदारण्यका दिध्ुतिजाते बाक्यभेदप्रसङ्गो दोष इयर्थः । इदं च स्यष्टमाकरे । एवमपि
मगवद्वादरायणमेवास्तु विषृत्करणे अमाणमत जाद--जरिच्त्कुच॑त इति । अव्र च
व्िवृ्छर्वत इत्यं ्ेन चिदर्छर्वतः सतः परमे.खरस्व नामदष्टिक्ता न तु चिवृत्करणम् ।
तथा च त्रिवृत्करणे तत्व तात्प्याभावात्र, न तत्र भमाणभियर्थः । सेलनैति } अत्र
च प्रमाणे “पच्नमूतात्मके ददे पद्ध अ्रर्यं गतेः इलयाधाः स्छतयः । पञ्चीकरण
अगवत्पाद्वचनमपि प्रमाणमिदयाह--षश्वीक्रमैति । पश्चीकरणद्धपसंदरति--
तस्पादिति ।
तानि च पश्चीकरतानि पश्महा मतानि चतौख्यानि मिखित्या एवं
कार्थमिच्दियाणामधिष्ठानं भोगायतनसुस्पादयन्ति । तदेवं शारीरमि-
त्युच्यते । तच्च सतत्वपधानं देवद्वारीरं, रजःप्रधानं मनुष्यशरीरं,
तमःपरधानं तिर्यगादिस्वावरान्तं रारीरम् । तस्य च शरीरस्य पाथ भौ-
तिकस्यापि चिच्ररूपस्येव कचिब्युनाधिक भावो भृतानां न विध्यते ।
एवं विषया अपि पश्वीकरैकैकभूतजन्याश्चतुर्दरासुवनाख्या ऊर्ध्व
मध्याधोभावेन सत््वरजस्त्मोदापधानांः घटादय । एतत्सर्व च-
श्याण्डाख्यं विराडिति मृतमिति चोच्यते ।
१, कष्तयोुलघौतस्येति ।
२० ऋगयुन्तक्योर्परमेनरान्ञामसूपशटितक्ता इति ।
३, कयुश्वके प्रधाना पडटादुयधति ।
तस्वमसिवाक्यार्भुनिर्ण॑यः 3.
^तानि च तथाभूतानि भोगायतनं करीर भोग्ये च विषयमन्तरेणः इादिना
यच्छरीर्युक्तं तदिदानीं कथयत्ि--तानि चेति । इन्द्रियं विना न भोगः तन्भव-
तीत वक्त--इन्द्ियाणामधिष्ठानसित्यादि । तत्रापि दैवादि्षरीरविमागा-
नाह--तन्नेति । पाश्चभौतिकत्वे समाने कस्यचिरप्रथिवी भागापिवयं कस्मचिनल-
भआगाधिक्यं कस्यचित्तेनोभागाधिक्यमियादिभेदः कथं घत्राह- तस्व चेतति । शरीर-
शुक्त्वा बिषवानाह-- चवं विषया अपीति । चतुदश सुवनानि-भूः, भुवः, स्वः,
महः; जनः? तपः, सलाख्यानि सप्र उपरि; अतल) वित, सुत्त, रसातल; तदार;
भदात्र, पातताखाख्यानि सप्राधोधः । सत््वरजस्तमोशश्रधाना शस्व पूर्वेणान्वयः ।
अयमौपनिषदेः शष्धिक्मः । तद्विपरीतो लयक्रमः। पश्चीकल-
पश्चमहाभृततत्कायात्मकं विराडाख्यं मूर्तं इधिव्यायेकैक्तलयेना-
सूर्तेऽवश्वीकरलपच्वमदाभूलात्मकै हिर्यग नाख्ये खकारणे लीयते ।
स एव दैनन्दिनः प्रयः । अमूर्तं ॑चाव्याक्नतै वरसे्वरोपाधौ । अ-
च्याक्रुतस्य त्वनादित्वेन कारणशमाचान्नं लयः, खकारणे सश्ष्मखूपे-
णावस्थानं कय इति तद्क्षणात । अयमेव प्राक्रतः परयः । ्रह्मन्ञाना-
दात्न्तिक उच्छेदस्तु जआद्यन्तिकः प्रख्यः । स च कषारणक्रमेणैव, कार-
णोच्छेदादेव कार्योच्डिवात् । सर्वं च खषि्ल्यादिकं खम्रस्रषिपरख्य-
वदपारमार्थिकमपि वासनादाष्यात् व्यवहारक्चममिति न मायि-
कत्वेऽपि तुच्छत्वप्रंसङ्गः । चथा चैतत्तथा ्यक्तमाकरे ।
नतु वटाद्थक्चैलन्र, ननु पुराणादौ महदादिक्रमेणापि छि; श्यतेऽत आह-~
अयमौपनिषदः छषटिकम इति । भवत्वेवं चष्टिकमो खयक्रमस्तु कीटदा इत्यत
आह-- एतद्विपरीतं इति । स्वखक्नरणे च्यात्त्कार्य् दक्ष्मरूपेणाचखानमेव
वैपरीत्यं तदेवाह--पञ्चीक्रतेति । तत्रापि कममाद--्रथिव्यादीति । भ्यो
हि तरिविधः श्रयते तत्रायं कतगस्तत्ाह-सख एवेति । भयं यः कम उक्तः स एवे
यर्थः । भवस्वेवममूर्त मूर्तस्य ख्यः, अमूर्त तु कुच प्रलीयते तवाह--अमूर्तं चेति ।
पूर्वोक्तपरमेश्वरस्योपाधौ अव्याकृत इसन्वयः । पएवचमव्याकृतस्य क स्य इयाद--
अव्याकरलस्य त्विति । दुतीयो ख्यः कतमः कृतो वा तवार--च्रह्मज्ञानादिति।
ब्रह्ज्ञानायोऽ्यन्तोच्छेदः स चऋा्धाविश्यायाः, स आद्यन्तिक्ो दयो महाप्रय
इयर्थः । वत्रापि क्रममाद-स चेति । एषकारार्धस्तु कारणोच्छेदं चिना न कायौ.
खन्तोच्छेद इति शनोतयितुम् 1 ननु, खष्वादेमोयिकत्वेनापारमार्थिकल्वं बटता भवत्ता
व=
~ = ~ ` -- ---
१. कमुके कतमः स छन्नखत्रदिति ।
२. गयुच्छे ज्नारणोच्छेदेन कार्य॑ाच्न्तोच्छेदर इतिं ।
६४ वस्वमदविवाक्यार्धनि्णयः
इति । सुखादुपलन्भकाली नसुषुप्राचतिव्याप्रिवारणाचाह~--तच्रान्तःकरणेव्यादि ।
ननु, शक्रस्य किमुपादानमतसतदैव मतमेदेनाद--तच्र चेति । खन्न इयर्थः ।
प्रभो्तरमाद--उत्तर ति । उत्तरः पक्षः प्रयानियर्थः । देत॒माद--अविद्याया
इति । तर्हि चान्ने ख्व्रस्य मनःपरिणामत्वन्यषदैदाः कथ॑तत्राह-मनोगतैति ।
खगे मन; परिणामानभ्युपगमे वाधकमाशङ्कते--नच्विति । ननु, परेषामिव
नास्माकं मनः खतश्नमिन्दरियं निन्तु क्लानकर्मेन्द्रियसहकारि' । तथा च ज्ञानेन्दरिय-
व्यापायभावे कथमापद्ते मनसो घरादकत्वमिवाद--न, बहिरिति । तिं तदानीं
मनसः कथं प्रमातृत्वं न इव्याद-सच्रत्तिकेति । एवं च इृत्त्यभावात्तदानीं मनसो
न अरमारत्वमिदयर्थः । एवं च चखाप्रप्रपश्चो न प्रमातभाखः, अपि तु अविद्याद्रत्तिसद-
कारेण साक्षिभाख इृखयचधेयम् ।
किमधिष्ठानं खभ्राध्यासस्य मनोवच्कछन्नं जीवचैतन्यमिल्येके,
व ब्रह्मचैतन्यमित्यपरे । वि; श्रेयः ? मतमेदेनोभय-
1 तथा हि-जाय्रहोधेन खम्रभ्रमनिन्सच्यभ्युपगमरादधिष्ठानन्ना-
नादेव च च्रमनिच्रत्तेः, बह्मचैतन्यस्य चाधिष्टानत्वै संसारद गायां
तज्ज्ञानत्वामावात् ज्ञानेन च सर्वद्रैतनिद्त्तेः न जाग्रदोधास्छम-
निव्र्ति; स्यात् । "स हि कर्ता" (श. आ. ४।६।१०) इति च जीव
कतत्वश्चुतेः आकाद्ादिपपश्वत् सवंसाधारण्यापत्तेश्च न मूलाज्ञा-
नावच्छिन्नं अ्मचैतन्यमधिष्ठानम् ।
पादानं निरूप्याधिष्ठानं निरूपयति--किमधिष्ठानमिति । मनोवच्छन्नं
जीवयैतस्यमिति । धज्ञानावच्छिन्नं वैतन्थं जीव इति बोध्यम् । द्विः परेव इति
गर्नस्वोत्तर्माद-मततमेदेनेति । अधिष्ठानज्ञानैद्धमनिदृत्तिरिव्येकं मतं, अथिष्ठा-
नज्ञानाद्धमतिरोभाव इसपरम् । तत्राचे पक्षे ननोषच्छिन्नं जीवचैतन्यसचिष्ठानमन्त्ये च
मूखाज्ञानावच्छिन्नं ्रद्चैतन्यनिति । इदानीं जीवचैलन्वस्वाधिष्ठानत्वं साघयितुं बह्म-
नैतन्यस्याचिष्ठानलवं दूषयति- तथा हीति । किं तेन तत्राद--अधिषछठानन्ञाना-
दिति। ततोऽपि किं तवराह-जह्मचैतन्यस्येति। ज्ञानेन चेति। तथा च ्ाना-
ज्ञानाभ्यां नाधिष्ठानत्वमिति मन्तव्यम् । जन्माधिष्रानत्वसाधकं दृषयिलवा जीवाधिष्ठान-
त्वसाधकमाह--सख हीति । "योऽयं निज्ञानमयः प्राणेषु हद्न्तर्योतिः' इत्युक्त्वा
तदनन्तरं ^ तत्र रधा न रथयोगा न पन्थानः" इत्युक्त्वा “ख दि ' इत्युक्तम् जीवप्रकरणे
१, गदुन्तकतं प्नानकर्मोमिवेन्दियपदकारीति ॥
, २, कषपुस्तकै अधिष्ठानन्नमस्य इनादिति पाडः स न भ्रनीतरीनः।
तत्वससिचाक्यार्थनिर्णयः ६५
चहदारण्यके । अतो जीवकककनिययर्थः । पुनरपि लद्याधिष्ठानत्वसन्पादकं दूषण-
माह-आाकःक्ःःदीति । आकासादि प्रपञ्चस्य यथा सर्वजनच्यवदहारविषयल्वं तथां
खघ्रपरपद्लस्यापि सर्बजनय्यवरहारविषयत्वं स्यादिदयर्थः । एवं च पूर्वन्न जौवचैत>
स्यस्याधिष्ठानत्वसुक्तं वेदितव्यम् ।
नलु, जीषचैनन्थस्यानःदनत्थैन स्वंदाभनाखमानत्वात्कथमधिष्ठा-
नत्वम् १ सखल्यं, तत्रापि स्वपध्यास्वालुद्ककटयावहारिकसं वात मान-
विरोध्यवस्याल्लानाभ्युषगसाल्, सखपठङायां चाहं मनुष्य इल्यादि
पातीतिकसं चलान्तरस्ानाभ्युपगमातं शाय्यां खपिमीति शास्था-
न्वरवत् । ्ानख्यायय्य भावश्च तुर्य चव ।
जघ्यचतन्ये काधकमित्र जीवचचन्येऽपि वाधकमविकलनिति दङ्ते-- नन्विति ।
नञ्च, तर्हिं चिरोधिन्यवस्थाज्ञाने जागरूके कथं ञयाव्हारिकसनुष्यादिखंघाच्थानं
तव्राद-- स्वश्नद् शायाथिति ! व्यावद्ारिकसंघातमानसामस्यां` विद्यमानाया कथं
ञ्वावहारिकसं वात्तानामादः, अत आंद---ंय्याथं खपिमीति | शय्यायां
सखपिमीयत्र बौ यथा व्वावहारिकदाव्या न मासते किन्तुं प्ातीतिकश्नव्या तथां
मनुष्य इत्यादियोघेऽपि प्रात्तीतिक्तौ मनुष्यो भासते न च्चावहारिकः, तथा चक
स्याबहारिकभानसामवरी, सामन्वाः-फडनियतस्वादियर्थः । छाख्यान्तर बत् , दाच्या-
न्तरभानवत् ।
नल, अहं सलुष्य इत्यादिव्यावहारिक्संघातज्ञानस्य पमाणा-
जन्यत्वाव्क्द्धाननिवधक्यः | अचख्ान्लरान्यशथाश्चुएपत्या ततह्क-
ल्पने सुषुवे खप्रवाधकाल पनसा स्वीये, चचानिषट जाग्र्वापत्ते-
रिति चेत्, साष्यवोर्यः, खम्राव्याह्ानस्यचवान्तःकरणलयसद्ि्तस्य
सषतिरूवस्वान्न तच ताध; । जागरणे तु मिथ्यैव स्वभ्रोऽभादि
दनु खताद हथित्तिन्चनस्य धमाणाजन्सत्वेऽपि वथाथैत्वात् हारीरा-
दिक्तानस्य च पनःगजन्यत्वाव्वस्याक्वानविरोधित्वभनुभवसिद्धम् ।
विद्रोदाज्ञानं घु न परभाणजन्यदक्तिमन्तरेण निवतते । साक्षिण
१, कपुष्तङ संषान्तहाभानाभ्गुपगमादिति ।
२. सपुलकं लव्याचदहारिक्र्तवःतनानसरानप्यामिति? गपुश्तके च सथ च्यावद्वादिकेल्यादि 1
३, कपु्तके ्वप्रबोषकनज्ञानमास्थीयंत्त इतिं 1
४, न्तौ विरोच इति दस्छिनिव, पुस्तके च स्राध्ववोचः, नासौ विरौष इति ।
५, कपुरके तै्ठोष शततिं ।
६, चगयोज्ञानस्याप्रमाणजन्य्ततै ऽपीति ।
४ ॥ % चिं
६१ तक्वमदिवाक्यार्थनिर्णयः
आविद्यानिर्यतकत्वा भावोऽविद्यासाधकत्वेनैव धर्भिग्राहकमानसिद्ध
इति न क्िद्धिदव्यस् । यावन्ति ज्ञानानि तावन्वयज्ञानानीति चाभ्यु-
पगमात् चाक्तिज्ञानैनेव व्यावहारिकसघातज्ञानेनाल्ञाननिव्रत्तावपि
पुनरपि कदाचिद्रजतश्चमवन्न खध्राध्याखाल्लपपत्तिरिति जी्चचैतन्य-
मेवाधिष्ठानमिति पक्षे न कोऽपि दोषः।
थ जीवचैतन्यस्वाधिष्ठानत्वपश्चे ऽहं मनुष्य इयादिखप्राव्यवदितोत्तरक्ञानस्य
न खघ्रकारणी मृतावस्थान्ञाननि वर्तकत्वं चक्षुरादी न्दरियपच्चकलन्यत्रुत्तिकूपकारणामावा-
रियाकशङ्घते -- नन्विति । आशज्च परिद्रति-अवस्यान्तरेति । तत्कल्पने,
परमाणाजन्यङ्घानस्यापि ` बाधकत्वकस्पने । समुषुप्ताचपीति । यदा खपोचरं सुषुपरि-
स्या मिनर्धः । नतन भवतु नाम बाधकज्ञानं कि तैन तत्राह- चेति । प्रमाणा-
जन्यन्ञानस्य नाज्ञाननिवर्वकल्व यदुक्तं तत्समीचीनमियाद--साध्वचोच इति ।
खप्रल्ञानानिवरतौ कथं सुपुप्रिलत्राद-सखभ्राचस्थेति । न तच्चेति । चस्वां खपुप्नौ न
सम्नज्ञानवाध इयर्थः । अहमितिज्ञानस्येति । एवं च न प्रमाणजन्यक्ञान-
तवेनाज्ञाननिवर्तकत्वमपि तु चधार्धज्ञानतेनैति आवः । चदि बदसि विदोषान्ञानं श्च
तत्यादयक्चानं न प्रमानजन्यज्ञान मन्तरेण निवर्तते तथापि न नः श्चतिः-। अहमिति सा्ि-
ज्ञानस्य प्रमाणाजन्यत्वेऽपि प्रमाणजन्यद्चसी यादिज्ञानस्य सत्वादियाह-चछारीरादि-
ज्ञानस्य चेति । अदमिति चाधिक्ानस्य यथार्थत्वैऽपि नाज्ञाननिवर्वकत्यमिदयाद--
साक्षिणओति । नन, व्याबदारिकपदार्थज्ञानेन चपराज्ञान निवृत्तौ कथं पुनः खप्र-
सत्राद--यावन्तीति । शछ्ुक्तिल्ञानेनै(ने)वेति । यथैकेन छकतिक्ञानेनैकसििन्न-
ज्ञाने नाितेऽन्यावस्थाऽज्ञानाद्रनतादि ्वमोत्यत्ति्तथापि (तयैव) एकस्मिन्सग्राज्ञाने
नादिते अन्यस्मादक्ानाच्छग्नोत्पत्तिरिलर्थः । जीवच॑तन्यस्वाधिष्ठानपश्चमुपसंदरति--
जीवयैतन्थमिति ।
यदा पुनत्रद्यन्नानादेवाज्ञाननिच्स्यभ्युपगमस्तदा रज्वा दष्डश्च-
मेण सर्षश्रमतिरोधानवदधिष्टाननज्ञानाभावेऽपि जायद्धमेण खमश्रम-
तिरोमाचोपपत्ते; ब्रह्मचेत्तन्यमेच खमाध्यासाधिष्ठानमिति परश्चेऽपि
न कञथिदोषः । प्रतिजीवं खभ्राध्यासासाधारण्यं तु मनोगतवास-
नानापसाधारष्यादैच ।
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न ----------
१, गपुसतके इन्वरियपष्ठकनन्यलात्र हत्यांशाह्कत इत्ति ।
3. तस्व प्रनाणजन्यज्ञानस्यपीति ।
३. इभ्रपुलकते तथापि न क्षतिरिति ।
षक्यप्रिवाक्यार्धनिर्णयः ६५
जीवचैत्न्यस्याचिष्टानपश्चमरुपपाशय मृाज्ञानायच्छिन्नसाधिवैतन्यस्वाधिघ्रानपश्चमरुप-
पादयन्पूर्वोक्तदोषं परिदरति--यदा पुनरिति । ननु, जश्चाचि्ठानकजामस्परपच्चस्य
सर्व॑पुरुप्रस्ाधारण्यमिव नद्माधिषठानक्स््प्रस्यापि सक्कपुरुषश्ताधारण्यं स्यात । न चं
करपकजीवसयैव ततसमदक्षं नाकल्पकस्येति वाच्यं, मनोभेदेनैव जीवमेदान्त्राह--
प्रतिजीवभिति | त्था च जीवस्यावच्छेदृकस्य मनसो धासनानिमिन्तको यः स्वप्रः
सत्तस्य प्रयश्च इतिं धावः ।
मनोवच्छिन्नं ब्रह्मचैतन्यमेवाधिष्टानमेतस्मिन्नपि पक्मेऽवस्धाज्ञा-
नस्यावरकत्वाङ्ीकारान्न काप्यनुपपत्तिः अल एव चाच््रषु कचित्क-
चित्तथा व्यपदेशाः । नलु, मनोवच्छिन्नचेतन्यस्याधि्ठानत्वे अहं गज
हव्याहङ्कारसामानापिकरण्येन गजपलीत्तिं; स्यात् हदं रजतमिति
जु क्तिसामानाधिकरण्येन रजतपतीतिवत् नत्वयं गजं इति । ्रह्मचैत-
न्यस्याधिष्ठानत्वपक्षेऽपि गज इत्याकारैव प्रतीतिः स्यान्न त्वयं गज
इति तच्रापीद ङ्कारास्पदीभूतबाद्याथो भावस्य समानत्वादिति चेत्,
न, आये पक्षे अहङ्कारस्य शुक्तिवद धिष्ठानानवच्छेदकत्वात् श्रुक्ती
रजतमितिबदह गज हति न श्रमाकारप्रसद्कः । अहमिति ज्ञानस्येयं
छाक्तिरिति ज्ञानस्यैव श्रमविरोधिश्वात् , इदमद्ाश्य च श्रमाविरोधिन
एव तन्न नानाभ्युपगमात् । अन्त्ये तु गज इत्याकारवद यमि्या-
कारोऽपि कल्पित एव । उभयाकारबाधेऽप्यपिष्टानश्रतचैतन्या-
चाधान्न दछान्यवादपसङ्गः । जाय्दक्ायामपि उुकीद ककार विलक्ष-
ण्य प्रातीतिकस्यैव रजतेदङ्कारस्य मनाभ्युपगसाच । "अध्यस्तमेव
हि परिस्फुरति अरमेषु' ( स= दा० १-३६ ) इति न्यायात् । शुक्तीद-
मद्रा मानप्पेऽपि न इदम॑शचासदयत्वमध्यासे प्रयोजकम् , किन्त्व-
धिष्टानसचत्वम् । अधिष्ठानं च तच्नाज्ञातच्लुक्तिचेचन्यंमिवाच्नापि
साक्षिचितन्यं विच्यत एवेत्युपपादितम् । तस्मान्न पक्द्रयेऽपि काष्य-
लुपपत्तिः ।
यथां मनौबच्च्छिनं जीवनैतन्यमयिषठानमिति पञ्चे न दोषल्लया मनोषच्िन्नं
न्दाचैतन्यमयिघ्ठानमिवि पक्षेपि न दोष इयाद-मनोवचदिन्नसिति । नदचै-
र >>
१, ग्रपुख्लके बह्मचैतन्वद्याधिघ्रानपक्षमुपयाद्यश्निति ॥
२. कपुस्वकते सामानाधिच्छीण्मेनैतं अक्तीतिः स्यादिति ।
३. त्नितनेनाधिष्ठानं च तत्राहनानं श्ुक्तिचैतन्दमियैति पाडः ख न समी चौनः।
हद तत्रमतिवाक्यार्धनिर्णयः
तन्यख सर्वदा भसमानत्नेन कथमधिष्ठानत्वमन्ञानत्वामावाचत्राह--पएलस्िन्नपि
पक्ष इति । मनोव च्छिन्नजीवयेतन्यस्याधिष्ठानत्वपश्चे वथावस्वाज्ञानव्याशरकत्येन न
दोषस्तथा ब्रह्मचैत्तन्यस्याधिष्ठानप्षैऽप्यावरकल्थान्न दौ हवयर्थ; । मनोवच्छिन्नजीच-
चंतन्याधिघ्ठानपक्चे, मूटाज्ञाना५च्छिन्नघ्दमचैतन्वाधिष्ठानपश्षे , अनोवच्छिन्नवश्यनैत-
न्याधिष्ठानपक्चे" च प्राचीनसम्मतिमाद--अत एत्ति । अघुनः उक्तपक्चयोरीहाङ्वै
- नन्विति । मनोवच्छन्नेति | सनोवच्छिच्जीवचैतन्यस्येयर्थः । जधिष्ठान-
तावच्छेद्कसामानाधिकरण्येनासोप्यमाणे ' निःरानमाद--ङृदमिति । इवम॑साध-
च्छिन्रचैतन्वस्याधिष्ठानत्वे यथेदं रजतमिति ज्ञानं तथाऽ चावच्छिन्नदैचन्यस्याधिष्ठाः
नत्वे ऽदं गज इति ज्ञानं स्वादियर्धः । साभाना विकरण्येैव प्त्वैवकारन्यावत्ययाह
--न त्वयं गज इतीति । नेदचेनन्यस्येि । मृराजानावच्छिन्ररकचचैत-
न्यस्य मनोबच्छिन्ननद्मचैतन्यत्य व्यर्थः । देतुमाद--तंच्ापीलि । नाद्य इति ।
यथा रजतापिष्ठाने शुक्त्ववच्छिन्नच॑तन्ये शु्त्थन्नानचच्छिश्नचैतन्ये घा हुकिरवः
च्छेदिका तथा खप्राजाधिप्रानेऽदङ्ारावच्छिन्नचैतन्येऽदह्ारोऽवच्छैदकस्तथा च
यथा शुक्तौ रजतमिति ज्ञान न मवति तथाऽहं तज्ञ इति ज्ञानं न भवतीयं |
उक्तेऽर्थे दे तमाह अहमिति ज्ञानस्येति । तर्हिं कथं चतेदमंद्भानं सवाह--
इद मद्ास्य चेति । कलिपतेदमंरस्य चेव्यर्थः । एवं च कत्वितेदमंदाभानं न भ्रम-
विरोधि किन्तु शुक्तववच्छेद्केदसं यभानमिलचवेयमं । अथवा ततरेदन्तवैन खूपेणेदमं-
श्षभानं न तु शक्तित्ादिकूपेणेति भावः । स्यादेतत् , तथापि स्वाप्रगनश्रमेऽनिद्यमान
इव्माकारः कथं भासते तव्राद्- खगे (? अन्त्ये) हिविति । तर्हिं उभयाकारस्
कल्ििित्त्वैन बाधित्त्नाच्छरन्यवादिमतप्रवेचल्न्राह--उ-वथाकारैति । चदि चरमस्य
दैरूप्यं खप्रजाग्रद्धमयोः कर्पिताकल्पितेवम॑ज्ञभानात्तत्राद-- जाग्रहृदायासपी ति ।
धश्र संकषेषशारीरकोक्तं भमाणमाह--अध्यवस्तमेचैति ।
जध्यस्तमेव हि परिफ्रति मेषु, नान्यत्कथंचन परिस्फुरति भ्नजैषु ।
रखुत्व्युक्तिशकरलत्वमरितितवचन्द्रकताप्रशतिकानुपदम्भनेन (सं ० शा० {-३६)
१. कषपुसतकरे स क्षिडतन्वःधिष्ठानवल्नं इकति ।
२. तस्मिभैष मनोचच्छन्नस) पि चैतन्या धिष्ठानपश्च हति ।
१. ठुकतदे वक्तु त्रिष्षपि पक्षेष्विति पाठः च न समोषीन इतति मन्यै यततोऽधन्ता्वीष्ठ कार एषं
कथयति "दनात् इछ न्द्राङ्याने वरहमाचैतन्याधिषठानेपक्ते यज्प्यषच्छेदकमेदैन द्वाववान्तरमैदी भव-
तस्तधापि हतर भोरे एवावच्छेयवस्तुसत्पैन परन्धक्तोऽप्युभचौः पक्षयोरितति वदतीति ।
४, इष पुरतकं सामानाधिक्रणेनोभयमानं इति ।
५. गयोः शुक्तितिषठवमंदभानमिल्दपेयपित्नि ।
तद्वमसिवाक्तयार्थनिर्णयः ६९
यन्तः ॐोकौ वौध्यः। ननृक्तक्मेण शल्थवादवरिद्।रेऽपि स्वप्नाध्याल्लौ न सम-
थितः, अध्यान्प्रयोजकतमतै सवेदमंज्ाभानाद् आट--द्ु्तींदमंङोति । मतत्र-
चयुपसंहरति--लश्पादिति । मूला्ानावच्छिक्नत्रक्चचैतन्यमनोबच्छिन्नचैतन्ययो-
रथच्छेवकमेदैऽप्यदच्छेचभेदाभावादुभवोः पश्चयोरै्यममिसंधाय पक्षद्रये ऽपील्यु्-
तित्ति बोध्यम् ।
अच्र च खाननिकपवाधैमोक्ता तैजस इच्युच्यते । पित्ताख्यतेजः-
धचानस्वादादिव्यादिल्योतिरन्तरेणापि भासकलत्वादिति चा ।
स्वप्रायिष्ठानं निकूपप स्वप्रभोक्तास्माह---अन्रेति । खाप्रभोक्तत्ते ज सेत्वमुषपाद-
यति--पिद्छ। ख्येने वि (ख्ये ति)। तेःब्दस्य पित्तपद्भरतिपाचसं याज्ञबल्क्यारौ
सपचिद्धम् । इति श्वपावश्चानिरूपणम् ।
एवं जाश्मस्खश्भोगद्रयेन श्नान्तस्य जीवस्य तदुभयकारणकमेक्षये
ज्ञानराकत्थवचन्नश्य चवाखनस्यान्तःकरणस्य कारणात्मनावस्थाने
सलि विश्नासस्थानं सुषुस्यवस्था । न किशिद्रवेदिंषमिति कारणसान्नो-
पलम्मः सुवुधिः । लच्र जाग्रत्यबभोज्यपडायेज्ञानामावेऽपि साक््या-
कारं, स्वाकारं, अवस्थाऽ्लानाकारं चाविश्यायाः चृत्तित्रयमनभ्युपेयते ।
अद्रा नावा नैका विदिषव्त्तिः सुषुस्यमाधखङ्गात् । अत एव
बृत्तिरूपस्योकलम्मस्यामावान् ध्रलयेऽततिव्यातिः, तच्र तत्कल्पनावी-
जा जावा, इह च छष्वमहमसवाप्सं न किञ्चिदवेदिषमिति सुसोत्थि-
तस्य दरामन्ष् , धननुजधे च परामशजुपपन्ते; । अन्तःकरणोप-
राभक्ारोनासमवजन्यस्धा नासा न तत्तोद्धेखा मावेऽपि स्मरणत्वा-
नुपपलिः । स्रणे तत्तेलेखनिथमा भावाच्च जाग्रहशायानखाप्समि-
व्यतुजबाद्पपस्ेः लिङ्गा भावेन च आखयासिद्धयां चालमान व्यासं
नयात् । अहङ्कारस्त उत्थानस्मथ एवानुशयते । सुषुधौ लीनत्वेन
व उरणानुपवन्तेः 1 शुखधति विम्बाश्रये दषेणे जपा-
ध्यास रत छच्थिति प्ररीतिबददङ्काराखरयंसाश्षि-
चैतन्यस्य स्यरणाश्चयत्वाय जहमस्वःन्छमिति खासानापिकरण्यप्र-
तीत्तिः, न पुनरदं सखीति वाश्रयलयं । स्द्तिसंचायविपयैयाणां
चगल. ३-५५ ` `
२, ्लप्ुतके लिङः मवै चाध्वयाह्तष्यति ।
३. खगयौरङ्का गञ्चयत्तचैति ।
, छगपु्तक्तयोनपुनःहं सुखीव्रदाननैयत्तयै पिं ।
११ तस्वमतिवाक्तयार्धनिर्णयः
साक्षिचैतन्याश्न पत्वनियमादहङ्कारस्य च प्रमाणजन्यज्ञानाश्रय-
त्वात् अमात्वैनैव तत्काय॑ताचच्छेदात्, अप्रसात्वावच्छेदेन च
अबिश्ाया एव कारणत्वात् । अन एव अनास्तवाक्यादिङन्यपरोश्च-
विश्रभोऽपि क मो वैद्रान्वविदाम् । तच्नान्तः-
करणव॒लिजनकसामग्रीसम्मवेऽपि भ्रसात्वाभावावरोधेनांस्लःकरण-
खासामध्यौत् । नामादिषु अह्माध्यासस्त इच्छाधीनतया नरम
माविलश्षणा मनोश्रिरेत्र कामादिवत् । तदुक्तं "अल एव चोदना-
जन्यल्वान्मानसखी क्रियैव सा, न ज्ञानम इति । पतेन त्कंस्यापि म-
नोच्रत्तित्वं व्याख्यातम् । व्याष्यारोपेण व्यापकप्रसञ्नाह्मकस्य लस्य
इच्छाधीनतया अ्रमप्रमाविलक्षणत्वात्) अत एव मनननिदिध्यासन-
सहिते अवणाख्ये बेदान्तविचारे आओओलन्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य
इत्यादि विधिरुपपद्यते, तस्य चतुर्वि घान्वयध्य तिरैकादितकंरूपत्वत् ।
दग्दरयान्वयव्यतिरेकः, साक्षिसाक्ष्यान्वयव्यतिरेकः, आसजापायिः
तद्ववध्यन्वयन्यतिरेकः, दुःिपरमपरेमारपदान्धयश्यतिरेक इति ।
अचुघत्तव्याचरत्तान्वयन्यतिरेकः पश्च; । एतच्च सर्ववां वेदान्ता-
नक्रटतकौणां चतुलैश्चगीमीघां घाप्रतिदादितानाखषटक्चणमित्यभियु-
चाः । विस्तरस्तु बैदान्तकल्पलविकाचःमनुसन्धेयः ।
कमभाप्रां सुपुध्यवश्ां निह्षचिततुमुपकमते-- एवमिति । जीदस्ये ति । वि
शरामस्यानं सुषुध्यवश्चा इलनेनान्वयः । लद भयेति । वहुभयं, जाप्र्खभ्रोमयम् ।
जाधत्छप्रोभयकर्मक्षये कर्मणि कछीने । अन्यथा पुनः स्ाप्रान्तरान्ुपपिः । प्राणम-
नसोरेक्यममिप्रलाद- ज्ञान च्ाक्त्यवच्चछिन्नस्येति । एवं च तदेवैकं चस्तु कान-
द्ा्त्यवच्छिननमन्तः करण ्ुच्यते ज्रियाशक्तयवच्छिननं सप्राण इवधैवम् । बुद्धेः कार-
णास्मनावश्ानं सुपुप्रिरिति भराचीनलक्चणं प्रच्येऽतिष्याप्तमत उपलस्मघरिते सुषुपिक-
धणमाद-कारणेति । उपलभ, वृत्तिरूपं ज्ञानम् । ननु, सुपुप्रौ बिषया-
स्तरस्यातुमक्राभात इव सुखस्यानुभवामावात्कथं चु्ोत्वितस्य चुखन्नरगमत्ं आाद-~
तत्रेति । नतु विरिषवृत्तयुपेक्ष्य क्रिभिति ृ्तित्रयमङ्गीक्रियते व्रा्--अह्-
क्राराभावाचेवि । अदङ्काराभाव पव कतस्तत्राह--सुषुस्य मावैतति । सम्ध-
दायमनुन्ध्य बृ्तित्रथसुक्तं वस्तुतस्तु एकैव वृत्तिः । इदं च प्रतिपादितं शीपारैरै-
तसतिद्धौ मयापि वित्तृतमदैतसिद्धिरीक्षायं स्तिद्धिसाधके । उपलन्मपदकृयमाद-
छ
गिः
१, कपुस्तंक प्रालामावापद्मवेनेति ।
तकवमसिचाक्यार्थंनिर्णयः ७१
च्रत्तिरूपस्पेवि । नद, सपुप्रादिष प्रखयेऽपि धृतिः कल्पनीया तचह~- तन्नेति ।
प्रक्य इयथः ! सुपुतौ कि बीजं तत्राह-षहह चेति । परासः „ स्मरणम् । जनुः
भवं विनैव भवतु परामश (त्रा) जनन चव हति । नन्वयं पराम एव न
भवति, तन्तोदेखाभावादताह-अन्तःकरणेति 1 णवं चान्तःकरणोपरागकाली-
नालुभवजन्यस्मरण एव॒ कततोडेषो न स्मरणमात्र इति भावः । वस्तुतस्तु नैया-
चिक्तादिभिरपि परसरपिर्ततत्तारूस्मरणगाङ्गोकारान्न कषामपि च्मरणे हनत्तोहलनियम
श्याद- स्मरण हति । जाश्रदहद्ाथामिति । सुुष्यन्य ब्हितोत्तरश्चण इतिं
दोषः । अन्यथा किञ्ित्ारानन्तरे जघरत्यप्यस्वाप्तमिति प्रत्ययस्य नानुपपत्तिगन्धोऽ-
पीति धोच्यम् । दाव्दायभावेऽप्यनुमानमस्तु तत्राद्--लिङ्क भावनेति । इदय-
स्मगणविषयस्य देतोराधयस्ाहङ्कारस्य चिङ्गाभावैनैयर्थः । भवतु चा यथाकथंचि-
हङ्खं तथापि हेतौ रा्यस्ादङ्कारस्य सुपुष्यव्यवरहितक्षणेऽक्तिदरिच्यद-आखया-
सिचा चैति ¦ य॒पुपराबहङ्कार्य हीनस्वादिति भावः । तर्हि सरणे कथमहङ्का-
रभानं तनाह-- अहङ्कार स्त्विति । तस्य, अषङ्ारस्य । तर्हि भटमस्वाप्समिति
सामानाधिकरण्चप्रतीति; कथं तत्राह--म॒ग्वप् तिविस्याश्रय इति| एवं च
एकाश्यसामानाथिकरण्यसन्वन्धेन यश्चा चातिः' सत्ती समथायः सन्निति परय्ैः
चथा चा चक्तसम्बन्वैन मुखप्रतिविम्बाश्नचे दर्पणे हौ दिद्याध्यासेन रक्तं युतमिति
मलचच्तधा चत्थानसमयै साधिनचन्ये श्वापाहृक्काय्योः सरामानाविक्ररण्याचल्यय
हलर; । आश्नयतया, सुखाश्रयतया । नुः मचन्मतेऽदक्कार एव ज्ञानाश्रयो न तु
सा्षिचैतन्वं तत्राह--स्छतिसंदाचेति । वर्हि ज्ञानाधयो न अहङ्कारस्तराद--
अष्ङ्कारस्येति । नवु निवानकाभावास्ताङ्यं स्या्तत्ाह-प्रमात्वेनेवेत्यादि ।
एवद्चेदहङकारकारीनध्नमात्मकराव्दानुमिलयादौ का गतिखव्राह--अत् एवेति ।
एवमपि नामन्न्धत्युपासीतिव्यादौ का गतिसतजन्याया नामनि त्रम ्॑मस्वाभावा-
दिवाद--नामादिष्विलि । यथपि तस्याः प्रमात्ेऽपि न श्वतिः, अन्तः करणव्रत्ति-
त्वाल्थापि वस्तुगतिमनुरन्ध्य ज्ञानभिन्नत्वयुक्तमिति बोध्यम । तङक्तमिति ।
आनचारचै; शारीरकभाष्ये षति दोपः । दलम लि । एतेन मानसनज्ञान्वं तकंस्य प्र्युक्त-
मियर्थः । न्याप्यारोपेरोतति । तथा च नामनि अ्चदृष्िवितर्कोऽपि ननोचृत्ति-
विशेष एव न तु ज्ञानगियर्थः । अतं पदेति । कष्य ज्ञानविटश्टणमनोवृ्ति-
विक्ेषत्वादै वैयर्थःः । अचं खद्धितीये ब्रह्मणि निचिखवेदान्तानां तात्प बधारणा-
१, खगयोः पुष्ट तिं ।
द. नदुश्लकरे यथा स्योतिरिति 1
१. खपुरतकै यथा लात्तिः सती तरिं तमवाश्ः सत्निति प्रलय इतिं ॥
७६ -तष््वमसिवाक््यार्धनिणयः
नुक्ृको व्यापारविच्रौषो न श्रोत्रजन्यं ज्ञानं, शब्दः श्ुत्त इयादिप्रययसिद्धमिति |
ठक्तेऽ्यं हेतमाद--लस्येति । वेशन्तविचारस्वेलर्थः । एवं भाष्यकारंन्नौनदिधिरेष
निराङ्तो न तु धक्णादिविधिरिति आवः । चतुर्विधान्वयन्यतिदेकं द्दायति-
हज्ट्दपे्यादि । दच्पदार्थस्वद्ितीयात्मल्लरूपधकादाविशचद्धातुभवमात्रः । दर्य-
पदार्थवविद्यातत्कायैपञ्चभूततदारन्धानिं सवाण्यविशासम्बन्धश्च । हदयत्वं॑तु
छाच्णाजन्यद्रत्तिविषयस्वं राब्दाजन्यान्तःकरणपरिणामरूपश्चानविषयत्वं चा । न
चास्य छधणस्व ब्रह्मण्यतिढयातति; सुषुपिकाली नसुखाकायाविचाद््निविषयत्वादिति
वाच्यं, विषयत्वहपधर्मस्य क्षणस्य निर्म बह्मण्यशाचाच् । अविचात्र्ति-
विषवसंभावना तु सप्राकतिकररव, अतो नातिव्याप्तिः । ह्वितीये तु दक्षणेऽच्िव्याति-
संभावनैव नालति, अविचाव्रत्तेरन्वःकरणपरिणामस्वासम्भवरात् । नापि अवपादि"
जन्यान्तःकरणपरिणामरूपज्ञानविषयत्वादतिव्याप्निः तववस्ाश्रबणादिलन्यायां वर्ते
ज्ानभिन्नत्वस्व भन्थषएद्धिरेवोक्तसवात् । विषयत्वरूपधर्ममावाचं नायदश्चणेऽति-
व्यापि; । यद्यपि इवादिकाले दगादिमत्वैनान्त्रयः सुभिछह्तश्ोपि निलयानां चगादीनां
व्यतीरेकाप्रतिद्छा अन्वयच्यतीरेकासिद्धेस्यं भ्रन्थस्तकंपरतया व्याख्येयः । उक्तं च
गुरुचरणैः “चतुर्िधान्वयच्यतिरै का दितकरूपत्वा्' यनेन अन्येन । तकश्च, इकर
यदि हववभिननं न स्यात्त द्याभावकाक्ते हक्ञाो न स्वादि्यादिषूपः । दवमुत्त-
रतरापि बोध्यम् | परै जु ददयादिंकारै हगादिसत्त्वेनान्तरचतपेऽपि हगादिव्यतिरे-
काध्रसिद्धेम व्यतिरेके तात््चैम्, जपि तु अन्वय | एवमपि ववाप्तर्मदचटितत्वैल
सिद्धो दग्दयादिभेद इति वदन्ति । नव्या सङ्तुश्रुतपदस्यार्थव्चकुपधिनं॑दुष्य-
तीति न्येन दग्डद्रयान्वयश्नन्दो हदृद्ययोः कालिकसामानाधिकरण्यसुक््वा अच
दिष्टम्यतिरिक्तपदैनान्विततः सन दण्टद्4+ योरमाबं तचो रभावयोन्वौ पिरूपस्यान्वयस्या-
भवं च वक्ति । तेन चायमर्थो छटधः । धदा चदा कयं तवा तदा दमियादिन्याघ्वा
हद्यश्चम्बन्धिकालस्य रक्स्म्बन्यै छब्येषपि ददयस्य दयसम्बन्धिकाशटान्वयत्वा-
भावादुश्टद्यभिन्नं रम्ददवयो््वाप्रावपि तदभावयोटर्यात्यभावादिति दग्द्दयान्वय-
व्यतिरे कशब्दस्याथं बर्णयन्ति । वल्तुतस्तु च च दृदयं च टग्ददये, अन्वयश्च व्यति.
रेफ अन्वथव्यतिगेकौ । व्यतिरेकोऽपि सामान्याभावः, छटदययोरन्वयव्यति-
रेकाभ्यामन्वयश्नु यधासह्लयेन, ततश्च दगन्वयो टददचन्यतिरकस्तस्पाभान्याभाव
इलर्थो खच्धः । तथा च चदा ददयसामान्याभावस्तदा इगिति व्याप्तौ सिद्धायां क
दण्दूदययोरेक्यसम्भावना । एवं च सिद्धोऽदङ्कायादिभिन्न आात्मा । सिद्धे च माब-
रूपे आत्मनि जल्वबादोऽपि परान इति वदन्ति । एवं सिद्धेऽपि दसूषे आमनि तख
१, ज्गयोरुनिद्द््तिनिषकत्रा तु खप्रातिका एवेति। = ` [रि
तेत्वमसिवाकयार्धनिर्णयः ७३
जदत्वं न परिद्रतं परप्रकादयरधरूपजडत्वेऽपि तस्यानिबाहादत आदई--साक्वीति ।
एवं चाविद्योपलक्षित्तचैत्न्यर्पस्य साक्षिणः सखवपरधकादयत्वेन॑ खन्वषहारेऽन्यान-
पेश्व्वरूपस्वप्रकादयत्वे सिद्धे क जडत्वस्तन्भावनेतिं मारवः । साक्यं॑त्वविद्यावि-
सरसम्बन्धान्तं पूर्वोक्तं वेदितव्यम् । निरस्ते जडत्वे परिहटतै च शरन्यवद विज्ञानवादो
न निरसलस्वथा चागतं ्रणिकत्वमात्मनोऽत जाह- श्नागमापायी ति । आगमः ५
उत्पत्तिः । अपायः, विनादा; । तथा च उत्पत्तेराकस्मिकत्वाभावेन - तस्य॒ किञ्चि
सूर्वावधिभूतं कारणं चक्तन्यम् । एं विनाशस्यापि प्रतियोग्यतिरिक्तं कारणं च~
व्यम् । अन्यथोन्तरश्चणे विनाद्रापत्तेः । एवमपि तस्य कारणस्य जन्यत्वै तत्वापि का-
रणान्तरं त्था चानवद्या, अनस्तत्परिदारायानया शीतया नियर कारणस्य साध्यते |
यदा ्लागमापायि ततः पूर्वमवधिभृतं जह्य यदा चागसापाचिमासान्यामास्तदापि तव्-
वधिभूतं ब्रह्म | एवं श काङपर्छिदन्यत्वरूयमारतं निलत्वमात्ननः, तथाचन
कणिकत्वधात । अधवा श्रुणिकत्ववादिनाऽपरि नादास्योत्तरावध्याभवमूतं किञ्चि-
क्त्यं निराश्रयनादानुपपत्तेः, नाहापरन्पराकल्पने गौरवं च । अतो यदा आगमापायि
तदा हद्वधिमूतं द्म । यदा चागमापाचिन्यतिरैकन्तदापि चद्वधिभूतं वक्षेचवधरते-
रागतं कारुषरिच्छेदश्चल्यत्वरूपं नित्यत्वमात्मन इति सर्व॑ निरयम् । सर्वत्र चा.
भवोऽपि आत्मरूप एव, अतो न दैतापत्तिः । व्याद्नियहरतु यदा घटन्तदा कम्बुप्री-
वादिमानितिवचदृा ददयादिब्यतिरेकन्तदा इगादीति । एकस्यैव प्रकार मेदेनेति।
नन्वेतावत्ता पवन्धेन नियातुथवस्वरूप एवात्मेति नताङ्धयमतसमेनोपपादितं न सच-
खकूपं आत्मेति ततराद--हःखीति | दुःखी अन्तःफरणावच्छिन्नं चैतन्वमहङ्काो
घा परप्रेमास्पदं देदाकारानवच्छिन्नं सुखं निरतिश्यानन्दापरपर्वायः | एवं च
यदा दुःलिन्यतिरेकस्तदापि परमग्रेमास्पदृम्र् । अतः सिद्धं निदयवत्वादात्मनः सुख
रूपत्वमिति । नन्वेवमपि परिच्छि्त्वेन विनारित्वादिकमापतितमत आद-- असु.
घत्तेति । जनुन्रत्तत्वं, अलरुगतत्वमदयन्ताभाषरतियोगित्वं बा । इवं तु ब्रह्मण
एव न जडस्य । च्याच्॒त्तत्वं, अनलुगतत्वमयन्ताभावप्रतियोगित्वं वा । दं तु
लड न ब्रह्मणः । तथा च चदा व्वादरत्तव्यतिरेकस्तदानुदृत्तम् । अतः चिद्धमाल-
नोऽपरिचठननस्वमतश्च सिद्धमात्मनोऽविनारिष्थादिकमिति दिक् । तर्हि किं वेदान्त
शाले पन्चैव तका, न इ्याद--एतचेति । अभियुक्ताः, वेदान्तक्षाखनिषुणाः ।
१, छपुश्लकै खयर्क्छ्ाकत्वैनैत्ति ।
२, शपुश्तके तश्च जवः न परिहृतमिष्यनन्तरं खव्रकाद्वत्ये निद्धि क नडतवसम्भावनेतति भाव
हति तन्न हमश्चत्तम् ।
६. खगयुल्तद्योराकसिकतवापरम्सवैने तिं ।
प् तिं बिं [|
प्र तत््वमसिव्राक्यार्धनिर्णयः
तदेवं शुषुस्यवस्थायामस्त्यानन्द भोगस्तद्धोक्ता च सुषुस्यभिमानी
प्राज्ञ ह्युच्यते । प्रकर्वेणात्त्वात्तदानी विदोषावच्छेदा भावेन परष्ट-
ज्ञत्वा! । तदानीं चान्तःकरणस्य छयेऽपि तत्संस्कारेणावच्छेदान्न
जीवा-भावप्रसङ्गः, न वा सार्वज्ञापत्तिः । ई्वरांनेदयतिपादनं च
शारीरे दियाथभिमानरहितत्वेनोप्वारात्। संस्कारस्य च निमित्तका-
रचात्वेन साश््याथितकार्योपादानकोरावप्रवेरान्न तद्भेदेऽपि साक्षि-
जैदः । जागरणेत्वन्तःकरणस्य प्रमाभितकार्योपाद्ानकोरौ प्रवेदा-
चद्धेदैन पमातरमेदध एव । साक्षिण पव चाधिकोपाधिविदिष्टस्य
प्रसातत्वान्न प्रतिसन्धानादपपत्तिरिति ।
मात्मानपरमेदेऽपि भतिदेदं न भिद्यते ।
साक्षी वाद्याथेवद्यस्मात्स भत्पेतयुच्यते लतः ॥
व्यभिचारो मिथो यद्रत्वमाच्रादेः खसाश्षिकः
स्वमात्रा्यभावाथताश्लित्वान्न तथात्मनः ॥
(चर, जा. ना. वा. ३।४।५४-०५ )
हति बार्तिककारपादैवयवहारददायामपि साक्षिमेदनिराकरणात
सुषुौ तद्धेदकल्पनं केषाचिद्रवामोहभाश्रमित्यवधेयम् ।
प्ासक्धिकं समोप्य अकृतनतंखरति- तदेवमिति । *आनन्दुक् चैतोमुख-
्राज्ञ' इयादिश्चयवष्टम्भैन भोगं भोक्तारं च प्रतिपाद्य प्राज्ञदाब्दद्य योगार्थमाद्--
प्रकर्चेणोति । सकठविरषावच्छेदकाभावे जीवोपाधेरन्वःकरणच्वाप्यभावैन जीब-
नाञ्च; । शृश्वराभेदेन रईैश्वरवत् हषुप्रसय सार्धन्नं तं स्यादिति दाङ्कामपनुदति--
तदानीं चेति । तर्हि "सता सौम्य तदा सम्पन्नौ भवतिः द्रयादिशुतेः का गत्िरव
जआद--हंश्वरा भेदेति । एकाविद्या त्रतिविम्बर णको जीवः, विभ्वमीशर्ः, स
पव जीयो दृचिमद्न्लःकरणनिविष्ैः, पमाताऽन्वःकरणोपदहितः, साक्षी अन्तःकर-
णच । प्ाक्षिकोटौ व परवेद एकमरमादसुखादिकं सकलप्रमाव्वेदं स्यात्, एकस
भासकंस्व परति निस्दचैतन्वस्य सर्वत्ाप्यविदिष्ठत्वात । एव॑ चान्तःकरणस्य विद्ोषण-
त्नोपद्िव्वाभ्वां दैवा प्रवेश इतति केषाञ्चिन्मतं दषयति- संस्कारस्य चेति ।
साक््येति । साक्ष्याधितं यत्कार्यं खरणादिसद्धपादानं चक्तोराचिलयर्थः । संस्कारापे
१, तस्िभनैव दरमेदश्रतिपादनतिति पाठः च्रं जं चरमीचीनः।
३, प्षपुस्तकैडन्तःकरणवििोष्ट इतिं ।
३. ्गपुखकयोः प्रान्त धित्वादिति ।
तच्वमपसिव्राच्यार्धनिर्णयः ७५,
क्षया प्रमातुरुपाधेरन्तःकरणस्य वैटक्चण्यं पददायन्पमातृमैदमुषपादवति- जागरणे
स्थिति । नच, प्रमावृणामल्चभवाश्चयाणां यथा परसपर भैदस्तथा स्मतः सा्चिणोऽपि
भेदः श्रमादनिषट्तथा चानुभवरस्मरणयोरवैेयधिकरण्यान्न साश्चिणः सरणमत भाह--
साक्षिण एवेति (साक्षिण हति) । पत्तिसन्धानं, सरणम् । वस्तुतस्तु
-रमातुरुपाषैरन्तःकरणस्य साक्षयुपाधित्वानङ्गीकारे सककठभासकात्ताकषिणः भिन्नः
प्रसात्ता; तथां च कथं प्रमात्रानित्तकामभानं भासक्ात्िकृष्त्वात्तदसननिङषटभासने
चातिधसङ्गारदृत्त आद- साक्षिण एवेति । न चैवमपि प्रमातुः खप्रपन्नस्रा्षा-
त्कार इव प्रमोत्रन्तरप्रपच्वस्यापि साक्षात्कारः स्मात् पमात्रभिन्नसाध्चिणो भासक-
स्वादिति वाच्यम, यत्प्मात्रन्तःकरगे साश्चिपरतिविम्थं तस्यैव भाननियनेन सर्व
सामज्ञष्यात् । प्रमात्रभिन्नसाक्षिणो मासक्व्वादिष्युक्तेऽय वार्धिककारतम्यतिमाद--
मातमानेत्यादिना । देदभेदेन भअ्रमादतरसाणयोमेदेऽपि वाहयार्थो घदादि्यथा न
भिद्यते त्था साक्त्यपि न भिशते, ततत्तस्मात्कारणात् साक्षी ते तव आत्मा इयर्थः ।
व्वतिरेके दष्टान्तमाह--व्यभिचार इति | यथा परस्परं प्रमाद्रममाणममे-
याणां भैदः; सखसाक्षिकः अन्ञानाषच्छिन्नवैतन्वसाश्चिक इयर्थः । दान्तं प्रतिपाद्य
दाषटौन्तिकमाह-- न वधात्मन हति । तथात्मनः साक्षिणौ मेदो नासतीदयर्थः ।
भव्यां प्रतिज्ञायां देतुबाद-- सर्वेति । सकलटधमाणघ्रमा्रादीनां तेषाप्रभावानां च
लाधित्वादियर्थः । श्ुषुश्राविति । उुप्ावपीलर्थः । जागरणे साध्चिमेदाभावे कुवः
छपृप्रां साक्षिमद् इयन्वयः ।
ननु, इुःखमहमखाण्सिति कस्यचित्कदाचित्परामर्दात्छुषुततौ
चः खाल भवीऽष्यस्तु । नः, तदानीं दुःख्रसामग्रीविरदेण तद भावात् ।
छ खस्य चारमसखरूपत्वेन निच्यत्वात्त् चाय्थादैरसमीचौनत्ये च धुःखमि-
त्युपचारात् दुःखंमहमस्ाप्समिति प्रलयोपपत्तिः। अथवा अवस्था-
यस्यापि जैदिध्याद्गीकारात्मुषुप्ताचपि ५ । तथा हि पमा-
ज्ञानं जाप्रल्ञाग्रत्, छक्तिरजतादिविश्रम्रो जाग्रल्छमः, ्मादिना
स्तवघी नावोः जाग्रत्छुषुधिः । एवं खमे मच्रादिधासिः खम्रजाग्रत् ,
खप्रेऽपि खभ्रो मया दृष्ट ति वुद्धि; खभखभः, जाग्रदरायां कथयितुं
न चाक््यते खञ्नाचस्यायां च यत्किश्चिदनुभूथते तत्खमस्रषुिः । एवं
१, कपृपुके भात्तकापरजिङषभातनेचाति सङ्गादिति, वपुले च भासन्त तिङरत्वात्तदनासने
च्ातिप्रस्रल्ञादिति पाडः ।
१. क पुल्लके भात्तकमित्येकलादिति वाच्यमिति पाठः घ नास्निम्सश्दर पै धुत्त ।
३, कपुजके तेश्रीनभावं इति पाटः म्र नं त्रमीच्नीनः।
७§ तत्वमसिवाकयार्धनिर्णयः
सखुषुस्यवस्ायामपि सात्विकी या शखाकारा चघ्रत्तिः सा सरषुषि-
जाश्नत्, तदनन्तरं सुखखमहमखाप्समिति परामदौः; तन्नैव या
राजसी दत्तिः सा सुषुधिखम्ः, तदनन्तरमेव दुःषखमहमखाप्स-
मिति परामर्ोपपत्तिः; तत्रैव या तामसी वत्तिः सा सुषुपिः,
तदनन्तरं गादं मृढोऽहमासमिति परामशः । यथा चैतत्तथा वासि-
छवार्तिकागतादौ स्पष्टम् ।
सुखमहगखवाप्समिति परार्था स॒षुधौ युखानुभवलथा दु; खातुभवोष्यस्ति-
याङ्कते-- नन्विति । परिदरति-न इति । हेतुमाद- तदानीमिति । नल,
तदानीं दुःखाभावेन तदनुभवाभावात्कथं दुःलपयामरीसतव्राद--्राययादैरिति ।
वस्तुतो दुःखाभावैऽपि दुःखोपवचारात्तत्परामदौ इयर्थः । ठपत्रारमसहमानी वार्ति.
कोक्तरीसा समाधातं षष्ठाध्यायान्तरगत्योतिव्रक्षणखमर्थमाद- अथवति । अ~
बस्यातैविष्यं वक्तुं प्रथमतः जाघद्वश्याण्ादीनान्तर्गतां जाप्रववस्थामाद~-प्रमा-~
ज्ञानमिति । कमपराप्रां चखप्रान्तर्मतां जाप्दवसखामाह--पवमिति । क्रमपरा्ा
छगुष्वन्तरं तां जाम्रदवस्यामाद--एवं छुषु्राविति । इदमर्थ॒प्रमाणीकर्तुमाद--
यथा चैतदिति।
एवमध्याटमं विश्वः, जधिधतं विरा, अधिदैवं विष्णुः; अध्यात्मं
जाग्रत्, अधिदैवं पाठनं, अधिभूतं सत्त्वगुणः । एवमध्यातमं तैजसः,
अधिभूतं हिरप्यग जः, अधिदैवं जह्मा; अध्याहमं खः, अधिदैवं
खष्टिः, अधिभूतं रजोगुणः । एवमध्यात्मं पाज्ञः, अधिमूतमन्या-
छतं, अधिदैवं र्दः; अध्यात्मं सुषुधिः, अधिदैवं प्रकयः, अधिभूतं
तमोशणः । एवसध्यात्माधिभताधिदेवानामेकत्वास्यणवावयवच्रय-
सहितानामेतेषामुपदितानासैक्योपासनया हिरण्यग र्मलोकमातिः,
अन्तःकरणद्रुद्धिद्वारा कममुक्तिश्च । पतत्सर्वोपाधिनिराकरणेन साः
क्षिचै्न्यभाच्नज्ञानैन तु साक्लादेव मोश्च इति । तदेवं च्रयाणामप्यव-
स्थात्रयसदहितानां विश्वतेजसपाज्ञानामविचात्मकत्वात् ददयत्वेन
शव व ८
पवं व्यवहारतः सबेव्यवस्योपपत्ते; घ : कस्या जच्यवस्थाया
अभावान्न काप्यनुपपत्तिः । विस्तरेण चैतत पल्चितमस्माभिर्वेदान्त-
कल्पलतिकायामित्युपरम्यते ॥ ८ ॥
प्रसङ्गाद्न्तःकरणद्यु्छवं वार्तिकाथुक्ताटपा सनानाद--पवन्रध्याह्ममिति ।
तत्त्वमसिवाक्यार्धनिर्णयः ७
कमञुक्तयुपाययुक्त्वा साश्ान्य॒च्युपायमाष्ट-- एतत्सव पाधी ति । भविात्मकत्वा-
दिदयादि द्ितीयारषस्याधं बदन्ुपसंहरति-- तदेवं चयाणामिति | इलष्ठनः शोकः ।
ननु, जाग्रत्लमस्नषुष्यवस्थासहितानां चयाणासपि तदभिमानिनां
मिथ्यात्वात्, तत्साक्चिणोऽपि भिथ्वालं स्यात्, भविदोषात्, इत्या-
राङ्क विद्रोषानिधानेन साक्षिणः सव्यत्वमाद--
अपि व्यापकलाद्धितत्वप्रयोगात्
खतः सिद्धभावादनन्याश्चरयल्वात् ।
जगत्तुच्छमेतत्समस्तं तदन्यत्
तदेकोऽवरिष्टः रिवः केवरोऽहम् ॥ ९ ॥
धन दृषटेद्र्टारं परयेः' (चर. भ. ३।४।२) इति साक्षिणं पक्रत्य
'अतोऽन्यदातम्ः ( सैव ) इति श्रुते; साक्षिणोऽन्यत्साक्षयं सर्च ज-
गच्चुच्छं, न तु साक्षी । बाघावधित्वात््नमाधिष्ठानतया ज्ञात्रस्वाच,
तद्राधयराहका मावादेव्यायनुक्तसमुचयाैः अपिच्ाच्छ्ः। अथ यदल्पं
तन्मर्घयम्ः (छां. ५२४।१) हति श्चुतेः परिच्छिन्नत्वतुच्छत्वयोः सम-
न्या्त्वात्परिच्छिन्नत्वनिच्रस्या तुच्छत्यनिदत्िरिव्याह-व्यापकलत्वा-
दिति । “सर्व लल्विद ब्रह्म ( छ. ३।१४।१) इति सवौत्मत्वोपदेदोन
वैदाकालापरिचछन्नत्वात्, आकाञ्ादीनां च देराकालापरिच्छिन्नल्वे-
उप्यापेक्िकमहत्वेन व्याचकत्वोपचारात् । नज, सर्ब॑व्यापकत्वेन
निच्त्वाद्वावरूपत्वाचात्मा न दुःखवनिघरृत्तिरूपः, नापि सुखरूप, ख-
चस्यानित्यत्वेन नित्यात्मरूपत्वाुपपत्तेः, तथा चात्मखरूपो मोक्षो-
ऽपुरुषा्ं॑पवेव्याचाङ्ू्य, न, इलयाह--दहितत्वप्रयोगादिति । हितत्वं;
पुरुषा्ैत्वम् । तदेतत्पेयः पुत्रात्मेयो वित्तासपेयोऽन्यस्मात्सच॑स्माठ्-
नन्तरतरं चद्यमात्मेतिः र. आ. १४८), धयो वै भरमा तत्सुण्व'
(छां. ७।२३।१ ), (एष एव परम आनन्दः (बृ, जा. ४।३।द२ );
“विज्ञानमानन्दं ज्रह्मः (ब्रू. आ, ३।९।९८ ) इत्यादि श्चुतिभ्यस्तस्य
परमानन्दूपत्योपदेदात् । तस्य च नित्यत्वेऽपि लोके धमेजन्यत-
त्दन्तःकरणन्त्तिच्यजङ्गयतया तवुत्पत्तिविनाद्रो पचारः । अज्ञानव्य-
हितस्य च तस्यापा्स्येव ज्ञानमात्राद विद्या निचत्या परा्तिरिव भवः
तीति तदृदेदोन खस॒श्चुपचच्युपपत्तिः । अध्यस्तस्य प्रपञ्चस्य दुःख
11. तत्वमसिवाक्यार्धनिर्णयः
खरूपस्याधिष्ठानस्वात् स एवा भावं इति दुःखा भावरूपत्वेनापि ततस्य
पुरुषाला ।
नवबनश्नोकख्यावतारिकामाद- ननु जाग्रदिति । अपीति । प्रथमं षदं
व्याकरोति-न दृष्द्रष्टारमिति । इयं तु॒दारण्यकीयदषल्ततरा्णस्ा
श्रतिः । छन्दोग्वसप्रमाध्यायल्ं "सथ चदल्यप्' दतिवाच्यमादाच व्यापकत्वादिति पदं
च्याकरोति-अधैति । शान्दोग्वहतीयाध्याचस्थं "सर्वं खलुः इति वाक्यमादाय
व्यापकल्थं साधयत्ि--श्तर्यमिति । नच, पैश्षकाखपरिच्छेदशूल्यतं चैल्वापकल्वं
तर्हिं कथमाकारशादेठ्यापकत्वप्था तत्ाद-जाकाद्ादीनां चेति । नन्तेवम-
प्यसिन्श्ाचे प्रवृ्तिनं युक्ता त्त्मत्तिपायमोक्षस्यापुरुषार्धत्वाविव्यारछ्य परिहरति--
नलु, खवेञ्यापकस्वेत्या दिना । पुरुषार्थत्वं, परमपुरषार्थत्वम् । परनपुरुषा-
्थत्वे उद्दारण्यकमथमाध्यायहितीयत्राह्यणस्थं वाक्यं भ्रमाणमाद- तदेतदिति ।
तत्रैवं छान्दोग्यसप्तमाध्वाचख्वाक्यं भमाणयति--यो वै भूमेति । इददारण्यक-
वाक्वमद््-- एष एव परमानन्ड् इति विज्ञान मानन्द इति च । ननु
गुखस्याच्मखरूपन्वेन निलयत्वांत्कथमुल्यन्न शुखं विनं दुखमिवयादिप्रययस्ततराह--
तस्य चेतति | यथा पाकान्नीरो घटो नष्टः, रक्त उत्पन्न इत्र नाकोत्पादयोर्मौङश्क-
चिषयत््ं दथा वां ककारो नष इव्यादेनां कस्य ञ्यञ्जकवायुचिषचकलत्वं चथा वा चटा-
पस्चरणकष्ठीनधरौ नासतीतिप्रल्ययस्य घटसंयोगध्वंस विषयकत्वं तथा सुखं नष्टभियादि-
प्रययस्य ्यञ्नकनर तिष्व सविपयकत्वमियर्थः । यथप्युक्तमात्मश्वरूपस्य मोश्स्याप्वष्-
रवार्थत्वान् प्रदृत्तितत्रा्--अन्ञानध्यवदहितसय चेति । दवं त॒ मच्छतचिद्धा-
न्तभास्करादौ विविच्य भरकटितम् । स्ुलात्मकत्वेन प्रवृ्तिमुपपाय् दुः खाभावस्वैनाप्यु-
पपाद्यति-अध्यस्तस्यैति ।
नलु, मोक्षे छं संवेद्यते न वां । नायः, तदानीं देदेद्धिथादययमा-
वेन तद्यज्ञकाभावात्, व्यश्ञकाभावेऽपि तत्संवेदनाभ्युपगमे संसार-
दशाथामपि तथा प्रसङ्गात्। न दितीयः, अपुरषार्थत्वापत्तेः., ज्ञायमा-
नस्यैव तस्य पुरुषायत्वात्। अत एव चार्करातद्धोजिनोरिवैतिः वैष्णवं
मन्यमानानासुद्धार इति चेत्, न, हव्याह-खतः सिद्ध भावादिति ।
खप्रकाराक्ञानरूपत्वादिव्वः । थ्यपि संसारददायामविचाच्रतरूप-
ह्वादार्मा परमानन्डरूपतया न प्रधते तथापि तत्वविच्ययाऽविद्या-
१. क्यु घललचेदनं वियते न वा इतिं पाटः ॥
द, खिद व्र्गगरधोषतद्धो निगितं ।
तत्त्वमसिचाक्यार्थनिर्णयः ७१९
निचृन्तौ खध्रकाद्रातया खयमेव परमानन्दशूपेण परकाक्चत इति न
व्यश्ञकापेश्ा । नु, सुखस्य खप्रकाद्ाज्ञानरूपत्वेऽपि नात्मषूपता,
ज्ञानस्य धात्वथेरूपतया क्रियात्वेन साश्रयत्वात् जानामीति प्रतीतेः;
ज्ञनमहमस्मीद्यप्रतीतेख्च । तथा च कथमद्रैतवाद् इ्याद्रा्य, न,
इत्याह-अनन्याश्नयत्वादिति । 'यत्साश्चादपरोश्नाद्रह्म य आस्मा स-
वान्तरः' (र, आ. ३।४।१ ), (सद्यं ज्ञानमनन्तं च्रह्मः (तै, २।१),
"विज्ञानमानन्दं जच्यः ( बर. आ- ३।९।२८ ) इव्यादि श्तेः खचकाचा
ज्ञानानन्दरूप एवात्मा, अन्तःकरषातादात्म्याध्यासेन च तड्त्तौ
ज्ञानाध्यासाज्ञानामीति तदाश्नयत्वप्रतीतिः । धात्वत्वम॒ल्पत्तिवि-
नादावच््वं चान्तःकरणवृत्तेरेव इति ज्ञपिरूपमुख्यज्ञानस्य सर्कधि-
छानत्वेनान्याश्चयत्वानावान्न द्वैतापत्तिः । तेन ज्ञानस्चुस्वात्मक
आत्ना सत्वस्तद्विन्नं च स्वं जगद सत्यमिति सिद्धम ॥ ९॥
तत्संवेद नाभ्युपगमे, असण्डानन्दसा्टात्काराभ्युपगमे' । संसारदशाया-
मितिं । आवरणकारे चन्वनस्॑योगोत्तरकाहीनपुखामिन्यत्िवदखण्डपरमानन्द्+
साक्षात्कारमसङ्गः स्यादियर्थः । हेत॒माह-जानामीतिं । भाश्नचत्नत्तन्चन्देन
ज्ञानवान् ज्ञानाभयच्वं बेर; । ज्ञानस्य साध्वत्र ` अतीतिभरुषन्यस्यात्मनो ज्ञानारपत्वे
चाधकमाद-- ज्ञानमिति । वददारण्यककद्ोढोषस्तवरा मणयो ्वाच्चमाह- यस्ता
क्नादि्याद्यं स्बान्तर इच्यन्तम्र | नैत्तिरीयकत्रद्मवह्ीस्यवाक्यभाह- सत्यं
ज्ञानमिति । ब्हदारण्यकपच्चमध्यायखवात्यमाद--बिज्ञान मानन्ढमिति ।
यद्यात्मस््रूपं ज्ञानं तरिं जानामीतिप्रच्ययसाध्षिकल्ञानाश्चचतवं कथं तव्राह--अन्तः-
करणेति । तद्गत्तौ, अन्व;करणयृत्तौ । एवमप्वात्मख्लरपज्ञानस्य धालवर्धत्वं कर्थ
तत्राह--धात्व्थत्वमिति । यदप्युक्तं कथमद्रैववादलवाद--हति ज्ञधिरू्पेति ।
वपसंद्रति- तैन ज्ञान इति । इति नवमः शोकः ।
नल, सवस्य जगतस्तुच्छत्वे तन्निवेधेनात्मत्त्वपतिपत्तिर्न स्वात् ।
न हि दादाविषाणं निषिध्यते, कचित्यममित्तं कचिन्निषिध्यतत इति
न्यायात् । तवा च निषेधानुपपक््यैव न जगतरतुच्छत्वमिति, न,
इच्याह--
१, कपर पुस्तके भअल्रन्डसक्नाकाराप्युप्रयन इति ।
२. खपुर ज्ञाना्रयततवं चैत्यं इति ।
३. तस्मितैव ब्ञानघ्माधगल्म इति ।
८१ तस्वमसिव क्यार्थनिर्णयः
न चैकं तदन्यद्वितीयं कुतः स्वात्
न वा केवलं न चाकेवरत्वम् ।
न श्रुन्यं न चाश्रुन्यमद्रैतकल्वात्
कंथं सवैवेदान्तसिद्धं बरवीमि ॥ १० ॥
एकत्वसङ्यायोगि एकम् । तदपेश्चावुद्धिजन्यद्वित्वसज्खायोगि
द्वितीयम् । लत एकाभावे द्वितीषं कुतः स्यात् । दिततीयं च त्रृतीया-
दीनामप्युपलक्षणम् । ननु, "एकमेवाद्वितीयम्" ( गं. ६।१।१) इति
शव्या एकत्वं परतिधावचते । न, इव्याष्-न चां केवलत्वमिति । केवलः
त्वमेकल्वं, तस्याविदययकत्वास् । यच्यात्मन एकत्वं खुल्या न प्रतिपाद्यते,
तहिं पच्यक्षादिपमाणकद्राए्व नैकत्वं स्यादिति चेतत्, न, इत्याह--न
चाक्रेवलत्वमिति । अकेवद्टत्वभनेकत्वं, "नेह नानास्ति किञ्चन: (च.
आ. ४।४।१९ ), "एकमेवाद्धितीयम्' ( छां, ६।२।१), "अधात आदेदो
नेति नेति (ब्. आ. २।३।६) इत्यादि श्रुतिभ्यः । तर्द सर्व॑प्रति-
पेधाच्छन्यमेव स्यादिति, न, इत्याह -न न्यमिति, 'जसन्नेव से भ-
वति असद्रद्येति वेद चैत, अस्ति ज्रह्येति चेद्द् सन्तमेनं तत्तो वि-
दुरिति, (तै. २।६), "खलं ज्ञानभनन्तं ब्रह्मः (सैव २।१) 'सदैव
सोम्येदमग्र आसीत् (छां. ६।२।१ ) इच्युपक्रम्य 'पेतदात्म्यमिं
सर्व तत्स्य स आत्मा त्वमसि" (सैव, ६।८।७) इव्यादि श्रुतिभिः
सव्यत्वपतिपादनात्, स्श्नमाधिष्टानत्वात्सर्ववाधावधित्वाच | तर्हि
सत्यत्वज्ञानत्वादिधमंवदपि स्यात्, न, इयाह-न चाद्यन्यमिति ।
एकमद्वितीयमिति पदद्रयेन स्वभेदप्रतिषेषेऽप्येवकारेण घर्म॑ध-
्भिभावादिभेदाभमेदपतिषेधात् । सवैन्न हेतुमाह-अद्रैतकत्वादिति ।
द्विधा इतं द्रीं, तस्य नावो द्वैतम् । तदुक्तं वातिके -णद्विषेतं द्वीतमि-
व्याहस्तद्धाबो द्रैतमुच्यते' (बू- आ. भा. वा. ४।३।१८०७) इति । न
विद्यते द्वैतं द्विधामावो यत्र तवद्रैतमिव्यक्षराथः । "सिल एको -
छाऽद्रैतः" (ब्र, आ. ४।३।३२) इति छते: । प्रतियो गिज्ञानस्मैव खाघ-
वेना ाचबुद्धौ कारणत्वात् दवैतस्यानिवचनीयत्वाङ्ीकारेण प्रवश्ला-
दिवे्यत्वाच्रिषेधोपपत्तिरित्यथः । तर््यतादरा का अङ्लिनिर्ेदोन
रतिपाद्यताभिति, न, इत्याह-कथं ब्रवीमीति । ` पे? अद्र.
तन्त्वमसिचाक्वार्धनिर्वाचः ८१
तकत्वेन वागविषयत्वात्, "अवचनेनैव प्रोवाच (चर, उ. ५),
भ्यततो वाचो निवतैन्ते अभ्राप्य मनसा खह' ( तै. २।४ ), "न विक्ञा-
तेर्विज्ञातारं बिजानीयाः' (त्रु. जा, ३।४।२) इत्यादि श्रुतिभ्यः ।
वाग विषयत्वे कथं वेदान्तानां त्र प्रामाण्यमिति चेत्+ न, अवि
चयेऽप्यार्मनि तदाकारशत्तिमातरेण नदवियानिदनेकल्वादि्याह-
सर्ववेदान्तसिद्धमिति । ततथा च श्युतिः-चस्यामतं तस्य शतं मलं
यस्य न चेद् खः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजाननाम्ः
(केन, २३), (यन्मनसा न मनुते येनाह्ु्नो मल, तदेव व्रह्म त्वं वि-
द्धि नेदं घदिदस्रषासते' (सैव, १५.) इत्यादिर विषयत्वमात्मनो द-
हायति । तदेवं वेष्ठान्तवाकयजन्याखचव्डाकारघुत्या अविद्यानिद्त्तौ
तत्कल्पितसकलानथनिघ्त्तौ परभानन्दरूवःखन् क्रलकरत्यो भव-
लीति सिद्धम् ॥ १० ॥
दाम श्नौकमवतारयति- ननन सयैस्येति । चदन्यदितीयं तः स्यादिति व्याकर
(आदह)-- न चैकमि तिं | वात्त्यखमेकपदं व्याकरोति--एकः्वसद्खयायो गि एक
मिति | न चानेकत्वमिति' ( ? चकेवलव्वमिति ) पतिज्ञाथां बरहशारण्यकपच्राध्यायस्ध-
वाक्यं कठवदटीस्थं च हैतुत्येनाह-- नेह नानैति । छन्दौग्यषछठाध्यायीयवाक्यनाह
एकमैवाद्विततीयसिति । "सदैव सोम्येदमपर आसीत , इद्यादि द दारण्यकी यचलु-
थाष्यायस्यमूतामूर्तना्मणवर्तिवाक्यमपि ततैव देुत्वमा(तेना)द-- अधात इति ।
तैत्तिरीयकतङ्गावह्ठीखवाक्यमाद -असंन्नेवेति । सल्यत्वै तैत्तिरीवक्वाक्यञुदाद-
रति- सत्यमिति । छान्दोग्यवाक्यमाद-खदेवेति | श्हुदारण्यकीयपद्ठा-
ध्यायीयञ्योतिर्नद्यणवर्विवाक्यमाद-सछि् एक इति । यदपि कचित्मरमितं-
कचिच्निपिध्यत इद्यनेन प्रतियोगिप्रमाःयेनं कारणत्वमुक्तं तदपनुर्ति-प्रतियोगि-
ज्ञानस्यैवेति । यदप्युक्तं निषेधानुपपतत्यैव न जगतम्तुच्छत्वं ततराद-द्वैतस्येति।
किमाश्ेप इति । बाग्बिषयत्नं न।सीयर्ध; । पतदेवाद--अद्रैतकत्वेनेतिं ।
बागविषयस्वे हेतुत्वेन श्रतिमुदादरति-- अव चनेनैवेत्ति । बह्मवदटीखवाक्थम।६--
यत्त॒ इति । उवस्तत्राक्मणस्यवाक्वमाद-- न विज्ञातेरिति । बवागविचयत्व
हति । एवं च ब्रह्मणः स्ाल्रभतिपाद्त्वं व्याहृतमिति भविः । तदाक्रारेति । वत्तेस्त-
दाकारत्वं न तु ज्ञानावचवत्वं बह्मणः। एवं च नाप्रामाण्यं वेडान्तस्येति भावः । केनश्ि-
१, कष्पुस्तङ त वानेकत्वमित्तिं ।
२. कगपु्तके ्ात्वेन कारणतवमुक्तिच्यनन्तरं तदगमधं तदेवाह -अदतकयैनेती ति । तस्माच -
किविदर्धंो घौ भवति ।
११ प्रि नि
८१ तत्वमधिवाक्यर्थनिर्णयः
तवाक्यनाद--चस्यामतमिति । तत्र घाक्यान्तरमाद--यन्मनसेति । अन्यस्य
प्यवसितं परमपुदषार्धप्रयोजनतयुपसंदारव्याजेनाद-- तदेवमिति ।
न स्तौमि तं व्यासमदोषमर्थं सम्यङ न सू्रैरपि यो चवन्ध ।
विनापि तैः सद्कथित्राखिला्थ तं दाङ्करं स्तौमिं सुरेश्वरं च ॥ १॥
लघुरपि बहर्थवहंश्चिन्तामणिरिव निवम्धोऽयम् ।
मधुसखढनेन शरुनिना विदितो शणिनां विनोदाय ॥ २॥
यदच्र सौष्ठवं किचित्तद्भरोरेव मै न दि ।
यदच्रासौषटवं किञित्तन्मसैव गुरोनं दहि ॥ ३ ॥
वहुधाचनया मयाऽयमल्पो बलभद्रस्य करुते कतो निवन्धः ।
यदवुष्टमिहास्ति यच्च दुष्टं तबुदाराः सुधियो विवेचयन्तु ॥४॥
हृति श्रीमत्परमरहंखपरिव्राजकाचार्यश्ची विभ्वेश्वरसरखती भगव-
त्पूञ्यपादद्िष्यश्रीमधुसूदनसरस्वती विरचितः सिद्धान्तविन्दुनामा
न्थः; समाप्न;।
सखन्याख्यातुशशोकीकर्तुः प्रकृतवेदान्तलाखलध्रधानीभूतवार्पि ककत नुतिहपम-
यन्तमङ्गलं सम्यकतमन्थपसिद्धये करोति-न स्तौमीति। तं व्यासं न स्तौमि अरो
वमर्य सुरैरपि (यो)न सस्यग्बवन्ध, तैः सुतैर्विनाऽपि पथिताखिलायं तं प्रसिद्धं दाङ्रं
सुरेरं च स्तौमीति सन्वन्धः । अयं वार्थो मौक्तिकादिः । प्रकृतस्न्धामिवेवं च सूत्र
तुखादिभवं पदसमूहृरूपं च उन्धनं संयोगविदोषरशटपनिबन्धन च तथा संयथनमपि ।
अत्र ैतारशश्टैवमदहिमद्योलनमर्थवन्धनसमर्वैः सूतरैरप्यर्थवन्धनासमर्वात् व्यासात् +
चन्धनसामभीतात्रं विना इृतासखिखार्धपथनपकाक्चनलूपविभावनाटङ्कारशोत्यं दल ्मोकी-
न्याल्यानकतसभिक्यल्पन्यतिरेकालङ्काररूपं ज्यज्कयमिति वोध्यमरं । जय प्रवर्तक-
ज्ञानसम्पत्तये चिन्तामणिसाम्येन स्वछ्तघ्न्थोत्कषं प्रतिपादयत्ति-छघ्रुरिति ।
खाधवमपषृष्टगुसत्वं बाहुल्याभावश्च । अर्थः # स्वगीदिः प्रक्तयन्थाभिवैवं च |
सुनिना, मननर्शेन । एतावता दघुतरपरतत्रन्थाद्रहथंमतिपतया विनोदरूपं प्रयो-
जनमनवद्यमावेरितम् । अत्रच सौघ्ठवच्च गुरषरम्परातिद्धःवद्योदनेन विपरी तसम्भाव-
नया असौठवस्यासत्तवेऽपि ख्वकृतत्वप्रयनेन खाविनयं प्रयाचे यदचेति ।
किशित्, अनिर्वाच्यं, किचित्खल्पं । गुरोनं हि यनेन सम्यग्गुणहपदेशभाजो
ममापि चदस्न्भावितमेवेत्ति ध्वनितम् । खस्य महतोऽपि टघुतरनितन्धस्चनीयन्युनतां
१, कुशे नौमोषि षादः। =
२. तसिन्नेवं अदवर्धंकर् इतिं ।
३. गवोः चत्तस्वेनेति ।
सन्त्वासिकाक्यार्धनिर्णयः ३
दिष्यसमीदितसम्यादनै सदिषगोः परमका दणिकत्वं श्वस्य परतिपादयति--वह्ुया-
चनयेति । बलभद्रः, भद्राचायः कथचन संस्यरभक्तिः चिष्यै; परमवेदान्तशाखे
निष्णातः
तं न स्तौमि विधिं वदीयजकर्थावध्यस्तदैं कचित्
मर्तं जश्न कदाचिदेव विवुेन्पं न वा भ्यते ।
ततं बन्दे मधुुदनं यदुदिते बिन्दौ चिवानन्दित
ब्रह्म खायि सदा मुदैव विवुधैनूनं समाङभ्यते ॥ १ ॥
बाहां विषहितास्तयापि च गुरोः चंदर्भगमा निरो
युध्यन्ते किट कैध्िदैव प्रुचिरादुदैः समृद्धैरपि ।
तस्मादत्र निगरदेनर्थ्हणे" भचोतचन्ती च्छु
भूवः श्रीपुरेषोत्तमप्रणिदिता बाणी समुन्नृम्भते ॥ २॥
यद्नाखूयार्नैनिरस्तदोषमचियादुद्घ्यमानं बुधै-
यैः सिद्धान्ते दुरन्तसिन्धुमकरो दाष विन्द् पमर्म् ।
सम्यग्डव्यसुदेयौनाच विंकसद्राणिध्रलीतभियै
निर्व्याजं मधुसुदनाय गुस्वै तस्मै परस्मै नमः ॥ ३ ॥
अमन्याज्नुधिध्ान्तैर्यदयतां चिनुयैरिदं ।
चिन्दुसन्दरीपनाभ्यासे युक्तिमौक्तिकपंक्तयः ॥ ४ ॥
इति श्रीमधुसदनसरखती श्रीपाद दिष्यपुरुषोत्तमविरवितो विन्दुंवीपनाख्यो
चन्थः । भ्रीर्तं |
=-= ययास्य
- कपुराके सम्पादने न सदिष्णोरिति शपुश्तकै च त्म्पादनेऽप्रदिष्णौरिति ।
. तयौरेव सम्यगभक्रदचिष्य दति ।
+ गपुस्वके प्रदीपजधाविति ।
„ कंषूपुल्लकते निग्रद्यनिति ।
जसिनेवार्थगहनिति ।
„ गपुस्तकषे प्रश्चिष्टमानं चिशादिति ।
„ तद्धित श्रचया्यान १तति।
€, तस्िन्नेव चिन्द्रुभयन्निति । ।
९. खगपुत्तच्योरीदगः एाटः--इति घौमघुसू्नतरलतीधौ घ्री परततरखतीपुर्यवादक्तिष्वपर महस
परितराकाचार्यत्रीपुषोत्तमसरखती्रीवादविर चित्तो विनदुंीपनःख्यो भ्रन्थः समाप्तः । धीरस्तु ।
ह नवगः ह चू न्त न्वा न्क
4170108 06६ [आतल 9 01018105,
(र नाण,
भवत्तरत्म्रु
सह्भघ्तमात्रः पुरषः =,
अणोरणीयान् =+
श्तं एवं चोदना ,,,
अत्न एव्र चोपमा ,,,
अत्तोऽम्बदार्तैम् „९
कत्र पित्राष्पितता „,
भव् यदुत्समरू नि
सथोत्त भवेव ,,,
कृष्टो दृटा ६४
कच्यस्तमेक हि „^,
ऋतरुततैन हि ज
अनेन जीचैन नर
अन्यवात्रुपपत्निश्चित, ...
अयमात्मा बह्मा ०,
खयमेव दि नौऽनरधंः
अवचनेनैतर परौवाच ,,,
अभरिनाप्री वा भदै ,,.
अभस्यात्र्ताननुगल्वप्र त
ाच्वमस्पशरम्
खप्रच्ैव स मवत्ति ...
शस्पूलमनच्कप् = =,,
शं ब्रह्मास्मि =,
लाादाचत्छर्षगत्तः „,,
क्रामन्ति चं धिः
आआरा्मात्नो श्वत ,,.
इन्द्रो मायाभिः ५
एकषा बहूषा =,
एकमेवाद्वित्रीयम्र् ..-
एतदु प्रमेवम् 0
एष एवं परम आनन्दः
पितदात्म्यमिदम् = ,,*
कामः संक्पादीन् =.
चिन्मदस्व द्वितीयश्च ,*,
ज्यावनाकाक्रात्त् *,,
तत्वमक्ति -,* भ
#। षर ति [| विं )
४६
ध ६.४द्
#॥ 1
„ १६५४१८६०
॥ 1
#\
8.71
¶८ |
५३
#॥3-
३१४६,
जवत्तणन्रु
तत्छट्ा तदैव धि
तदैतघ्नियः पुजार =...
तदेतद्रह्मपू्वैन्
तदैक्षत बहु खाप ,,,
| त्रश्रघां नद्रामत्छवं ...
तरमेव अन्तम £
तमेव विदित्वा „^
तपति क्लोम ,,,
तच्मह्धा पतनात्, ++
कैजोमयी बाद ~,
निषुरछर्वत ह
लिड चिकततमर् ,.
दिश्चः श्रोच्म्
कैवत्मग्राचिप्र् ,,,
दविचेततं दरीतम्र ="
न छु तद्धितीयप्र् ..
त दृद््टासम् ,ू
न निरोधो न चोप्परततिः
न विज्ातेरबिज्रतारम्...
नद्विग्ररैष्टः ,-,
नान्योऽतोऽच्ि ,,,
नीहारेण प्रावृतः
नैह नानाडइर्ि +,
पश्ठौकतपन्नमहाभूतानि
परकषज्ञानतौ र
पफखवासतिपौ १५,
बुदधगगेन र
जद्न बा दषुमभ्र ,-
ननवैद्ममूतम्
त्राद्मणौ यलैत्त ,,,
भिद्यते हृदयस्रन्धि ,,,
भूयश्चान्ते = ***
महतौ महीशान् = ,,
मात्राडनतगैः =
मात्रमानश्नैदैडपि ,,.
€१
श्वम
१३
२३
१६६६१६८४
#॥
8.
५
~
भवत्तणनरु
मायाशदहेन ०१७
मायां व॒ श्रकृतिष्् ,,,
य आत्मापदृतपाप्मा
य आत्मा सनरौन्तर्ः,.+
चत्ताश्चादपरोक्षात्र ,,.
यत्तौ वा इमानि भूतानि
ऋतौ वाचौ निवर्ते
यदा पुश्षः खपिति ,,,
यदतन्न पद्रयत्ति ,.
यन्मन ने मनुते ,..
वया यया भवेत्पुंणम्. ,-
यसित्विन्नातै .,.
य्वामततं तस्य मतम्...
यौ धिन्ञानमयः ,,.
यौ इश्रनावापिषाति ...
चोगश्चित्तत्रपिनिरौ घः
योवै भूमा क
कप पं प्रविषटपो ,,,
वादु प्षेषि्रा
भवतगणम्
अमिर्ययैचने मवनम् ,..
(1
भज भातो 5
अक्तानेनतृतम् #७५
धलोऽन्यदार्तेम्र् ,.*
अत्रायं पुषः थ
श्वं गदत्यप् ह
अथात अदिश्लो ,,,
अध्यमेव द्धि „^
नैन जीवैन न
सन्तःकाणसम्निन्नवौषः
छन्नं हि चोम्पर ,,,
अविनाष्नी वा अरे ,,,
सगङ्गसमनप् ,,,
असङ्गो ह्यग्र ,.,
८8
पु्ठाद्धः जचत्तरेणसर
| विकानदाकम्द
ह ¢| ॥॥ | चिज्ञाननाचन्दं ब्ग (र॑
अ १३ । वित्ताद्युच्रः क्रियः ,,*
1 -
#1-
। विद्रा अवे म
तिष्ठ व्यातौ ॐ
11. | [¬ + व्यभिन्रारौ परिधौ यह्रत,
त ४ | बाद्रगौनिच्रात् „+
भ १ | स एत्तमेन सीमनम्,^,
> ४२ | श्च एष इद् क
त ४२ । सद्याब्रृते प
१ ८१ | सष त्तानमनन्तन्रू ,,,
= ३१
# ४५ | दादेव सोम्य ब
ध €१ | (सौचं एषोऽकिना ,,.
६ ४,१८ , त्र यत्तत्र किञ्चित् -.,
र १८ | सर्वं खश्ििदं ह्म ,..
क ४०» | सदधि को दष्टा ,,,
*७७ ७५ |स दहि.करती भू
क १४ | त्राभासाज्ञानवाची ५,,
3 ४६. | स्तिरूपः परत्र =+
^9) मावत,
व्रहठाङ्कः | अवतरण
मि १५ | अदं नद्मा्मि
१ ४९ | गाकद्धागदैका श्ज्ञा ,.,
द २ | शकाश्च हि यथा
७ २३ | भाक का्ौश्रनाचौ ,..
= ६ | भात्मा कतादिषशेत्
| २, | मानन्दुभुक् चैतन्न
# ७८ | भानन्द्ग्य्रं र
ह १५ | आन्नायश्य क्रियार्थत्वात्
* २४१५८ | श्वाराच्रनात्रः क
क ३.५५ | इन्द्रियार्थतत ननिकषौतत्तम्
+ २८ | इन्द्रो मायाभिः ,,.
५ ५७ | उमे कनतेडचुसघरति ...
भष >०४९ | एक् एवं हि भूष्रात्मा
98 र | प्रक्ृषपत्तयां त्रः .,*
५०५ २ | एवमेषा मामा „५,
ध्रः
१८.१५७, ५५१,
१५
च्
दन्
५
+
छवसरणम्
पष प्रत्र पव्रान्नन्द्ः १११
कस्िन्नु भगो
कामः चङ्करपः क
छर्योपधिद्यं जीवः -..
कुर्वन्यचेत्तनाः कर्म ....
कंब्रह्मंनह्म ,.*
गर्धकूपरततदप्त „=
चेततनश्चेतनानामू
छन्दरकिचन्नाः ..~
जाच्र्खप्र्रुषुप्यादि ...
्याश्रानाकाश्रात्त् ,^*
तमेव विदित्वा ...
तस्मादहयव एवात्मा +,
तख मासा सर्चमिदम्,,
तेद्याभिष्यानात्, ,..
तेजोमयी वाक =.
वै ष्वानगरोगान्नुगला ..
न कर्मा ने व्रज्या ,,
चक्तं गांपत्यप्रू ...
न तत्र रथा
न तेत्र पय इत्+
नतं निदाध ल
नं श्रष्ठरम् ..“
नार्यः पन्था बक
नाम ब्रचचल्युपास्ीत ,,*
निह्य विन्नानमानन्दचू
नित्यं चिमुगर भति
नैह नानाति ४
प्र्भूताप्मके वेह ,,.
चुरत्रये कौडतिं
3.
११३५
१1
= ११,२२३.३१
१,४१
॥
अवतग्णप्रू
पुरश्चक्रे + | ।
जनह वेद् +^, ००७
न्वेद तिषितम् =...
महान्तं विश्रुमाह्मानम्
थिनं तु मदेश्गम्*,.
म्र्योः स स्युम् ,„,
य एषौडथिमा =
यत्पयन्द्यमिसेधिश्चन्ति
यथा जरे नन्ढमसः, ,
चथा सैन्धवो
यथा शयं स्मौविः .-.
कन्न वुःदेन सम्भिन्नम्
यूपमद्टा्ि करोति ,.*
बूपे तक्षति ४
यूपै प्ूल्वघ्ाति
येनाश्ुतम् चक
बोध्यं चिद्रानमय॒ः ,*.
चः परचिन्यां तिष्ठन, ,.,
च्तन्ते ब्रह्मणो ,,,+
विमुक्त श्च विग्य ..-
विरेष्यातत तद्वादुः .-.
सता स्म्य 4
स्यं विश्चानम्
घ्रदेव सोभ्य ०५
चवं खलं ,,, ए
त वै प्रियततमक्षात्मा ,,.
प्र धमाः चन ,..
चदि (कर्ती) „^
सद्गौवाच तंह 53
चा्भधिभक्विकः ततिष्नु
सच देवतैक्षत ,,,
संक्नामूर्विङ्चत्तिः ===
खगुगैर्निगूह्याम्
दषडोकभयच्नेषः -,^
दत्तीषायुशयश्थ श्च १,
१,५.९.६९
| -1
4:
चष्ट
११,२३.३ *
५
+ [76 [8 णं ^+00िलणद्ीणाऽ (ऽत्रार्ताा उह्तीणा).
क. = पेतरेयोपनिषत, प्च, = प्चदश्ती.
कठं, = कठमपनिषत. घु. भा. = बुहदारण्यको पनिषत्.
कैन. = केनोपनिषत्, ब. आ, भा, वा. = चुहदारण्य कमाध्यवार्तिकम्,
ख, श्र, श्रा. = खण्डनखण्ट खाद्यम्. | ल, बिं, = जष्ठनिन्दुपनिषत,
गौ. का, = गौडपादकारिका, । त्र, तु. = वक्वयत्रप
छ. = छान्दोग्योपनिषत्. नु, = मुन्दकोपनिषत्-
तै. = त्तिरीभोपनिषन्- दत. बा. = शतपयक्राद्यगम्.
पै. मा. = तैत्तिरीयारच्यूपर, । छा. भा, = करादीरकभाष्यम्,
तै. ध, = तैत्तिषीशधदिता. | श्च. वा श्रता. = श्रेत्ताश्वत्तरोपनिषषु,
ब्रू. ल. = दचिदोत्तरतापिन्तुपनिषत्, सं. छा. = स्ेपवारीरकष.
चद मरि वि
1.57 0 (0ललाणा5 ( वाऽ इतीमा),
01, -)
19
> 11.17. 71: 15/11 ट.
[+कः पाह.
निन्मत्रनात्मैव चवबहा्यन् चिन्नव्धातीनव्यवहार्मम्
अदयैक्यज्ञानेन उह्मातमैक्यज्ञानेन
तैत्तरीय्स्य तैत्निरीवकस्
तैत्तरीयघ्ुतिम् तत्तिरीयघ्युतिम्
मोदात् मोषाच्
घरं - |
विधेयताषष्छकं विधेय बन्छदकत
म्बन्प् नन्वद्ध
तदेकोऽवरशिष्टदिदावः चदैकोऽवशिष्ठः रिचः
अदित्तीयच्त्चै्रमागाचोशन्वः अद्वितीयः स्चंप्रमाणावाध्वः
पाहकभरादादुपि ब्राहकाभावादपि
श्म्बन्धःवैन सम्बद्धप्वैन
सारि नाकौ
प्रतिचिम्बतत्वात् पत्तिविन्वितस्वात्
सा्षिभाष्यल्वे सक्षिमाख्यतयै
तैत्तरीयक तत्तिरीयक
चधा ह्ययं ज्योतिरात्मा बथा खयं ज्व तिर्मा
तरिव्ानपोभिन्ना विवच्छानापोमिन्ना
दृष्टान्तिमृत्तः द्छन्तीभुतः
धिविम्बस्य चंत्तनत्म् प्रतिबिः्वस्यावेतनत्वम्
द्यन्त द्यन्त,
प्रघराध्यतै । नानां साधयति वम्राष्वं तेनानात्मतरं साधयति
नन्वन्ञान दिषदासम्बरधनैव ननु ज्ञानं विषयाच्म्बद्धनैव
एकत्वाभ्युपगमे इति एकत्वाभ्युषग्मे चैति
खप्राध्यायच्थरष्िकादृतिवाक्यम् खप्राभ्यायस्वकन्डिकावर्िवाक्यम्
( १-३६) { १-१६५ }
आभाच्चानतिरि्तं आजाचातिगरिक्त
तूपाधिषव्राल्वात् तुपाधिवधित्वात्
रगस्तनोद्िकः रवल्तम इद्विक्तै
परम्भवतीति । उच्ो्यपश्चेऽपि सम्भवतीप्युच्धोभयपक्षेऽपि
तद्वाकारस्वप्रमोजन माह तदाकार प्रयोजचमाह
जानं अपरगोश्च हानं मानं, अपरोकषज्ञानम्
2१46. 116,
९ 11
श 12
14. 20
, 28
शद् 1
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१२.
1716 7894708.
देषावभासः
जारबन्ययत्तत्वेनं
मात्राक्तस्तगीः
{ छा.
६-£-१ )
स्वज्ञादरुपें
पयोजनवद्र्थ~
तैता पतने ष
कंवलमर्ध॑भिद्ध तं
मूर्तं अमूर्त बा
अषन्तीद्यतीनेनान्वयः
चरुः
म॒न्छियां
(मला प्रपा.
देधावभासः
आत्मन्यन्यस्तत्तैन
मात्रात्संसगेः
{ उ. आ.
७-२-२९ }
सर्यज्ञत्वादयुषेतं
प्रयोजनवदथौ-
हैत्तानपेत्तैः
केवलं तर्कतः
मूर्तौ ऽमूतौ बा
भवन््रीलनैनान्दयः
त्र. चु,
च््प्रक्रियायां
सवं नाथाध्याताज्चानाध्यास सर्मचार्थाध्यासक्नानाध्यात्त
सनोगतवास्नानिभित्तत्वै मनोगाततचासतना निभिच्तत्वैन
चाय्या
अन्नानघ्वाभावषात््
पगसङ्गास्यत्वैन
तश्च
दगाष्यीति । पकस्व
चकारमेदैनेति
अल्यन्तामावप्रदियौ निं
सा द्ुषुत्तिः
दविवीयाध्ाष
देदाकारापरिच्छिन्त्वे
स्चस्मादनन्तरतरं
विक्ञानमानन्द इति
1116 8100
खन्यास्वातुदश् छोकीकतुः
इवाल्यानकरतुः
परमानन्दो धश्वन्
पराच दुक्त
तस्विननै्र
प्रारहश्र
पारुच्छौ
1131
ट्षातिंद्यन्नेष
च्ाय्यायां
अन्नात्तचाभवाव
स्वपरसका प्रकस्वेन
ठाः
टमादीष्ये कद्चौव
परकारमैचेनेति
अच्वन्ताभावात्रवियो गितं
= ॥ श्रषुतिद्धधुततिः
दवितीयाभष्या्भ
दैराकारुपरिचिछिन्नत्वे
स्चंस्मवन्तरतमं
पिन्नानमानन्दमिति
†116 81011 ।
खब्थाल्यातदरान्ो कौकतुः
क्ती.
परमानग्दबोधः चन्
चाटः स न युक्तः
तयौभैष
पाठः नन
प्राठः सौ
पारः सो
तकराश्राधिद्यत्रव,
५
५३
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च्रम्पादनायां १५1८1 6\4६४
सम्पादनाय.
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क 68 0067 6 ६116 छ्रां त8 एटा 10 स्ेत्तेषजञारीरक | 7, 178)
11846 116 ₹]ण111518 स्त्यः; चूक्ष्नः, पत्; विभुः; अद्विषीवः 5 परमानन्ः ६1011
5 1शहा (0 16 प्रातृद्यक्णत् [ह्या६,
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९012 75151८8 80६] 88 अनित्यस्य, अश्चादव १२९,
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0.11 ॥€ 11011 -8€]8 +, €, {126 ८65 ° 100 816 (105 3६818
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एव्व (कृपञदव (0, 1४.) उप् पत क्तात (कृण्वकर्डदं (5)
४ पच हप्रहल्पुप्कोतिक पतक्हण०5् 1 1109 लाय ण एवकृत चप
1,2.01. 01.1.11.
अद्धितीयदयद्यजिश्ापयिषया प्रहरतां सश्यज्तानादिपवुानाम्-- + 18 पण स्य; ज्ञान
&५घ् ननर्त 19 1116 187: चन्यं त्तानमनन्तं वह्यं 11५6 10 (ला [एतान छौ
{16 1पाडद्णड् त पा प्पफछफाशवद्ः ० 6 पाव प्राह 301108४ णद
18 प्रपा ह इष्ट्णात्,
उपापिचिरिष्टचैतस्ये सक्तवेऽपि--.^.11110.1\ 118 10१९ ०१८३ 1197९ 1118
0 10 [ष 8.0 [65 ० धह उ 98 चुप्रा एक् [हणा
50९11 85 सत्यसव %९.
एण 1146 5910९066 ० ध€ 8814 एतद शथुग्वाशाशक शात 1०618
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यदायात्यमनीभावं तवा चर्पररमे पद्म् ॥
तावदेव निसोखब्यं हदि याचत्क्षयं गलम् ।
पलज्ज्ञानं च मोक्षं च रोधरारतु ब्रन्थतिंस्वराः ॥
समाधिनिर्भृ्तमद्स्य चेततो निवेचितस्यार्मनि यटुखं भवेत् ।
च दाकयते वणचित्ं गिर तदा खयं तद्न्तःकरणेन गृष्ठते ॥
(मन्ना, ४-४, ५, ८, ९}.
यदा वश्चावविष्रस्ते ्ञानानि मनतां चद ।
अप्रमत्तत्तद्ष मवति योगो हि अ भवाप्ययौ ॥
(कड, २, ३-१२ ),
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थजोषरमते चित्तं निखदधं योगसेषया ।
यत्र चैघात्मनात्मानं पदवयन्नात्परनि तुष्यति ॥
प्तमाच्यन्तिकं यत्चद्द्धिग्राह्यमतीन्दियम् ।
वेत्ति वच्च न चैवायं स्थितश्चलति तत्वतः ॥
ग छाम मन्यते त लतः।
सि १ दु देन गुङला तै ॥
तं विद्याहुःखसंयौगवियौगं योगसंक्षितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगो निर्धिण्णचे तत्ता ॥
{ भ. गी. ६, २०-२३६ ),
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सामानाधिकरण्य अचति प्राधम्यभागन्वयः
पश्चादेव चिरोषणेतरतया पश्चाद्धिसोधोद्धवः।
उत्पन्ने च विरोध एकगसकरे वस्तुन्य्ण्डात्यके
घृत्तिरक्षणया भवत्ययमिह क्ेयः क्रमः सूरिभिः ॥
सखामानाधिक्रण्यमन्न पद्योयस्तदीयार्थयोः
सम्बन्धस्तु विदोचणेतरतचा ताभ्यां चास्याःमनः।
सम्बन्धोऽप्यथ लक्ष्यलक्षणतया विञेयं एवं वुध-
रेतान्यर्थपवानि बुद्धिपद्वीमारोदणीयानि तु ॥
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प्रकते च, ,,*अज्चानतिवर्तनास्ानर्ध्वात- पि ९१९८ श्रेत 716९115 {16 इशा{शा९
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अतः ८८ +, 4, 811)68 ` पातवीड्या#1868व] 1660115610 1 अल्त्
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छकांथद्ठ 0 15 एतद पट कृष्य ण चठ तयन प्रह्व भल, वानु
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नुपपत्नि; 15 ४११४६ 81719 171 ६118 ९५६ 119६ 18 पाणडु #0 5085४ ४18
1196 0 1116 सादा इहा) 8९५ 11181 86156 [0146 718६,
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# ५, प्708.
(दत एठदणदयः वत्वा धह वार्ह 066011६5 [एलाक(लव् तिप पष्ट
णत् की ताहारा) अप्त वल्लक 181 ह्याह 18 160 ततल एषठ णा
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[वाणा एलाणटु वन्य ऋण्प्रत् 05 986 ण एल प्ट
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00 हदा; कछ]; उ0पणुतछल्त् ७% [10 प्तः 18 नह फु छा सकु घा 115
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हणा 115 कर्ठिष्यातकक 19 हा द0णणत्त् 7 1196 सनतक
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कणत छौ तुसु पादच सात् वकपमतककफ् ण (पप्रा,
पा 86 1 णच अरपत् 19 0०6७ #0 05 1119 पाश्च 1 18
(ष्प् क़ अ घ ६1८ एर चादुत्राह घ 58155 0808.पह6 हरा) 11767०६४
एक जा 19] कणः [द्य 88 ककु पा छपरा 10 06 प्रद्णादुञ धा पाह
†& 75 छया ऋ्त्पं दठणा पठ एतवा फपल ह प्रह ५ [ष्छपल ० चह णाप
0111811 1, 211
ता प्राय एतध्द 75 चछ] 8 पष्प ज धा चणााष््तंणा 0 1088
घात 1118 119 ९ [पतद् णा 8 एकह]तार्षा ता [ठ 016 1000
एषतपूु एतफष्यः लान्ता आ एलाह आता 0.0 1 118 0 °
।६5 हा०४च् चप्यारयणिह क 06 19 ह 716 उदाच65 ४१ ६६४ ध्] सीणपा8
811०7} 16 16218 प्र प्रत् 116 वछूप्ंशि्णय ०१ (हे 1९81६ 11६0
णिः पल द्वाद्वा. 1956 फ10 २10९818 इती 11916144 11541
तदप्ल ८0प्ात् 110} न छाः प्रप 9६11 दणएव त 116 छाए रणा ॥्राह-
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60४ दला पाह वदोछणड व्ह णी 18 ए ठत्18 एलपणत तत काच
8 एल्तण]# श्वो {18६ इताः त०५।९] ८१५७६,
(ण 105 (पण 10163 1४ पलत प्रात ४१०8०70018 छा ज पः
तध88, (718 छक 88 (12 [0तोग॑त8 धाते (8 06 88 115 जिप४818
त #08/ प कणा तावि [लाक्षा पहा पाह पतड 18} 1116
[ताला [६।|हरठत् ती राह थह 79 इछ] 17 प्राक्च [दणड ३६ 1118
[9 एनाह् पाध प्लाट फषड ०0६ एव 1 [षह्य कती {6 वतु
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०, आलात द वद सतास्न्ा४, पण, 1, ए. 18-79,
१ 11/11 9
11241157 818 110 प्रषः {41९७ 1018 0 {118 क 0 णपा" 3219०018 0
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वा सटा] + [फ 1106 ४४ 0ा.प्् परे, अन्ये, पके 81 अन्ये 10 111६ 16.81 णप
अणा ठा९९्ड, 28 ात्5 भृद्छा 0 तषा ४४ पाी8, 37धााफद्ा9ात9 801
4 01३ 171 तहा एताणाह्लात्खा 168.
क्षनिकं विज्ञानमिति सौगताः कन्यमित्ति माष्वमिकाः- 11८ ६०५75 1०॥५
धा 1 15 ध6 पतापत (ताञ्णडाष्त्च [ छात) ६16 कतितुकु पाप
119 1 1 6 ए णप,
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01 {16 छप्रतवाह दाला], 116 धरा 145 110 कषपः 86 १३६ 11818
11 प्र ए्ट्य॑कसंक् इह छ पीवर सिठण छााणाडी 1118 उपतत्रीपड् प्रप;
षा ह कतुरणटवर णा {06 + प [द2१दव, एवजीफ शुणरदया
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8007] 18 कठाः 9» दल श्यातरं [लकाया दोप णौ 9 आारएरन्छाणा ज
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४8 16 ¶ 0दठुपा्रततऽ. 1115 दिवा - प्छ अणः इलात्ा ण
एठपवतहाो फात्ी ॥ ध्वं ज 8 च्छा रक काल्प 7 एत् क्रतं (क
17 ४ 1 {181 जक 110 116 [7601608 (९9115010 प्रहा ल्छड 10898
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पला 81058 घप्र भ ॥€ किह तरद) १३8 +5 वल्मद्ु-
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8९९१० पित 116 इतपाती। ज ए भक्ता) प्तौ वत्त्व 9 प्त्क्नाणोि्
85 निच प ४888111 98 16] 90 400 ठ, ©, थत्र
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87. ाफावडविठि पाल, 1 88हफा8 दौः कतत ‰ [पाव्य कृषक
पीला सहा पलु फषटाठ बा-पएतलप तड ण 8 106 तष उलातता5,
एत एषा 1000 85 06 फ़ धवार, 1 कन वधर्दप75, ४
प्राह उपसव प्तष्ठ 115 88075 [ष्पंएतु वहन 21088 9
पिपा) प्ण 88 6 पनोपप, [पप्र {06 पतं [र ्रातएत् एृहषा$
ता68 37086 तिता वहा छिपा नक्ष 2110015 [ठा 85 (गुपतर॥-
प, (दका ककष 8118 8 1 1 च/५।|३8, 11588 ६९]0015
फण द्षव वुण्, पाऽ च्छह 19 इह 1780
1. 98 पाधा 15 पम्त्ठ {च शता ्५००७ पता &0 ८०9८० पय प 1...
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9.113.09० 1}.
प्रह, 23
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30195 ५।् 8018 ¢ श्ट} 78 [०४४] ४8 ०।प ४8 100 8. (2. कात्
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8 ताद 8 [डला [लात्राक्नाजा 83 0 16 ९88 2 कछया 0 &
709] [एलपि्ाक्ा८६, णौ फा] 6 द्राण ण्ा05 कष्य ०८ठ्न्
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07 17णा¡ 585 ०४[[६व् # 25912.
1115 प्रक © 116 १०५०५ छ ध 2104111४ 0118 #11;0)1
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1, ५. न 11 कः 1 9/1
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+ 0. {1 (1.111.111. 14.1.90 1.11.
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8००६6१6 (कपतं धात त कता 116 [पए स्तक ४१71105
स 1108 तिपा काल्या [द प्ाणदा8 दण 5 पा) 8०४ [फणृष्ट्ढधाषट
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11709 11188 08 ९0प्रा 710 17078 1.
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पावका, दलाल कणत -विवालकपत्यन्यो+4व.
48810885 [0 # नादवार 11०86 10 185 0ल्टाा पाहा [कु
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0 11६ प्र [ाद्गाच४ त शात् 1 फ [1700801 पालषर्क्णिः 1781 118 एता
7168718८ प्रणा प्राः =क्र ताह्क्ो1758 काह ५5 सरी
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कापाल, सववाः लुक्का, वषत, चात्
थातपननणद्वद्ठ कात् ए्णफुभाल्वं त0ः6 रान्य ०५608 3116] 8
पफाीकाण्वकवकवद) -व्वतपाा्य्/त द, = {1018 801100] एत्त्वं मणि
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6 ० 180 590] एणाणुणष्डप् 0 णु [धल फी 18 शपो,
(6 प्राणवप्र तन्त ०४ णवी वाध 1018 9 116 ए6ह फ
छटाः 81106}5 ¢ = जप्वव्ा16 [ृण्क्णएक+ प्श्मक, 16 सिक्ता
०1 सिष्ामि दानि 874 ए वोोद्डा045 छा विद्व प्हपा15, 15 गि
ठ ०08 क 105 श 67015 पापो 109 सपञला ३00 {1६ इहा 0 115
हलाताए 8. @. 0प्र॥ न प"6 वाऽप 01 318१३५१४, 116 ०९८॥६ा18
त 11०56 €] फ 10086 ए ऽ (6१11९ 8 116 र०प५।। त ४ ०11 800१5
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11.11, 12.3.81 11.
+ एः पवा कपल छक धिह चत्ाणाछ्ा पाह ाणतकषतपाा5 1, द,
{1558 11 06 आ त्रिह हदशः ० शा पदु चत् 98 वादु
धा दणञ्ड]प्ठड २150 तप वात एत. षठ पप्तता त शापा वार्यात रणा
पता कराए र्त्वं [शकलो पालाः, 1108 + कत् र वरछातिप्)
& इथपद्नद्रणर च्छणणाह्णड्ठु छथ रवहिततातापलदकव्द्ररछ त फ श्ना-
षात्ण, 8 पशा, 1116 ए1618 र ध 1 इत]100]5 16 र्णी
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ति16 081 ह ण 116 1एवाश्यप्रपन्र ऋष,
[व पात्ताचार पाह उणााप्ाछ्याताद् जा 1६5६ 51६ |शाान्नो {5 588
[वह 6 ह्यद्य] चतक प्रय धल (लठ ५ ३1] 112 फः
8910015 श0फपशनाौलातिणाषव् 7 180 कलात्मा 15 (वाका, प्र
80|| ५16 च| 18 [्राणफा[लदुह 118६ 07 द्ह्ाठ 15 10 [ण्म छ 1४5 एक्णष्ु
प्रापीहए्ला त प्राल 14116) 1186 पलत 4116 लाच छय1588 11 {119 [08
0 | 0 व,
६३८ 01167 6प0०९6ए६ ए, पी 109 ताह ॐ सौरा 10 1116 818द्ह
पणा 1 कमि) 15 106 एट्डप+ त ह सातारा ज #15 पच्छ
एथ प्न ण कदाताह्ववला८८ 10 28 एलछचछछोन 1119; 015 हतपराप्् 08
्ग्णा्काणह 1पणप्र्च् क्रध 106 च्छाञ पं कहि पवाक ण
इषकृ पराद्ु छा््॑ प्क 1) 2 [पौ 0 ताह 06 नातत् एत्र {0 ० श्प
वाठ फणाः, वाह्या को]ह एणणृततधषट पह तपल एयक छ 11068
8001918 116 84.१8 11181 (119 ० ध्& ईइतच्रप्रहपपपहतड 18 1116 प्र0ा8॥, 1
ण 06 प्रक्द्पाद्केड [ाहाः (नो ज पा ० ध एण्या
18016# &41] हात 020 9 106 पाक कणा165 118 एह 0 दहा 9]
णाध 1815 85 1181 1115 {670 न्तरा; 148 11681, प्रञत| 1188 {0
धलाणन् 18 11165 छणीकठाड म प्रोह [पतेत छ्य 080 ४18 0 #8
18/14 8710118.
ए 1188. ए
801 १. 11018 वरलात्राष्पं शतल्छप्एह ण 106 उपततडा 80००918 115
7वृप्ालाकच एव्छ्पलयः फकः ए [णी॥ कटिः 2 सवाण्चवत्ावश्चय्यीत
71. 5-20, धाव्य ककती तत तमपा सक्छ 1, 2, कयत्
748 लित क्ादमक ठौ वाकः -लातद्वकणुणतु एण्, 1. (ता, फ,
(1 6तटषणा ६0 त, वा दव की, करातु6 ण यन्ता
-धतदातरुतः लसणड ण छतड वका [ (गलप पाप)
९0 4 ५व छा तलाक हटि ९ एजलफृताम्ा१ 7 7 तनद्पल्य
( ¶, ‰, 4. $, 1905 ),
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णा धी पा धा तत् छात् वाहे छदटव्राह ० ६०७5 { एप्रा } प प
8128 न {116 0.
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19 १५८०४५९ 06 वक्ष7दड 1४ कपतं शुणु 00 एतौ क्व एकदत
1111 ..5 2 1 |.
1.81
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0 धर उ7ङपाद्द् पकााष्कु श्टुषता3, कणत दिता पिप्रतः, 878
00 तातन पण ककण एषणलएषा 3६6॥२, ४16 [ह्वहणाश्य्नह चतं दाह
य" पला्णावाव5, उण द्वस पठः काम उाद्द्य इछत [त््प्रार
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सपक 6 105. = छप पाट सपक्ष, इदु प 116 61485 876 त
61876768 का1|5 116 [णातत इमु 1708} चालक ६0 पाठ [पौ श्वत प्रौ
{6 फ्रणणःड एणाठा ०6 य) लिक चह 006 -\785 0 9116 2178] 866
२16 808 ००६8, = (हा ४६ 8|8० चाहा पीहा एद्फ्रस्छा ताला,
पत शिः [कहा त६, 1106 [ददात प्रा 11४३ क्रिल तंरा एल९ए७ प्राह
8 आतषा प्रण 0फ0ड धाक [छत छा प्एवड का 60168 शव्क्ातह कष
10 {16 [पद्व 0185 ८०।।६द् पपत; पादा 8 कण्वा 3150 एत्रतापठह चठ
80, 11141 {16 व्राश्ात5, [हाना जणा] ह, दी 117६ ऋपा ण्व ८.
ए 50 7 85 पाह फपवफ्दाणाञ् [षपलं018उ छ धाः ०
१6 (एताषाा९त पाहा ९ 18 10 वरा्धिरा८० प्लक्ष पाल्या. 1005 00
0611678 ६19 21] (16 ताए08 17 ४15 एठाषुतं 2870 06 0एवह्त् 1110 1५9
९1988५5 105 एए { नाक ) चतं 16 7010 ( +] 28} 11191
1 {8 कितः 118 [ष्लिह ग 116 18 वप्6 पाडक्पछ्ौ गिण पाह फणतृकृ
ध 15 30१ 378 [णव प्राह +ड (लह 1/6 नप्र, 11 1/5 [णा
& (81 18 [०६4६888६ ० 11011116 [दा ५6401 = ( शप्ता }, 17018
प्0पणृल्तुद (१४४४008 1 79165 1011585 ( ससालकहपा्ा }) 80
णाह [णक ( वाकः ठ ); वलं ६1] [फा छप 0555 18६
हद्ाप्रटाातरएड |; 0 पापदा ताड [18४8 [हाः [पाक भतत
एः 00कात ०४ #ष् 8 (0 प्ल ण दिद्ना पाना कट] 1188
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एत्ला सतछ्प्ाणक्रष्तष्टु 1 परफ्ा तिणि 16111011111888 111९, ५४६ &१6]1
हा] 18 चुप पण 5 कलह वत् ऋ पाक्ष 50 कषटपे पष
11177 17. क 02.
{ छ) फ अपाठ ¶ कृष) फफ ज व पाह्य ष्ठ [ ल्त
कवतवपरतएढ } चत् [चह ६18 कृकलः + जलता ददृश्र श्प एका+18016
हच्ण्जु दु ॥ 106 526 ० चाच एण्तु भंत शोणट]णृटड # = 119 त्य
(1811111 व, १ 1
तला शरप्रञाला प्च, प व्रप्ाए दाला कट, 1 चका वुल् # कशोर
दव ्णात्र कपठा0 [प 148 कृणक्हाड छ कटछा) छत् [तातक8तदढ कणप अण
10 [पिला
¶08 वृश्ाह 916 ह0णाह॑ता68 ९8।16१् 4118158 000 पाल एल 8
1110 कर&16 द = 41118, प्]10 18 च €†&109] [06८४ ए पा 18.
एण ॐ फाण्ट वृ्ील्् हसषहिणा नी 1९ पक्षाणड [कहग ६76
किकयीयाह (-णातश्तारेच्तैमु/ 0 न्दुध्रकासवसावस्कालालीयत॥क, सवका
सलग [. 3056, नवत 5 वत्या कप पन्ता (©, 2. 2.)
9 11.21 11 11.11... 1.1.
(अत्वतः, -वरलाप्लदम्ा क (तापसा, [९/0
का दातुः त पकड पणव ताज का ष्व जमान0०क (1, #,
कतौ भोक्ता जडो विभरिति चैरोषिकतारिकमामाकदाः-1¶1£ ५1551115,
1१1१1145 8० [8 [णप (18 1 8 ध6 १०६४) 116 शरक
81 |] ए8.ा ४६.
्रा9 एधन्ते व 9 5811०09] ० [आपपषणुगदयाह पिप्रातह्य् [त्र
[श्0दप8 २180 ०६९६ ए धप्रणापीर कणत 4 पपौ = ¶06 पापल)1९8 ण
1.1.181, 1118171. /118171 11 18.31. 18111.
1 (1 1. > 1. 1611 1.१1. 1.
[षस] हप्तप्रा८ठ 10 [ष्ठष्ठ 7187 पाल द [छ प्रवता5॥16 इप् कलु
हक्चा॥ 8 5610५] ० वीणहा55 णया दरइक्णष् [पणा 19 प्रष्ठ जिरणं
{115 एण्या ज 1116 स्थाणौ द्रप", 1.813.418
2068 र) #116 एद प्र ए पाद्वप8 00 क्च ला एणा 11 वक्षणा ्एत-
{त 10 हकत चतत् £ दषए€ [ष्या 8 प्८1क]6 (0 छट दिणाातर्दश्चाकाक,
115 हता 1851 04 ता 1115 जिो1188 18 11187 छा [ना [948,
(0061 181158 18176 [6 पाता ह्ण) एतृ वु द्षुुभ्वा६/2 13110686
ग्ड स्यात् छिद 151, 6 [दलः व साक पाटा ता) [लुण्ट
तल्ा# एणफाफलयावा णा 115 सिप्रा एवल दकचकद्कत, व्हा6 कद
8150 -त्छतकलमतत 80व तललतवाषतुकणीं णा 6 50108 फला
876 0 [10000 1081, पुणा श्यए [प्राः एला 181168 01 176 ण्यः
कराल) पुता [ङ #ङुणााञहायानतोाहात (णृ कफ
1. त क काव दनद, एण] 1. छा, ए, 0, १३0-85.
| 11 ॥ ~व श
रवश्च कण्व कि सताती दवत् पिङ्क्कछिग्यतफ
उलन. (10 5538 178 [श्लौ जल 8षण7ह 1 16 शत् 6808
7 हद्णछा्षिठाा 1 16 एषाः किः 8 पाठ्वद्मपा अपवृक्त ज ह पभाञ्ल्ञपा8
[111्णुभक,
५. 1 1, 1111,
115 11791 7 1156 2ात्ाभातकव्ततर61४ 18 #1 8 ण रनभा 0एक्षााहै
ए 1 अत् ६0 78 +£ एप प्ण) [०86 (जच्युदेव) 800
88 प्व (निःतरेवतत) 86 ६४१४106. 05 एत्व कल्त्छप्ताद् ४ 1
‡ #& शठप्राठ ० [07 छव् 80 [तण्डकः चा 8 पाह
एक शत॑ प ८ 118 1पुपणएणाढ क्त इतण प्राचा वलाश ण
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ध प्रणाद 8 फलात् पाल पक्र 11 कद्यद्वकजा 0 न ०16९8 198 उणा] प्छ
वहा 7 एत [च्टतपएत् 1 का चषद्णणाह 88 तुह एत, (ठ 116 एष्व ण
२ 18 | [060611100 { चान्प्र्यक्ष ) 86 16 80081 0 #116 10010
०2 नुः धप (78 1 ऋऽ प्राह्ण ष्व प) ० 9 धाह
18.116]; 8 (11188 प 111611 हाश्च आ ६0 [ष्ठा 16 पाठकः
वाच् 116 भाडक्छप्राप म पा एवल ल ग" उच् (2) छा -4 लोपप्रह्मेकष ४
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1.1.111 12.11... 11... 1.12...9.
त ०४४ ( इदप छाटदापी) (चणा 4, 3), } 7क्णाठत् (तततह्य,
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16 उप्र ७५४४ :- निष्कलं निष्कियं वान्त ‰०,, 1116 = 05 6 एन
एवा+8, 081 [लाप 8०, 1४ 15 [0णण्ड 015 पां # इकपातं 08 कश्च
101||९०॥ दतत ढ्ध्ग त्क्णत्। ४ 1761168९, = पतिका ९९ 1# णा 8
त 1715 प्राह 0 साशा. [कसु -# 0 17 5 ह ० £
श्क्षा 88 16 38 12 णचः 87 110 8159 ८6 १०6४ 0668155 1# 18
190 8 [एता ०1 णा 006 18 €176०66 15 ऋताव) त पाच
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[कववः (द्छव्रवछ चाह भत्ा16 {119 5. रणौ5 |] कस्को द्यं पुरषः (६८, ए111011
धा ॥]8 तारा 105 तपता प्रो 15 प्राह वादु उ" प्+8 [15 तच्वमति
क. 816 17118464 1 1९ 8 1१ रा 16 सश त वज17121107) [ल क्रषला
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पिक्का, धोद, सिदत क्वे एण्ड, तकीककवतते ज
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1/2). 3. त)... 11 3.
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[ठप पण 18 एवल रपरा ०९७ 0 1118 एक्रयाठत, पहा शाह
0१६३, 1
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हठप्] ठः २ [ण प्रश्षीक्ति ० €. व1688 फणी ॥6 तिप्रापवश्य् कडतपश्ल्प् ता
1116 {€ ण 16 सततत हा [0]. २६.६१.
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11/18/2811. 91.4.1.1 10.11.111...
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(0 6णणा58 10 धा ५४३९ {116 पृह]पडणः 88 #0 वुप्रक क पतया एनौ 08
पशा 006 1 छत्व ठ शप पणं वरद्मील॑ल्ापएपन 105 पपं कत्र)
प्ले पाहतड निर्षर्मकः ( चरणात् त ददा प४85 } 155 [७8७ हतु.
कृणत ण ध पठ ठ {00 तलौ प्णातह पुकः ४ देवक्य 16 82.58
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धा इषा 0 दडतंपतंड पदु त धा इ 6 ८1६58, अद्वितीयः 11088
ण & पीदा २888 810 एव् ९] व 5, -
ओौपनिषदपक्षः- 111९ ५१8 ©{ {116 ४ पएद्ादपद्ध, (प्पोणत्प | #1118
फत् कठाः 6 पक 0 8] (8 णाण्कलाड त एतत षत को
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80156 ०( 10058 ० 501 जरात 9,
नैवानु- 1116 06 णा" पाठाः छदषलाला1.
अन्राहमिति -^ , = सन्वध्यते- [६15 116 प्रछत] अहन् 5०६६ पा कलाक
"24, 8.11.) ।
1 छलौ ५३ कणा ॐ अहं न भूमि 18 0116 इद्ा1678) कहं नं
त्तोयन् 18 ‰101118॥ 8।१् 8 07.
या मुमि... जटध्यः--()॥6 &]0पातं [6शतछर 1118 175 7 116
2८४68 छ आप्नष्र् आद्याठठा | प्णपला लो [ट हपाच्छत्प् }
116 विना «(119 कणा, 15 06 स्वा 15 001 "+ {18 पाण) 78 ग" 18
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17 | पपहु पा कलशा] 01808 55 11184 ०6 11811
०9€०ौ पादौ ६1६ (द्द परत 16६ ९६0०5 ४16 ७0०4 10 118
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1 (तौ ९६६६ पहार फ्रएपाप् 10) £ #08 दतान्छिछपहाज्ड् 0 1115 287 &£ १॥,
00 १०४३ 18 ६४ [क््षा०€ 1956 #गा 71 प्र एच 0हट्58 10 19 ०७७
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6066 0९ फषन्ना {16 00 भत् आढ 59; प्रोष 0618 80, प/ 8ड 1
0४ पा ४० 8108168 फी 6 चन्म प्रकञठत -88 ८9 पत छष568८ 0 अ], 1
18 5810 718 18 70 शला, # एष्ट, ¶ (05 05988 10 11976 06श॥
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(1) (वाणाः, (2) १ (दात्रा, (3) -0कत्णााहड (4) पशा788,
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(7) प ाकद ६० क्रस्ताषातञ, द्यप); प्ा6 प्ल ७३[६ठौ5 ५
16 (द्वात, प्रंछण 1187५ 1९) १०९ उछक्राकलक, 50 २150 18
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1116 हतका = णाण्न्णद्याऽ पप्रौ 06 वशात् च 1676 (कलो
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0) आाच्मनो देककारपरिच्छिच्त्वात्त 1४ †{1\£ €ध 0 1116 [५589
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10 प्रु णौ ड.
#.
न जायते श्ियते घा विपश्चिन्नायं फुतश्िश्न वभूव कथित् ।
अजो नित्यः शाश्वतो पयं पुणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
(कठ, १-२-१६).
न जायत न्नियतते ब। कदाचिन्नायं भूवा भविता बो जे भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं वुराणो न हन्ते हन्यन्नाने शारीरे ॥
(भ, गी, २.२०),
अनारननां जदत्वाव्-() १107 ४0 1116 पत्ा-3] 6 एरु {1&.
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108९] © एणाः 198 पच्छा चत [गहपाणड प्फो-छद डित
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९0101407 0 0755 छता 808हा९६ [क (ह्सश्,
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10 1561166.
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ष्शति प्रठवापं जट्ट 11 1 15 0611605 187 #16 8६1 18 0681106 कारव
11150 ¶चएट 33 3 718 (8) 1 ति तौ ९18६, ठ 11 13 ॥लाप्टषषतं
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107-हडा8{हा८€ एकता € [रात्रा श्यः एष इताह 17 8188 धावा 11९ &डा
01" [क 116 ८1 1686६ 11. ध नि्छौ ४४७8, 1118 &5178060ा5 चाष प्रश्
08 श्ध्राण खा [एश अपहा ९९ 118 1118 णीत ठा शाणः ६६ प्रण फ्रप
शाक 1118 1116 88] 1 ४1686, 1116 एह कात ६ 1116 वाणक्रल्यः
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एकएव 116 58 185 छतु छा ह वाध [ता पा. [४ 18 एं एहठल्हवापु
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व ला 15 ५६ च्प्रह्छ ण 116 ्लिात्ुड णं [ह्वा क्षा,
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पलप्षप् णा) 000 186 + [पाठ 85 # {1016 कहो 19 प्राच् 10 6130 छत
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तदपच्वात्ननः तर्वननानुरनाच् नाश्यस्ताभावतंभवः-- 0101", 1 ६801९11 ४8
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क्तश्च. कषक एद्8 पऽ [ण्ण ण 18 लाद पापा [र भृः,
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तडा फ्ण्पत 108 "5अ098, 1 198 उलटा 16 18 हाक एफ
1#5 #षहणाप्राल 101-0प्रह्ाशा८ह 8 0 [10851118 11 18 €4811¶ 1016101
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0 0ा-ह सहाः ०४।॥ 7६ 16 (एठल्डा॥]5) 1/ एशाष् [भषठका( आ दण्डाः
00] श्ल॑ 71 016 {ण छ ६001 द्यः चात् १४ दालक [166.
द्वैतस्य मिध्यात्वेन ,,, *. तत्तादेत्स्वाावानुषषतिः- ( -+.114 ) ०१17४ {9 19111.
एस परा] ३ ठसिा० 18 [ठह छण छा ह्लपद्ठु तण ष् पाता
118 54 शापल्ौ 18 1/5 आाडतदप्ा. [5 चला हप] मप
(0 115 र्था} 15 शीक्ठः णा 8 छाः), = -आ्रह्ाल्ह 1 18
[पा एकलव्रिऽ 11181 (लाए शपात् 6 का वलाएह रफ 73 वेलाः क 11४
11 (1, ९. धार इना},
१ प्र,
मिध्वा्व- 11116811.
[प्तिः पष्य पलाश 106 ्लाफला्| कमव 35 प्रात्
1, € 7 तव्या फणौ 7 + ठौ ॥णामणिह 1138 1. €. 116४ ९ पौ
0वश्छलाीतणह 1, 6, हटा वता णाः हहे 28 फा] {6 € [क्ा६ [क्प्ल
छा. 0 ६9 पिंड प्रमो, 1# दत 70 हमंातठ था ष्ण धच उ
एप पपत लि एटाफ पदाक््व्ट = 168 उवाहातणुण्डत्णाा 1. 8. पमल
10111178 11811111 11111 3
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पलाला क {16 561
चादार्याभाव 35 1116 89112 88 अन्योन्याभाव 07 भद्. न्रौ 88 8
वणद्ठुपरा २ पुण पा » 00 9 5 पणा, 8 ९67086 &6, फ
ह्थ्ा०४ वक्िद्ुपोडाः कत ०08 पशप णाया ॥16 86 0 ध9
1688011 5181641.
तैनात्ना नाभावपतिवोगी-- ९108 (16 ५811 18 101 ६09 एणाातछा-]ष8ौ
त 1011-6 816८8,
भाव ( 1011-8818978060 } 040. 6 ५ पप्रा 30148; 10 (1) पर्वस्राभावं
[ 0भा-दजनला०6 ककि वंड््प्रल० 85 त 0 सदः एलाह 00 };
(2) प्रागभाव (णाक [८१05 9 पतात (9 उष्505068 85
0 & एणी (रला 0 11545 }; (3) अ्वन्ता भावं ( 8050111६ 1011-6 13161150
६8 च 8 70/ त, ता {106 ४5 शात) १74 (4) ताङाहम्याभाव 07 भन्योन्वाभाश
( धा ९८ 0 वहत 0 फश्च वव ल्हडग्णिा & ठ ॥ [104 +
{182 15 हतााशीपट्ट त्ष्टाः ।ताक्रो 1). विणा ज प्राच्छ 1048 ज
0007-6 द867106 शद्ा ॥%9 [ताशव ०1 16 3 16 19 तौ कालर्दणि्
18 च््ाहानक्ा ठ प्ला-छत्चहा66 1, ९. 10 छु 11136 1 18 87016 प118
[पाला8 ठ ४108 शात् लुत.
अभावप्रतियोगिनश् वैतैन्वियादयः- 1116 1201 5611968 4८, 88 {119 श्रय
0904 0 1101-6918650 08,
10888 8 ¢ & 0418 णण 19 110४ ग 5 द्वा (र्चा
(16 ९९४७९ {0 € पीठाः वडौतपल0, फठाए 70 7 हदला हता प्राह
०९०, लौ ्पापाषः क्त्र कक् कत् वाह णद्ुणहफष्णह ति
6 सातीभाः, ।
तिगाभ्री नाानः-- ९९ 11688 816 701 §6]68, ग11;8 {0]ातक्नह एध प्र-
पा पणित प्ो6 (कण ा्ठस्वाणह एण्ड 08,
पित नाला भे पु 5 #06 गर्न॑प्राव तृणव ॥9 क्ा8९8, ¶¶16
वाकः 10 1 13 पवा्षपत्तु 1 च05 [णिम्को्ठ उतपर्॑ा& 180]
विन्त श्वप्रकाराचोधरूपै ८.
| 11457 9१
पात्मनि छद्ेतेऽपि-.0. 11101111 111९ 211 18 ए†170 पौ 9 86607.
भनिवं चनीयाऽविच्वाकल्यिता भनिर चनीका पएवचेतितिदान्वरहस्वम्-1158 219 ण
॥1£ प्राणा फक्त 18 पाह पाद 88 व्ाहााहट]फठछ वात्मा एषण
णण आपा हदडदाठते एक् भि च्छलं हा ९७ फ 01611 13 30पदरट0815,
136 जवं चैट्ट, व कशा 10 [दे तआपर्डन्धःाह कलतवप्रहे 14 चद0
15 पल्ला] 7178४ 81] हा 186] 41 पाह 11६४6 1५165 ६, 97 8॥| पाः
कणप 1लटाप्रा5 11058515 6 118 #रएाणीठा षौ 108 एण दा
पातं कृषं प्रलया एषठ पफ 10 काकएख्ठ निह वृ वप पालो [पाषएष्णप-
081] ४6 पपात पि कह हठ कल्ला 6४158068 पाक ॥6८प्रशे 6 (का190
1150 97006 1715 एमी छ प छलनम् छडलाा६६ काह [द्य पडणः,
तता पिच्छला 100 ३ हप {9 05 9 116 हषा गाद्रप्राठ [लतव
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© पारित = ॥षष्पञ्ये उह्ठणत्पीद् 10 958 एणाष्ल्जृण्डिञ #08
25 18 चछ 0708 1175. पृक्ण ण ककत ९8 दत 20 धाता 1016
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पकस्व इटस्यसैव सर्च साक्चिस्वात- 1115 018 ए 18 पपा प्र]8 15 { {66
{56 } 176 कऋ1176६5 ० सरदार,
टन्चस्व 1183 ॥द1 द]2131115त् 0 तशर [४119 166 (० 168
"धा 19 जुः श्ैखाड ७8 115 इप्रकद्प्राा रणा 106 [ाशापण्ाश्चा (कूरे
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१०६8 70 पढ 18 पा एष(तताा 107 15६8 1/5 10641101 88 पदौ क [णा
18 ताश) नफ तह काएौ॥ [ष्ण ्र्णाा8त] 10 = हप 0त्ा८६
[दकार [तकः अणा] 19 34580 ९, प. प्रणत पाली 15 प्णाडणिापष्य् 100
आ प0्ाक्ालाौ छा †8 सिदत आ सदकाकृ् एपातत्णूणाक्र
0र्ना758 1द्याशणितातह्ं (1/0 कौ ८, 1106 €] 18 118 118 छप्]
छ 16 दणुपेाणं छाः #8 एप्प ण ध चित्ते, प्ण७य
4८0० पाए 60 [पा {00 +116 एलक्र7हु 38 पश्प्राअए16,
1, 4 ५ क 9. 4 3, 711,
धर, नतष 0, 145,
00 पह,
(/ ४1६०
ज्ञानविक्तानघृपरारमा कूडस्थो निजितैन्द्रियः।
(भ. गी, ६-८ ).
ये त्वश्रमनिद यमव्यक्तं पयुपासते ।
सर्घ्रगमचिन्ट्यं च कूटस्थमचलं श्वम् ॥
( चैव, १२.३१.
|+ 17111111. 011 1111. 1.1.11
11111111 11011111. 18 1.111.111
11 छत का 11651 1116 वनः धाव् लाका पलयाह प्र्ञ 10 16एकक्ाि 10 चनाा6
116 छद साछ 0 8 इषाः पा साप् 15 5 एलुभाहतं 19 [क उच णटु
11171 111111171111 11111 1.111.111 1.31 |
9114 ¶ छाछ 80000 106 118 [ललं ण 115 एश लोन एढड शात् कौ
1.7 11711111 1. 113
2. 13. भाद्गियते--18 7९९८६६१ 0 1900 प्रः6त, फा एल्वारएल्त् कटशृष्वपि। र.
तु16 1001 18 ह प्रा जा # [नाता तो षट) णः 0 (भृटा
166167€ एष्व]
जप्ालाणिकवात्--(1क 10 #9 1४8 000 3४10 [ड्ध [110८ } शाप
पा्वा6 0 हए,
116 णरपंल्लीणण चनु, पुषः कूटस्थो ८, 1158 [का 181० 10 एतद्य 10
2६॥ 82 एणृषप्पणा प # शच 1130 106 हदजनौराएठ त छप तलत
न्फ] प्रा6 फा6७6 14 0017116 0 एक 108 - श्ा787164 18818 फटा शकष,
तलुभाति--1117188, ०067 छ (प८फणणल 01871680 च 1. €. 15
१६618४६ 107 ए 18618/190 प्रता,
7719 10०॥ 16४६ 28 मासु 19 8131712, शगृगल्धः णः 06९06 1811951
प्रति 1105 [ष्टी मनु पणो वत्त्ठातवाण्षु ० निद्र व्च9 018
भाधथित्य 87 छल्ट्छाणद्ु 10 [कृण अनरुश्रहेण
मास्ना--13 ( 113 } 1्॥.
गण6 फणा जाल £, प्णा३ [10 [व्रह९, शुणलावणाक छा दप चाप्र
8150 8. 7८06100 छा 81 [पापु
विभाति ({ {767} 1106 8815 000 २8 लनुशात्ति ए1011 06 एषशीड वि >)
188४3 शण, शदो 0 षत्णल् पात्रा ल्ि, = विदष्ठ8 क 8
£> [18108 ‡# 85 भनक्त भवति,
॥॥. 2.1... 1.1.
न तत्र सर्य भाति न चन्दुतार्कौ नेत्रा विद्यतौ भान्ति कतो ऽयग्र्चिः।
अदाग5, 91
देदार्म्- 111६ 860 ९ 1116 81.111.
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णा ए111८]1 18 ५0 †जण्रा०६ :-
यथा होकर स्योतिचस्ा विंचस्वानपो भिन्ना यहुधेकोनुगच्छन।
उपाथिना क्रियते मेदरूपो देवः पषेत्रष्वेचमज्ञौ ऽयभात्मा ॥
1४ 85 णप्राप् वुपर्णाष्ति भा अदा (कीत, उपा शत्
सालाना ०).
दह~ प १, €, 7 ष्वा पप्क् #0 9 [द्मा कणौ 183 107 8
पापं अना †, ९, 06 51081168 06५ एवत्र छ शं ण 110.
2, 15, सीमानत- सीमन् ०1411811 6875 8 एप्त ॥ दाह
11 7186875 1168 अप्राह 0 1106 श्ता]] 1. 6. #16 1116 7 †75 7016 9 106
छद] वाप्प्ाद्कु 10 11110 चक्क कड,
अनरुप्राविकव्- 1111९184.
पप ४५1५ 11108. € [18108 10 98 तद्न्तरमत्तवेनाभिन्वक्तो वभूव.
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1.11. 2. 1) 1.3.19
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नैष नानास्ति किंञ्चन- 1 ॥1189 (१, ९, [उर } पाप 3 10 प्रद्रु
1111: 11
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वत 1120 -शवा0 पतते ५ कनक 018 प्द्द्कुणिरि & 8 019
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इङयश्वेन ,.-०,,,,,अनुमानाच्र- 1116 १2511 ०( 1}& [ाताएहा5 छ
06 658 )1शो8् पछ छा] मि ६118 [न त #118 छठ ४ 6त1८ (६8 [पौ 8180
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4... १.11... 13
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प्रातश्षःह्छ प्राह [फर १४1 [001911८9 0१8 र 850161९8, 116 [पाह्य फु
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ण पीहा ६8 शाश्वत श्राप एह शत्र 101 115 € {णि पद्ौका
ढा प्रलापा 13 प [वरहा पद्या 101 कापया 10 शक्ता
11087 ‰0॥ 18४ {० 06]हष्€ 10 उणा कपूत [तक्मा ण 8 1090-5
18 रछुत |क्वप्राली। एता 7 च शपो त अहलपमुहटणवल्यात्ट ( आष्मान्नय )
[लिः {7 छह 10 स॑दा 006 अप्त] 1100 0 & णाह $णप
[णठ {0 06ाछपहे 71 धाचनिह, सक्त आ प्ण 106 लडाच्छरण
धातरा, 89011 1 01846 10 उद्वा) [0 7168 91 शणः ९१० & 1116-8
छत्र 1118 ॥प्रा#: क प्ापीपडय चल्छवसार ( चन्योन्याश्चवय }, (11115 [कलशाः
097-8९ ०0३1६ लष्ठ 1 176 58108 एण्ड {ण 35 चि णाः फा 88
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8118568 115 {811४ ©{ हा १1३87688 ( अनवशा ),
घतेन--1 075 1098 १० {196 >प|८5 50 पश्ाशा्णाहत्,
¶78 सिद्धान्ती ;3 ञप])णर्ल्पं 10 क त्र) नल ह 10 एणा णि 1€
0५] आ]7]0816100, गहण कीलः 116 ६6 18 अराणां पणा
116 १००-६९। छाः १८८ कठऽक (प्तप [0111 176 [दार्व क शा एद्ताापणकृण्लं-
णण क एक्का 9 चला लल ४06 पपा ० तच्छपभाष्छ,
१16 छपष््ताः पलादि एठा पषा 0 पट वएठ हस्म 10
11/54. 18. 1.1 111.
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2 कुहल 15 प [काह सात् [ण०टठस्यड 1० ६5080116
13, 1, म विकष्पावसरः (11८ 18 110 77070 0" ४6 8७|| 871 ४६5.
स्प्रकान्नात्मनिं ... ,^.छजुपप त्ते - 11118 13 &851] प 1111611161016 51065 अविन्चा
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सर्व्व `` "नं छ्ात्- 1 दपर 11110 15 18६६0 19 19 (18 छप्र†ल्छत
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प्ााह्ताणा ॐ (1211४ 1८ 1608.
एकयैव ,,,...,.. विङद्--] 115 2011781; 8 गुणा [808४8
व पाताला 188 8 सारस ददा 6ा६8 कह 415 पारदाः छ [ताएपाहवृ्ठुऽ,
६08 (101 19 ६ (पठा सात् 176 420 भा तातफाल्वि्कह कए ०१8१8 88.
16168 ५५4 1139 [क्लः 11168 8150 11856 86108 पतिहपाड]गिष्ु खवप
५.111.111. 1
अचिगोधाभ्युपगमे च स्नौगत्मत्तोपपत्तिः- 101 111 ०1119 11811 7} + 16।16१६त्
8 पह ए 70 एवाव पाका चालं 3 115 [0 त्क ज ९
पाह तणा शट उदप्रत रसभन 1. 10९९088 11168 इए {1४ ६16 ६६६
पण1ा6ा। 18 ता ५16 7क्पाहर्णी क्षणिकविक्ताने ( +€ एाषल०50685 } 368६।ह
लए. 116 पाचका, {ष्ट #० 98 तोता ८.
7110 (०15० ध [88६१6 (णयापु ताप जनु, अध्यासो ऽपि ६८, ५६।४
{11 116 भदा ]015 10 द्रा ०8] 0 प्िस्लललो)5 $9 {16 ॥[1ल्0ा ए 01 अध्याच ए111]1 8
छण ठत {15 अद्वत्तवादी'8 19 118} 1110 ६४19(67190 ठ ०106 त] 78
ऋाप्तव्रौ 8 इद्हणयात् दादा प्रपा (12! ० 1118 ृप्रष्ना0ाहा8| प्रछत,
सकीभात+-- ४ षत् कष्छा सथा सतह (7, १३ ) कणित प्राह पत्
वमाह्ड ४1 उणा न प्ट ाठणाष्वद्ठढ एप 0 18 । वद्र १०८८.
{ण ० 8 जाह ए ठकाणषठ 18 एश) १971664 ॥1॥11 1 ग 010;8 611
०06५101 88 10155 1186 +176 इता छएठपाप् 70 [६ एलाह्नस्प, पुणा जक
धाय प पाट 1वा८ठ्ञ 5 118 विच्छा त्ड त एताः तातं उ्ात्,
पाना धह ६५४ ण धह उरला एला बलप्रदा २२ 6९४६त् प्छ [त्य् ॥४
1.3 1 11.11.711. 1.1 11
णाक पटन् भात् 8 पैल्च्णा 8 पणत् प्र] ए श्व) त्नात् सिद्धं
६।८, (7, ११ )
0185६, १9
10 पष्क 106 पछाश्रटत् धम ६४ 7. १६ प्रहे #ए० पिल्छञ ५ 18 र्गा
एण फीच्छन््प् 7 5 प्पणप् चात् न किह एषटताह 116 बपृषप्षणलत्ण
र्णा {ऋ विदत्ताक ण 106 पाक्त प) 18 जिना फराह ससल पाका१९६क ४३
क्वाण बाण्टद्पिष्ठ षडणणछव््ाञ ण ह फा एतदु पर ब्रणः
प्ण 0 पाध्वष्टठ 0 (5 ाछफक्य, 4.) 2. १६ 175 पपफण 1 फलार डक
10६ 10 59119 1189 9 छा ताड 07 पपत 066०065 106 [ठक
नज) 108 श्य प्णुषडननणण ठ कह फली ( ०० १6 8810),
87 पणण6 80 76 वराकः पलिह 85 का) ०तुषकणा फलो 18 1
कप ध)65 ध115:-- 1116 कि व हपाल प्ता [8 15 पी कलौ ाीण्ल्
कि णकपुर प 1118 तणा-छ।8 पा प जा छा छाच्ट स्थज्च् ; प्रा्हठपम
1 .21..77..8...1/2..;1...1/..1..9..1..3.7.1 1:17.
पटप्णव् त शणाड्ततुि फी पह 707 -क्लुन्धि एमा००ा ॥€ विष्ट इद्गिश्च्पा
प्छ 18 तिह 86०० 0 116 77 -उह 86 016 0 0९ 789] इत्र
61665: 1 1४ 5 एलासफस्प् पाख बाध 8 शप्र 266 ला [6 8 इपहाकडनिाप्
प्राह्ा, 116 कए द्प8 81609 10; च पक &8 0816550 0 08 1681 त्राह
2 क्ण 76 06 [न्]5 79 दाकतीछ्हे पाठ ऋत् 158 क्णप्ा्रं पक्षः
08 तवा 209५6] पतल शि 9 18] हा एरक चो 16 06 &8त13150 ५२५
10 9४ 8] चत्वा, # चाकी 05 एकि [पाणत्र]षवंहु८ ६ प्या नासे शत
हतप्ल्ात एवा ठ्कै 50706 ठ पणता चहो) 95 भिचतते हृदच्रन्थिः ‰&६,
कपष ५090 च6 कालोछण्टन् एषत् 18 > पुपश्चणा छां छलाह अग्रत
88 पुकमेचाद्धितीयम् ‰८ 11101 च [7655 थ 80; 11 15 &180 ]010९8् 19
6 उपलः पषाण 19 1४8 ॥कणट् 80 प्छ ण एतल्) अदुक्षत जप
लीहछत) ६ कजत ४5 णित् पीक इटो, 8 सफृठप्णणुणडाद्नणा 109०] प्६8
106 शिप ० शप्त &८ ; 15096, 115 0018५419 ४१8४ 86
18 70 एणा) णि 06 व]न्हाणाद्ककछ शकक हह फक 0 ६15
हपव्पाणृधिंठत [कण 068 इडञप्ल्त ०71 कटछणाा णा र) ठाला८९, 18
101 +8 018 ; च्छलः ४116 ८६876768 11567 0 च्ञ ९५९ 30 106 82।
प्छाकएवष्ण उ 8 79 95018; 0 1 +०० 28 क्तः शपः पकूष्छनत
.छा 007 डफृलपछ ०३; 17. 118 णाह 6886 06 एदा ॥ 8९6 कछ 118
{08 9 अयुविदुपृ८००6 क्छ, छवा 16 द्वकछपतिठ्त् दत प 06 [ध्न्य 7
(ठाव 6 1 णष़व्डडा ४18 15 ससन टकह 1 उप] = 08] अ्णपणा छकण]त्
00 06 [त्व्लणिल कयत् # सलाकपिण्ट् 5 6 पप्रा ण उपचतप्फूणडा-
धता) 16 फएषण्पाप् एतौ 06 [008511915 10 = लकामिष्षप 108 ाह्याजाष्नाह छा पलु प्रञणा
षत् एही प्रपठक।6व७; पला, पालनाच 5 8 ठािञ्दाहत्रिणा 10 छा छण्
1116 छवा6 दला एलाह ध ठक, 6 पोपणद्ु #9 6 ठका पु6 86
छ 10फ]84्6 धातं (146 15815 ण प्ा०क्रहपृषटुढ प 11 1 + एलाह (क
(४६ 19 10 00104100 पदलप, प्ल पल्य प्रणुत् सद 111 पाठ पाड
छ {115 उितात्रद्085,
10
¢ ॥ 114
2. 1६. ऋक्रोच्चतै- 1110100 11८78 ९2105 115 श्छुणृष ० "5 सिद्धास्ती
10 #6 319 १€ छता, 1 इनश्लारत्ञ 0110 116 काततः न सरौगत्म्रतापततिः
नवा चरिरोधः ध [, ३९.
धत्रीतिः-- (1001810 7511658.
साच ,„ ,मदाग्रहपूवंकरवाच्च- 1 114} ( ९011541011671६83 } 18 1107
6016० = फह्ल्ण्ड6 7 क6918 10 6 8प्णल्छफढः 8 18 ]षडश्वस्प
क़ 8 णा-एाणृणटीन्लान्ञाछा रणा पर व्पीटलयाठह ( (प्रण) {09 दिला धषु
1115 ०0.821 }
4 115814188 = इदृगृष्यादकता त 8 65 एतन |प्रठप.
18 3. त त. 1,
11 1... 7.1. 1
1706 उपात्ता प्कार्णणिठ गिः [ष्ठ्छव्ड 1० लडपि) वौ शत् छा {118
18 १००6 इपलााफठडा्तणा कणप 06 दञ॑क्नत्प् एक 98 प्रमाण [ताछ
28 अन्यशाजुपरपत्ति, > 0४, चा छक्वद्वह 15 ० ॥6 7ीप्रणठ ण छौ
18601162६10 ०7 ए] ५8०6, = ¶16 |कल 13 9150 लल पद्मं णः
प्0ााप्ठु, 1४ 18 19 ४५ €8+201181ल्् 168 + 8 णाह अहं
भकेष्यः 2 15 9. प्र०१६ सरा 6णठद, = ग16 व्राताः काटि चञाब11878
156 1 18 प्रशासक क्षताील्छनमा फत एष्टा [पणन्वेद,
हह ७ 0 ड 0५ एलाह तदल्णाल्पवफय, 1 1/5 6956 काचा ०प्रर 658
८४) 16 ०6601१8 मधुक, 3978 ४६ = प्णाञ्भंणाकषा6स8 18 प्रा ए९१६.
ल्त 4 पवा ठत (8 कहल्ील्तित्तमा, कर्वण्णर्छा, ऋ 8 8, 1177 15 पापक
हापा 85 7 18 0 8ढ छणा्डा्ाए क्तः व फर्म 18 18, 1 18 7116
पण्णनछठनधिणय म 8 वाडिपल्ण एकल 19 वण एषणटरफसप् ४४
त त त त. 2. त. 1
णड फला शपा 18 [लसशफष्त् त= प्वाञह 0 [त (लाएलएणा 38 18
0०४-कशरहएणा ण & वाञाल॑0ण जमकर {116 अं] एटा 18 35 [ष्यस्व
ह् 6 वरहटप्र०् शारठा, क्रक च शलश 18 पहा प्य कर्णाट,
17 6 त 0 एह८्ण]षल्रणा, 16 086 ण 19 7188 18 101 178
पणन रव वञपरदद्ण एकल) धह कशद्ु रट्ल्णाष्ठौच्त् खात्
{06 कछ] प्रणष्ट 71 06 0198601 ०४३०, #6 ९756 0 1116 1155
णा 1309 च्ण्ण्पणपन्नाच्छ "ता # ना 15 605 कालाद) ०१ 8
धाना एप्स 178 उघु[ §उ 10 13 धचत् इह 1४ अणा 19 18 ३, ह,
एण्ड छा 8 वप्राश्चा (पृक 2, पल्ला 100 कं 6०0866७०
द70 6 एणा,
नापि पमार, ०=व्राधित्त्वात- द 1६ 15 194 शु [०9६26 18
त्वाप पु दातय एल्वाए ष्टौ चात् ए एट्ञ्चछणात््ु.
योऽ, ,*,१,१,-युदषः-- 11115 †5 छा जहका {5 पर व प्छ 01 कतम घाना,
त, 1
विक्तानमवः-- पता 7५19 वषि 81 01 911041817त3 69 1॥ १8
71587771 बुद्धभिमानी, "111६ 18187: प ००४८३ 115 +€ † चिक्ञानं चज्ञं तेतेते कर्माणि
तनुतेऽपि च घा 588 पवा | पड धत फा ताल प्राद्छह ए 1115 कणत
विक्नान 15 1115 बद्ध, 50 11678 ६0 11187; प्रणा 15 11560 1० (तणा {196 10६8
1 118 बुद्धि 8.1 {118 {10680215 {06 #५१५ चिक्तानसयः 71878 बुःवभिन्ाजी,
सिधा] कट्ठं # ला 176 फ्र0तऽ प्राणेषु हवि 816 10 08 पाछा ००व्
10 71587 श्रानाभिमानी 811 मनोऽभिमानी 1८5 [6९६1क ८},
अन्तस्य तिः-- 11118 पाध 8600 #6 ीलो। 1068798 स्वघकाल्नः 5110
11501111 {18 8 {001 5 बहिज्योतिः प 6] 15 0 16 एधाप्एरण
110 प्]ह्वद्ुह [० पठत् क 106 8611588.
पुवः-- 11113 ८८ 1155 1६६।॥ 68 [1817164 85 पुच्पु ददयेपु जलनश्यृत्तः ( 11181
पाष [लावाः 8] घल ण एलाएलुणतठ) )
4.01 8116416 6301108 106 फठ् चिज्नानसतः ४ कानश्मस्पः, 116 80४
116 हदु 0 जन्तःक्कण 11088 ०गुह्टाक पपकक्रा [क एिणणप्ठु 19 प्रीलण छव
स्ञप्राणद् (शा 5018068. एह #16€ जाध्मा 15 1116 11 ल्व इ0प्रा०६ ० 115 [0 फा
ण प्रादु पुरा णठ क्ण, पाण कलमी 10 क ताड ॥ष्डौ 1085908
1118४ 176 8९ 18 106 ह्वी 1546 चर) ११] 0 87 त् 8०१ 18
ध {10€ ०४४प्६ह # वाणस्य 11७६].
छचमाष्मा ब्रह्म- 11415 ©| 15 10311118.
(15 16 016 त 115 पा महावाक्य! 1 ०८०1४ 111 115 010 पवव्श््-
कथ [एप् व06 रपाप् जाच्मा पाद्यते 15 ग्रावृद्छल्ा ००६ एक 118
एणा ४10त5 10 एष्व +06 जीवात्मा { 10त1714118| सतप}. 1४ पषपड
छञा.1181158 (118 पणता ववंक्लात्रादु ठ 08 1तीाातणण् इत्या] ऋध
[7811115 1118 {06 (प पणद्ु& 36116166 तेच्वमसि, (^) ६०५18 1115 शपा
लाह 18 00६ 10 #5 प्रतरलयरा००त् 10 18 (1891 15 06119141 16]16प८६व १० 08
116 पप्र] ए नह एप 59,
भनन्तस्- न चार 1171418 दपुभुश्चणड पह धट 85 15वपाण्ठु
प्छाप्लाणडटातएस्त ( जरिच्छिननः ) धप 4.0 धरा 88 160110४ 19
९९5111011016 ( मविनाक्री ).
वित्तानम--), 4 111 धाव् 137 8१48 0011 21311 11 ६8
स्वप्रकादाचित्छरूपन्र् ( ५ 116 14178 0 51 पपलाह 15 इलुनिपताक्णाह }.
खपहत्तपाष्मा--¶ 1181 ऋ 11181} 15 चलना च 81|| पढ त 2011011,
साक्षादपरोक्षाच- + 71५1 80१ ०0] 15 वष्ट राकणाह 1 18 शत्
{० € वर्ष ८ च्यक्ष, 14 19 79 107 स्ान्नोदपगोश्च 1668758 11
प्र 165 विहा 10 #105 8९ प्ट] 91018 18 शरान्चादपरोक्ष ४, ६,
स्वप्रकातान
सश्ननाया--- प्स,
76 धरता.
पिपाप्रा-- 11178.
मल्येति-1 19115 0611015,
तच्च--1 11778 †, €, 171 ‰ पसा).
्नेन्वागत्- 11 ०811361060) प्लणाााल्छःह्प का प्रा क्स्लिःश्व्,
दुत्याच्चाः--.^ 60070718 1० द्वप 0, (1118 811 11110148 †118
६5 मूढौ जूदवहुद्धं मावा, सहि पको दृष्टाऽत्रैतः ९११५१ ०1 द्य 0? 11111. 244 -
आ 1 ॥6५ पवुान्त् छतु प्च प्रण,
युक्तयश्च- 1115 1188 01 76080110 ्रपद\ 18894 {9 1116 8816 ०070८ प्र
धा 710 इहां फी.
चिकारिणः... ++. -अनाष्मष्वापत्तैः- [{ 116 ९©075010180888 नृ का 8 क्ष
0, 2 दश्री 10 96 + ातक्र]छप्ह्€, धह 1705 साएण्पःल्व् छपा क्छ
एष प्र तह काति # पक [षडह एत्न निह [वंग &९, पपत अग्रपछछं
10 लोश्रयद्ठछ हाता छठ दुष्ठकक, पेत्वः ५ वहनि स्वात् [हु एण्ड ण०४९
ा्व7538 (ए 15 804 50825 1011 18 8 द्ाचतण्याः1६ = 1106
प्र0ानष्ट।ति 7101 106 =,
11113 वाकाणीाणा 0तं शाहषतरु च्व ९5 एवा ञप् ( वर १३ },
स्येनैव ,. "^^, ^“ विरोधात्-- [॥ 18 1100 [20857116 {140 {16 04 8110111 18
106 3617 5९8१8 10678 38 8 (वाहद्तठान छा 0 क्छ 116 तिल जणड म
6 कुष्ण काप धप पदी, 4 विहः द्दाा५४॥ 16 1118 तद्र 0 06 कइष्ल्या
810 ४५०९ १७.
इन्हदयं , -. ,. ००, ननुषयत्तेः- 116 £| 38 118 हल्छाः 5 {116 |, 3/1. 1
वषा १९, 13 1116 प्ण ४० 06 इचा, 11 7: 38 एलाछ्क्ड्व् 11156 1705 18 उठकर
त्णान्छणा (डाक लया, 19 एवा हहा ४6 तकण व्याति ताः
त्न एलाोछठठा, एल कच्छा फत्ता पक्ता ०012018, = 15 7156 58 ००४
एवा016 08९ प प 1118 वहारा ण स्यतु णुच १15 56 कण्ण]
8180 [€ &१।३]8०। {0 ५65।10८110. [1 +€ द ्एपौल्ञ छ ४6116] {० 8
तका प016 किलाह पकप 8 10 0 दषा, काः 18 [0601818
छणापह्ठाण ०581016 (808 पच्छ 1 (15 एप्रंफं प्रा षट] 18 17170545
तठाषत क्षया 7 कणा ४6 एणााषठहप् एक स्ह एषा #्ौ 18 7100
15 16641188 016 ०58 719}, {&6| 80 व् {१ शाल &०111661;0४ 18
वड्ञपाल्त छि 176 एता६८।4०॥ ता १6 त श्रध) 116 अपं पशा],
1ध्रधत्ठ एठतात्सात्, 118 ऋय] ४6 हा व[सााष्ड,
मेवेनामेदेन-" --" --जनुपपत्ेश्र-.4 2000171 10 पपक्थ १५18 नेद्
166 1685 आस्यन्तिकमेद् ( 0010]21566 01218118 ) 8114 ज्नेद् 7188713 वद]
भका त पाक्राठा त्क पिरणत 88 पपत 5) 0 9 तात्र
वाहा, णक 9 #05 38? चत् वुठडाषप) क्क, छठ 85 पा178#
3 ४06 पणदमष्8 82१ पापक छपा व्8 (18 १8 170 एण्ड रण
प078. 77
प्ाा९ 060 1116 एताक्षत0. ण कष अौ1पफ्रीह कापु {18 11108 #0 प्ा1द॥ 1 18
91190160 6 सा कीश, 11 (06 छा ७३७६) 0156 = एण एत
एशाा877) ाप्ाछ]8 छा प्ात्रीठौल्व (क 116 81016,
ज्ानानिस्यस्थपक्षे- [7 1116 {0718 शष्पं इ 15 प्राणशत् 111४{ {118
39 18 ० 1115 ४९ प्राह च 10० फ 18१8 ऋ 111ए11 16 पादद्नाद्टााह क | 108
पणा प्ाणदह, = विक्र 116 व्रप्ाता वधड णु 116 कपालः अहारि (99
1# लावष्रः 8 कप्य एाठणक्चा 15 (16 9 पदाता 066१६, = 0०
19 तालाः प्राणत दाप 16 11558 84 कफदाक पात्व तक्र &
पछ एककश्च ॥16 1019त् प 1 इ,
तत्तद्यन्ि,.......- गौरकात- 17 {115 8।०१८ ऋः 1: स 16 ततल 18,
016 प्रह 9116 ्ा०४}6वृहह ० ह्ला पाताला 1 चलकर 81 {116 गहः
प 10 15 018 87116 [प्रह ४06 006 0] वधा6 पल्ला), त 116 चिछ्ाड
छ{ {€ 718४ आाखत5. [शी पाताला [0 क्र]हपद्ह 15 3081518
1118 {0 ६६2] क हा ४1616 ऋतपा 08 एलुञटा्कर आवापक] वा््याठट,
हदु १६४॥०९११०08 २० [षता0पर पनिद 6५५३, इधश्यत्रा र [1110448
क0ास्मा100ड ८, काटा, ।प्द्कणन [षणतणहु चाण प्रहा 18 एषठ धि
{16 [प्ा0088 711 [श्राप
प्कन्वाभ्युपगमे चातिच्ाधवाद-- 111 †1\6 011167 ०३७, 100 11118 पत्त्रं 08
एणणर७व्, एटा पीला 1115 561 11887 18 | व्य्ण्ह र श्लिष ण 8
क्षौ णा एक०्कन्प 8 168 18 70 उठा शि ५0676 171 8 विपकतण
एर्लाषटा & णहा ० 100 प्र 16016.
चटक्ताने . , , "^. ,, क्रानमेद्रतीत्ेः-- ५ ८7 116. का 172 [168 कषा प तिहा 19
+© णु 00 पाठका 18 (6 शकार 1 ६] एच, 1४ 1 1018
11189117... 8.11 11.11.11
छ ्ण्ठकत]5प&€ ©? णुह्ठौ= 88. पराली छा 008 वात 3 8 1000,
8 01061 &. पि] आ एदा 10 10 18 {18६ इद्र, ठतक्टाणधर1689 115
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अतत्तःपग्मं तैन परमानन्वु तास्पनः ॥ १-९, ॥
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[६००प16प2९, पह एप्त च्छलतः 36 = पपान्हया ठ] ष्वए्.
परिवेषात्त- ए ॥15 पल]पहं0 ( ण 15 पलप » 18301660 क्व
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1. 97-57.
तत्करणमपि योग्य ,,कलपरनीयमू-- 1 |1९ 18601 {0 16 38810116 0 17 िकहत्
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र्व छणाञ्ला0पडाः क 01५ 00४ 06 011 तातफाषएवदऽ ६114 10 1116 कमः
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19.077 परोक्ष्वैन ज्ात्ुमवाक्यत्वान्र्, 111 116 1144 8]58० 11961९६ 116 पं7एए
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16 श्रमस्य... ... ... च परोक्ाष्वेन, क्तातुमदाक्यशवात् 8110 {1181 111 1116 01118 1#
१111६ £ असत्ता ++, ,,,.०. चापनोक्षप्वेन लातुमश्नक्यत्वात्ु, 11 1118 {01187 {1
फा परोक्चषवैन 011 @० शा] अमे क, धणं 10 {116 हटात् 1119 क्रताष््
परोक्षत्वेन 111४ ‰0 11 क्तन्.
भावरणारनकनत्वाव्र- 1361118 07 111 आ्त$णा8 ०? 8 द0पदय7 द.
अत्रादयुस्वादतध्वाच्च - 11118 {८५८२८0५6 11 1 1118 10216118] ५०5६ ०
५६11810 शट,
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एसा ० पषेसाघ उवप्हह छ पह] चरा070 4६.
निर्विकारत्वात् 1168118 18114 1100111181116.
भन्तःकवणादंश्च तजस्यवात्--111:5 ८४८1११६५ 1115 [0801111 क ०? {116 1 प्रद
५५.2.11. 11..191 1
निक दार गप दुह चत ताह फणा आदिः ८8 10 195 सीट
771 6 छण ता नष्ट पद्म् हठ कपल [०५९५९ १8|प्र४0॥ ८,
वेवारमकाक्ि ,," ,,. निगृदाम्- 6 ८0000011 देषा््ाक्तिम् 1185 1६६11 8001124
9 मद्व पि13 88 देवर -स्वप्कादा-नद्यणः-आध्मशाक्तिः-निजशक्तिस्तास ॥
ताद्व. पच्छ पाठ सु) ्ड 0 चृषठयाद्विकीडावतः 12151641 ० स्वषकाश्नसय.
खगुि;--1 115 19111155 ५८५९, पष्ड भात् व्प्णलः एणा च5 11९
एताश # [09148 णा पत क्क्ति,
गुणवत्वश्चतिः-- + 1.1.11. 13 -.14. 1; ॥ 109 [)1ए716 (एकरा )
एषाा8151111 0 01 @प्रा58.
शि 8 118 ह [पण [कषय एण्ड ० 6 तह पतप
6 इप्र्रिणाः हाड {0 एकार व¢ 05 [णकाः ए ]णो। 18 {105 इक्ा8 च5
पण्ड्मक्षा ९४18 19४० 1116 कापट 07 000. 5661106 [0 & एण्या शाति.
परृतिम्- 1118 ए० 1188 [च्छा €] |३}०6त् ए (1 1.1 ५1 11 |
8१4 एश तु 38 प्ाठशा7हु 1116 ताण 08६18 00158 0६||
शा न्ि८तेह वत् 116 णलः 195 ३180 हए [४ 000 85
भरक्षर्पन कनो.
४११, 89
मायाभिः पुच्छप दैयते- 141९8 १५110118 0109 [पु 0068108 0 [18 [190 ६,
दते 15 पाण्य 0 ड 19 29,
१. 25, अनृतैन--3 1५15211004] +, ९, 1101916६.
घल्युढाः- {-;0 १८१९८] ०१६॥
ह 15 धप [प्म कणा ५॥ प्रषयुष्ध ‰ [481 {9111६111 १प1९०॥४६
पातर णा 116 ८000 क्रत्ृह गणहा 9 106९, 0पश॑तपहः, ०] 05,
1.11. 1/1.11,. 8...
106 [णटए्रौाद्रु एण॑तणा ज 16 चष 15 तद्धा रिरण्यनि्षिं विदित्तमन्तै्रना
उपच्वपरि सऋरन्तो न निन्दे युरेचमेनैमाः प्रना महराज गण्छन्त्यो न तं विनदन्ति ।
गीहारिण-- र 11047-16051,
॥॥/ 3.2. 11. 19... 13;
य इमा जनानान्वद्रुप्माकमन्तरं बूच । नीदरेमाचतः जल्प्या चान्ुतप उक्थकास्रश्रन्ति ॥
1४ 18 8 ४ स्यात ॥टङ् ाप् पाच्छाह ऽका व 10 पठ प्राय 10
शा€+5त 8] 1६58 { तरह) ए्त्कप्रह पहा 18 101 पणा णाह फला
18 पािलह्याौ णा वा, अआ तष कप धट एठरक्षाठव् कषद (फ [तवती 057
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8१ 10/40
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0818 ततौ २५ जनो मृद दव ज्यवहमश्नास्ते मायैव 0711 अविच्रायामन्तरे वर्तमाना.
माचा,," „" ,,*चाज्ञानमेक्- ५ ८३1६162 &]0118 क 1118] 35 चन्छद््या ० 85
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९४०1५१६७ ए 116 ॥00 फ]श््५ 0४ 1115 5801168,
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९56 &प]९८1 ०५8१६108 ४6६०५88 18 18 छ? 116 पकी ्76 0 प 65161108
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सङ्घमदेह १४५५ ६११०४७१ ^
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1111111.
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ण्ठ 15 9 प्राह पप्रत्ठ ण 8 ताण ज पात उघह कात् धल प्रता हहा.
५.ल्छतापा णड 0 पद्धात्कनप (तत्रा 16 पठा पण्डवा # पप्र
दण्णाह्ठौण कचस्तं छठ च्ल प्ट [पाव ए 116 कीरा,
एकतरख,,* ,,,,,,जभानव्रसङ्गाच--1( ॥116 80181110) [08111011 ण 814 9119
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अध्यसस्यैव अमे भाननिचमात्- 11113 118 15 18 000 रक्षा) 68/९[19
प]: 1, 86 पाधा 1005 18:
अध्यस्तमेय हि परिस्फुरति मेषु
नान्यत्कर्थचनं परिस्फ्रति प्रमेचु ।
स्ुत्वशक्तिशकलत्वमरक्षितित्व पख्श्चितित्व-
चन्दरैकताप्रश्तिकातुपरस्भनैन ॥
हमे शङ्गगजतते इतति समष्ठारम्बनवत्- 1115 11714141 ००।०/ ० 8 11101161
एवय] पट] ह्ाकचड 86 1 (ह चलुचनकर (लठ [शा ता ब्य शां 106
{41898 शाकला" 18610 878 1511 11715784 प्न 6 प्छ दुदम् { 11118 ) 17) (118
पे]प्रहछाा "1118 18 81] एत्य. छनि] 1४ ५०८8 [षग 1156 प्री सष्छय चल
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10 18 06६न्छ्् पा पिठ 18 फप्रत्द इप्ृ्ाफएषहात्छा, 116 88006 18
1118 0050 क 1118 फणात-वलपक्षंणा पौल 6 [0ल्ाणालया कशा 9
श ]एलः यात् (16 इर्धा फला 15 108 अपठत इ॑ाव॑ह 0 1116 पाक्या
0106911,
(6 पापतप्रतीणतु [षणु 111 1116 सि(ण्णा (19509 ० सत
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निहा क यप्र शप्रृश्णएण्च्ि०म,
सर्वबाघावधि भूत ,,, -., -* न च्ल्यवादापत्तिः-- 1115 811]06117}00811108 0† 1148
ध ०४.४6 चता -86[8 ¶च् [ददद एक पतप ण] ४00 ( संसर्गतः )
011] 10 वडा (1841 ( खष्पत्तः ) 85 11 ६58 ¶[ 1118 1107-3 ]8 छ 108
€| 1166 15 [ध्लाः 7हा81008 प्रारीं८४5व् 1 ६11¶ 5 प्रा ]10शिठाड.
18 पपा पपाद 8 हह तकपाला #ाष्पद् च प्क्छुः च] 1
क
1. _ प. 4. 2, दव्यसन्क ॐ, 1 ९, कक्, एतद चलः वनोदय (5 वाठ +, ३
कं मा कषयतद्ा | (वतक ् ) 7, स
पा, (-1|
1४९6 0९ 0118060, = प्रहा ह४6 सवी प्ल पशुम म 8 नदादलः
हाड, 14 एणााद्ा5 0८, {1 10 18 06६1167९त् {144 14 १०६३ 115), #्ये
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(181 ५ < कद्तवीकष्णपड फ 119 0९सछ 108४ छा 018 वहुणद्ला ०8]
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7817185 18 8 एणा [0४ 30 18 10४ चते सोक एषा 8 ॥लो-लाप्क् त्त् पाह
08 पतद्वत 08 वहलााल्तं 10 11 18719106 0१,
सघ्याचरत. .. .. . . .-अच्याव्रच्व-- 1111 {0 18 [वहत् छा पा ण
त लि वाभातएीह्ा द 71 1106 उद्ना 012 पपठ) 18 च्ल
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तस्मात्... ... "एक पुदानाविः--1 £ 80])6ात0]9081110718 9 #16 60 च,
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60१ छ ४८) ६ 81]& ४।| 178 अप्र०85 816 ¶र8ह170क6प एप 18 पाद्ट17४|
द्िण्णशापट सजा णहा ॥05 1तनाठ्छडततड ( संस्काराः) ० ॥11६
0984 80110708 ग १ [लार एट्ा8178. = 18, तिणण (ालञछ [ाटछहोणा8इ
18 उठ] पठा (ष्टा 20651, 1115 15 8 [्वह्य् 181द 9411 8 ‰, ५४
क 4116 48011115 116 भन्याकृत,
2. 26, स्दरतिद्यं ,,, भध्वाच्रः--स्दतिदषः 1116975 ०८९०११17 10 111
एणा शणाःर स्डतिसदवाः = ( 811111187 10 छा ग 1115 चऋणाह कतिर १8
16८0116९4101 }, = प्प 8 छप = 1181 {1118 1068110 11171165 १०१६
118 अपकारक 18 द्ु्ादव्हल्त् कि [कटपण्ऽ [पुटा छा.
हल्छाा$ 19 [6 [8 (8६९5८ पाहा 81 16 110 ६८० दहना ण > प्ाप्ाद्
ए (षष्ठाङ्क उद्छा आत् ठौ छा प्रपा 1898 [दीं 710 आड
छ 0165 प्रात,
म 0487148 द] जह 115 र्ता अवश्राप्तः ४३ अवन्हो चासो ज्ञानं जेयं
घाऽबभासः 89१ 888 (11४४ 11६11९8 जचमत्तत्वन्रु 1& 118 ए]0ाषसटाकए ण
ज्ञानाध्वासर 81८ अर्थाध्वान्न.
कार्याध्यास्रा्िप्रायत्वाक्षस्च - 11116 811]061101008111011 = प16]+ 118 शप्10
६16 13088 11६ 111 णत् प्116 णकत्र्मादटु (्# कह्यव्यीः 15 118 न ह
श्िटिला8 १, ट, 8 छष्ु9 च६, पाणौ काह 115 [कत्वार् छा नि च्न्दा166 तड
०[0त्हत। †9 पाक ण विहत की को 15 प्रह एपणणाफ एह
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पापाया इध9 {18 धह वनीपाक्चण फतपात भुणा ४० अर्णाष्यास
1 ४15 फण ध्यास 13 १६7६५ ४8 जध्वच्वत इत्वष्यालः 820 2 ज्ञानाध्यास 1
६119६ ५ 1 पष एटप। 83 नेध्यत्तनमशघ्वास्ः,
8६ ५८18४,
परत्र परावभातः- 1115 8 [ृष्ाशा1८5 ० सात) लः शा सात5 २४ 8 [11858
111 1.211.181, . 2 /. 212...
खभपानुगतस् लश्तणत्वात-- 1 1118 [६71६10६ + 111६]1 18 दा 10 100,
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1106 १60101४1.
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प्रा्दाद्स, {116 चप ण एला हकालाच्त् कु [राफण पपात)
छक 0 118 संप ०106 पक्षा म 76एनाह्छणा पीला 15 ऋ) ०६
ए "त अन्वादलेपपड पणात् 0६ एाहदक्पाठाछव, प्ट वदुभुक् ण धर
प्रह 19 1४ 18 11194 कौ 18 प्ालाछ एष्व 18 (18 अप ्फफृक्लनिनण ०
6 €05९15, ४५१ 1116 (ए एत्वता०र छ क्वाह हा818705 89 ध11011180 [1.58
क) 18 #06 कक्तातोा तौाधाचदन्विडर ण एकी, 118 108 ण 8प्रएभ0-
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0 8 शवल व्माधिशवाच््तण) ०३ प्रत श्ाकतालय भदश ज नद
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चम्नेदः ००००1410 ४० विकर शार सत त्मा व5 परय6छा)8
तादास्यस्र { 10161110 ए }.
1 जौ0पातं ४ (लात स्प् (8 १1189 18 5814 6 {ह [18९5 33 1०४
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धातत 80 &8 1601 10 170] प्रतं8 176 जाक 01 #176 ९9188 ता {116
घृत्य पण्ण्डानिछते कौ 15 8 सा,
17 धाह ष्क बलाचह 1 18 115 जप्ता त 15 पह्ड्ताक्षतठ ता
1118 उर्घा. एण ४1 16 8150 {1/6 स्व्रह ध 10 8 ण 116 60 त, पि €1106&
1118 काराः पराक्ाध्टु 15 9150 एणा 6८६,
का्यौम्याप्त ... ...**न कोऽपि बोषः--.4.2201111 19 कपद्राप११ गष
11118 वशाया 1185 [6८ इवत 19 चहल" + तष्यद्ाह ४6 पणुह्छणा ११8
118 द्वाध110॥ त € 150१8 ४5 5५1 :--आहमिवं ममेदमिति नसर्गिको ऽयं कोक
व्यचदहाकः 1† 18 ताए 8 16061140 ण 118४ 185 पच्छा €]118198त् 10 1118
एवाप एषण) प्यक, ४ चाह हपृत्पपण्डिण ज च्छला 1
एणा 58 17 1116 58056 110४ 1} 1188 79 एकक [1118 नि ण {= ह्ण
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7, 20. तेर् ००१०,००. न॒ किचिवमश्चम्-() †0;8 शप्त 0116
एवा हप 8 6 [पाह रिच [ष्ठ एरी 1 11861 18 0णावृूटऽ 87
1४3 एल्डस्िछा 708| 81501190,
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1116 [लाद 5681588 ह्ाह्ण फक्त 1४8 † 6 हडणतसं चापतत् क नहह
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आभासवावुः- 36110108 1, €, 8 †ठोकुः कराह1 इष ]्95 ४18
§प्रुणटा० सिप] पत् प्रा6 [तीत्पपपष] पइ 85 इ6ाा9[श्668 वा पास,
अक्ञानोपहितम्- ५) १६11॥८५ (क 11018158.
छन्तःकरण ^, -,, ० जी दः--)1471; 110 10806948 1147 116 पुण
णप] 8 #= चिन्वदेतल्व ८181106 एए 1द्ाणापप८्ठ 15 ४06 र फ््तंतेप्ा
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871 शपा ]916 एप 98 [तलत क़ 9106 पाल्य छदः क्त्र 1106 ता 0668 08
9 5 61616 60681116 (चती).
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अत्तानघ्रतिचिग्वितं चैत्तन्यम्न-- 157] 118 ¡॥ 116 पल 0 11015 क्रा
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8810 प्रिता प्र] {118 17 एताश 0§ [001.8,
सन्लुपवारीरक्च्राः- 1106 चपा" ण पतुकलुण्य स्न,
णः ्णिकव्छा १३19 पाड पण्य छत् 18 कठाः छवः}, 40
शण,
जनयो १००० जीवनाजा्वम्- 1 11115 ॥८0ी 16८ 38 8 [पवक ४
एताव 86 पात एल्त्वा६6 पच्छः त 8. पु [णठ [0 16 [7्त्ल]णलौ,
+ [पतप प्र प्रणत जुति 048 9०४ 05 प्रञत 1५ ता नवका 0९
18 पाह ण -एातव0 ६5 09 6 एकत्र 0 0106 ताप] 8९प्रा,
प 6४80 18 पतौ णय 0षठद्ाञ 4 $ ज] 8 णण्वप्रल) छ छाल
8866४ ० +06 जन्तःकरण प 1011 15 पदा {0 ॥@679,
03. द
अरतिचिम्बस्यं चं ,०,,,,...तत्वमादिपषरदैषरु-- 1 1118 [9 ६५००1 ।६१ ॥1184 #11]8
11111111. 82.18 व) त) त.
अछत छाः 1106 श्वाात्रष्छता8 ० ध जआमाच्नवादु (९168 118 सटी हाव्छा ४0 0९
9186 ५1116 1058 ध १18 प्रतिषिन्यवाव् 06|18५९ 1: 19 6 नि 6, { (ह 8, ११
द्णात् (८ णड हील) च 0, 66-67 ऽध },
अतिक्िववादः- 16661100 ~ल ॥, ६, 2 1060 णाल ६218173
#16 ज पृत्ठणह उक्प्ा श्च #6 पिताक च्णप्राञ 85 कशीहछपतोह ण
3181778.
2. 29. अज्ञानविष्रयीं भूत्त,.... ,.. इत्ति बाचल्वतिमिन्नाः-- # ६.118.819} 11०15
1187 [19109 18 701 कलीहताहत् 17 तण्ड ०९॥ (प्रौ 0ष्ल्0ा68 115 500 [6०४
0] 1: ६6 [प्राह 01 कहत 8 प्फ सननिणदठु अप 115 भुणा
ण द् 80 170151४ चपर],
ठ तकि 88 10 प्रतोद सत् 015 फणाः [गद ग,
25, 4 चात 40 कणौन"ठ,
भर्सिशच पे... .^, जीवनानस्वम्--31006 1116 = [07710 1800788 1118 8 प्रभौ
८ 1400787108 10 तातल +> एह शो 10 0ाप्तपप8। अपा, एषा ता्ा128 1 प्रह
06 विषहा 16 पष्ठ दव त 69011 11का1व०| वि जान्लक86 {119
3] १४॥ 419९8 0९ पट्टा ततान णड सककाठ 05 ७50प्र|दते
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पर्तिजीवं च... ,,,०.जगतुपादाकत्वाच--1115 १0110 2 2460 [पवातपृध्रम।
वव 15 पीछा एवठ्णापघु ४० पादि ल्प लठ? 1175 [पाध सिवा
एसा11018 प्रती8०ग७त कणप 10 1 708 वाप] =| ३, ६, (क 05 त 11011
114 0ल्त्छत 178 उपम ण [दणताश्रोफ8 क्षा 15 प्रापिद्यन्ना॥ 11 + ८७७8
0 €५९]॥ {118† 18 116 ६५४5 ० [08 [ौष्छणणरा
70 06 16 शप ग द्वा०७०५8 ६ 9 ॥स्०ा6 वुप्स्ाीश्वं 0 1#
गाह 1116 इ8706 10108.
ग्रत्भिश्चा- 16601110,
दै वर च,,,०,उपरचाराच्-- 1115 30016116 (7 18 ॥¶ ९५०१६६8 80061
धी 98 {116 द्व88 080४186 [© 18 #15 हरपाणकफ्रा त 706 पी फताप्प हणप्राह
॥दु्ालः प्र 06 एषलालाला$ ६0 पत्रार्का] 11018688, = 81066 10
4118 ॥्रष्ण्का 1.6 छप्ष्ाद [रिह १०७६ एणा पि1056]{ एतल्ा8 कणाद
४ 18 णु ग द्णपाहटफन पह प्रिह 15 अूणपला ५ ऽ 6 (्वपच्च 0 15
एष्णणपाह] कात्, प्रघ व्ठपयटप्न 8 तक, 9 ति] 1568055 €
15 ६06 द्रस्य 0 ४16 [ततायपपमा उ0प्राड द.
१8 900४6 श्हाष्प्रणा 18 18884 01 #15 लप द्रहपत्धफ 0
40 कृशा प्रण वलौ8 न द्पछश्णा सप्रपन्ननी वाधिच्राऽधिष्ठनस्वेनं ५8 6
94 11/41:
वणवा एणफृणपधत्, तिदपोकाधय (1008 धमप 1 95 8 पा
पिष पप्तः, त्फ + रि कीया पाश्या ३8
पा ५1९ §प्ृष्छयह (लप 38 पु च्णपाणद्व्छु शु0ल्या ० 25 {6 68115
ए68प्७५ प्रि€ ५6 16 तणान्त्क् ण 1200८४४ प्ण 1) 16
एषणा पाठौ पाह 116 पदिद 9 1106 ।0वाकपप्ा इपर,
3 सपुणश्ाद््णा १०६8 प्र इडा 10 8 एणाः [कव्व चणच्णताष्
10 108 भवच्छेदवाद् 1118 जीवः 910 पडा छात जचिधा प लिऽ फा ९१6
षदा ७यत् एषठ ज्रीव 7४5 18 एफ & [6ापौ6 एाह्व0.,
जयमेव चाचच्छैदवावः--.+.1104 {113 1६83616 18 110 प्रा 85 {16 1410
ताक १, ह, {16 ताह्णक पाती ददणश्णड 1105 छप त्छ5 उता] 7 {16
1एप्रापाा9। 50115 9 {18 तच्छा ण [पत 4.111.911 9
4.0 6 1198 81 0, 48 ५ 05 तणछा्त्वए 01956 11656
1188 पच्णा8 1णद्ुटठा शवात् काठक व्राद्। ताल वाह ण्या 0 पश्च
(नाच.
पशष वेदान्तसिन्धान्त पएकजीवचादराख्यः- 111 11118 11601188 81058 86
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हृण्ण्त् (६. ९, ध्प्फणकर८) धपते पाल काह दतप्ष्ट्प् फा 105 पक्षा
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तंछ्ण) स्वात् क ष्णाा9 6४18705 पश्यगास्ननि वपुपत्तिः ३३ आस्मत्वावबोधः
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1 भन्याःकरण
[॥ 9 श्वम 0 पत च विवतते (10पा0च्रतण) ) 0४१६९, 1४
एत 1186 1115 एषवक छ् [हषएठव ॥ ॥[दचपद्कमात आत 18 1416 तितौ
एषणचप्त म 11 षट भण शशाक पपषष 5 15 णह +त त्वव
णी7756 पीयतो ण ॥06 नन ०18.
17 18 एठाछास्वं पोष (6 सदलिकाकटुपकः पठति [6 एलणणछकया
पाला (९९६३७ 16८ 18 # हिठ्छ। लाः [षणा ०0 कहकह ज 119 एक ण ण
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185९ > म्ावहारिक { [71610708181 } 6क्ाशाटा0६ वत ती1 1110 9 {18 ०111६॥
वरा्तीतिक (17510044 }5 य 1 प््फप्रह्ा एड धाह सत्ति चह
शात् [४ फण व्चिछणं किणड पहा6 15 च पाएला। टकठला
पला, 1118 जद््ट्वमा 18 नशछयछ्व् 0 19 पाह 9598 णा पद
ह एच8101। इचाभवाह्वा.
त] सवया जनि्च॑चनीयर्यातिः 1198 [6९ दणि पिप 4.
[छ {0 7171600 अनिर्वचनीय उवाः व्रतीतिः, [€ 185 पिला टद] पाप
15 फच्थाण एकु 5, छ हण पाहा 06 क्प पड कृष्य 1 8 प्रमा
0(08त् 18 7104 1९9] लयप्र छा धाह ए ठ कह [पाठकफाल्प्ुठ 46 ०९३९8 10
सुः दयात् कौ / 15 पराः प्रापरध। [ष८वाा७९ इट] 8 नाणु व्वा
श] 0 ९350 ६७०. 70) 8 {धपा पि्ता०६ 516) सी एटा' 15 1708]28116
त एप पच्छलतं एत् ल्यः 88 उच्छा 07 पठ] ४7 111810078 1 18 516 1
क 1111 11111111. 1.
106 प्राकण्च., 0 & सजाणरश्व्ा ० {115 पसव त वाति फ111 1118
अन्यथाख्याति ०९ 1116 [पावका चव व निक ताक श कवक
पन्न, 70, 4, 2. 455-64.
तथा च ,,, ,..रेषाञ्वनासः स्यात््- 11168 15 8 81191] 51061107 [61१76201
11018. 121
01178 पर]110) 0876 3 व्यावहारिक ( 1011600011818] } 8114] #1086 फ 111९] 18९
8 ब्रात्रीततिक (0 ) ह 86108, 8 एप, दद्या 06 [तछरष्त् {9 04
प्रतएछ] छू कडा {16 [पह तड ण त्वायत, 18 पठव्रा्पं ऋा)ह पाह
[दरहप्लि' एका. 8 [णण # 06 शलं एकत 116 णवा एठाह त तकरण
छाल) 88 १७ [ष्ाठत]01107 ५, = प18 ती 0णणा ए क8ती पह कपपर
18 ० 1116 88719 1817116 88 व [शौ फरष्छा 116 1671688 रा 18 [षतंसककं
1 8 जपाकुच्चुन २१ 11157 17 १ स्फटिक [९.७५] 118 1#,
लि. 1285 एण 1198 &[ ४6 ्र05 पाडाठप्ंणा 2180 1 {9६
एषह १00९ णित 10.
न श्यत् +... दचोाभाषादा-- 115 8011175 वा ष्न्टः {7 118 8.05 ०0
1601 18 नित कातो) # पाह] भुगधतादह फठ् प्रकतौ #95 {019९6 ०४ [प
एण्ड, प्रकर ( 1) (12 9065 ठी बण धह प्यत्र पकप ववक्षामीन्
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एवणााणौः 06 [एछाष्टारपयं णत { 8 | नादौ ताह फारत व्रद्ल्कााश्माषप् (क 8] पदि
1.11 3.1. 11.81.10). 71.111.
णह व 0प्रहठ ण 8 16 कीरै वि 1181 ० 15 छण वाह
87186 17 116 881
तख्यादेकश्ै बाह््न ,,,,,,,न॒वा विरोधः-- 118१718 ४ पड धल्छास्त् ति 8
{०851015 ०१९1०४8 19 क 5 जरला फलाद ५15 पनात) ४05 पिप्रु +
18 [70 फा ८. ४11८1 11६ शकह स्डत् 109 घ. क, 06 पतः नतु अथ-
स्वनिचावत्ात्र् ८, ( €, ३१), नाह वपा [कक 4518 0115188 चीद्ौ 111६
णहलणाच पौः पसा कति 8 कहट्ल0का्वक्ताटतिण् आ 16 ए हतु प०८४०९
धात् ॥119६ 1# 23 8६ 0 08 पणत् 90 ऋत ता ० 6 -सतरपतता हक (१ ६,
176 छक्र 1785 ) को फष्ा७ एषञा 7 118 0रद्राणाणट { एवह &,
१७! श्व 001 अ्डाकाण].
भष्वापिष्यचस्थाः ,,, ,", ,.-वपवादचिष्यन्तै-- 1) 148 [8९ यपं 11.11
१६086106 19 ध116 [000 0 116 लत्व ्ाछ्ातका 01 # 6758 ४ व क्ष्मा
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योऽयं योगस्त्वया पौक्तः साम्येन मध्ुखदन ।
पत्तस्या ऽदं न पद््यामि चञ्चलत्वात्स्थिति स्थिराम् ॥
चश्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलधद्ुदम् ।
तस्यां निन्त मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ६.३३-३४ ॥
5/1 71811118 11114 [प ४05 प्रणतं 1 त इप् & 7815 श्तु
16011६8 :==
असदायं महावा मनो दुर्निवहं चच्छम ।
घभ्यासतेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
अस्तयतात्मना योगो दरुष््ाप षति मे मतिः।
चदयात्मना त॒ यत्ततो चक्यो ऽवो्ुमुपायतः ॥ ६.३५-३६ ॥
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अविभक्तं विभक्तेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
अतभ च तज्कषयं अरल्तिष्णु परनचिष्णु च ॥ भ. गी. १३.६६ ॥
तमं सर्वेषु मूततैषु तिष्ठन्तं परमेऽ्वरं ।
विनच्यत्छविनद्यन्तं यः पष्यति ख पश्यति ॥ सैव. १३.२७ ॥
0? 00प्राऽ 1116 58€008 188 110 (णि कषात् 70 [1 0ड [प 88
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888) ३]| 1468 0 पाका ठनिक्ा5 ४६1181165.
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28 ॥116 प्छ पी तवाहनिा८प्रणा8 ताह 00771 91 8156 1110145 ०01४; 116
11, 18, 11.71. 11111111 11111 7,11.1
4.3.11, 11901111 1.1.111.
चेदु... ..प्रनाणबाक्यानि - 118 ९188 07818॥ ५ 10 [रा] | [त्रा ६४
व्रतु (1) ४08४ फाप्णाा कपत छौ पादु 118 ्ाच्फहतंहटऽ ० 1105
16915 ?, €, {106 १278 17011 त्वे ९० १{लव् 1० एनत 8० फट]
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चह ण चसु) शच 7 फलौ 4 18 प्रादात्तं पी 7 कप् अप्
1116 8811388 ५116 ५० 106 8] एव 10 63181,
2. 42. त्रथाच सुपु प्रहत श्चततिः..* ०, स्वानरधनिवृत्तिमन्नषद्रिति- 1४
ध्म पप्णाह 116 800४6 [ष्णा ए ४९410 १७8 त फणा अत्र
पिताऽपिता &, 13 9 1 [16.
भणहा 1116115 1116 ५६७॥०१७॥ 0 # {८8३ ,
व ्ल्णाणप्ु 60 क शयत क. 13 चण्डाल 05 1116 ९856-0 8718
क्या ४9 8008 फणा + प्या पणाय पपफपद्, लषणः ६०
प] सत 1081.411 ष्णा 1० [षव इ, 18 1690 पत, 8 पक्त्र
गए ८ 18 1196 हठा 5 ॐ पौल्कन्त पड 1116 88161410 1 0 8018 0८५
0 चाच जहा पाष प्लल्णा56 क्षा विियाततत।53 इ. €, 50115 004
०[ 10 क्णपडछ [ञीगाश्ा द्रत 1150 वतं 5178 पणर).
पालः [६108 कीशुपषद्ठ ण प्रतिकोत 11३ 1, €, पपा
लकल ॥811 0? 10 0६४९8 441 क 9५९0 ण दाच 91158 फला 170९
१०४४ पणा णि नह इ०8 कण्ण, पण्डु पव् पठं तच्चरण
द|] ¡पटा -द566 11018268 98 1116 1145 ए0फ १०.
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कात् पत्ािहण] प्री वृह पवाणत्ण हपाइ,
=-= न्न
1. कलम दु जाध्यक 1 तयाव 1, {5
2, शिवकवच 0 कर्वद्कत, वप्रतप्थ [प्क सतत दवद 2, 15;
त क, 240, 5, 73,
३. -तिात्थष्णतय ४रक्॥ 2, 2, 51-59.
4 अत्र, 72. 9. 44.
9. -तक क न 150 547, कै 20. दथा दा तध्य (^ कि (1 |
1. 200
8, १७५ क, 17, 40 काथ {2 तदमृन्लताण्ल,
४
18; (1,971.0
त 188४ कृत्पव्वृणः 35 हालत एका ५ गिरष्पष्याच वा पाड कष
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0 पा रा चैत्न्वतव एप सलवा 85 कपण कणदाातपक्षा त्वं पालो
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राप्य ्प्राफलयः ६ व्ाणट 3 होः] ण कपान्न्णुणहा8, 90 षाद्ा्
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प्रणण्ड स$ 11181 उछतु +9 फ 50 पत (९ शप्र 10109168
लणा०। ० कणप, ताजष्टाा छफत् चष्ट, 8 पा परह 11191018 8४18
उजाला एता ० 06 पिवाहणप्] 8 ७8९.
जा्गायस्य क्ियापरत्वेन- 12581188 1118 11110॥ छा 11५ नागतः 18
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गड एषंणलंएर अत् 11. करपाचञता0ुकु 8180 1856 06671 00101१९
ता #15 2 ककत 5 1. 2. 1, धशा एषण ह~
आज्ञावच्छ किया्वादानरथक्यमतदर्था नां तस्मादनित्यदुच्यते ।
वागेन्बादिवत्--&& 7 ६।९ ६७७६ ५६ 8]७8०\ ( 0617 940780 ) 11६8
2 तण.
ग्रा 18 8 करा 1675 १० 116 ॥8६॥ काचं चेनुमुषास्ीत (ब्. आ. ५-८- )
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विषयो विंशयञैव पूर्ैपक्नस्तथोत्तरम् ।
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20110 116 ए तएए४ छत् श ्द्मीड+ 11453188 11858 [ल्ल्य
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ण ०716 07 06 81188 पटठक्पाणहू 19 ४16 प्रः ० 16 [मतौ 1¢ प्छाउ
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वनित सिद, प्ल् 1, 1, 1, 1. 1४ उ्ण३ प्ल
वायव्य शेतमालमेत भूतिकामो अयुर्वकषेपि दवतां वायुमेव स्वेन॑ भयधेधनोप॑घाति
स वैनं अूतिं गमयति भव्र॑नि ।
स्वाध्यायविधिप्रहणान्यधानुवपच्वा-- 1], प शात् ऊणा कालाः 18
0660118 एप [00861688 प्राणद - पहिए 416 | 60781806 10 एर. #9 ०6
[पुप्प खान्याचो ऽध्येतष्वः.
शाष्दभावनेतिकर्मष्वतांग्ासाकाहस्वतिधेः- (1 {116 पाणा प्र 1116] {808
1 08800 18 [087६ ८३।५त हुविकतैग्यत्ता ( 16110 छा [षयि ८्ट )}
171 116 ए सा०8] ©ानण्र,
+ भावना 123 (टा. वहतु 10 1115 अर्त्ंगरह ०5 मचितु्मोवनालुच्धों
जावयितुर्षापारनिरोषः [ 111५ [६८]; अठ(1811 त उता [ए्ठवाल॑त6 छद््चा॥
पा वथा #० [४0६ १०५४ 116 षष्ंडाह्यातह ० हणााहौ णु कए) 18
इणंणड्ठ 1० 18}, [४ 18 ण ६फठ एव्पकालड, शादी % र्थौ. "116 71.50 1125
0680) 069086| 88 :--पुक्पमनरत्नुकलो भावचितुर्व्यापारविरोषः ( ४116 ],९९प]19८ द
र उठ [70वप्र८॑र6 वटुष्ाौ काण -दहातुड {0 [व 6 8 [हणा प्ट},
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06116क्ह् 9 7651487 {16 कण्कतत ठद्ाठवाहत् तु मु ्6 चलथ 15 11008
&९, 1६ 18 ठ 11126 ववा ॥18४ 4४ 13 ०8118 116 च्ाव्वीभावना,
(7, 130--किंह्त्टौ डादिभावकस्तत्रभान्या
चये ऽथपुंस्पवृच्ति; घसिद्धा ।
लिश्लोडवैःपुस्पत्रच्यशानिष्ठो
व्यापारो यस्तं विदुर्मावनैति ॥ सं. शा. १,३८६ ॥
1 पह वाह पछणादणतक तप 16 71, 6, व्बाह्त गृहारधदीषिक्ा,
{5 088 पपत 5 एष्व, [6 नार इकृड पाह दण णा
144 1 1.0:
46 (6100 क्मोषना 00071 7) इ [1. 18, 9 चोदना 7६091095 प्रवर्मना,
अन्ता अनुप्रतिं &114 धिदा नल :--ते चाकादुयो कानविोषा इच्छा वितोचा
शा येतनधमां एव लोकै व्रहिदाः । चेद तु विधिनाहं प्रेरितः करोमीति धषवहतःरो भव्रन्ति । तत्र
ल्व वमयेतनच्वाद्पी मेषश्च विदिकख्य विधर्मं ॒चेत्तनधर्मौणाज्लानाद्विना तेर्कता संभवत्ति । जतः
स्वधननवं साज्भ्वुपगन्तस्पा गचन्तर संभवात । स एव च धर्मशचोदनापवतनापेरणाविधिस्पवेदाः
जच्दमाचनैनि चोच्यते ।
पापः माना 195 11128 एताश प्रणा भृलाहणाड, पताह ( 1 ) साप्य
(४च्७];) (3) षन ( [एप )} वध् (३) इतिकर्मन्वतता { 01046 19 78
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1116 प्रक्र ० 1106 इरा 1 ८, 5 कषक, 11 1४ 78 तरि त्रिणवः 116
3 1, 6, 10] स्प्े का मठ काप 06 कण 865 60 प्र
ऋ # 001 श्रताफा्ल्छत् 0 नह श्प्रफएाः.
अन्यावृत्ताननुरातं ..,.. दितीये सति वस्तनि-- 14111114 18 101 € शह फणाः
बहटा पणि शआाकृ्पणद् पठः 85 ‰ एण 18 द्डलपतृषह्प ङ छ सह्या परण
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पणि [काण छप्णीणय क चिप्हाह 35 ८५ पुपस्ुि स्म्य) 0 जि्8
हाते आकु शुचठ पलः 88 118 वपा ता एशां 8 06 18 दाता, 10
हाः] [0008. 1708; ऋष्ठप्रोत् 3180 ॥6 1116 0888 11 सरार 19त् 108 111६८.
ऋ 1 तह क्ता 8 निप पापिष्य हिप २४ छप् क्छ > प्ट
पौ 11४ 8 वप्र 10 एणााद्ठा) ताणि (डा, द्रिला प प्रणतं
४1.111. 1/9... 3... 111.
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एप 86६6 19 18 1118 ए पा६88 ठा 1] [एषापरा लान वत टला 8।,
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दपदाथ; घात्मा.-. +, ,.. साक्षी चेति-- 716 8661" {5 1/6 < 186]. † 18
साच 10 8 पारमार्थिक 16५६१58 1# 0०८8 10 ८९४७७ {0 छख द छा प ए8
४०५ पीला हदय परवैड © ल पपा, 10 पष्. पण शष्ह्ल॑, च ध्ष्णाक्का,
16014105 119 8६118 त्ााप्दुा0प, 10 पट्टा {58६ पर्विडाःहाौ 01681
र्णा, ६ववा6 पए, हैश्वर, जीव 94 साक्षी.
कागणीभूतान्तानोपाभिरीश्वरः--दश्वर 1५5 107 1115 11001140 111 41.411,
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वुं स्वं खर्प य॒खाषिः पदरलीवेश्वरयोरन्तःकरणावच्िन्नधोरजुगतं सर्वाजुसन्धाव्
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तस्मादेतत् ह्म नात रूपमन्नं च जायतते ॥
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चतमतिर्ं अ ४ ¦ 1
आतमानं प्रविभज्य ऽहं लोकानां द्धै ॥
पका मूर्तिस्तपश्चर्यो कुरते भुवि मे श्थित्ता ।
अपं कुक्ते कमे माज्पं टोकमाधित्ा ॥
अपया पद्यति जगत्कुवाणा सराध्यसा धुनि ।
होते चतुर्थां त्वपरा यराहंच्यो वसार्थदा ॥
प्रह १18० ह्ण 8 छपर 9 ४16. फल [-प0कया 11681808110118
न 5 + [वपाद्ठाक, ९९ ऋक प्प छाः अतपर का भत (एवा ०
एत्ातााषठपर्ाा, प्ता अ6 तिक्तक 116 898 प्रद्ना०, क्िद्नाकणोध्रा-
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जाह्मल्वरूप शरपत्तिच॑स्य लः.
160 प्रतएव,
एतेषां च स्वतनौ पाधिमेदाभावेन , ^" ""व्यद्ियतते- 11191018 १11६९; 71816].
विश्व, तेजन ५५ प्राज्ञ 1५ 00६ 6४1४] वा किरचय एष्व [दपं चाह
पुह्ाद्11075 ण 718 इव्या+8 इपर ह्कष्चा @ा च्ठ्छछप्राह ण {116 11166 54६8
16 16 पिवाप्र् 19 ह्यह 8., [0 ६8 115 छलाह 08 711 1106 प1188
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ण ए 105 कच्छ ४8 इष्वा प्रक शि्ाएठड तठ 10 [841 छा,
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रयणण४व् 95 116 त्तिक,
तक्षी तु सर्वातुसन्वात्ता... ^," पुङतिध पुव-13981प०६ 1119 0९७ परूपालट
पीणा€ 15 8 पप्रा ा तठलद्टाहतणा, त्र (116 काक्षी धयत् प्रा 8 हणा
८0 १८६† प्राद्ाटन्ड्णाह (पम 17 तया ऋणा एणाणा४९ह ध्] #11६ 210४८
6 51188 811 15 [ण्छडा॥ 1 9 ण षण,
1४ श्ण 08 एलाश्ात्व ४ 1 15 096 जीव 10 13 ध 10 18४6
णवा प्श ॥15 प्रप छव पा ९ प्राः 86 ग5 घा 15
[ााफत्] 115 चाक्षी.
(सण परर लयात् तठ सान्ता त ताह हाप; ०0७
४116 चक्वा, 8 ध व (0 फक्क {ह {जा णु हणा९०।०हा६ब] ६5९
॥ 1/1 8.1 11
सथ स
+ ` आ ` जीव षी
बहा विष्णु ङ्ह चिच्च तैजस घ्राज्ञ
(८ 0 हषण 008 फ 119 दद्दा 11010 ००८ ०१] 80. {9 88
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व्स्, एकता 10 कह अप्रहत व धाह काठ 75 ताणतश्च
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श्ड्ा0॥ 08 वहल्लाल्ा 9 र; तुला कद्व, &६]] णा +
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धाह पणात् एठा 06 एषण 19 11 11016 इलाः पए [पत्य 5
06 7194 ववज ४9 हे ४ 0 06 वपरनन्णाद्प्रफह, वरि [लर् 80,
80 61701 त 110 ददप 0 05 ए्णठप्द्या त) 15 107 पञु88 85
पारा त 18 ०0}९०॥5 शृण्टत्पाद्रु 10 च पर्याय,
८. 54, तत्र स्ाभाप्ताविद्या......... अन्याकतमित्युष्यते--1)€11718 1106 अषटयाङतर
प्रौ रा प्र धप पपत 0४ वदाः वभु 0 ४05 दक्वपवाध, 1144110
84809 इधक$ 01186 11115 वह्लादुाश्चनिछा 18 दपए) 15 प्राह चलाय तद्छदाद्ला
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पष्डु शठे 106 प्रिह अनु्ौ8 णा 106 इहा पणाः 01487. व्रापपञ
सिका 1 118 तलोक क तापन स्क 1. 9. 38 उछ हः--तच्चारमन
चपाधिभृत्तमन्त-करणं मनोबुद्धिर्धिज्ञानं चिन्नमिति चानेका तन्न त्श्राभिदष्यत्ते । छचिच्
बरत्तिनि भागोन प्॑दयादिदच्तिकं मन इसयुच्ते निश्वयादरिवृत्तिकं शुद्धिरिति ।
4 ४१ 1 र, 11.1.10 = 4 ग 0
1 0118. 1029
करिषासकिप्रधानांडः प्राणः-- ग). 18 1718 ११६५] 11611. 11 15 ॥ए 115
वल्क #6 तुरील्ौ चयुषा5 छ पाह [षव आह 8018 9 [षर्वणण
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सच पञ्चधा समान दति--प 08॥ 8 {78 }0एहा नगषुा [ड हा
एणा वषत प्ता छा वतका ज त्ष वीता प्िपतछाह 4 [ल
{णिनााठ, 50 {09 5 ४16४] 817 1103 (ह्ला द्ुक्हा ६16 प्रिया क्ा0€४
पाहा णाठपं त 116 (द 1 116 इतणाठ एवल्छा, ५8 कि 1८5 तुला
पाठात पिद्धतङ्लाः पपा 178 शात् एलणत्फ्याप्३ पपरक 5 916
त्णय्18ौ प्रधा 15 [प्लिक †0 8 8 [ध्] ७0 पादा्णातकु ~~
हदि श्राणो गुदे ऽपानः समानो नाभिदेश्लगः
उदात्तः कण्ठदेशे स्याब्यानः सर्वेधारीरगः ॥
एवमेकैक भूतेभ्यो... ... ..दन्दिवद्रयं जाचते - १] प5† 8 1116 1006 पुषा, प्यव
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स्णणाछाप्डापत 170६ वा 0६ णाक त पाह ववी [पौ ० पाऽ छह
धचाोदा॥> 85 पर्] 89 28 प्राद्ा०1 पपलिकपपं 10 08 ॥ एत्या ण ५५४
1111119 11/82... 111 1.111.112...
2 कृषच्वप्रठः ० 616 हा 88 वणदुदुच्छाप् [कु 196 ॥रप प्रावः वणाहवदयणा,
अन्यदत 111९8118 “1116 18 {01४5 2 विषा 11117"
पएतैपानपिष्ठात्तारो देवा अपि कालक्िपाक्ञचिविधानाः- [+ 2; ॥6|16¶6 61 1118
ाष्ौ1\ ठ ० प ष्व्ा6 द 11) 66]॥ णद 01 86188 १०६७ 115 कणा 100
वाहतापदरत्ध पप्र; क पष्लणह ण ऋणा पट॥465 ए्ताएष् पाए,
47 प्र ६5 (षाह 46 0१6 085 0 88158 कण् ट म दला 56 ६00
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0 पह ताह णठ प राक्र पएक्याहभ ष्ठि णद्ुशचात [षा पः
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मुचः, भूः, भत्तछ, चित्त, स्रुत, रप्नातछ, तक्तात्त, महात्तछलः परात्ताल.
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1116 पष्छद्धा०0 भ 1112 मर्म. 1८ 18 वादयति ठ पक्पाद षः पए
[षण्तलंह वदास उत्पात सक्छ (6 कपपद्ययृङ चप्लहञपपर- -# 15 एफ
1185 दाल्पठा ६8६ कपा पाल, एषण च+ 0वा ड, ४16 (एप्त पणा व्ह
वाच् 1106 छप्र्छ+8 ४ ५1115 #०ाणप कणा दह 1 क च|| ददल
एष[ष्प 116 जूतं १ १६९ 8150 पलट द्ु9।दय् 118 वह्माण्ड 07 विवाद,
[क र कः छ ~ ~ - -- --- - - -
1, भ, 5, 7, दा) 7, (~
174 प्र त786,
गं 0४६ २5 {116 विश्च 1 111९ अभिमानी देवत्रा ० (116 11011 एष्वृक 17 116
तरात् ६1२६, ॐ 1110 विगाह पर्वं (16511064 17 {116 पुरुषचृक्त 1111411 ०{ 1112
{ला अशा ग 106 [षटु एका४ 1 178 हणप] ० ‡118 ब्रह्माण्ड 0 विराट्,
17. 61. जयप्रौपनिषदः, °^ ,, ..छयक्रमः-- 1116 0706 11181 11238 सा १७७
1116 ९00१ [8 {116 [ठल्टड घ ह्त]प्रा व्ल्ल्छप्रद् ० नह [वणञाप्त्
8०100]. वक वा ष्णा चष्ठछात्तीण् ६० 16 वत्ाऽ एक] 1 #119
एणपए89 0 पक,
धापन 1]6 [50658 600 1650190 ६६४ [6 098 पलाशाः
1 16 1011५५1 &६16०10188] 1६६ 18 00176 10 वपात् :--
वष्टयपदाध
( हैश्ररौपाधिः ) व्याकृतः { साजास्राऽतचरिचा )
(जीवोपाधिः ) असूत; { सुष््मपज्रमदा नूत्रानि )
= ए करय ~
चसीरम् (ष घ्राण इद्तोखिचाणि च, छम ! (वातार (रधृष्ठपश्चमहा भूतानि र ।
दिरण्यगभंः, कियाञ्क्छिप्राधान्येन चं चतन ) न ० | ॥
आओगायतनमर मोग्वचिधयाः
दवश्चरीरम् ननष्यल्लरीरम् कियाद स्थावरान्तं चनुकु्ं भुवनानि घटादयः
(स्प्रधानम् ) (रजःप्रवाननर् ) रीम् (तमश्रषानन् )
| |
सद्वकोकः, तवष्ठोकः, जनषोकः स्वर्लोकः, ुवरलोकः, रसातल
सहरछोकः (सत्वप्रधानाः) भकः, अत्त, त्ता
वितल, पुतः महातल
(रजःप्रधानाः) पात्रा
(तमःप्रधानाः)
17 द्वप ्णा † प्रह 1 णडा 6 [ताह 1 पप्पु (1) ॥0४॥ 96 जन्वाकृतं
3 14,311 11.1.11 111...
पणछवडणाड [शी ता (आठवदतणाहर्णा ना6 वो प्ता8 कणपाह पलः प कृषा
दते कष्ठ ण 1६ श् 118 तिप क च सटः 18 का [यप्रलकय क ॥8
8१४५5 लुचफलाा8; (2) चतः कणि 878 ईपर० ६एव्३ छ [वटौ एा$ 11 18
ललफषणा8, एवा06|क, पच्छ ण णिफकाषप्ु पत १८६0 पत् 1665 ४061
1 जण 18 ॥ नार, 5 सृण्या णट्ुरणः [0 0पुप्रछ 116 शुद्धि
घत मनस आत फला, (116 1४8 15 11 णः ताण चष, [एवात
198 प्रच प्राणाः 814 {10 अपण खयफए, प्ली (115 पित्वा 8 1 पुषाण
11, 19... 1.11... 1.11
श्छा३. 174
ठका 0६, नाट, शंह10, 188६5 8114 800811 णत् क्रौकता 15 [का 18 7
णकात्ण 1 [10प्र६ठ 18 छाद्य, 116 8618688 ¢ 8.९0), 18171814,
श्छ, हार णड 874 $, प्न, एडक शत् छषद्धपश ला [फा
(3) ध18# "106 ज्मूरतै ७९८010९5 १९१६।०]१६ब् 119 18 मूत ए ॥16 [1009888 0
पञ्चीकरण 21076-11887108 शाप (4 ) 11181 घत1& वां कदय [0158 वात 1108
०166 १४् एचछु0ा§ 8 [ष०्वृच्टहत् एक {15 त्णापल्डानत तकपाठा
01116 प्ु70ड सशल्य 8 [9 एश्वुपद [एष्णुणध०ा5 & पाशह 1 80796 1195
38103; 1 तीाहाह {08 2]48 छाध्ं 1 एष 0ालतह 116 {0088 2 116
ढह (¢ पपष्ठ सृणाऽ ६० [एल्वेठाणाप्सः€,
कच 85 (६006 186 7 तह व्का०6 [वह्ट8 11९5818 "1118 पर्ण ण
811 णु 10 8 हपह अंशा [श च6 165 पका पएषपञ्छः छतत पत गडा
हव्पिप्रणा, णह 1 पाः इए, गा णापर फणां ए) 18
7०88101९.
पञ्नीहतपञ्चमदहाभूत "^", १,,च्वकारणे ठी चत्ते- 113 ‰४ #11£ {1105 ०{ प्रवं
प 1181 015 1१1९8 [01968 15 (118४ ॥06 सुरतश्च ०५।।७८ चिराद् ४1116]) 1168118
1116 € ०७३ लुलाव १9५ दैप एव०वेप्राह 7८ २१०5०118 छा [क काह
1110 18 त्वाह, पष्ाणश्फन १06 159 जपच्रीकृत 591५118 द]चणालाः। ०६।[स्
हिरण्यगर्भ.
खं पुव दैनन्दिनः श्रकपरः-- 1115 ६8011011 ०६ {115 21058 705 18 इया 15
61611818 15 11701 88 {126 दैनन्दिनः अकरूवः,
4 8 {06 देशव पदाय अ्188 1116 प168 81888, अभ्याहत, अमूं ००५ मूते
पप्रा 1116 [ठठ ण ह्णीप्रत्ता, ऋ) 100 10 कत्रा) सड 1110885 ६६३॥६8 17
1118 पशा छात चतदु ६05 (ठतठ्छ छ 1ए्दत्र्ा, ए [दण ६ चूत
8 80501060 111 ५16 अमूत, 111 प्रय 114 (168 {1875 38 016] दनस्ुन,
1180 ६15 कन 15 81350116 पर1 ॥11८ अभ्यातत, 1115 प्रय 11181 {41८25 ])}966 38
0४108 प्रात 8१५ पाषा १9 185/ 18 १0७०८] ९ब् 11 18 = #9 £
४3 8 108३8 र्ोषववप्ठा 18 एणोत्टाल्वं ६18 प्रकव 9 पच ौषलल
९५॥)९५ आल्यर्तिक
व [ला फलकाएद् क 096 16पा) देनन्विनि 18 कवप्रताता, ग 15 एष्ट
18 एए ¢ {16 शणच्छनुग 00 ० ए6 भूतौ {009 106 अमूत एच्ठ्तप्र ०06 चेश
0 116 हिरण्वगम 13 1६]1९९९ {0 188 हा1१९व् धह,
ताकु बाध] हा ाणद्नाक्षाप्त्च हतक पाताः पणा, 11115 प्रह्यय 91६६8
[18९8 (1७ 1810905 पत्यं नुः, भरुः पतसः १६८ शटणत]ा द्व् प्र) ॥ 168४
लापय िता॥ 1116 110 प्री 9 स्ैकर्यन त्त् ॥11६ वृल्यांष्टा18 0 जहलोक 11
71} 0 (118 जनलोकं भत् 111९8 ४॥ 1119६ (ह 1115 इषठात 1111685 1010105 ‰18
एताण्गह्छप् वल्क ठलत् क्तत ॥1८ मदरकछोकर 11101001 710; पडा 01६ ॥6त्0ाच्ड
तषा छ 8 103 गणद्षवणीौणपड श्यत् आपटा धौव द्दह [1५66 1118
हिच्छ्वगर्य 119 प्ौ8 17 11 घ्च्चललोक 1185 {116 छा ता18 ० 4. ए1911॥
17५ 10178,
11111113 -2.911.11. 7. 81 1
811 दव०1४।6 धषणद्ठा 5 बद्धो प्ीडाठ६ करडा ० ४ [ठठ
8111, 1
धातुपप्रव आद्धन्ने व्यक्तं व्रव्यगुणात्मकमः ।
अनादिनिघनः कादौ छयच्यक्तायापकर्षत्ति ॥
द्ातषी ह्यनाच्िर्भविष्यस्यु सवणा मुषि ।
तःकाद्टोपनित्तोपष्णाको कोकां खीन्प्रतपिष्यति ॥
ग¶ात्तालतलमारभ्व संकर्षणमुखानलः ।
दषननध्वं शो विष्वन्बर्धते वायुनेरितः ॥
सांव मैघ्रगणौ वर्षति स्म शातं समाः ।
धाराभिर स्तिह्ताभिर्लीयतै ल किले चिराद् ॥
ततो विं क मृस्छल्य वैराजः वुदषो चप ।
अव्यक्तं सक्षम निरिन्धन वानः ॥
वायुना हृतगन्धा भुः सलिलत्वाय कटपते ।
सिद्धं तद्धतरसं ज्योतिष्कायोपकल्पते ॥
हत्तरूपं त तमसा बायौ ज्योतिः प्रलीयते ।
हतस्य ऽवकरादोन बाययुनयसि ीयतै ॥
कालास्नां हत्गुणं नभ आत्मनि लीयते ॥
इन्द्रियाणि मनो वद्धिः सद वैकारिकैनप ।
प्रविद्चन्ति दाहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ मा. पु. ११. ३. ८.१५॥
धत्यराटृतस्य स्वना दि्येन कारपाप्वा न्नव „+, ०. ०" आत्यन्तिकः श्रव ः- ४ [1६5 [1६.६11
तप् भज 9४ |), = ष्ठः 176 - भव्याक्त भाद 1115 वादस ष्का
[8 एष], [1 ९६॥ त्रीहि कत्ह 9 एवप्र९, वायाः एलाएद
80, द्य छा 108. 79 आच पश्चा म आ पा कोक काष्डाः
ष्ठ प 1151128 80 (शिः 88 116 कमि 18 दणातलााहत पाला एषणाः
1168 [तठ 8 प्रव प्वप्संणद 115 कोहछाृभै ०० ० 106 अन्पाह्त, 130४
16 8 {1 १609 88 १1६ वयह्ि ३8 सणाल्छापास्तं वतं पत् एः पोः [कठ
{हा पपा 78 79 608] ब[हणजुणतछा. ¶ाहार्धतह 16 15 लाए नाद
कौला 0 उवा तञ] श्दवुप्ा 8 ब्रह्न्तान ६6 अध्या 13 1107 (५1116
050 7 तक ॥198 ९३6 एप 18 स्णणुशलकु चडडपण ल्प 80 (8४ ५8 16
¡ह उ0ाण्ला16त्. गण॥15 15 ०६४11९१ आच्नन्तिकः परयः, 1६ = 1५1 ६१८्द् ० ६५।६९
119९8 शत्य पहं 1118 अबवाक्त 38 811 &9८॥ 06 14 प्0पाएहे छत 1[ च 18
९0 च्रा6 फलः पाप ६.
षै च सष्िप्रल्यादिक्रं .,,,,"न तुच्छत्वव्रचन्नः-11 112 667 88१५ 11118
(11111 11.1.11... दक््यपदाश 1114६
भता) 16 18 पवा प्रात] इडा शठा कट ाीपल्णुणीप इतत ज्र
11 ‡ॐ5 एराह््व् ४० 5 78अ| {08 ६५ (षातुष्छछ च च नदा८फप्रा8.
१05 एषु 119 छप् ० {118४ वच्ञलपिण 1 15 एद €द्भिम्त् ना8६ पी
तणाः, भन््छपुणणय ६, पप्कणटा प्राह [ष्ठ 8 चहज काप
1/१ 189
20500101 93587171 17) > व188ा ६१६ ९9291018 = 0९11 = € [6ा६ा १6
9? 116 [प्रा]985 9 पश्च [त्शठ्णप्रा छप्पर ॥दयर्लीण 81107 प
छपुए्शाला५६ 18 1पदडतात 11; 18 10 11०0६118 न्ट, [15 4150 हवा]
1616 ¶5¢ 1115 6लााशा68 868 1426 [तना = 11/65 तन्मूल
त्च [86१ 11 प [चाशप [हवत
यथा चैतत्तथा व्यत्छमाकरै--.+1 आकन् 18 8 11018, 80 छ" ७5 1110
-4.01103118 [ात्डलु 13 हजोदसा ध्य, ॥१८ 1 त51/ क + तपल
धि ©+ (1८ -निछात्रातः स्व्ड 1 स पा छ पणयात्रा तात्
शादु, गहाण ऋ, | गाष्डा। [दय 18 (६ (18 एकप 8
सप 117684 वृचक] 111 1118 881त् तलत.
तष दा 4018 वाद् उव ाद्वाववधतत द्वप 11 116 10088846 त ४1£
पात कर्त 19 11६6 1 ननु भवन्मते जगत्तोऽसत्वेन तुच्छन्वभिति चेत
क पवना जगत्तच्छगप्रिति । जाजिंद्यकस्वास्त वुसदविकस्वगमिच्च दर्वानम्,। जथ पुनर्विलोदुये
तुच्छमुच्यते, कामन्चुच्यतास्. । जं स्वेतावत्ता तत्पूवेष्यचहरल्यानुपपत्तिः ।
7. 68, शचं स्थिते ज्ञागरणादि ज्यचस्योच्यतै- 11 1159174 (तहा € [21910160 110
(16 लाए 810 6978 (न्का6 पा 0 ए6काहु, 11 चठ तयाक्ा75 10 हगस्भा
क 1184 18 11680 [क 111 8४}8 = फल्रा०+ 16 11:68 5०प। छह) ०७8
[दपा &8, 10 11184 8516 पोप 50 -छा,
इन्दिववृनिक्यलीनाधविस्मो नजागरणम्र-1116 ₹(‰४5 छ पकए ह्ताञ
0 41111111. 2.11...
0१ 88158 18 17 नुशा्ंणा.
1१... 1/1... त) 1.
18}:65 [1868 कल #116 पणण्प् वतु द्रुण)8 कत्र नीद, शण प8
पदा ण शाछे 19 र जनुषा पमा 16 [प्राहः चप्पल 1118 प्राय
197, 2.1.111 1. 9
4 उ्या०४८ॐ {116 ४6१| ४ 1्ुधणएट प0णलाः 15 ६0], 16 इच्तरियन्त्चि
लह 5०] ० 18 ४06 ध्यावार ( 42190 } छ0ले। 181६8 [166 11 16 इन्द्िष
0६ इप्रत]1 9 प्र7&,
, तश्र च सूर्वं विराडाल्यं ...... ... जीवेनोषभुस्पते- 1८ 1 11119 1 1114 ६।४॥8
11181 {118 [ताप्रात्ण्ठ हणा] ०७।६ब् +6 चिच्च छा] पप्ह 1106 पव्णद्वा95 पच्यत
९४।।५५ 115 विद्. 118६ कठ एषण ०३9७५ ० लषु ह ष्तदाच्च्य
क त्र शद ६०08 त [पाण ठद्, 18176 प्रक्ष, अनुमान, उपमान, शाषद्,
अथौपत्ति 710 नततुपरलद्धि,.
त च चेद्ेन्नयादिषु... ~... विष्ट ष्याप्ताचित्ति च सरणात्--1'1115 258 1116
16601071 9 1116 फफ विश्व पञ् 0 148 छपा,
त्र यच्चपि निश्धेन,,..,,..म तख अचस्ान्तरब्यापकत्वम्- 11 [1२5 1601 ६५1१
7 ह [दाप न्य 1115 (0 ्कथहु6 ५19 16 विश्वः हणुज्ड 5 सै
( 14110018 } ०१५8618, त. 16 13 8५१९५ 14146 #& हार का एय्ात
176 1001788.
1115 अमूर ०१ जव्याहत ध} [णा पर छा ए 0दिला०७ 6 ५16 ३०
186 वठााल्य # ६115 पताह ३18९, = (16806018 115 [एषा ८९ छा 6
निश्च 60707 {8 इषत् ॥0 दद्द ४० दपु पीटा शौ्8 एत 11130,
शकिरजताविश्लानानो ०, ,,०,,.जागरषत्वोपपन्निः--]॥ 1145 10811 इ 8007
त +75 चास्ठड णं पह एणतप् शा दकशचछल््व नि नह विश्च 7 178
81816 ० एदा फ़ पाह क 1803 रण [०० वाध कहत
0 घीष ० & पाणीलाभष्छ] 0 चच 8 वणा] 01 0 10106 वणल
13118111...
तर]510॥. = एधत 1118# 15 710 ल्णाहाछकाा 111 118 नपा 1198 (1 1116
काथ] 108 [व्याप न[130 81818 [185 1860 तरतिप६व् 93 1115 (पचपरृल्पनु्
0 8॥ छप] 9४ पा उरो) 110 चड़ ता 0060 त छणृदुको ९1 8891166
हाद रदा तपाारपाकल फा कपिला ह फक्त 7188 ४0 19३8 [० प1605 13
पठा [षि ए का गुना) ती का काष्टा ण 8९056 प्राज्णद्ुा 7५६ 1
(1 .॥.1.4.. 8111111
1. 69, एत॑ जाञ्द्नोरजनककर्म क्षये ....... विश्नोऽपि हीन॒ दत्युच्यतै- \ 181
{78 0 षह "= # ७५0४९ 9 0 15 कत्रा 5816 18 19
वशुषातछ पत् कीवी किचि 5 10 लप्रणापटः॥ 10 पठ रसस 9
तेष्छधाीा् 15 १९8 पणा 2 विकता पत ०७ हहत) णठ ला8 1116
ह्यिप ण (वल्णत्दवत्छ्या पती 116 [षुरल् एतु कत् सल 81] 1६
ह. 1 त 1. 1.1. .
[वप्र ला पदरात ज +४5 [णहा एणपशि्ःछत। © {60 ष (6
11८61410 ९1188 1115 विश्च 00 15 शीं 10 1147 [8ठणाह वणाद,
तदा च स्मरावस्ा- १५16 प्रक 15 800९ 81216 †9६68 [1०६ पह्ाह
18 भ) ध६ 18 ०६।९द 116 ४1816 0 ५७७४४१६.
त्त्राच्वःकरणवासनां ^ , ^ ..जर्घोपलन्भः वम~ 11113 18 ६६ वृता
14} 81615, हा) 1168 18 175 [तातप्रहत् ह त ठणुह्णड पाए 870
जौ वाहत] 88 हृद्यतयदनल्ला 1 पाह 51866 क फ्रक््ताहु एप ाष्ड्ााश्राक
छा [पठकरः 1165 प्छाह5 [दन्डं आ 116 पात् दतत् शोक
णपुलवह्ुह 15 १0४ चणदणप्रह्त ए शा णुषलाशकणि ग श्चा 0 प्रह 0ाट्षाञ
ध व््ा8९ ०९५३0६६ ६11९ 6198 ६। वता 1 तार सीह,
ठन्न मन एव .-.......कः पक्षः शेयानु- 1111) 18287 # ध16 ^ 119६
1709010 पपनम & [106५ 14 प्राणः कर्षदपुदप्रहषुक्ष% धाहा+17ा5 १०
काह ४5 £ 1115 80 प्रा ण ६098 ०६६॥४. 0116 8 ध 178 1017 1४8६
ध्व 11 #06 [पएपणाह छ {11985 ए(कुहणाड &०त 1600168 = वततप्रया एफ 6
81107. ० शिष्ल्छा्ा ८6 छात 16 0नणडाः 18 1180 म हन््छा०5 1६8६1 एह 88
पवा प्प् 1110 11056 07018008 97 066० 70 2150 1 15 एष
शला 8710 पा च पराप 109 पलाश 106 जा 15 115 एला एरप्न अञ]
1104 (00१6 धुप्रद्छत्रणा),
प्छ ६, 177
¶118 ०9 त्री 0001160 14.6073 8 81600 88 {0 10058 {11688
1608 916 001 4 का ६419 885 {1191 {116 15 15 1115 3४141109 रा6 प्र
11116 15 छता 18 चाह क्फ तौ 176 चपा ए ाद्ण78, [ष
ल्ग् (6 प 116 58 11181, उप्रा० 1१८६5 8116 0 पाः 5048) शश्राणल्क
( 1 )} पारमार्थिक { {21111०50 [0115811 ७७] }; ( 9 ) उशावहारक { 1६8] 0] 7
116 [पृण 0 पक [पलल्णणाल्ठ }, ( 5 } अतिभाति ( 11119द11097क १1६१
8 80113181} ४12 (4) ब्रोद्ध् (| (पास्कल ९ दकद्निणा )
[॥६ शप्रो शाा 0८ ठ 1198 वीस षवीहद्कात 16 काप 0४ 5 भोदपाद्र्रत्त, [7
1118 ६९८1 {|| 11056 511051800688 कह] 88 [एठपषप| 0 18 उं पष्प
त [०० ४9 हइ}, 11186 काह 1115 [षठ ण पञ फुध् एठा) 2
211०८068 ९५1९१ चह्वाविद्य, 14 ४118 (पाप ह णण 15६प् 11088 019६५१७
+#1118]\ #11०प्ह्॥॥ एठरष्व + 08 (9155 त धा०४8 त [ठ फद्दे 10
का ्०पां उ इपाडाप्रणा ४६ 9 हटके व्पएतपएणञ्छव् ०॥ % 09, गुणाहु
158 1118 हतप्रा$ घ तह्लाधिधा ( 1141४14781 187८6 }, 6 प्रा
वुण् 1 ञव पकृ ठ [परक सिपित 80051 चत्त प्रणा 88 नि
1071 ल + 816 कठ्) 38 ॥ 1618] 12 [0०881011 छातं 15 10६ 8 [एकत्र
[1.1.119 21.17 11111 1.11...
{1 लपुदाष्दरषदुदोतर्-भधेचत्पूतर . 111ह 1.700441171 19 16 तीद्वन 1115 पणत्
क्नद्यङ्ग, सपुष्प 810 0111८76 व 1 त्रा ५1५8 ४6 तत वाह्या [०एटाः 10
द्ु1‰9 7156 ४० {१6६6 © 118 ` [ठा न 8 1 दाह, नद चीकक्रल छौ, कात् 18 त
1,2.81... 1.1 111 111.
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११16 8 धात शि ष्णा 1116 ।0६॥8)" "र 0649198 8 15 811 ^ 4 (१
0[ {118 5111079 91100],
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55 ज्श्चातात्र्यास्श्च जवोध्वासः 7 07 4.01 ध 8 अर्यस्ाध्यास्तः ज्थाभ्पातः,
व प्रणाः (106 [हा अपण 78 एवा) एकप पणाः 18 10६10 18
(11. 11 1 आ. त 1).
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170०854 11101 & द्युति,
61001 118 ९0702910 ज्ञाना च्याः 3110111५ 13९ ५०1६ ५5 ज्ञास्याध्या-
खः छ्लानाध्यास्नः, {11085 11616 ॥ ज्तनाघ्यास्त प्र 18ा [६10 16038 स्रा चता
1९950191] 91188 35 8प्एाण0७६्य ०1000 १06 0४,
7 91 ९७४६5 ० श्वध्वात्च ५1 ज्रान।प्वास 1/ 15 पद्य ल्ा०६ 11140 7
&ऽऽप्रा160 ६० 16 116 क्छ] 68.58 प 1४ 15 891 (4 06 ¢ [100
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क ०६०0 18 1915884 {118६ 10 71 15 ॥6६।16ह्त् ५11४६ 10 13 हठा ९6 ता
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111/11211/4. 1 11/14... 11.1.11.
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1796 ध वस्रकनद्यणणला9 19 115 08801 छ शिकला, 6 दप्राताः
7 [गण्ड {0 वललप्रााल स 18.616 कपञीपवौत्राण नाहा [118
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तु, अहं मनुष्य „^, , "^ -कथनन्ञाननिवरतेकता- 11); } ९10116४ 01 व्छौ छा
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11.8.11... ..111 11118117 1
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पलु 0 # 0श्छन@, वि9 1र्वणड 105 ध15 एलन शाप्पकल्व
0 ध णुर्णाणाः 15 (तपतः = 4 83 1} 2०६७ प्रौ पीत 16 पणा
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7110 वक्रा, नि वद्रा70ाक८९ पणीाटी प्रह कतकाप 1109 ताछ
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1 धृत ६ # 11८2 2 , कपपर 6 8806 88 ठ)
ताचश्टपाका ४ हह पिका 1175 ए्ीषहाड 9 108 शद श्नात् प कल्ला
11818 15 [011६}1 वक्षा हषा 1118 एहप्लापंए [फा 01 1116 188 9688865 10
8] [881, 50 प्रसा ॥ त्ता 18 10 15 81818 छा फश्चद्ाष्ु धाह [पाः णा) 1
पङ वणार, ४1 ४6 सदौ ण वणवा ०लदराऽ दह उट) (णपद्रु
0६ 20501164 13 11150४6, ताद फद्लो #1)6 8 प्रिह 9 प्ट) भृहन्ा एण्छप्रहञ, 1
18 {०६5 8050 हं वात पालहणिह ए6त३68 19 1711 }5 15 शिर.
जागरणे १,.....,..न॒ध्रमाणजन्यन्तानमन्तरेण निचतते- 119 2111107 प
दष] 81116 कत 8 सातु कर 15 10 110१16६६ [तरव्ठह्तं कु 8 85 ठ
[ठक कात् [ठक पौ ॐ [द्रति 10 दाद ध कलपतर प्य (1८
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10 चणष् 8 16 8184789 ६४४ € दणाहटाठपन्नाहछः पठ कह
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ण् [78 ण ताञालणा हा प्रक 15 1 हका6 88 108} पछ
४६], ३८ फलाछ 1106 पृप्टहणा पण्यः पणाािलश्वठ 15 कडा 115
एटा [ छ हा चव्ाएठ एवा छ द्क्रछह ए५ एलणण्ठव् एकु [सिषा ०७-
ए, 66, साक्षिगश्चाविचानिवर्कःवाश्नावो ,. +: घर्मिग्राहकमान सिदः--1{॥ 18६
प्रहा) 8४1 90078 ६1४ कल इ 716 18 ४0९ प्णक्रह्ञः छ ६॥ [प्लान
11955 [158] 1088४ 01 178. कक्म्ला ६0 116 ` कद्वाणप्ठु ह॑ र18, 0६
तुद्यणः 18 (ालछणि 1076 ६० षपपत पमः ॥ (108 स्ञाक्षी 18 ३016
0 पप्रच्छ इ०{-ठतारालाात्फल्य फ] ह119प्1प 18 091 08 16 15 169 ६18
द्षताश्नाछ वव 10 तदयवा णुद = 116 अकाः वणकः 0 14
0 08 स्मरतत धा पड-4118 दात 0 णाद 18 [एप्ठफष्प् ५
॥116 ल्छाञणपल्नाह्छञ न् चाप दाल" पपाद 0 जका८्द 18 10॥ सा छ्लौ
०६ छद्रसरद [ष्ठाण्ठूणा (पौ ण प्लवति 8 ए0088101150 6७8, = 11178 75815
{ण ६18 क्व ्ाच6 च ॥ [लताहएदा, 1985 स्राक्षी, 13 8।50 [ठर एतु नाह
इका ६ 1116008, = ५1 ए 1116 इ 9ा26 पाक्त दुद 16 [६८ष्छत् #ह [ड्भ
ण 106 स्राक्षी 1० परह] इद्त ९६ [८टश्नाञह ६115 200१८ एताम 168 कस्
लह 1118 पराणप 1/6 साक 188 पाद्व पाङ ाकाल्डिः 118 फत्ा-
15191101 15 एप्प ॥ दरुपणाध16६,
दान्ति ज्तानानि,,, -,-,.-न् स्वद्नाष्याप्रानुपवन्निः--] 1118 18 दा चा1हफ टौ" (2 &
पिना 606५ 0 ह्दण पष्ठ 11 जात९८ तवका 18 ए6्ाएरण्प्
[क प [पछफात्पह्वर, 1 नापप पण छटाः चदुप. व्रा 6 [कणप 9
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0? (18 450 हण 1141 118 जीचचैत्तस्व 15 1118 कप (प्रा 9 11६
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चदा पुनघल्तानादेवं ,.- ,,, ,, ति पञ्षेऽवि नं क्चिरोषः-- 0 ६118 श्ध््णः
1१/1६ 1116 छाः धात्छाक, पीहा ६106 क्ह्वचैततन्वे 15 061161६ 10 16 111
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816 9 1116 पश्छ्रशा-त९11810४), पहा {11६1६ 6811 8 1115 ६६६41081}
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वलुप5001 ए ाक्पाहा 0८९ #116 इदा उरक,
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171९1468 हपष्याक्रहण पए 10 तावतः 19 दहा ए २ वलाः फमिण। डु
18 प्क जा एश् 19. चात 118 लल ५ (५ 1 [1व्ठक, 1४ 15
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छठ 18 जा णठ एह ता् ४5 पित्त [पद्पक्ष ज ६५6 पमण
8६86 876 प16 10 नह ६९ - 0455 छपल]पभाष् ॥॥ [लेषु वाक्या, धह
पवणो |) हंचाठटच छी ताल परपद [पताप्पत्प्रद्रुच 1011156 6 ॥10६180॥
छ प्ण 5 ४116 1366116 वैल 1 प्तप्द् 3 11068 वा प्वधद। द्य पुश्प
|, -1/1.8 11111,
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1... ,.9. 0... त 1
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ाणला-पनवधिप्, बा कपण एप ववहदत ऽ ० दोकढ ३
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कषप पाय पणाः सुगुहवाउ छुट 18 "6 पलमक] पछ
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हा 3 1008 1 ४६ 68३ ७ 11४ वत्यणनुणणलाफाणमा9, 119 स्ाश्ची्ैतन्पर
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ण्ण 0 नह कणिक
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्णो+षत् [ङ चह णोत 35 करिह अाडकछप्राः (9 } व॑ 10 क्रि +
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एप्# 11९ इहटाइ 10 त 01 16 टत पतः ए एक ५११ 105 पाषा पास्णालस्छ
&५ [0185८ 1461101 0609088 176 जह्चरैत्तर्य 311 119 1111. 15 ० 1118
88110 7271178 ४5 116 जीवयैतन्व 71 1116 705६, गश भपच8 आ्रा0 11 9६॥
071] ॥१० 01160165 पवा { 1 ) 1184 10 पए) ६15 जीवनचैतन्व 07 व्रह्म्चैतन्प
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॥ 1... 1
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~ क त व त त 0
1, 1९ 1, २६२८, ५३, चदं दष हा
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क 1४ 18 कणामुतष्याणण्मारः 18 264] 50 छ 85 एषाः पता
तिव्णपाडः 18 ८ एलाषष्त्, च णााक्ष् त [लाल प्ाधह कहितप्लोत्पन
णाह 5 ष्य तल्छ् प्ल, ता 10 कंद पिल जीवचैतन्यं 07
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7. 59, अत्र च घ्वाजिक तैनत इस्युच्यते- 1116 १५0 अश्न ( 1168 }
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108 15 10 ९६168६8] 00१ 75 118 अप 6, 15146 कहा 0०१68.
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पिच्चात्ु इकठीनं पक्तिमौष्ण्यं पं प्रकाशताम् ।
रखान्तु रखनतं लयं सहं छेदं समार्वधम् ॥
एवं नोप्रषखय्रभोगहयेन ,,, -, ,,"पिश्चामस्वां सुपुश्यवस्परा-)५ 01 [2८111181 4148
[फषटत्पैह #9 हेड] 8 15 176 [08140 17 116 च्छञ्ठ 0 1176 5815
१६६) उट. ५ 18 1 कपाला) 115 = ॥0क््ा9 फटा जा 1118
वपन्त त 16 80६68 म फक्त कषात् पप्च्छ 118 चज्ाक्ाौ 0 138
(78 [लद धात ४76 पराणहा छाश प्रासुपरद्वणद्ठ 5 प९४।८७४ [06 पासं
28 [पाप (प 6 [कण छ तक]हप्९९, हण] इणां कड 19 118 ला
०६ ६118 च्छ श्रंठौ इष 01 © नह पा, गु 118६ ;5 पर 8186 10
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ग किञ्चिदवेदिषमिति, ,. =° ",सुपु्तिः-- 11113 18 २११९य् 10 पष्प #0 इपणृ)01॥
८ 800५ पदडाणणा [क़ गणु ५० 1198 कणणफन्ना दपा] ८९
५ ‰॥। प्रश्ना छा ग्कणद्ठु प्रु पठतो 1186 5818, 11181 08 शलुः 8|] छात्
तत 79 प्रछत शाकु िष्ड 1, ©, 0 कक, 1६16 ए98 /1.1111 81.811
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तशर ामन्लश्नोग्यपवारे "०० ,,,धधिन्रयमभ्पुपेयते-- 1108 8५11102 10 ][70-
~... त 0 पशात
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1. 3.1.111. 1.1.11 11.11.111
नीप्छषाष्ाछड शद्लात्ाणड 101 13 ग्रह्याय प्ण, परान्न ६१०] पफ
एथद्पपाघ्या ८६8 ॥6 गि ४ पीतौ कणेष्छछ 18 पाषा ० द्राजा, ग
४ प 15 पवुप्श्चर्कीरत् 1 81] 1116 चा क्ल ण सतय, पट्ट च्यत
8 [60 पद्ु, ४ च्व, [वाष्प 118 [0दव्ा106 18 70 एवाः 0 105 य158
व 0ष्मह8 क #115 5686-0 10 08 प्रशठापताष् 56818. 11 8 1:01
॥दा5206 ताति 10 सक 020 प्छ 18 धाः एवह पतक
प्र 0 06 [षड णा पाण 8158, वृ नार्णिठ 10 कतृय 9 चुुषण
ध [षच््णधठण छं ४05 पच्छ 0 ाछकाचप्द 9 116 छवाष्८-०च्ठड 1
एाप्ञ 06 &8प्रता8त् पा ¶ताह्ड 73 चाकाशः ३06न8£ प्रपत ठ + तहत 7
प्राणः शद्रा 0581088 = प्ा5 गद्वाा8। इद्पताना०६, = पिप्रणाह्ञ णण 12
एता राच शताच्च छ 8 [षाः 8198 ० अञ््ु) ४16] 8865 60
08 क्हप्राा 10 76 कथ 5६6, फलक न शलुः ए७्], चाप 1
प्राठफ द्वाङ पिष्टः रः 13 वपात् पाद [च्छ्रः 116 1द्एण्णात्ड हा फण
116 16६1108 छ [द्ुगूषाड8 छात् 06 पएकच्व्तापहु 15 क ण 18
1658, {11888 1 प्र कड १5०9 1141158 ० ४ प¶ 8, 17 78 11616078 8०
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ण पण््डाद्ु (6 [पड 8० 1000180८द,
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शी 8119 103 814 {1124 1167७ २४९ 117८8 ए 11148 काक 0 एष्ट त 116
ब. 118115 [11401108 0 11611" 80090] प्र676६5 985 8 0019110 91 88}: †11854
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हाप पल 109 सृत ए पौ ५ हिष्ठा त पफ प्र ४5
डीव ०४९८. (115 ज्हसश्च 111 119 (णाल "1 516]97 ८]; [ चत्
४०॥ [पणप् त्ा कदु 6णणयठ्ड 11 छा ० धह प्र ००६ 6 8 नपण शामा
61566 17 116 एला 08 61968 प्रा ४8 006 णडा, फ्र16) € [01588611
18 द्वया 19 2088 धा शहा. 1 1 दतै एषा धादद6 किया पहा
कप्त 16॥ 11४१६ 1850 175 8866 ०1 प्ट] चच,
अते एव चुचिरूप् „०... परतामर्वानुषवत्तेः- 1116 ५2110 110४ [01068 ]8
क. „1 9. १).
(पापौ णच कण्व), व पजा एह सण पला 18 प्ो8 ककार
18६ १.11 11 0
[पठफालदुष स्तत् [प 8 प, प्ि0पठकः, 7 पि शाकाः 0067६ 18
11178. 1.
कधा 0९ च्णाहतपपजाश्छव 11४ ००६ 81506 ऋ९।[ 37 पौ ०76 चाति एणं
[तप हाट हहह 9 फक्त प, 1४ 15 उप्र [0०७8६ 10 €; 1508186
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11.11.11. 111
पतयत ह सत्याया, पला तात त [पहु 8 © प्फ] एलाह
ग्वा [्णणा]प्वृदुह 100 10118 188 ए7काश्वंद्रुः फणौ म्] ४06 इए 1#
3 ब्रृत्नि ० ६1६ फपंणत् पशितसाौ वि) 1011 आन्न छात् च्र्रा 15 पच्छा श.
तदुक्तं “भत्र एव ॒चोदनाजन्यप्वान्मानसरी कियैव स्रा, न ज्ञानमिततिं-11;8 33 ४
पृणीत फिणन् ठ स काप्प्कष्व्माततु् 0 णा
1. 1. 4. 1110 एह्पाख]ः [5 [लो गाद्वद (क़ पणा कह पैकनिणद्वपाहपणद
ज्ञानं {010 किवः.
एतेन तर्कापि ,,* ,*. °, ष्याख्यातम्-- 11118 82019108 एए तकं ( 61६११९१
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च्पाप्यारोषेण, ,,,,,,,,अ्मप्रभाचिलक्षेणत्वाच- 1116 71081 ०0101011 {11151781
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विं घूमोऽपि ने छवा, हाट ट बह्वभाव फाणलः ॐ [ष्ठत् एए परनाभाव 16
1709०86 छप 115 पर्तत धरण प्रात एवातल्छाएव् फति 19 पाणु तलह 18 70
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छा च [पष्ण्वंह प्छ 18 एकत् छा प्रण लोष्ठ पी 8 ष्क ण 15
71111,
प्रत्नम् 1069075 ‹ 00716८41 ,
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गु] विधि एसारातसा 10 द्या त {186 [हितश्च शिता 675 1हए† श्नाच््ा के
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पपार ण व एष्एाोष्छ [परातृश्चाकै पुराति फी पह प्रात् कृत) 75
11, 111... 1...
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पल्वाह्०नि0य रण 05 जैकुन्तताक्यवि्वार् ॥ 18.49 1 11061856094 198४ 1116
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19 1 "11 18 8०, एव्र कषा हतकत 81198 707 प्रया पाण
11... 8.) 1 1,2.71. [11911189
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भदित्तीये बद्यणि नित्रिश्वेदाच्ानां त्राव्यर्यावधारणानुकूको सवापारविदौषो न श्रोग्रजन्यं क्ानम्,.
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(0४ ० ६ 11165 1पव5 ०६ ककं, वण 1०008 10 9 [कषर 17 1118
पशात छ पाह पपच छप] दत् एत्य ठ) ध सयाछ५३]
प्रमाणसास्स्भावना (००७18 ५3 ६0 (115 यप।1० 16६14६९8 घ #116 1 एष्5]1.8त्8);
मनन् 188 #0 २ कतया छ ४5 10 त वजप छा (098 पलपछाश। रण
प्रनेयगतरासम्भागना ( 4011048 && {० 1115 40६1 ० 16 इदप एणपवाणदत
77 पाष्ठः कणतुञ) अथं निदिष्यासन 18645 9 1116 ८०1४० ॥भार्ण
01] 1112 एाएठरव ० चिषतरीखचभावना ( {11086 16851011 पष110]1 अशक 1906
एटह {ण्ाणल्त् र {18 इका] वेन्यािपिव्वा कता फोुडएमा 00165 1
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शाणिच्तावनि्8 0 1175 शिः लौह ण नि किना तज
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1 रषद. व्वाग्र्तष्वभू ८8 पातु छडथपवस्व 0 एत [जिातकहत्/ ८ कृ
1८ ठप ण 08015 एतान) ८६, पाहि पपन एलणा8
19 48 ००६ {0 ८3119. 1115 धमाद 8० क] 60 {178 18 ४116 4 95608
९† व्याद्त्तत्च 1111-2 183 बअनुचुत्तत्व. {11211 1080118 1111 13141114 15 1191
1,11.9, 81.1.12...
विद्ध वत दापि शष्ठ ता #16 रह कोष्णः आजपा
118 तक प्राह्ण वद्ताठ क्छ षट कणा पराहुः कार 7०4 1190 पाग
0788 प्राश चा6 गदहा 10 101 1106 प एवृद्माा कपाण्कलुीद् पौ (११५)
वाढ धश आशा णाल्व 5 106 (गद द्वा 1
40172 00 16 फताषला तद्रतं 101 वह कहं प्रा ल९ 5 7106 एषो ४8
121 1/1 1..111.19. 111 ,11111111911111 1111
017 {16 08818 9 प्णडह पिप ॐ 10116 1॥ ध] ० 067. 1 8111 क
{19 णा्रणा ,111.1.81/1.8/.11/.3 -91/.1, 1. एप 6८5 08६ 1118 11121111.
7प्राणफद्य 18 [पण्ाठा पत्त पाठ निह 1 ए 168 एलान एतां
10 र्भः 70 15 [च हकं 0 पछनाहः पषा 10 8] 106 8 ०0 तक्र
1119 1 [ड 179 सल्दा00 [1008 वै्िपहतं 109 10 41 प्रात दातान्य अतत
४8 68211 ¢ 1118 0111687, प्रा 188.
चेवान्ताजुषकतके पाशा9 ^प्रण्ः शडठा0 88 पपात् 05 [लवा ३
वादु ६४ पि कपमाप्णाड इ्टटव्मल्ध् क 1058 पकृ ण 1118
एषण (लइ
। +) ५५ 193
चतुकक्षणी 7188716 चततरप्वाी.
सजियुक्तः ाल्छा8 "116 छतवुातडि (1 धष ए स्द्रपवतद्ड{78 )
विष्रच्तु -*,,, *""अनुततन्धेवः- 11688 तकत; 114६ {587 6007218] 8९#
छिदा [71 रव्व्प्रशीतअ५३ रद्दत्तातपुणवयतत त, शाद् क~
पा ड 5। {कहा 7 ड लणोक बु, ८, 5 च (6 मन्व ण
मदा व्यध कताः पं सलाद, प्लाकाल, सप्त भतत, दा
प््तप्रणीणा आ तवहा, ए कदु इवच [तदच पण्य
10 08 75 प्रणो [प्रा [ ५0 716; ष]ाहड ी्ौ 10 15 6 1016 9
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#0 1116 [आपकत्रान्न, ह फणा नाच्छा 1660 [द््धाप् 118 (एताणि
ध १1८ इ ४8 {£ कणप्य 15 प्रत्य् 10 णाव [0918766 ; { £ ) अधिभूतं
1. 8. 016 18110 0 {18 छा] त= (हा ०68 10 णपा 11688
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9 70 प्र], 06 [तमप्रला8 ० कपिद्वलामा6 भ0तहलाप्ाद्ा्त 68
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अध्यात्मम् अधिभतम् जधिरैनम्
(८ ४ तिरा चिष््ुः
नाद्य शच्चगुषणाः पानम्
( हिरण्यगर्भः बरह्मा
च्व बन्नोगरुणः सटः
प्रज्ञः जव्वाछ्तन चतः
(क तमोगुणः परयः
पचमध्यात्मा धि चूताभिरैदानामेकःवाच् ,,, ." ,--अन्तःकरणष्चुद्िद्वारा कममुक्िश्च-- 11: ;8
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18 धा) एटि अदत् ता6 पिप्त् फालो 8 #08 एव पयव, उक क]
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1, #, $, 2, कक क, ९39,
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111८8 8181६83 छ {116 10) 700६1 प्र] आत् 178 इपुण्ा०€ दपा चात् 1118
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6१76 प 81] < व 11091 1198. चलाल्ला् पीपल णिः एमा
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चद 586:
साधनान्यन्न चत्वारि कथितानि भनीषिभिः।
येषु सत्खेच सन्निष्ठा यदभाचै न सिध्यति ॥
आदौ नित्यानित्यवस्तुविवैकः परिगण्यते ।
५ फलाभोगवि याग श्तदनन्तरम् ॥
५ घट्कसग्पत्तिमुमु्चत्वमिति स्फुटम् ॥
(षि. चू. १८.१९).
खवणश्चरमशर्मौ तपसाहरितोषणात् ।
साधर्नपरभवेत्पुंसां वैयम्यादिचतुएयम् ॥
{ अप्र. ३}.
ठट कडठे क्तवा कतत 9 लाका अ 7, 7. 1. त्वन्ध
न्तत क दील पण्णा र दत छौ कत्वात्
145 101 10प्रल]न्। ध6 89 0ख्छः 91 जधिकार् 1) दक [001 त 1115 भकु 1४
8006 700 ४ 8 पातात 115 एषणष्व् दध 19 पलप कय कनाल
षाणा एषणदपशछ 18 कषः ॥ ताद्धत णिका ण सि तताततौष्पा
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1, त, 5, 2, तवाम, 39. 7175.
00 ॥.11, 8
16 [95 पहात उाककश्वे पाता 115 ए्व्नात्यह्ञ त एता 06 तपतत
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वापभा708010798 904 आ 6 तिताः सिखा 9 शाह एदतकातद्त्छ
फत् [वात 116 हप तचन्राधनापरवरगानिरूपणम् 118 1188 वा उन
शिण ध186 क6क्र ०९ 116 प्राशाहत स्णौणणा 88 पि नहि त्रा णा
091 = स्वाप्त र॑सला-- त्ख ( शाश्मनः }) खसूपे साधनानपेक्षस्वैऽपि
व्वश्जकतया येदान्वमषहावाक्यष्ठरणकसरस्वरूपसाक्षात्काद पच प्रतिवन्च्वतुषयरषितः साधनं
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11818117 71.1.71. 1.1,1.31 7111171
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धिचार एुवानुषठियः कपर्थन्तमिति विरमेत विभर्प प्रदुश्ो्ामः१ 701 0710 111९ण९
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118 विश्व, तैजस २६ प्राच वरच् ६16 1188 हौ 2155 जानत्, श्द्न ६7त् चुुधि ए617
ण 1& 14176 ० दिए आणव क्छ पणकछा उपर्ए९६७ पषण
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19 ६008 ताहारा ध, 0, 89 ठी प्या स्वाति तपरा 1४ 0847094
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#115 शाव्रह तो) 18 काङ्ग 8 ६७3] ००७ 19316 10 ह उपाके ण 8 5(8#६1४६॥
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पष्ठ हणप शोल्वुणद् 5865 {0६९ पता प त (0058 88658
षटु क्ञावानाह्व्, 1६ पण्ड 8 शदटुप्रस्् पषा 106 उदा फा9 फ1068858
हा इीत्प|व 3150 5 पछ, (पत एला 58 15 +ष्पर्यणिह शतु 10
&8180115}1 {1 † {116 फालः ह कल = 1681,
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पराणप 10 1116 एष्टा 15 अपि, 1 कटशि्याच्ड 10 7 पार उप्र सप
11187, 9, 8 .918....2.71|./. क. 11. 8;
{10116 1888018 570) 88 बाधावंधित्वातु 8110 ०11101६,
4, [8 2, पतै भधुगत
26
209 प दल,
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लता णा {8118185 व्ह फला 19 18 प् नेदं जाते किन्तु शुक्तिः
188 13 (06 बाच ० रजत्त 114 (16 श्रुक्ति 06८०0०६ 706 अवधि ० धता चाध,
प्रा ठर पए0प श्त तेति नेति $०प वला 9086 छिद 15 [हे शाप
प्याणला पङ्षला, चणप् व्वणााणौ एडक प्ीध6 10 106९841186 1 15 पणत
छा एताकफ्ण तुका चत् 7 35 एलकणात् ध [तकाः जा सत्लछी। 10 व्ी718
11. (16705 1 18 115 कात् छा 8 सणाककषातौत्ा३,
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०६ {9 (प्रणवा } पचप्डाणण, गए उमा 15 पछ छड पणा [ठणपन्छ
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तद्राधग्राहकाभोवः 1988178 «1115 8188758 ता साक छार ऋ 130 प्व [00 {1180
1 4, €, 1115 दाह 18 च्छा ४स्प, 171 18 हत धीश्च 1166 18 1118 श्रा ८९.
०९ पट 3 0716 {07 # ॥त्ःच 8 कोक (160 616 धणं ९०0४1946 91090
08 (18 85 1# एल 5 ण्ण पश्येः शीला लषु द्व 886 1185
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ततेवः पुत्रादयो. .०.,०,,.परमानन्दस्वोपदरेशात्-- 1; ©011817घ ॥ 8.
पवतण णा 116 एकल्णा कडादुहत् {ए पर पुषाण, 1४88 0 कत81प
ए ठ्वाद वदतत फणा वथाः ० छापर च 8 [एर
तस्य च नितव्वेऽपि.,,,.. "तवुत्वत्तिविनाओोधवाराः-- पष्ठ) 115 शप्रघरातयः
€ 1019115 एए 16 ४26 39 18 8(६॥0] १7 1161[315 ९८ (08८ 1{ 18 चक्रात्
1118४ नोक्त ( 1106 | [कठ ववद [ठठ 9 वौ 1 षड चठछञच्त् +
€15६ 198 [० मवृ ० 0615 पा प्३ 708 91988 80001 न १116
पप्र 5010909] पता कठ तिम्दक8ह, 00 स्पा 10] एत्
0628 १०९३ ०५ अपप पशा 0७क]बदु5 ० पात चाहत्पद् ०९ 05 ऋणप
एप 9 प्रह एवानु ० 6 इ्यप।6०08 93 3 प्र0०19 ६० {140 ६09 ए0/ 8
णित पिल्ल्ार्छाश् प्रप्य 9 प्रौ 18 890 ०6 धत प्प
00111311164 11160611, = (परा 89 8पट]1 1407968 अत 938, 1४ 13 =थ३प 111४॥
0116 प्ण 78 [1[6्१8प्, 59 [णाद 35 ३६ पण्ठ्ड 701 त ड3 16 18 पि 0 18
पपकत, 49 १ पवनः ज 1 3 उ 2.10 13 शशः {58 ४४
1 1... 71.
परल 10 18 [धडा 906 प्ण 3 इवा {0 08 एर्व, प्प 58 116 8
8910 {9 8 ०7. प्र त0ञ्टताञाच्छञ 18 च, पिला ०८ + फण7त
0.9 11.118. 1.11..1 11
का सातल व्वा च्व (८.१
भध्व्ततय पञ्चस ^ *,* ,"तुःखाभावक्ूपश्वेनापि तद्य पुष्यता पर 9017 ९५।६-
पाच तं पविम् श्वनुपत्ा ॐ हा 0एलौ य लाड चित्प # + 8
लापा #0 08 ण किह जण्ण ण कलािर्ठे 088, 16 प्रप्रा पतप
68410113]165 186 हषः {11 28 [तव पकौ 10 18 9 #06 _ लप्ाऽ ०६
1116 81810 ता णाश धा 1४ = ता चरत्म + 06 शंर्णत्ण) गिः, ग8
क्ाहप्राााह 13 (दह 6 फणावती एण्छण्प्ा2 प1९0 18 #116 6656 म 8
पपाण्ता 18 पपात अ]70088 19 कदा 1 प्यव, श्राणा, 18
{16508 116 अपा काश्र ् न118/ [पलो 57€09, पतला ८७ ए ्यठ 111 हा
15 176 ३08९006 9 धौ [ष्ा०पला> च पणन्छपु 1678 18 एए चा, ६, ९,
10 &७¶, ५16 008९6 ९१ पक्ता 10861? 28 षव71४. [श्चा पहा का
एच {ण 05 एचञडधप्िण णा पाचु 118 वपतछयाष्वकु शव्पृणंप्ट 8
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षाठ पुप्रणह ध शिपकापष्ु तम्प्र
फक्व्याप्यत्वमेवास्य दाखरुद्धिर्निवारितम् 1
ब्रह्मण्यज्ञाननाच्ा रथं च््तिव्याप्यत्वमिष्यतते ॥
4 प्ण 8 वधि 115 प्र्प्लवछा एधाः 6 अथफ8 111
कला वा प0णच्छः ॥९९्ा68 1६00011 ४० तड 9 व्या्ि'8 ४७८९ [01308,
पक्षा 01६ 1 कह बुद्धि 9 इत्ति पप्य कीश (76 प्राह कधा
7०6 10 ४6 [धत्व रणुत) स्पत चाट पणः 1 ० 105 चिदा
क 11101 15 8150 पणता) 85 8 ककहयातनि 9110 1108८ {८1071 18 10 1708108
{18 ल्ल कदी 1 आटा, फाष्ोष् चणत पष कला जकन 18
9 1 1६६4, 96 150 3 उ6वृप्राच्छत। एश धुषा 18 1108108
+ # पजृत्व कपौ 70 पी इल्टणात् 0688558 18 ण्ठ 0 08
[राणक 18 उ्लिच्लुग्व्ा, वरह सतश््नंमा ॐ एड्स प्रप ४
{091६ एण्ड पद्ध पणा (6 लवकर
वुद्धितत्खचिदाभासौ द्वावपि व्याप्नुतो घटम् ।
तत्राज्ञानं धिया नद्येवाभासेन वरः स्फुरेत् ॥
बरह्मण्यक्नाननाप्राय बुत्तिव्यासिरयेक्चिता ।
शयं स्फुरणरूपस्वान्नामास उपयुरयते ॥ (७, ९.९-९२).
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छा फा प्रणाः पणा क 8 द्र ( हुः + सात् छनन, एकु +
( १९४07 ) #॥8 (णदवापदभा 5 छ 0 प्रसव कणत प्रच छपा ( 88"
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2६18 पण प्ट लणपणच्क-षयः ०१ पचपहदक्षा०ह काऽ 1116 एषतु) सा 5
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७६] ४॥ 1६७09015 हयव वटः तालं ष्ठ कषा, परप
15 एच्रुपणा&1=85 50 पापृच््ला0त015, + हक 6६ 1५ 06 रिद फपठौ + ०
116 1141179 ० छलका प्राणहर 81 6ण्यद्वा 1६ 15 ए ।४कतपा २
5६००1, 11184 15 116 इछत 96 126 ( ए ८वत्तकत) ५०९६756. { 8, १०-११ }.
1. प्रणणण दकि कवष (1 ' व्याक (त तिक्रा
१. 00 फप्प चिद्रत्ाव प 18 ०24 00 10 08. क 23 गणनया 55560141 71
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पलफ्रणएल्प्, एलका कश्या 106 कद्डला68 ण हिगना९३ 1 116 इन्ि
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प्लत तकणन्च्पं छा 100 इप्रहपंप्ुणतल्प, वाहाः आ ४15 णहा हॐ,
ठ 18 1 द्रा लाह 18 20 [ण्ठ्स्लोधका ण शिप्8 उप्त) 88 891६
पशश ^छ ८, १ [1 {115 1816, 10 कञाप्तठो) 85 {6 पपाच ठल्ाणछौः 18
धावत् 6थ॑श्त् 11606 1 116 एण्ड ण पल्स नल्व ०५ 65189
४0501110. = -4 10 1 सलक्षणं 0४5 18 0५४ 19 इत[लक्रृण्डाक्ित)
1196 १1511८110115 एप्८]॥ 85 गपा वपछणाल्व्ुह, 11४ तामह ९.
९710 16 दा ४0115160. = क णाल्ठणहाः पलाह ०।३प 06 3. साक्षी 7
0१९ 87 1116 इ्ा9 तिना अवाद 8 न णल्वा§ 0 छत्व, 116
910 ४५ 06 धाता, ४16 २९॥ र प्णठणुष् द्वह श्यत ष प्एतकशः ९१ 1 30
18 एलाह 1 तीलाठ 15 70 एणा षताता तहाछ कणा 06 चाव] धाह
धत एत्र ० 05 एदप्रव्राद8." ( 0. १६-१५ )
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[प्ा०फण्वद्र छ » पणणं 15 प्राणाः णिः कताहलक्ाहह एश्टणाहठ्तंण॥
1, 106 ॥6क्कोफद्ठ नोधः 205स्छत् णा बाधः फपप्ा 8 दापय 1 ण रणह 3 81 118
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¶, 16 92410 इ 10 10१८-9 5 ५ 111६ ६0105 [2९ ५६8 21 8558798 19 8
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0४10६99 0 (1 एत प्व 18 उपाह कऋता 01 च पत = पान्णा 0 धमत ३5
प्रणतानि छण] ० पत्ता 9 119 १४८११ त ०९1४ 11 {9 [1१67 0 116 1६0
॥ 8.31... -1..71..1....11
40
१५ १00 वा.
४150 परण्णुत् [द्राठ 1 [0 8] पाष कवल्छड त एठादिष्तीतमा प च
एष्पतण४8 115 81008 1 116 षकृ 10 एषएणा0ा5 1, पह {116 ॥676754
11103) 1.1.311 111
५.९] (1056 ग्ा0व्5 नि (एपलु। पन्ना ला0ञ ठतग तहत" ( छ 1106
{6 08९) ५ 1116 86, 3110प्राध 0६ 00) 09 06 ००१ शात 00161866014
(कत नह 10 पृणल९)."
4 त् क [पपठ एल्वह्रणष्त् १४ # [राव्यं पक्त + ठ करोता
हएत दरणं आात्ठहदणठक् फा 1115 छाल क 116) पाक 18
{06 शाप्द्णनणाश्रछि 9 406 [ष्राष्पाः ज ( माक} एष्व 1888, प्र
17015 { ० ुच्छत्रिणा ) 188 710 श्र 10 1४,
060 ॥ चाह पाश्चाठलाः षठ दात्र 18 कष ¶वसगाकण््प् ए
प्रणद्ीपद प्रदः शाह तावम शा] एष्टा 1श्माश्ादा0ण काण
9 [5 एलाह छकलाएफष्यटत् (क् [फाोितिाड पणार च व््टाषल्लह 1.
( ण (5 णकाः ) (सए ह च्ण्णाकणादहा 9 15 [राक्र 55 शह्वृप्रप
ताणीक्ठणातठ कद्,
110 9 श्रवः एदा, 1 शात 0580 ` धाक्ट्सपाता)४ 98 0 {109
15131011 | ग 8 हा0& =6|[} 1065 116६ ` तप्ताश्च छप च्रात +76 1.0
{07 116 र्ला६) 4८. 118 एणकः ण कि एल ०९ प्रौ 110 ०४0 पहा 1
ध श्रपप्रणटु्षालशः४ 9810 116 11678. 07 00, नर #@ ० 0९ कण छकष्त् &५,
फा परदद्धि्णधह 9 86] ००-78-26] (95 नाणक } प वलं ६९९)
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ध्वात् चहल) एकष्याह एण्यः धह नृण पला 86 प्रच
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णौ एदा एलालंएकहव, = -पणछठफयः पवतण 38 10 [0881016 पा ]68
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ण पाह शह 9 ह पि वापएतपती इणाह (कह चमा) 10 पह हणा
0 {116 1८80718 180 10 €] [1९71008 च्ाा55 [च्छा (षा
शिपन्् {0/0 +16 फ]1द16 पाल्य, [ह [कष्ट कवुप्रत्व् क्षा [वहात
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1. 1 119 कण्ण कंपः 13 (सरत् (ठ करणात् नात [शएक्श्ः प्यक 06 उप्र
11318... 1111111
9. 17 ५0९ 51 सखिदखित्रा 13 षहा प 118 1102310 ०१ ६:-- "दन
1० 0४४७ 2 नलु पर्त [7 ॥त एषह तुतत) त ¶059 छलः छत् 138
२०१०६ सनेव 19 एकपदं 1६ पधात् ०९:-- ५१7 (कु 9658 57४ (10115,
1 106 अदा 6888 0 पद्ह् ठाध 10 शनः 926 क 294 एतापत् 15 इतक 9
एष्पलषणन् फ्ठ९त् ता चा णु 54054 87 10 58113885 06,
पृ पष्ठ पश्च, (1:11
1६068801 [शा ९8†8व् ए 118 शप पाछपद्ौा 18 व्हक्रानिक्ा९६ 009
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पाह्या† गात वना तक्र रा चति कलाक त द्ष्डलंहा, १ = पराद्मा0ड
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1111168 7 1116 दद्ठश्रा8घ् 8चत तातएाऽ ण उ0भीह 7107 8४६
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पचथ, १३} त द्या 141र७ प्ष्कृपलाहाक क 0० प्लत 8
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त णहा, सिता च्वृपा 18 1119 कद १५६8 ध 1115 01 ला तादः छाः
हदधा00114 ( 1} पह दाहा] जपणु्छक (छा ५}. -षुकतप्ः 18 1118
च्छणचल्पणर्प्नण ० पार इयणाह कप णकः 1 त एता न 6
8211011 ० प्रह 11110त्.+ = ष 11 कणन तत 815 [णद् ( 116 0665
00) व्रिातुक, हव्प्ल्पणुगृक्णा ९, 8 पठ 680 0 16 छाल
।॥[ ए ¶1ष्लाए } ५ च पाठ कोष्छ्युणडणः 10 (पढ ए58 म) [ाठ५]६त्8
= ननन
1. ¶16 चकला "ककड 1४3 [चा {नारा॑कत् 1४ {16 कचात् शकक ०7 116 छान्त
त एह कचा क क ४०६० 0110 1-1-1 {दोवः सम्राधिः),
2, 11 118 तस्य् य दसीणय ६५ उत विश्न 1 =+ क; च 15 पर्लहातहपं ६1 र 05
1 1 1/9... 1111 18.81 11111
१, ¶10 751 पराण दषा 70. (तन-द्नड 2 07 108 स्का [ष्ण कफात, प कि्मस्ा्त,
क्थ 1 वीत व 109 ।ाश्क्ंठठ एषफन्ते (18 स््पष्प्पतर हतफूर्महै 7 11 श्यं
[न वणं एत्रापठ्ड चछ (नृ,
244 12911711 ,.0
(17111111 11 1.
फलवा षण्णा 15 #णड-- 9 वदाल 18 पीर कच्छाटी
गि 017 1, 3
71010018 छ न" चपर का 776 ( चणप्) कका, 8 (वकल ती (1, 6, 9
इध् ) 1185 पाण ति व पाकहा छाछ, सपु हाकल्यस् दष्टा पुटक
॥1। 1४8 एकौ, एफ ४1६ परा०फ1६466 ० = 16 ९5७8110६, 16 81181 6६य॥ ५8
{0 (45 ८४३६६, 178 एष्व ता फलत च८९. एठा) 18 9 छप एठाह र्मा
0०९६ 7०४ हषं 11785 18 1116 1एषवणाणद्ठ. ( 2}. (72. ३१४०}.
+ 111 11111117. 11,
&०, [१7 168 एठा 77 [नक्क ्ठष्वह्टट जण, (धार अप्र्णा) 185 10 णवः
10 [णि 108 प्राक पाप, इप् 11181 11165 0लंणद्ु 116 इ८ा8९
1116780 (1, 6. ०८ 8188 ॥ ००४1६06 } 711 116 51६6 ० १६६] ६1९६] #1्6
81131 -. 1/1 1 11218...
गश उता पौ 111 तत्छु 51९66, नाला 18 1 8
7011 1107 २, शि) शाः 179 116 &०१६ पणाः ४16 01178
101" 118 ९३.५70 88.110 668 101 {18.668 ण [1द्11112.2६.
एलाह ण 80८0 8 अप्रा न 6४6 १0111658 18
6८16१ (ष्णा 716, 1 छा 116 0716, 8081 प्ल§ 2171 [प्रा १,
प्र) 0 ए्191115 0967, (3).
08 पोका 0 7९ {8 11115 ) :- कि 1169719 1116 पछ
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(08 तिल्सठह 76 [कवु ३१ कषक जि छ18 0 109 ॥2 [्णुणनिशहते.
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पणा च 4६४68, = 115 एह शहा€३ ० 46110 कल द्व#€ (88 {0 छप्रात्,
४1९ 8९ ¢ धाह, पाठ इदएयदणा छत् { ्हदप्र] ) [2164875 298]066-
पर्प 815 ०५1९५ 16 57९6000, 1100089, 26†, 11६ 0९६ ण दद्छाःट1्ा
40 1115 ५12 ० इह्ा1971, „1 पाक्त [दक 17ु च्णक]दव्टत् ई 1886
प} धाह [नणु3, (रप 018 एष्व ) पष्पश एकाह दाप्या, 4.1
1. 11४० उण पण्णा एणा ता [0ानपठा8 ठ अ 17. पथाम दण चक्का 19 ४९
1111 11.1.11 15181
4 एत कष्प्णप् कलानि होमा 7 कैठणीन्धकह ठ १ 00 5 (दुर ०0) कालत
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8 ला 0ष्य [क ॥ एति 9. [चाक ( वप्रा } ८०।९५ 6|ल् वापय
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दुक, 8४३ करे पणा द्य 18 ह ददल ता या (कृषाण त
छक छ (16 इहणच्छ, ५.१ 7 पातं 5।घ+६ सदठछापापद्ु 10 तताधह 1 प्ााणत्
तथां द्छपय्यटड 1115 प्ष्ठय छण ५ एषषा इषत्, 88 ससधाषफा
70505 ९, 8४१ ॐ तणदुााण्ल [ष 9» भतो र्न किह्छछाहा०€ काह कतल
1. कणि 10717 ह1791 17 0-0816 3 9. ६१ चारि शा 110 ५0७ कत् 111
धन [तैः छत् 717 पात (प्म तिहा {= पह कत् सं एर 119 करणात् हं #9 1195 वणा,
पणाः ऋष्य पतापु पकषत ५५४ 19५] 10, 1108 ०० 20750 18४
णाश र्य णा पठ चप [ह
‰. 1 108 7300 हएत 77. पानचतान् च 44 178 उद्धा 7845 18 कषवालठत् (1४5 कत्
1 18.1.11 1191111. 1111. /1111..111111
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॥ 2 11.52.11 1 7.
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0 फतह किरष्ण्षा०७ 1158 ए८छण्लछ पारणि पइत 1010 115 ण6९# ण
116 पष्ल्ाणाणदठु स॑द16 118 1108 नं कषा द6, शु एरप्तंप् 1प च पठन्तम्
वाथ 18 00 कु 8 एण किष्ल्ड्ा१६, पतला रहकर 18 ४18
(य एह १ 1६ [व त्वपः कवच्ज्हा०७ 1158 तत्फला पाह पर
पछ" 85 धाह पाप्ला8] सप्र ज 6 इपुयाणछ्णड्छा ठा ०6५5 8
106 शुभा 0051/709 ण वणकपदवृट६ कात् पाप काह ४६ पााहह शृणदक्षा 0?
5 {106 [0 0पप्राह त #5 पपात एतद नाद (+ ६, (11६ "1ा7६८॥४ धगृष्ताा्
1711. 1,811.11 11.1.11 71111 1/11 11/14/1111
887188. [1 17 18 व्रह्पं त्वह 10 पाध ८858 1116 पाक्त 1५॥ [हाद् ॥हक्प्
1.1 11.111 11.11.113. 11.711 1॥.
{011 ¶9 0८टणा6 1118 इट्ठ कात् तष्टा 111६ इह] निद्राया 05655 9 (16 5811
0111 10४ 04 10४; ( ५6 एल, ) 11 18 710४ 006९५ = 06९87188
18 कए 7 70 पा ९बृ08016 ° कणणुद्चाक्षाप108 { ०7018) 010
0 116 धडा त स ए [एक्पेप्ठ्त् त 80 दद्रा] छु) च हटा,
11168 0871 ३ एप्15 नाहा 178 तिपः 185 15 एदुरयतुि ०८ पणपएणदहा-
छाणा छा क् णाता शीाला९ 18 1118 एए-णदय 100 त 116 [वला आत् 11619 18 10
१18; 1.18 11171111... 11.31 111.
चणा, ॥ष्ल्भाहठ ॥वद्याष्ट ह 8 7115 नाः 1" चिरा । [ष्ल्माच्छ पष्ठ पठकाः
07 95 [1071166 [अ क पापश्च छा वल्छ्छणषपोस्वं सु 8 ४/1 ५
छाद्ुषाा फ इटा०, (0, ६३ ),
( ए पालः 9 वुप्षठदत्तिण) 01568 88 105) 1184 18 118 इद्र कनिाण ण
{05 8185 ाफतक्ष्र णण्ठप्ताद्ि 30. 8 पुकल्छा (118 स्9् (र 7,
1050४} 18 ० 6 6 प्राह 1 8 ५0ह इ 7 15 708 ण 18
17४1 वप्ञ| इप्] 88 11फा6त क {6 एणत् ( ०१) चातयः ( ८] ) 11196
10 15 ४706 लता 111 115 1016 वा छाक्ातः 88 [पाप एष 0६ 0द्ाात्
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ण ठ च्छ उचा83 फु, वाहद्पयहटु क्षणत् अन्छागणष्ुर लः कध
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{ पाणा 2 उख्ल्फरातं }, क्र लणणपाह्छवहः वुह्ठन्रिर॑तंणा कात् प्रश्रं
वाडल100100 णाहं 70 उठी एलाह § 8६ ३0 01110016 कवत् 16 7008568"
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807 हप्रलातु फ ६18 [ 1, 8, 111 1116 ६856 छ 8] (11888 तुल्या मोह ) [18 [ला शस्तं
1 (6 कीकट) यदत, पकाः काट] 18 एष्चुप्ठह् ४0 पप्र
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(गधपप्छ६््) 18 वथा किषमादका"+ (एता, णा, एद. [प्-5-1807). 108
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पि) कापिणौ रूल) कतटुाह्ः का 1056 पणत् चपणड इणु पाणा
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छा 10 1६5 एण पापदृ्रट न ॥प्प्ा६. 1 1४ 15 णपुच्ह्व् णन
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9 8प्0]80} ¢ 8]0061-116 ४411101, 0४ प्ाणदु 17 तवं [प्6कल]ण्) चौ पाक्ष
18 प्रता एणाः 06०5 पण्प्रदा 6 कर्मा 18 0 8 वष्ठी व बुह्ल प
(1. 8, 08 [[एक157448) ० [0585688 {116 पुप्प ग एलं € ए८ण ०१6
पच्या फ़ (प्ण 55 1) 8 ४ प 10 पाह प्रोपौ # (1, €. #न द्वग),
183 उतत्वः (ल्य णाडल्व् एता 3 ४06 फएश्चाभीस्तह).
1. पञ 8 पठ पन [ता् पष द प 1, 1) किमातपे ५५ ०००९५7४
तिः 1 कप्त [णि जिंद्ठन्द ब्राप्तैपे णप्णत्र् 10 निञित शणाः चथ
ए ्वमकप् अा 77, 91 (वतछाचव वाव, सुत समच, स०, "हद, 8, 59), ग8
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4. पलास ,.. =^ 61 | ^+ व्क १४ विः ॥
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४, 29, 27, 423, 44, 46, 48 8.
49, 57, 59, 61, 65, 67, 69, | 2 पप्817881041181001057185878 40
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98, 94, 96, 97, 118, 119, 187, 295
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151-62, 154, 156, 157, 168, | 22808 =... ६4 1५8
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111 09४. 1739, 174 | पद्व द्ाछा08 „०, 40
. १, व = 76 | एड्ताद्पधव्षपप्र8 „= = 209
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॥ 1111 {1.1 कि / 1 1 1111 {त १9
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130, 183, 148, 151, 157; 167 | 184, 185, 2681
1, ५.1.01. ,.. 41 | छा्ोादचानितेह दणड 2, 3, 9;
एाद्ग्छौः [पान्चप६ 4६, 80, 1871, | 10, 19, 14, 15, 16, 0, 5,
174 १4, 27, 921, 37, 40, 49, 45,
एकाक्ष ,, = 1992090 45, 49, 50, 57, 59, 61, 64-65,
शाण्डि ..-3, 40,153, 199; 239 69, 691, 75, 76, #0, 83, 84,
सत्रा कत क्का ,,, + 0 85, 87, 8, 97, 100, 10109;
| 1.1. 1 41.1/1 1111 नि =“ छी 114; 146, 153, 1517, 158, 162,
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एदलादकपवा6व४ ~ 28 | 198, 208, 211
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॥:1. : । क +७४ „^ 76 | एष्ता्नृ्षः + = २
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॥:॥ 1. 1 क 19, 37 | एणवतप्ल्टपााषाा ४ -- "~ 147
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॥६॥1, 1, ,,, 119, 190-91 186
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तृणम द ... 95 | तुल णवक्री8 160, 151, 172
िप्राहव78 = ,,. य ५, 70 | 174
580 110811858 वीः न 1851 | [िपपान्द्गणाष्व। १1, [न) 10 |
॥॥ 11: 1/1 १ ४ न 1, 4 | 7प्0द्ाचणणकिकक =, 196
085 (001#9 21, 2१ 259, १6, 251 | [ऋपा == = "=> 199
277, 2४, 85, 120, 121, 186, | प्रापुदणनुाहाणद्रसतप्रण पच
1411 + (1/1. .11. ~ 1 =_> 194
[कधा ,,., ०+५ == 24 | ॥ ॥ , 11". क 55 ००० %1
10 ,,, > ... 30 | ष्क =, --.53, 206, 207
1411, 1 1 १1 ==» 8 | [त्र्लठ -. र == 40
0.1 1/.., ~ 128, 199 | [0 ्रठा19 (17 1116 ४ पद्8 वा) 149
0,5५1.1 14111 206 । एथ] लप 0 [वाश्च [111०
586
1प्राहद्ध ध पा तान
प्रणत 0 दपुगशोपय > 89). .3.7.1. >. ~.
ह्ण्णोङ्ग (10 -प्पुप, | 6४ ७५ 45 ०, 188
19181... (न ० र | प्लान ,. हि == 119
पर्ष अ „> 41, 4९, वातप -0शात्ाद्ज्ाा, -विशापः ०9
[दात् ... ध = 86 क बर्ण) = -.„ 105
ए्त्ु पदवंष ^ 94, 124 | पाप्णपकश्ूव 18 156,172,198202
1 1111, 1, 11111, - 70, 205 | (11४४ णषठट, -.. 209-08
1 1 50 | प्रगृतच्छ „~ „^ 188
0111. -.„ ‰2 | प्रपतमकुष्ड्ाकणा -.. ०,» 69
(कतंव्रवाानाच एाा्नदलीत्राका ,., 31 | (च्म क स -- 159
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(6,111.14 111 =» ¶ | 18. =^ 3
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080९8 [1 [1 च 99 30
तिंवपृकताकद्वपश्षावक8 == 40 | 170४ र = भन 89
087१5] ०० 35, 36, 89 | 1701718 6९
6३०११] वा 11, 39, 41, | [बा = 150
153, 195, 203 | कणु - = 7
(0/1. 1.11 11 [क फवाध (171 ६ ¶ ०75) 38}
मु अदाता „र, 41, 195 13
विप्रा ,, + = य | [द कथा रतश ,.. 54, 38, 1411
(प्रहा, -.. म =» 2711४ [7 _ ~. + ==» 170
(वपयय प्रवता ० एतत | [धु ,=/ 148, 144
22" 25 | [ध्षाफुषदणोन्च ,.. ० {‰‰
(उक्षा र, व ०, 129 | पृ्रण्पिगुहा 8186 = ,,, -*= 2115
(ठाद +, =, ॐ | वद्वा ^ दाह 00 चक्नहः) 26
, 61.11, ५1 क 5५ = ॐ | य श्ण 3 1 जतदाद्रा8 = 26-50
(6/1, 1.11 = = 3 | गष्द्दपात्रफिशापतं = „= 40
(डत इप्णणफणमना (ए, र-३१ ) | "908 4 + ०, 05
129-24. | चकद्र 194, 197, 198
(तुरण ६ ,., 144-44 | "20741 9४ ०० -- 19
(दावन... 21; 26, 34 | ¶ ०0९41811 द + 9
+1. 1111. = 158 | ग ४1 ५० ०.9, 90
61111 1, 1 11 - 1.11 ./311..1.. 1. म -,„ 30
(0197 „+. .... 211 | वभाणा71.8 =तिप््ठऽ ,,, 39, 38
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911 विन ००४ == 30 | वशा, ... भ „=+. 119
वभावत, २३. पद्णतणठता5 छादधतक्ला१.. २१
पिलाश्तादात8 ५ पुव 26 । वशुदधाताशपाामे 63
ध 8 70 कप प्र0न४8, %87
एषप्त् छव दु एव ¡ एत्वं छाः पिवतु >. ।
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82, 184, 185 | दाततरार [दह्मापृ8 त्
नद्धा ,.. ०५५ *=» 192 40, 114, 299
च कक्षा ्पोततात्यएलछ ,,, -. 40 | 1ृण्डा8 न „1
नाप्त. =^ 168 | रा णार्लू8 207, 879
1.11 1 न == 190, 191 | दाका. 4 न+ अ
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0/1 1, 111 1411411 778 | (धाक्प्र -- 1998, 199
निमित्त ,,. १९५ ॐ | णार ,. दाः तं दगपम
प णा ण प्राह ला ९8। 6 8॥ तताप व्क, 58
-4 हा 50टालतु ,. १81 | भाप द -.. 209
१1111... 1.1 == 197 | शिं 18-14
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4.11. . वि त 0.11 4.11 न= अभ ऋ
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द तातवपोप्पदणृ्तभाद =, 6 | पणता 23.80.31, 920 99-94, 58
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ह वएाक्णा ,.= 3, 40, 1539, 2111 | डत] १४ ५५
भावणृमतंप्ष्ान ॐ; 40; 11 | पताडतरत + = 59, 6
एद ,-. = ~ 91 | 1 दापडतष्ावप्रकलापाडा ,., 177
पशु ... क ,, 8 | [श्टापकतद्भुर -. == 8
(वाध्छ्ाप्त .. प ... 36 | 18154... ९ ,.9, 16
00:01 ... भ 263 27 | 1.418.80४ [वषि , 18
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कत्ता णडा8 „= १ | [कवा दवदलुाहव्च8 ,,, 16:
षा ... „^ 2 34, 1411 | [पापतरकतत8 58 „= 98
11190111 व ,„, 159 | 1,425.87 23145919 .,, 138
[र श्ापल्यड = = 34 | [कु ५५० म = 13
पिकपपक्तोपतपा0 एणाणपात... 9 | [व्पषापाक्षा8 । श
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पध {71 1116 ¶ ०४/६8) 140) | 11703 (1) 106 ति दए ४848६18) 188
3/1 | + ^ 87 | [सव्या ,.„ 159, 18667
(रष ..., नि .„ 94 | 1.0 कद्वत ,,, ५४ 22
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11०09015 80 =. 7; 133 51 | कस्ताप्न्नीवन्याह छश्राश्वक्रषत जः {106
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28६ 178 70 तह षश,
|, ..1.8. 80.1.11 8 | (तत् का एषा [= 1
15, 17-18, 20, 50, 38, 40, | फषिप्नाफुञ पश्वा „=, "~ 30
48, ५4, 46, 46-47, 48, 49, | [ष्फणछाः =, . 40
80, 56, 9, 88, 73, 77, 85, | ०18 == „रर ५ ०, 198
88, 9, 94, 95, 96, 109, 104, | 28१ छणपं 1971, 138, 148, 218
115, 119, 128-8, 128, 130, | त्िभा8 = ,,, ध =, 18
153, 135, 187, 140, 141, 144, | 1193 9 भ ०» ‰09
145, 146, 155, 158, 181, 165; | धिग्फापात्र तीकनललादाप9 ,, 30
177, 18189, 186, 187, 193; | श्वित्री 8४ „ 198
199, ‰00, 201, 209, 210 ` | तितहणह्षी रू, == 189
पीप 8511)4१48 39, २04, | रिता न ह भ /
2761 | पपाद 000648 =» 196
॥ 1.1.411 ~+ # | पश्ाक$ व ्9, = 34
07} कापर 22-25, 49, 87, 199, | ४8 पील भ „ 146
185 | एतशा १4
तात 21, 34, 187, 1571, | 018 0158 .- ई ==>. 0
158, 164 | श्वापि ०.०७ *== 689
16 वठपकः ०० र =. .129 | शा३. न स नन,
॥,1117. 1,111.1. क %9, 29 | [पातो 891५8 30-34, 38, 61, 1988;
19 ( 1 ४06 चदन 180, 14:, 14;
इध) ~ 186; 141 | कान्तपपात्पफा, „= 84
1 ्न्7... 75, 113, 122, 205 | 1000 त... 54
[नाद क58 > विह. 111 - (ध ==
1111704, श (3.1. । ॥ 111 4 { वि क = 208
॥. 1.113.116 1.1, , श ५५» ५५
1:19 = = %2 | प्रप्ता, =, 3
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॥ /1.1, 11.111, श -„„ 29 | 0 रपत ,,, 177, 20
क णाततद्माष्वततिष्वपहया ,, 29 | प्ण ईपाि, न -.. 199
पत्य पृ्पक्चाह्ः 138, 157 | ए पण्वृ्प्णृन्ाणडक ण तप्तम
शक्वप्ला „= ~ = 130 7, 140
11917६19... ४४ ०» 29 | पिपा. = ञे *> 811
॥ 01 1 ७७ ०५५ =, 27 | 77 न === 1१3; 179
11, : 1 „„ 130, 191 | अिष्व. वि ज *== 9
1181188 = 169, 172 | कबष्््न]पा8... 9७७ 99
0षित्ा8 1118158 82, 93, 34 | द्षध्युप्णड् -तप.,. 98
एतद्वाव प्क णभा 9 १; 11 39, | मित्त = र = ¦ ओत
160, 195 | पिशा. 40
॥ 1. 11 == =^ „~ 119 | धिश्षद्मा४द8 ,,, पव [पलप
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ए छा 7 एःणुशछछ्नणो 1६.
नद्ष्०१५ पत॑8 2, 8, 4, 6, 6, 7,
9, 10, 19, 14; 15, 16, 19, 20,
29, 27; 95; 87, 42, 44, 47,
49) 80, 56, 572, 59, 60, 61;
99, 64-65, 68, 691, 75, 76;
१9; 81, 82, 88, €4, 85, 86,
87; 85, 90, 91, 97, 99, 100,
7101-0,
118-19, 146, 147, 149, 153,
136; 157;161; 162. 165, 167,
179, 175, 177, 184, 188, 199, |
209, ‰09-10, 251 377
05188 09प९040918 118 रप प ५.
144
िश्चपधध ण १8... ह ००» 29
षिणकृष्धाक धप +") 9
तिश्कक्षाशुपछड्तताण ,,. व |
पा 0 „^ 210, 211
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पद ०५ ०» 88
1,01.111... | = 9, 194
॥, 0,1.11 १५१ त 14
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10०08 9
0/1 68
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पाप ४ द्ता१7५9 15; 16
। 9.6 | +^ 1 | >
{^ 41111144 8
8.1... क अ » 1.58
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11.11.11 . 126
कपप प्र =. 68
109, 115-14, 117, |
> 198 |
289
॥ 1,8.31, 1, 08
विपताक ०, ५» 29
1 1/0... 1.1.11 ५» ३4
पपकतकद्यदणद्मणछा =. + 8
कपु ७५... > ५८5 30
6 1/1 1, 111 29
वि ४7१९5११ | ५» 34
पितम उिि78 ,,, १, 28
नप कव कृष्डतए] ए त8108 == 28
| तवतकण ण्त् 979 ,,, 28
| नकत. २8
(1178 4 ०० {99
,8/111 + 19111 ० 198
ध्व ,.. ०५, 6
॥ 1.11 11 11/11, ५५- न्प
-सथतात्पाच्ठ +, (11115 कतक
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25011510 0118 र ००»
4... 40, 41, 79, 119,
108, 208
॥ 1 1 11.11 1 व) === 137
05709000 (10 #116 द्रप
1॥ ०6811} ,, =» 2198
॥ 1111111 === 4
141 ** 10, 40, 86
8 „+ 40
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> 811011651.1)8 ००७ „349 96
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1,11.1. र = 911
0 धल ञ08.03. ०० {9
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पङ्ति णाप्छ०पदा ,.. प | एताश सिपि, 86
॥, ^. {01.1.11 21, 28; 55 | एशावणप 8 (६ सिप 1१40) 25
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१ ^ ८. 1* र.
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॥ + ११.१५1. ॥‡ ; 1 | १७७ ,* =+ 18
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प्काण्ठं लाः पि-पुव्याताः +
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थ ,.. नः 1
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7१९२8 प्रातं „र, === 089
णक ... + 191
। ‡ + >" 1.141.111 , 85
पए = ,,, + 182
ए पाप्ड १५, 157, 164, 2117
ए पाप्रहा ४ ,,, (10 6 सत्पष्प8-
84819 ) 35, 96, 185-36, 140
एपाप्रडीः र (1 प्रहे एएतक्माौपदत्॥8 )
75
॥ + -' 1] + =" 179
ए प्णपन्रीतनद्ण, &4188प8॥1 ९, ए, ५,
8, 12, 14, 17,:48, 49, 61, 68,
717-78, 80, 87, 96, 100, 119,
133, 147, 157, 168, 185, 170,
186, 191, 198; 197, 207; 211
[ताण 51४0745 च 11975578.
26, 27, 80, 81, 188, 148
॥ + (+ 1 1
ए प्वक्षापि ,, ह
प्क्वााक्वा011818 ,,, 28
व (10 1106 ४००६517) 13940
0103109 ष -„ ‰0
पशुपा दत्छषप्रा ,,, 29
एतद, ७ न ०० 85
पिद्रण8 ज + 9
48 8915 (पतह 198
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ए 418 ण निपाक. 88, 119, | पापतरं भ = 99
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(1.1.11 ,,,„ 114 | १18 ग ० 11; 1178
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प्र 9109700 प्र ड 28, 24 | १ 1888 (1 80 + पपाप्पछ9 ) 142
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प्ाटयोवण्व्ड दलप, 26 | प्रकृष्ट (६ ्धा8 ० शुएण्ट्1) २10
एानाषकाद (10 दया 4 पाशाय) 148 | प्कृदप्रण> (प 15 प्रह्वद्वा8-
एतना ... =° 146 8481104 } == 131, 191
प्राश णपप्णशप्मतड =. 146 | प्रकदप्णादताप्छ 95, 181, 192, 150
एप, 154; 172, 175-76, 198 | प्रकुत्य इतक न 177
एह प्रवात ५ 4 पपक्थ =, 199, 194
॥( +... 11. कः | # # 1. / 1 \ 111 ५०४ ० ‰6
॥ (41/11. 1.1. हि ०० 298 । # फणा फदा९1573, ० 20
पपासा उत्ादधफकत 2, 3, 214 | प्रप्र... ५ ==. 99
11411 11.111 + कि }, 41. , , ११ ०» 188
एणा... [क णावा | पततक्ाद्गीहपा्च, „^ ० 29
|) (१. 1 क शुा9 (वकु णौपफणाह पाद णाऽ}
४1 900 क्श... 40 131
(ए 91718 9५2, 165, 160, 2967 ॥ १1.4.11 41 १» 61; (2, 180
प ्ादपलुतणलुतस्वानेद्ुप्कार 0 | पतच क५ 87116 81, 186
पौष्य „+ "र 211 | पशप्पस्तित्रन . = #
एष ,.- +^ 4, 199 | ¶ 44"0711078,+ न *= 24
पट्वी ^ ०० 199 | ¶्प्रपताष्णप् ,ू, भ 6५५
नि1एणा्वलकिपुतषा + 4, 55199 | गणक = ~~ 130, 243
वसता तिक. 168 | ४ण्द्वकतापतश्छ ककव ,,, 2३
एप 19, 105, 107, 10809, 110; | ए ण्ुकनोतकतह 0" ¶४ ०९7९0१19 [3दप्रव-
111, 113, 115, 115, 1165190; ता 78 ... 22, 24, 77, 146
। , 9451 | + ०४४ जपत 0 जिव ध 5188
ए 1178... ४ ,* 107 180 15, 36; 37, 128, 1399; 1407
प्रकषण , = 50 | ए0ुभाद््नी, --= =~ 9
प्रक्णा0ाा8 =. „+ „^ 196 | प्रण््प्दज।न0१॥) प्र्रणक१४, 197
एकप्ा9 रत ऋ 1.1. 11; शा ०० 92
8 नितः एतत 8१५ एर 558 | पकड २०७ == 6
धत (८0पणाहणद्ल्णः 9 ध06 | ४09. ह ७ = हि
^ [7 वीत्वा [146 ग फणा (णाल वात् रिरसलगह्ं 7,
ग, 2.- 1116 13785 1878 अव 0711115 ०7 116 ३५75 [21015 65 11959 17 11
[01114 19८ ऋ 1115 धा
रीका द {८ ०, 1... 1:00 १.1
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11111114 11.111
ताण्वुपठन०ा 70 इत्याहा 0 किष दा 1188,
27801; ए 11811118 83/4.511. 11/11, 240 1917
11/11. 1.118.111. 1/1 11111.)
१८४१. प्रातीप त्वतच, 1893
4.4 7९1१०8111 4111 111 5831815; ॐ
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पप्छ1. 10 च16 हवा)6 18411296 4, त 01६1 21 2307108, 1924
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पण छात् 4 चकत एप, 0. प, 1918
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14 ष्ण ||
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१,1.11 | 1 1 1; 1: , 1.1 1
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21. ^ [हलां [हठ (91910द्धुह र र (स्माया = [सभा 57 [=
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2, [186 प्ाताा8 ६० छतर ; 9 पतत छा ' [चाय पदा म
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न, 2... 1928 ॥ +...)
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णाच ¶17118, 150) , 4
24. ववाता्रा्कत्र ः 8 प्रद का पह (षत ाष्रात्ड दकता
0 व्ारत्ताताणदठ जी, [फ दिव्ससः : श्य् #¶
६, न्रा, 14४ ++ 19
29, ‰2, &क्र195709109 : ६ क्ण 91 १010, (चा
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11110 श्णापक] : श्यीस्त्ं एए पमि ४ ॥॥
श एा्रुषाद्यं १03, 10.10. ाााहनानश्य, 2 ०19, 14241935 10 1
0, 31, 83011 ; + पततन दाक ४७५४ 0 णाऽ,
१३।९त् 1195 4, एकता 8॥111ह् = 312 ०8|| फते, शा~
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[1914821 ५१114 -4., 211.1). 1ष्मौत्णत्डा, काच, 1926
1 „ 14-॥)
27. ^ [दका [ण (1100६ 1 55, आ 116€ (ला
नाता, 00१४: दता] 0 (=, ५. रा ्ुपाप्लाद््य,
4. (का 1. 8. दाय 209४7, ए 1 सक
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४ हृहदणना०, = 1 एताव), 1935 ५५ #=॥॥
24, म्०9०।1५६ 0 41001195 पद्व 0| ; 81 £ -
हतका कतय वटक ष् ा ठह छि प्रोत् पहता; नुग
(षाक 1 15 द्िणकत्] प्एाान्छा्लद् साति (12 तक्म
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व्ल ; लना1न्ल् 0. 0. ददन, भ. एण
ष, 1, 1925 <>
२४, 91911353: 8 चता ४ 81901780, {णा ०1
विशा०१.०)97]छष8ता7, तपीषडछात दद्र चनह [ाततोह्िः संका ता
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1.4. हात 1. ठ, (त्वात्), 1020 ‰-4
30, 31. प्रत्र 008 ; 7 136१1078 [ाक्डत1 59 क्ता
त £ & च्छया, 0९ चिप्र, 8 निए छां
1.11 11 11 1. 1, 1, व 1.
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0४ पालि द्त्गोा्लकाचीतरत्छ० को] 3 काहछत
0 2. सावत, भ ,५., 1.1). 2 १०1३,, 1929 -. 240
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35, 34, 1781-० । 41 सन्धा 711 11311. ५1९
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2, (~, 1९18, 10936 , , भः छ
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1111118१ 1. 1,771.
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1.111.111 1.7 7
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1.20 क „ ७141 दठपालरश्यतंछड ७ [वन
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१ / 11111
7.11 1118.111. 11117113;
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71 (1 का (कुल्यं ६४५,
1. ., (1.1... प). 1. प्ण ~
2, 0). ६ 1[कत्प्क्लत ; ततावलतत ऋक क | 1५ 10०-
। 0
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एष्या, ए सक्ष : शवाष्सते पणो धा दालज्किह उफाणत6-
1. वि त त 71
दिव, 21,4. प एतह छया ततृ [कु [पी
छापा पच, 2 ए०1४., एता ए [+६अौ), ए५।. 1॥ (पट)
1926-1998 १४ च ह
हतवा 14175961 फसा ६ छ -भा किप या्
1. , का त त क | =
एदा एए ऋ. ८, १. उल्का, 1.18. (रसाश्च), सवात सि
न पपकं) 11, ५. ाष्डौत्छान्लि, (णाति 1६6९,
पठ ए णत ४07६8 ६ पफाल एन िणषिददकार-
स्थता ता भकु अ नािक्तापिता। 01 1 क
प्र पध - क कपुष्ातकहि फार ॥च्छापतूुाु + ४96 16116
्त्छो (10 इ10त। त एकतायाः [जि कलानि
&.11.} : इतान्ति एक 3. पिासकनाधि्प, 2.0. 1929
121, 41.1.11... ए 1 1/1 त. 1, 111.
प्राफािः 0) कोसौ कोत्र 058४, [दताः ६4 111
~. 11151250 ; द्वप एष पध ०188 प्रीत
चिणं अकण), वा्छा, ऋत इ, 8. तिक्ाहडक्रहय) सल्ला,
तिहा] [पतिन एढ7णत्9, 1929 १ न
118. ५,
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रित्यत : छा ५1178112, (द्रत [ष त कड,
(य निष्ठ धकतट ५5 [हात ।> त 116 [> [करद
(न [८1. 41 च्या 2.11.) : स्ता 0% ‰, ४, का
वर्था सिथया, 1020 +
पधी भा ति ०500105 708 ; १ धा वद्वा वाड 41001
0991 र त्, 3 पव छा) @क्व18 1, 0118 9४] 1८13165
६० {75 ्राकरिचत्किणा णा तचो 18 तो |8, सा ज एषी तुक ०
पकाठ : स्य [ए एकता 2. ए नातकाकत18 0, 1090
पिताक; ता) तीत्माासवूष, कफ दििताहपत्वापाः, चपल
फा 715 छता ताता ; क्वोन्स्थ ॥क चौ; 1 #.
{३0वात्1 आतर 0. इ. सिपद्ण्ण्वर्या। 01.40. 2 कठात,) ए. 1,
1929 #
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(डद 500८ ६ एफ 1४ हप्र पिद्तरोह्ा
क नता ता रमा ६१०, 11 0टाडाा दशर अतं [पल
थाह) ०6 ( शुल्यपीषो सि एठतवक पं तवता, ०४ हज
पठ 1817 {70 84118 {४ विच्छा (षडह त (हका
धवत का वतक दवदतीकाप् : स्पटिति [४ त (रा तष्टुगृष तलप
1)
9117911 = [11108घ्। इणाणण181811) : 1151811 1६४६ 24
छ काएत्नोहः त (कवटा ४ | भप्व्णताणननं 111
एत्या एष 6९ अख) 411; 1.4... तादौ, 2530090]
111 (च]]ए्ढ, च प्न, 1940 =. .
(116 गा 7 णा प्रि्ाच्णणकतै, 17975
णप नद्वल का लठ प्रप्त ए [0 प्हश्
[वप त (ल्त, प्ण, 4. ५ एच. १०. 1
[241584८], 10६९, 1951
0919 पए; > चका ण एत् कह त (६
ध्ान्ट।जा१ तत्राह 0१ ४्य्रहवताा> ता ॥ह [त चलाकर
0 8111 111 111११
(1411105, 1031 . , क क य
॥1.11,1114111111 1/1 (1 4.8" 11) 111 क~ 11
{08 तानाः क्रचन जा प धह (हा 5140]
115 एतत ल्6 [१ प्रलप्य -५.12.} ; तपाद 04 8, 9110619
11974४४, [11.11., 1
१9 एउ 7108 : छा 1110 [तीक पका
० ४1 5 कषणा -\..1), , 1112:11ए पएणुटणनछ] 0 1115 ठा
एता पए: धनल कि एतत ए. पभपाद
तापा इ8 ० एकत्या, क फार प्रलय प पत एतपा$
हनो ‰. (पए्ठफणष्य ७ ए. 31४0१8४, 71.10. 1031
प त४४। तौ तावता वलया: 01 [पवद कौ 16
1.11 11/18 (न्ड 1/8, 3 1111 11.111.
।-111,11. 11 "101... 1,111.1.
प्विाप्ठिकरापता1 5111, 1981
द्र्दतसात्ठ उचत ६ तवा कान्तौ गता प्रष्कप फण्पर ण नक
वित्रा ५ #पालछ णा ह्च चला 0 ञाता एए
1700] [168 पा छ छक्र 81001 त वप्त : एरका ॥४ तकल)
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ताण, 70.10, 191 ५
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गलं प्राहौः, 161 छण 1011 (हापा, ति प्छ
णृप् : स्पती प (1. च. ल्पत, 1.8, [चलपल्न),
17 88.81 9. 11111 -..11.11/11
2 #=.; १०।, 1 (+ह दा], 1432
9.1, ,11 1111111 क 11111141 ^ 81.11:
५90४, 1105 पिः गानो णा 1178 "185, [प
शाव्ापण्दाधात्रछ 1प्प। ण (5 131 ब्लाक सतीाषतं 9
प्रि. ए. एक, 214. 1932 ..
58101374 0195 8 पा 1४9४ ॥ ४ 11111 1६५1000 द 10
एपुताणोष 0 ठण्ड 10 साधत वणका ]11एत। एषु (16 पिणत 19
|, १1, , 1 9 । 1 1, 1
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9. 13118415 ‰ ८» [7.11., 1952 भ
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118 [तर (179 ए0 कृतादर [फिफ 00105 07 ‰.11, {78
स्मितेन ०त| ातरापातजानि,: स्तात ए 8, पना
छन, १4... 21110. 4 १०३ ४], 1, 1311148, 1032
++ 11/11 1 1 त 1
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षणशणुष वणल, ऊकितोएदल, [रविणा ` ~छ्णराकु+ ‰ ४०1
1. 1, 1952 ॥
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13111113) |+, (५.1 0 £ 81 ५ । 1.11 .1.10 8
(पि तानोश्षहव 1015 1911 णा तका] ॥+सप्राया॥ 1१
97५] ली 1881, + [त्क्व 1.1, (महद्र
018 तातां, प च किफाटफताप् ककं सि गकतद्तती तिचा
0, 1932 0
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पाच हपाल क ठणधतहकछवश्ः त (प्त्फतल्ना४
ल्पात् + ए. 0. 701 र्ध], 9.4... 1, 1034
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छा: छपा 9४ 9, पातष्लााछ, 9.4. [स्ता दिकण
11-0 ,.
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1, (5 [आ वत्रा (155.
819०6३88: 57050 0 04, पिदणद्ा50119 [का, 4 ५।।६..
४0], 11.
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कादा १७।८97, 01. + 3 १०18. ए०]. 11.
‰ [६51011४६ (10 ्ण६ ५ 155. 11 116 911 11
धता 8 छा र्षा ; लहत शिफा पष हल 0 118 [82
3, 0. 10. 11, 4. 0 1 8. 01, 2 २०1६.
ए्ा०६०९8६ ४०८४१1९5 [7 ^+ इन्र 191078६8 : {दा
1815 19 कणा) गिणः एष्ट 07 रणा, 4, च.
5०४०४, 0.4, 1.1... एर (जाश, छक.
1}.
ध
8. ^,
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(षन 43 शानध 10४ पापात, शप्रो 8६ 11६
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वदा 8. (कात्र त 106 (तातन [पषतानाह९, छात्,
आदा (दक णा॥ 3 ; लाप्राणान्ााह्ु 3 112 पा.
[८ प त्राता हयात एातताड। कप्माल्, त्शाद्कत्र |
पला ॥ 8 (ष्काणटः ता 16 1818198 ठा 19 र, रा] 77
फ11 एफ्ुष्पततम्या)9 : एवल क र्वः सिए [हक
श्तिपा: =» फन निद्र फल छा
णण प प, 9 छजातटायकृकतद् त द् ि्नोत
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छए [पा 2, भीताश, वाह्नः (न्तव,
{1:1१
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सहिः पितता: श्वाीहत 1 (, 1५. लतत, 1.5. (1178),
ताष्छा्ाौ क छ (फक, २ का, ठ]. [ [्द्राह पत्ाधच -
17191.
प्ति ; 4 सतह फक्त ता [हीह वी पितः
[पना ता तकाषला| साहि) 5 1. 5, त्रातक्त्तफ्रत्षा)।
सकला त पाह (होम [तािपा, कप
111. ए. 91 13111
॥॥1111 9.0.11... 1191
तिका 0011 च 18, 1.4, 1.14, ८. एत कवाषलाए,
1१/11. 11.8.1/1 1. 1 0
(पा तस्ा ; ज दण फा 176 चवा रा
स्कतद), 8 कतो फण को भप्त छात
41075 फ] » पक्त, पणता; स्य11हत 0 त, 7,
9/1...
पपाद) 5 त्ता ; ॥ परर्णप्फा एकल) ता [षी [श्त
11134119. 1 1
1 18217111. 17.
ष्व 09 वाश्व; छा शाना ए्णलतणाप्ा पवाती8
४३02 » (उपाक ० 91 प्राश्य 11111060 011158} इछा 8105
प1६|॥ # एटा र ६5 887४8 छत 1 गश्च करश्ाप
कौत ए जामाता सवं पततः आ तकता 0
स्वाप्त (त्ता - हल] कद पां (कणकश,
1111 1 1.9. 11
०181111 1181... 11.18.11
उत्त] हति [क् ६. 8. परिभाषण स्थिक छ 10६
| [्तातिणौर, वित 8,
10.111. 11.14, 1 1.111.871... 2,1.11
प्िष्डालणा [तः (उवाह, > [कपी रिण 9150 ;
€त1150 ४ ध. 2. भपणताक, १.4 ., 11,
11111 141,
्ित्वाणष्ला०, एर197111 961 [ 118 र्त्त, च [111
प काह्ध॑स्वसपरचः छ] ४ पिका्यफ्ान्कतीकक पत पक्र ।३
111 11111111
1.
|| ॥ 11 11 १ 111 21140111.
५ [षनाृति$ट पत्ाकद्ण्ट छ 1155. ता वह (01167181
[त्रा ौह+ दिवान्ते (लद्राता+8, कक्षक्ाह, हाप (साा४
द्रा): एतए ए 16 [तपए इ, 12 ए०1३., ४0०1, 1.
णिता : कजााफहातित8 त्रो 1६ सिपित
ए १, + 11401 001195011111601 का : दद्धि (क पि,
1] (एवा, ? एण., २०।. [.
9101199097718 ¶ जाा8 : लछम छित [40768 0) (711,
पद्व, जिपतेक्रतं, छापे पाणान: सप्तति
7. एदा, 1.1. 4 ए०1३., १८. 11.
पपठ 878 ; 1पणवषदर्णितत) 1 शक्तजप्ा प णा
छदप्ौः क ४5 पपुकतैतुः वाप पल] नन 17.
४0 1811. 1, 11 -2111111/11/ 1 8, 1 ण, 1
1,111.7, त, व, त +,
1. 2. (धाता. ठ 7रठा8., १0, [,
एतु पपी : 8 पितता फणाः पच्छा वातत विहना
ता सकतोदात च्छा प [रलौ वातकरं, काध। 11
हका का निशिता [तत्प् प्रप्य ५.11.) ; स्वल्प (क
2. शकण, 10.10, 2 7018.
(नाता 58७17 : >» (तह्ता रणा कदप्य। 0 १70 क्रत
प्त; सहाल्त ॥कं पल्ल, 3, 1, वावाता, प. 1. [7 ्,
क्न्य धि, ८. भण,
एता "जक : 70 कातो क्ता का] वृत्क्रौप
५11} 16 (णाणरान्टात्ात र्त [्तपाष्ष्द्ा, ; अत्कणा+। एष्य
च्वा्िका [ए हका त पपिक्तः प [9-
2 : 2 ऋक ज णतामंक [ज, [ए िणीह्मीौकाप
प्रषु त + कवद्ुक्ततषना फतकह: स्तोतु त्रा ४
दवाः च्छाद (क [-पकवै- काफः -लीातताधा,-
111,
वकत ज्ञा्वाक्तप्तणान्खच्का पि ; कां [त्ाकक्ात न. ; को
[का 1015 पिष्टा कप 177. विलाल र, बणछाताहणान भ ¶0हि,"
०] 1.
ए [पानी किक पाक्षा5 [तण हाता
५११
वत्त [ताता
6,671.1 1/ 1, 9
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१ -9.18/.11.91.114 1111111. 9. 11101 (6119... 1)1।
पा 04.
वाट (णातातागा1 ४6 5॥॥त# ० द्व ाॐ : [(0वाला॥5 :
1, {ह स्णााषहह कात् तदात्व पचात # पता, आ, जुण्डाज
प्त] लप 20८ 4 ४0. [1196 500, 15 प्रहर,
4 > अध पडा. [ए, अ शतत अ्ीहषाीह, इभृहसपप
का प्तरि = #, 10४ 8. प, 116 वाध०-
६10 ककि त्रैह कवय एलाह 106६918] ¦ एए ष्वा 3.
एप्नृतह्वल, 4.4... 10224 >>
115 शि ा1ाकडणुीपए तातं (ण्डणाचद्् फ ० + एटा ०९३. | [0 तिहा
1 8 ०5015158 पीऽत्रणप्रच्ह छा। १165 पहा ता (06 तलातन्नप्न
णठौफछर छदा, 9णत [19105 {क, ऋ प्रह ण रहप
छा शशा] (एठाप)हपुद्रह फ ा6ा 4 0.0 छाहा110] 1
015 पल्ला पाहल्प्णा5ह- [आ कण € ध छ 1६
10६10015 ० कषु प्रदा पतला (16 प0पत््ाषडञ
॥1६& {1101; £ पअह्िोक्रततातातत् व्हा), ॥. +
1921. (कात 75. 5) +#
0६141005 १74 1०51 &8८175 1 | (जतस्य)
[वदा ; 1, 106 कतित ता 70611, 11, [पणा प्हिहपत्ताा
9116 शवस ष्ि. 1, यतह अपति धव. [ए्, ल
डाभरू) ब्ठ। न्ना. प, 106 षार फ |0एह वाद] क्रा
# 7558. ¶], (0 च+ म प. ४11, ॥1६
10१९ 0 (39 पवत 145 वादाः. # 111, श्छ ० [कि 3 अप्0-
प्ा्यणा 10 पधि की}: पवनय] 91 त् एए सला णा ४
आ 3., 1021 < १
१०08 धप चतह ६ 0९ 111 उप्र0जन्धठट ७ 1 उ83 0
14118 चा १1६011581083 4. प.प, 6 01908319 व्रत
ता तिता्छप् 9. [[-तातणष - ण्ठा. 1 कृषका) एला पाच,
71, 7णानास्साप्ण तष. 1, | पवक ककाप्रह्टः 1४,
प्राण्य] तवाक. ए, काटा एवा9, - ४1, 198. एत् 8, 118
पाणी शातं अवैहि]; 0 10 6, पतह, 11.
19101, [नीला 11) 3.5} नं
[ताता [क वात (हा 598; [[ 1718: 1, 1001198
फफ णत् 118, 11, [्ातातलणक, य नभा: श्र
7९10. 1, नाहऽ18 शाते त्वलाा ठरो , 8
एषठ साणक््टुक ० (प्ता पाष, प, पिष (तदा
8100 ठो (तहा शादि, ४, पपिणं8०0९ छाती
पणानां तो पिका कवा ददा. भा, हाः ताण्ड
[तह छ कता 8116 वषद्वितता, 1-, 116 ५8108 0 ८07
{लारा 1 01111. च, धह पि णा वछााप्पिंणा, श्र,
काणा वाप (कपा. 411, ठहराया 87 भपप,
श, एतत णा एटि 7 817]; एक 41080 +
प्रतृह्लाए, ४.3 .. 1010. (ण 55. 3) +
"5, (पापतः का ५1 ; = [वकवत धयं {16 प्लुत
वपत्र ए (105 (ताए ० 108 अ फत्008] य) ता; परिकञ
[हत् एष ए 11०17 (10 ु8701081 अणा, 1915 . ,
(00 पदा ता ०91 इए ; एद ४ एनत य एषा
{पिए 108 नाशयतु क्री 1 [ला 797918110088 1
1111-8 111...
अ.५., 1011
पलि, 3,
15-4॥
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= 01. 1111/811/110.17.1/1.॥/81 11111171.
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1165575 , 1.021010 $ (0 40, {स दव्ःा तहलसं, [-तान्नकरा)
|, 01.31
िस््ऽ. पाः सिलारी, 41, 14 प्ट षहः
न्ता), एए, 1,
िस्डिडाञ, [हा हणि शद द (0. 19 & 3, गोपक सिः
{का 7144९,
णिह कातर
आ ल्58ा5, ता प्रहता, प्लवत प्रत् + व४-
प्रका, निलामर् 14, [रण (, 1.
1.1
96595. (९०10 इ (1० लौर्श्णालुलौह 5, ४8176.
१.11
पर्वा. (08 एत (0. 11, 4/3, (| 2479.18
2125318, प्रपर्णः {पर द (0, 2. ष्वा 141.
८१२८७ (1४
01458, छात्र पा 10985 स {0 410. 10910871 138४,
१117
2७३७. पाला 1 कलााज्रातत3, वान्तः लु,
41 11100. 4६,
टडञाठ, ककि एतातन प्रत्तञड, पप तक्ता, पिज
एण दवति च स,
1111 ।
िल्छजा5, 1ा्चणलषश्रो श छह, व 24411, कतक
2००१.
1168875. 0300 पपप्या ‰ 0. 19118 ६0
रूह, अ, भा. वपणी & 07. माहा ७,
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तहता एत्णाद 5 + ह््ाष्फ, 19. 0 पद्च्छप्ा एए.
= व = ज ढः § 3
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| ॥ | | | च
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